कैसी रची थी खुदा ने ये दुनिया
अब कैसा इसका हिसाब दिख रहा है,
हर दिल को उसने प्यार से सजाया था
अब दिलों का हाल ख़राब दिख रहा है,
जब इमानदारी थी तो फ़कीर दिखता था
अब धोखेबाज़ है तो नवाब दिख रहा है,
दिल की सूरत के लिए इक नज़र भी नहीं
हर नज़र में बस शबाब दिख रहा है,
माँ-बाप को यहाँ दी जाती हैं गालियाँ
और महबूब ही बस माहताब दिख रहा है,
दिया जाता था संतों को खुदा का दर्जा
अब पंडित हाथों में लिए शराब दिख रहा है,
खुदा भी हैरान है की वो प्यार कहाँ हैयहाँ
नफरत और धोखा बेहिसाब दिख रहा है,
कैसी रची थी खुदा ने ये दुनिया
अब कैसा इसका हिसाब दिख रहा है
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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