विद्या के तीन स्थान माने जाते है,पहला चौथा भाव होता है दूसरा उसके पंचम में यानी मृत्यु का आठवां भाव होता है और सबसे महत्वपूर्ण बारहवां भाव होता है। विद्या के लिये अपने को पहले सबसे नीचे यानी मृत्यु भाव मे ले जाना पडता है,और समझना पडता है कि हम कुछ नही है,जिसके अन्दर हम का भाव पैदा हो जाता है वह विद्या को प्राप्त नही कर सकता है। दूसरे विद्या के प्रति जो भी शरीर या शरीर से प्राप्त साधन होते है सभी को तिलांजलि देनी पडती है। इन तीन भावों में अगर किसी भी एक में गुरु का प्रभाव हो जाता है तो जातक जीवन में विद्या में सफ़लता ले लेता है। गुरु को बल देने के लिये जो ग्रह सामने आते है वे भी अपनी अपनी योगात्मक शक्तियां देकर जातक को अपने अपने क्षेत्र में ले जाने की कोशिश करते हैं। गुरु जो ज्ञान का राजा कहा जाता है वह जब अष्टम में बैठ जाता है तो जातक को बाल में खाल निकालने की आदत भी होती है,वह अपने ज्ञान को कूडे के ढेर से भी निकाल सकता है,राहु मंगल की युति खून के अन्दर बल देने वाली होती है,लेकिन खून के अन्दर बल देने के कारकों में अगर शुक्र का समावेश हो जाता है तो वह नशा बजाय शिक्षा के अनैतिक रिस्तों की तरफ़ अपना झुकाव बना लेता है,इस जातक की कुंडली में शुक्र बुध और मंगल राहु का प्रभाव भी है लेकिन शुक्र के बक्री हो जाने से शुक्र का असर राहु के पास नही जा पा रहा है,शुक्र बुध की तरफ़ जा रहा है और बुध शुक्र की तरफ़ जा रहा है,इस काम को जातक की बहिने पूरा कर रही है जातक को अपने घर परिवार या औकात से कोई लेना देना नही है उसके सिर पर तो केवल ऊंची शिक्षा का भूत सवार है। जातक के जीवन में लगातार बढोत्तरी का एक कारण और भी बनता है कि वह अपने केतु को बारहवे भाव में लेकर पैदा हुआ है,केतु का स्थान सूर्य की सिंह राशि में है,वह सरकारी शिक्षा संस्थानों में अकेला रहकर पढा है,वह अपने सभी काम अकेले कर सकता है,उसी किसी का भी यह सहारा लेने की जरूरत नही है कि उसे कोई चाय देगा तो वह अपनी पढाई को करेगा,उसे कोई चिन्ता नही है कि खाने में आज क्या बना है,उसे कोई चिन्ता नही है कि वह आज चटाई पर सो रहा है,उसके अन्दर तो एक ही भूत भरा है कि वह अच्छी सी अच्छी शिक्षा लेकर सबसे ऊंची पोस्ट पर जाकर विराजमान हो जाये,गुरु ने जो रिस्क के भाव में बैठा है उसे अपनी पंचम द्रिष्टि से आगे से आगे बढाने की कोशिश कर रहा है,वह अन्धेरे स्थान में रहकर भी पढने के लिये अपनी योग्यता को बता रहा है। कालपुरुष का कार्य तीन भावों से जाना जाता है,एक कालपुरुष दूसरे भाव के धन और भौतिक साधनों का प्रयोग करने के बाद अपने जीवन को चलाने के लिये प्रयोग करता है,दूसरे कालपुरुष अपने द्वारा दूसरों की सेवा करने से प्राप्त धन को प्रयोग करने के बाद अपने जीवन को चलाने की कोशिश करता है,तीसरा कालपुरुष अपने पैतृक व्यवसाय को प्रयोग करने के बाद अपने जीवन को चलाने की कोशिश करता है,इस जातक की कुंडली में अगर आप ध्यान से देखेंगे तो जीवन को चलाने के लिये कन्या राशि जो जीवन को नौकरी या सेवा करने के लिये जानी जाती है के अन्दर चन्द्रमा का स्थान है,चन्द्रमा माता से सम्बन्धित है,माता का नवें भाव से सम्बन्ध है,नवे भाव में वृष राशि का सूर्य विद्यमान है,जातक की माता को वित्त की प्राप्ति सूर्य यानी सरकार और सूर्य यानी पिता से प्राप्त होती है,उस वित्त को जातक की माता खर्च करने के लिये बारहवे भाव के केतु का प्रयोग करती है,बारहवे भाव का केतु