जुरि चली हें बधावन नंद महर घर सुंदर ब्रज की बाला।

कंचन थार हार चंचल छबि कही न परत तिहिं काला॥ डरडहे मुख कुमकुम रंग रंजित , राजत रस के एना।

कंचन पर खेलत मानो खंजन अंजन युत बन नैना॥ दमकत कंठ पदक मणि कुंडल, नवल प्रेम रंग बोरी।

आतुर गति मानो चंद उदय भयो, धावत तृषित चकोरी॥ खसि खसि परत सुमन सीसन ते, उपमा कहां बखानो।

चरन चलन पर रिझि चिकुर वर बरखत फूलन मानो॥ गावत गीत पुनीत करत जग, जसुमति मंदिर आई।

बदन विलोकि बलैया ले लें, देत असीस सुहाई॥ मंगल कलश निकट दीपावली, ठांय ठांय देखि मन भूल्यो।

मानो आगम नंद सुवन को, सुवन फूल ब्रज फूल्यो॥ ता पाछे गन गोप ओप सों, आये अतिसे सोहें।

परमानंद कंद रस भीने, निकर पुरंदर कोहे॥
आनंद घर ज्यों गाजत राजत, बाजत दुंदुभी भेरी।
राग रागिनी गावत हरखत, वरखत सुख की ढेरी॥
परमधाम जग धाम श्याम अभिराम श्री गोकुल आये।
मिटि गये द्वंद नंददास के भये मनोरथ भाये॥
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" यदा यदा ही धर्मस्य,ग्लानिर्भवति भारत..
अभ्युत्थानम अधर्मस्यतदात्मानम
सृजाम्यहमपरित्राणायाय साधुनाम,
विनाशायच दुष्कृतामधर्म सँस्थापनार्थाय,
सँभावामि, युगे, युगे ! "
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कन्हैया तेरी झांकी जो देखि भली |
मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल, अलकें अतर पली ||
वैजन्ती माला उर साजे, हार गुलाब कली |
कटि किन्कनी पग नूपुर बाजे, मोहत बृज सकली ||
नखशिख लूँ श्रृंगार मनोहर, संग ब्रशभानु लली |
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"''श्री क़ृष्ण ,गोविंद हरे मुरारे ,हे नाथ नारायण वासुदेवा ''.......!‎
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गोकुल में जो करे निवास
गोपियों संग जो रचाए रास,
देवकी, यशोदा जिनकी मैया,
ऐसे हमारे कृष्ण कन्हैया!
राधा की भक्ति, मुरली की मिठास
माखन का स्वाद और गोपियों का रास
इन्ही सब से बनता है कृष्ण खास
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हरे कृष्ण ! हरे कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हरे हरे ! हरे राम ! हरे राम ! राम ! राम ! हरे हरे !
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"ॐ नमो नारायनाय "

" सिद्धार्थ: सिद्ध संकल्प: सिद्धिद सिद्धि: साधन:"

"ॐ नमों भगवते वासुदेवाय"

"श्री कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।प्रणत: क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नम:"

"श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवाय" ||


|| श्री कृष्ण शरणं मम ||
|| श्री कृष्ण शरणं मम ||
|| श्री कृष्ण शरणं मम ||
|| श्री कृष्ण शरणं मम ||
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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