कालसर्प दोष निवारण---

जयोतिष में राहु और केतु को छाया ग्रह का नाम दिया गया है। राहु शंकाओं का कारक है और केतु उस शंका को पैदा करने वाला स्थान। जब शंका को पैदा करने वाले स्थान,और शंका के एक तरफ़ ही सब बोलने वाले हों और समाधान करने वाले हों तो फ़ैसला एक तरफ़ा ही माना जायेगा,अगर शंका के समाधान के लिये दूसरी तरफ़ से कोई अपना बचाव या फ़ैसले के प्रति टीका टिप्पणी करे,तो अगर एक तरफ़ा फ़ैसला किसी अहित के लिये किया जा रहा है,तो उसके अन्दर समाधान का कारक मिल जाता है,और किसी भी प्रकार का अहित होने से बच जाता है। जीवन शंकाओं के निवारण के प्रति समर्पित है,किसी को शरीर के प्रति शंका है,किसी को धन और कुटुम्ब के प्रति शंका है,किसी को अपना बल और प्रदर्शन दिखाने के प्रति शंका है,किसी को अपने निवास स्थान और लगातार मन ही शंकाओं से हमेशा घिरा है,किसी को अपनी शिक्षा और संतान के प्रति शंका है,किसी को अपने कर्जा दुश्मनी और बीमारी के प्रति शंका है,किसी को अपने जीवन साथी और जीवन के अन्दर की जाने वाली जीवन के प्रति लडाइयों के प्रति शंका है,किसी को अपने शरीर की समाप्ति और अपमान के साथ जानजोखिम के प्रति ही शंका है,किसी को अपने जाति कुल धर्म और भाग्य के प्रति ही शंकायें है,किसी को अपने कार्य और जीवन यापन के लिये क्या करना चाहिये उसके प्रति ही शंकायें हैं,किसी को अपने मित्रों अपने बडे भाइयों और लगातार लाभ के प्रति ही शंकाये हैं,किसी को अपने द्वारा आने जाने खर्चा करने और अंत समय के प्रति शंकायें हुआ करती हैं। अक्सर कोई शंका जब की जाती है तो उस शंका के समाधान के लिये कोई न कोई हल अपने आप अपने ही दिमाग से निकल आता है,अपने दिमाग से नही तो कोई न कोई आकर उस शंका का समाधान बता जाता है,लेकिन राहु जो शंका का नाम है और केतु जो शंका को पैदा करने का कारक है,के एक तरफ़ बहुत सभी ग्रह हों और दूसरी तरफ़ कोई भी ग्रह नही हो तो शंका का समाधान एक तरफ़ा ही हो जाता है,और अगर वह समाधान किसी कारण से अहित देने वाला है तो उसे कोई बदल नहीं पाता है,जातक का स्वभाव एक तरफ़ा होकर वह जो भी अच्छा या बुरा करने जा रहा है करता ही चला जाता है,जातक के मन के अन्दर जो भी शंका पैदा होती है वह एक तरफ़ा समाधान की बजह से केवल एक ही भावना को पैदा करने का आदी हो जाता है,जब कोई शंका का समाधान और उस पर टिप्पणी करने का कारक नहीं होता है तो जातक का स्वभाव निरंकुश हो जाता है,इस कारण से जातक के जीवन में जो भी दुख का कारण है वह चिरस्थाई हो जाता है,इस चिरस्थाई होने का कारण राहु और केतु के बाद कोई ग्रह नही होने से कुंडली देख कर पता किया जाता है,यही कालसर्प दोष माना जाता है,यह बारह प्रकार का होता है।

विष्णु अथवा अनन्त---
इस योग का दुष्प्रभाव स्वास्थ्य आकृति रंग त्वचा सुख स्वभाव धन बालों पर पडता है,इसके साथ छोटे भाई बहिनों छोटी यात्रा में दाहिने कान पर कालरबोन पर कंधे पर स्नायु मंडल पर, पडौसी के साथ सम्बन्धों पर अपने को प्रदर्शित करने पर सन्तान भाव पर बुद्धि और शिक्षा पर परामर्श करने पर पेट के रोगों पर हाथों पर किसी प्रकार की योजना बनाने पर विवेक पर शादी सम्बन्ध पर वस्तुओं के अचानक गुम होजाने,रज और वीर्य वाले कारणों पर याददास्त पर किसी प्रकार की साझेदारी और अनुबन्ध वाले कामों पर पिता और पिता के नाम पर विदेश यात्रा पर उच्च शिक्षा पर धर्म और उपासना पर तीर्थ यात्रा पर पौत्र आदि पर पडता है.

अजैकपाद अथवा कुलिक---
इसका प्रभाव धन,परिवार दाहिनी आंख नाखूनों खरीदने बेचने के कामों में आभूषणों में वाणी में भोजन के रूपों में कपडों के पहिनने में आय के साधनों में जीभ की बीमारियों में नाक दांत गाल की बीमारियों में धन के जमा करने में मित्रता करने में नया काम करने में भय होने शत्रुता करवाने कर्जा करवाने बैंक आदि की नौकरी करने कानूनी शिक्षा को प्राप्त करवाने नौकरी करने नौकर रखने अक्समात चोट लगने कमर की चोटों या बीमारियों में चाचा या मामा परिवार के प्रति पेशाब की बीमारियों में व्यवसाय की जानकारी में राज्य के द्वारा मिलने वाली सहायताओं में सांस की बीमारियों में पीठ की हड्डी में पुरस्कार मिलने में अधिकार को प्राप्त करने में किसी भी प्रकार की सफ़लता को प्राप्त करने में अपना असर देता है.

