लग्न में जब गुरु हो --कई मायनों में महत्वपूर्ण है बृहस्पति---

लग्न का बृहस्पति कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जाता है। लग्न का बृहस्पति जातक को विद्या पि‍पासु बना देता है। हर तरह से ज्ञान अर्जन करने की इच्छा इनमें रहती है। हर बृहस्पति व्यक्ति को अच्छे स्वभाव का मालिक भी बनाता है। लग्न में बृहस्पति होने पर व्यक्ति आसानी से परिस्थिति के अनुसार ढलने की व खुश रहने की क्षमता विकसित करता है।

लोगों में पहचान बनाने व कम साधनों में भी विकास करने की क्षमता रखता है। नई चीजें सीखने की ललक रहती है। यदि अन्य योग दुरुस्त हो तो ये व्यक्ति ज्योतिष में रुचि रखते हैं। लग्न में बृहस्पति होने पर व्यक्ति प्राय: अध्यापन, काउंसिलिंग आदि क्षेत्रों को व्यवसाय रूप में अपनाता है।

बृहस्पति के बारे में यह तथ्य है कि यह जिस भाव में बैठता है उसका नाश करता है, मगर जिन भावों को देखता है उनको लाभ देता है। लग्न का बृहस्पति कमजोर होने पर शरीर यष्टि कमजोर रहती है यानी छोटा कद, दुबला-पतला या अति स्थूल शरीर रहता है मगर इसकी पंचम व नवम-सप्तम पर दृष्टि बच्चों, जीवनसाथी व भाग्य के लिए लाभकारी होती है।

साधारणत: लग्न का बृहस्पति निरोगी, दीर्घायु बनाता है, जीवन में संघर्ष देता है मगर अंत में विजयी भी बनाता है।

स्वराशिस्थ गुरु के परिणाम अच्छे ही होते हैं। तुला व वृषभ का गुरु कष्ट देता है। अन्य राशियों में अग्नि तत्व की राशियों में यह व्यक्ति को धैर्यवान साहसी व ज्ञानी बनाता है। जलतत्व में होने पर व्यक्ति न्यायी, उदार, सहायता करने वाला विद्वान बनाता है। कर्क (उच्च) का गुरु जीवन में कष्ट देता है।

लग्न का गुरु प्राय: अति आदर्शवादी और अहंकारी भी बनाता है अत: गुरु की शरर में रहना, माता-पिता का आदर करना व अहंकार से बचना आवश्यक है।
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जब लग्न में शुक्र हो----

लग्न का शुक्र जातक को शारीरिक सुंदरता से पूर्ण बनाता है। शुक्र प्रबल हो तो जातक की आँखें बेहद भावपूर्ण होती है व वह बातें करते समय आँखों व हाथों का प्रयोग अधिक करता है। मीठा बोलने व लोगों को लुभाने में ये माहिर होते हैं।

लग्न का शुक्र स्वभाव में कोमलता, भावुकता और विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण भी देता है। यदि शुक्र लग्नस्थ हो या तुला-वृषभ लग्न हो व शुक्र पंचम में हो या शुक्र महादशा 12 से 16 वर्ष के बीच कभी लगने वाली हो तो चरित्र का ध्यान रखना आवश्यक होता है। अन्यथा यह शुक्र गलत रास्ते पर ले जाता है।

शुक्र लग्नस्थ होने पर जातक कलाकार होता है। उसे गायन, वादन, नृत्य या चित्रकला का शौक अवश्य होता है। लग्न में शुक्र हो व उस पर शनि-राहु की दृष्टि न हो तो बाल प्रौढ़ावस्था तक काले रहते हैं, त्वचा की रंगत बनी रहती है।

अग्नि तत्व की राशि का शुक्र (विशेषत: धनु) विवाह में देर कराता है मगर पत्नी बहुत अच्छी मिलती है व जीवन सुखी रहता है। वृषभ का शुक्र चरित्र का ध्यान रखने की सीख देता है। मिथुन, तुला व कुंभ का शुक्र भी विलासी जीवन में रुचि देता है। कन्या का शुक्र पत्नी व घर परिवार में रुचि व झुकाव बनाए रखता है। मीन राशि का शुक्र अस्थिर विचारों वाला बनाता है। कर्क और वृश्चिक राशि का शुक्र अच्‍छा पत्नी सुख व संतान सुख देता है।

शुक्र की कमजोर स्थिति त्वचा रोग, डायबिटीज या मूत्राशय से संबंधित रोगों को जन्म देती है अत: शुक्र को प्रबल रखने के लिए स्त्री का सम्मान करना, कफ को संतुलित रखना, सफेद वस्तुओं का सेवन करना व देवी की उपासना करना फलदायक होता है।
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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