इस पल से उस पल तक तुमको ही चाहेंगे
कहता है जो कुछ दिल उसको ही मानेंगे
इस
पल से उस पल तक तुमको ही चाहेंगे

चाहे दो कोई भी सज़ा हम तुम्हारेही रहेंगे
चाहे हो कोई ख़फ़ा हम तुम्हें अपना मानेंगे
यह दूरियाँ
अपनेदिलों के दरम्याँ न रखेंगे

सच कहती हैं आँखें जब तुमको देखती हैं
राज़दिल के खोलती हैं, इशारों में बोलती हैं

इस पल से उस पल तक तुमकोही चाहेंगे
कहता है जो कुछ दिल उसको ही मानेंगे
इस पल से
उस पल तकतुमको ही चाहेंगे

थोड़ा क़रीब और मुझे तेरे दिल के आना है
इन दोआँखों में तेरा हर ख़ाब सजाना है
सब कुछ
भूल गया याद कुछ नहीं तेरे सिवा

गुस्ताख़ियाँनादानियाँ
जाने अनजाने होती हैं
जब-जब देखूँ तुम्हें पता नहीं
क्यूँहोती हैं

चाँद-सा चेहरा जब है तेरा
कैसे न हम देखेंगेएक दिन
भीजाने कैसे
बिन तेरे हम काटेंगे

इस पल से उस पल तक
तुमको ही चाहेंगे
कहताहै जो कुछ दिल उसको ही मानेंगे
इस पल से उस पल तक
तुमको ही चाहेंगे
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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