तृतीय स्थान संबंधी योग----
स्थिति अनुसार भाव की क्षमता का आकलन----

तृतीय स्थान से हम भाई-बहनों से संबंधों का विचार करते हैं। तृतीय भाव से कान, व्यक्ति की अभिरुचि, छोटे-मोटे प्रवास, मन की स्थिति, लेखन, साहित्य में रुचि, आर्थिक स्थिति, पराक्रम आदि का अंदाज लगाते हैं।

तृतीय स्थान का स्वामी तृतीयेश कहलाता है। इसकी विभिन्न भाव में स्थिति के अनुसार इस भाव की क्षमता का आकलन किया जाता है।

1. तृतीयेश लग्न में हो तो महत्वाकांक्षा व आत्मविश्वास प्रबल रहता है। भाई-बहनों का सुख श्रेष्ठ होता है।
2. तृतीयेश द्वितीय में हो तो संयुक्त परिवार रहता है, भाई-बहनों में स्नेह बना रहता है।
3. तृतीयेश यदि तृतीय भाव में ही हो तो इस भाव से संबंधित सारे सुख पुष्ट हो जाते हैं। लेखन से यश मिलता है।
4. तृतीयेश चतुर्थ में हो तो मनमाफिक घर-वाहन सुख मिलता है।
5. तृतीयेश पंचम में हो तो संतति कर्तव्यदक्ष होती है, भाई-बहनों से संबंध पुष्ट रहते हैं व कला में प्रगति होती है।
6. तृतीयेश षष्ठ में हो तो शरीर में अस्वस्थता बनी रहती है। परिवार सुख में कमी आती है।
7. तृतीयेश सप्तम में हो तो जमीन-जायदाद के मुकदमों में जीत, जीवनसाथी से सुख व पार्टनरशिप में परिवारजनों से लाभ होता है।
8. तृतीयेश अष्टम में हो तो परिवार से, भाई-बहनों से बैर होता है। वैवाहिक जीवन भी तनावपूर्ण रहता है।
9. तृतीयेश नवम में हो तो आध्यात्मिक प्रवास व प्रगति के योग आते हैं, लेखन के क्षेत्र में नाम चमकता है।
10. तृतीयेश दशम में हो तो दो-तीन मार्गों से आय होती रहती है। उच्च अधिकार के मार्ग प्रशस्त होते हैं।
11. तृतीयेश ग्यारहवें में हो तो स्व परिश्रम से धनार्जन होता है, मित्र परिवार से लाभ सहयोग मिलता है।
12. तृतीयेश व्यय में हो तो आर्थिक स्थिति साधारण रहती है, परिवार से वैमनस्य बना रहता है। वाद-विवाद से नुकसान होता है।
Share To:

पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

Post A Comment:

0 comments so far,add yours