पीडित् चन्द्र करता है मन को अवसाद ग्रस्त---


आधुनिक भागदौड के इस जीवन में कभी न कभी हर व्यक्ति डिप्रेशन अर्थात अवसाद का शिकार हो ही जाता है।. डिप्रेशन आज इतना आम हो चुका है कि लोग इसे बीमारी के तौर पर नहीं लेते और नजरअंदाज कर देते हैं। किन्तु ऎसा करने का परिणाम कभी कभी बहुत ही बुरा हो सकता है।
डिप्रेशन मानसिक लक्षणों के अतिरिक्त शारीरिक लक्षण प्रकट करता है,जिनमे छाती में दर्द,दिल की धडकन में तेजी,कमजोरी,आलस और शिरोव्यथा(सिर दर्द) सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त इस रोग से ग्रसित व्यक्ति का मन किसी काम-धंधे में नहीं लगता,उसके स्वभाव में चिडचिडापन आ जाता है,उदासी रहने लगती है और वह शारीरिक स्तर पर भी थका थका सा अनुभव करता है। वैसे तो यह बीमारी किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति को कभी भी हो सकती है,किन्तु अनुभव सिद्ध है कि बहुधा इस रोग से पीडित किशोरावस्था के जातक तथा स्त्रियां अधिक होती हैं.......कारण,कि इस रोग का केद्रबिन्दु मन हैं ओर मन भावुक व्यक्ति को अपनी चपेट में जल्दी लेता है।जैसा कि आप सब लोग जानते ही हैं कि स्त्रियों को सृ्ष्टि नें पुरूषों की तुलना में अधिक भावनात्मक बनाया है (परन्तु आधुनिक परिवेश में देखा जाए तो इसका भी अपवाद है,इसी समाज में आपको ऎसी भी स्त्रियां देखने को मिल जाएंगी जो कि निर्दयता में हिंसक जीवों को भी पीछे छोड दें) दूसरा,किशोरावस्था के जातक इस रोग की चपेट में अधिक आते हैं, क्यों कि उनका मन अपने आगामी भविष्य के अकल्पनीय स्वपन संजोने लगता है। स्वपनों की असीमित उडान के पश्चात जब यथार्थ के ठोस धरातल से उनका सामना होता है तो मन अवसादग्रस्त होने लगता है। 

डिप्रेशन जैसे मानसिक रोगों का केन्द्रबिन्दु मन है। मन जो कि शरीर का बहुत ही सूक्ष्म अव्यव होता है,लेकिन आन्तरिक एवं बाह्य सभी प्रकार की क्रियायों को यही प्रभावित करता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार अवसाद(डिप्रेशन)मूल रूप से मस्तिष्क में रसायनिक स्त्राव के असंतुलन के कारण होता है,किन्तु वैदिक ज्योतिष अनुसार इस रोग का दाता, मन को संचालित करने वाला ग्रह चन्द्रमा तथा व्यक्ति की जन्मकुंडली में चतुर्थ भाव के स्वामी को माना जाता है। अगर चंद्रमा या चतुर्थेश नीच राशी में स्थित हो, अथवा षष्ठेश के साथ युति हो,या फिर राहू या केतु के साथ युति होकर कुंडली में ग्रहण योग निर्मित हो रहा हो तो इस रोग की उत्पति होती है।
इस रोग से पीडित व्यक्ति का सबसे पहले तो वातावरण परिवर्तित कर देना चाहिए,लेकिन यह समझ लेना गलत होगा कि सिर्फ वातावरण के परिवर्तन से रोग मुक्ति संभव है। इसके अतिरिक्त उसके आत्मविश्वास को जगाने का प्रयास करते रहना चाहिए, साथ ही कुछ महत्वपूर्ण सुझाव तथा उपाए भी इसके निवारणार्थ यहां दिए जा रहे हैं;-----

1.रोगी को चांदी के पात्र (गिलास आदि) में जल,शर्बत इत्यादि शीतल पेय पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
2.सोमवार तथा पूर्णिमा की रात्री को चावल,दूध,मिश्री,चंदन लकडी,चीनी,खीर,सफेद वस्त्र,चांदी इत्यादि वस्तुओं
का दान करना चाहिए।
3.आशावादी बनें। प्रत्येक स्थिति में आशावादी दृ्ष्टिकोण अपनाऎं। अपनी असफलताओं को नहीं वरन सफलताओं को याद करें।
4.एकांत में न रहें। बाहर निकले,दूसरों से मेलजोल बढाएं और उनमें दिलचस्पी लें।
5.कभी भी खाली न बैठे क्यों कि अगर आप खाली बैठेंगे तो मन को अपनी उडान भरने का समय मिलेगा,जिससे भांती भांती के कुविचार उत्पन होने लगेंगे।
6.हो सके तो बेहतर मनोंरंजक साहित्य पढें,सिद्ध पुरूषों के प्रवचन सुनें,व्यायाम-योग-ध्यान साधना इत्यादि विधियों को अपनाऎं।
उपरोक्त उपायों एवं सुझावों को अपनाएं तथा अपने घर परिवार,समाज के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करें,दूसरों की खुशियों में अपने लिए खुशियां ढूंढने का प्रयास करें..........जिससे आपका जीवन भी खुशियों से महके उठे।
श्रीरस्तु.............................शुभमस्तु................................कल्याणमस्तु
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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