सिंह राशि का है और यह केतु सरकारी शिक्षण संस्थानों को सम्भालने वाला भी माना जाता है और ईसाई मिसनरी वाले स्कूलों के सम्भालने वाले के रूप में भी माना जाता है,केतु का सम्बन्ध जब धनु के बक्री शनि से होता है तो वह माता के द्वारा किये खर्चे को जातक के विद्या के लिये और जातक के अस्थाई निवास के लिये भी खर्च करता है,इस शनि से पंचम में गुरु होने और गुरु का स्थान प्राइवेट स्थान में होने से जातक को उस संस्था के ही अध्यापकों द्वारा ट्यूशन आदि पढाकर भी ज्ञान दिया जाता है। माता के लिये शिक्षण संस्थान में रहने और विद्या के लिये खर्च करना लिखा है तो सूर्य यानी पिता के लिये ट्यूशन आदि के रूप में जातक की शिक्षा के प्रति धन खर्च करना लिखा है इस प्रकार से दोनो ही माता पिता जिनका सम्बन्ध पारिवारिक और धार्मिक है के प्रति जातक के प्रति ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभानी जरूरी हो जाती है। सूर्य से चन्द्रमा जब पंचम में होता है तो माता का पारिवारिक होना जरूरी है,लेकिन माता का पारिवारिक होना और माता के प्रति जातक के पिता का पूर्ण सहयोग होना तभी सम्भव है जब गुरु पिता के त्रिक भावों में अपना योगात्मक रूप दे रहा हो।

नवे भाव का सूर्य चाहे जिस राशि में हो लेकिन उसका तेज पीलापन लिये होता है,पीलापन लेकर सूर्य मर्यादा मे रहकर चलने वाला होता है,सूर्य के अन्दर पीलापन तभी होता है या तो वह अस्त हो रहा हो या सूर्य उदय हो रहा हो,जातक की कुन्डली में सूर्य के द्वारा शनि को पूर्ण अष्टम द्रिष्टि से देखा जाना भी एक विशिष्ट बात को पैदा करता है कि सूर्य को भी रिस्क लेने की आदत है,रिस्क वही ले सकता है जिसके अन्दर यह भावना हो कि जो मेरा है वह तो मेरे ही पास रहेगा,और जो मेरा नही है वह तो चला ही जाना है। अक्सर जो यह भावना रखते है वे सफ़ल होने के रास्ते पर अपने अनुसार चले जाते है। मेष राशि का सूर्य उच्च का होता है और तुला राशि का शनि उच्च का माना जाता है,राशि से आगे के तीन घरों में सूर्य अपनी उच्चता को कायम रखता है,जैसे कि मिथुन राशि के दस अंश तक सूर्य अपनी उच्चता को कायम रखता है,इस सूर्य का प्रबल प्रताप भी कभी कभी देखने को जब मिलता है जब सूर्य गुरु के घर में ही जाकर बैठ गया हो,जब ईश्वर भलाइयां देता है सुख देता है तो उसी हिसाब से ईश्वर उसे बुराइयां और और दुख भी देता है,इस जातक के साथ जैसे उच्च पदवी वाले कारण दिये गये है तो निम्न प्रकार के कठोर दुख भी दिये गये है,राहु से आगे गुरु तक बीच में कोई ग्रह नही होने के कारण जातक के साथ हमेशा कोई ना कोई हादसा होता ही रहेगा,इन हादसों में जातक के बडे भाई के साथ हादसा मिलता है,जातक की पत्नी के हादसा मिलता है जातक को जीवन से कभी कभी अरुचि होने के कारण भी गुरु केतु का आपस का सम्बन्ध देता है,जातक के अन्दर खून का उबाल उसे कहीं से कहीं लेजाकर पटक सकता है,जातक के अन्दर नशे वाली आदतें पनप सकती है जातक अपनी कर्णधार माता के लिये अपमान दे सकता है,जातक के अन्दर खून की खराबियां पैदा हो सकती है,शुक्र का बक्री हो जाना और बुध का साथ होना जातक के लिये राजयोग का बाधक भी बन सकता है,जातक की पत्नी अधिक गुस्सा के कारण जातक का साथ छोड सकती है,शुक्र बुध की युति जातक को अवैद्य सम्बन्धों की तरफ़ भी ले जा सकता है,आदि बातें भी सोचनीय होती हैं
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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