अहिर्बुन्ध अथवा वासुकि---
राहु तीसरे भाव में और केतु नवें भाव में होता है तो इस कालसर्प योग की उत्पत्ति होती है। ग्रहों का स्थान राहु केतु के एक तरफ़ कुंडली में होता है। यह योग किसी भी प्रकार के बल को या तो नष्ट करता है अथवा उत्तेजित दिमाग की वजह से कितने ही अनर्थ कर देता है।

कपाली या शंखपाल---
इस दोष में राहु चौथे भाव में और केतु दसवें भाव में होता है,यह माता मन और मकान के लिये दुखदायी होता है,जातक को मानसिक रूप से भटकाव देता है।

हर या पद्म---
इस योग मे राहु पंचम में और केतु ग्यारहवें भाव में होता है,बाकी के ग्रह राहु केतु की रेखा से एक तरफ़ होते हैं इस योग के कारण जातक को संतान या तो होती नही अगर होती है तो अल्प समय में नष्ट होजाती है।

बहुरूप या महापद्म---
इस योग में राहु छठे भाव मे और केतु बारहवें भाव में होता है जातक अपने नाम और अपनी बात के लिये कोई भी योग्य अथवा अयोग्य कार्य कर सकता है,जातक की पत्नी या पति बेकार की चिन्ताओं से ग्रस्त होता है,साथ जातक के परिवार में अचानक मुसीबतें या तो आजाती है या खत्म हो जाती है,धन की बचत को झूठे लोग चोर या बीमारी या कर्जा अचानक खत्म करने के लिये इस दोष को मुख्य माना जाता है।

त्र्यम्बक या तक्षक---
यह योग जीवन के लिये सबसे घातक कालसर्प योग होता है,त्र्यम्बक का मतलब त्रय+अम्ब+क=तीन देवियों (सरस्वती,काली,लक्ष्मी) का रूप कालरूप हो जाना। इस योग के कारण जीवन को समाप्त करने के लिये और जीवन में किसी भी क्षेत्र की उन्नति शादी के बाद अचानक खत्म होती चली जाती है,जातक सिर धुनने लगता है,उसके अन्दर चरित्रहीनता से बुद्धि का विनाश,अधर्म कार्यों से और धार्मिक स्थानों से अरुचि के कारण लक्ष्मी का विनाश,तथा हमेशा दूसरों के प्रति बुरा सोचने के कारण संकट में सहायता नही मिलना आदि पाया जाता है।

अपाराजित या करकट----
यह योग भी शादी के बाद ही अचानक धन की हानि जीवन साथी को तामसी कारणों में ले जाने और अचानक मौत देने के लिये जाना जाता है,इस योग के कारण जातक जो भी काम करता है वह शमशान की राख की तरह से फ़ल देते है,जातक का ध्यान शमशान सेवा और म्रुत्यु के बाद के धन को प्राप्त करने में लगता है,अचानक जातक कोई भी फ़ैसला जीवन के प्रति ले लेता है,यहां तक इस प्रकार के ही जातक अचानक छत से छलांग लगाते या अचानक गोली मारने से मरने से मृत्यु को प्राप्त होते है,इसके अलावा जातक को योन सम्बन्धी बीमारियां होने के कारण तथा उन रोगों के कारण जातक का स्वभाव चिढ चिढा हो जाता है,और जातक को हमेशा उत्तेजना का कोपभाजन बनना पडता है,संतान के मामले में और जीवन साथी की रुग्णता के कारण जातक को जिन्दगी में दुख ही मिलते रहते हैं।

वृषाकपि या शंखचूड---
इस योग में राहु नवें भाव में और केतु तीसरे भाव में तथा सभी अन्य ग्रह राहु केतु के एक तरफ़ होते है,इस योग के अन्दर जातक धर्म में झाडू लगाने वाला होता है,सामाजिक मर्यादा उसके लिये बेकार होती है,जातक का स्वभाव मानसिक आधार पर लम्बा सोचने में होता है,लोगों की सहायता करने और बडे भाई बहिनों के लिये हानिकारक माना जाता है,जातक की पत्नी को या पति को उसके शरीर सहित भौतिक जिन्दगी को सम्भालना पडता है,जातक को ज्योतिष और पराशक्तियों के कारकों पर बहस करने की आदत होती है,जातक के घर में या तो लडाइयां हुआ करती है अथवा जातक को अचानक जन्म स्थान छोड कर विदेश में जाकर निवास करना पडता है।

शम्भु या घातक---
इस योग में राहु दसवें भाव मे और केतु चौथे भाव में होते है अन्य ग्रह राहु केतु के एक तरफ़ होते है,इस योग के कारण जातक को या तो दूसरों के लिये जीना पडता है अथवा वह दूसरों को कुछ भी जीवन में दे नही पाता है,जातक का ध्यान उन्ही कारकों की तरफ़ होता है जो विदेश से धन प्रदान करवाते हों अथवा धन से सम्बन्ध रखते हों जातक को किसी भी आत्मीय सम्बन्ध से कोई मतलब नही होता है। या तो वह शिव की तरह से शमशान में निवास करता है,या उसे घर परिवार या समाज से कोई लेना देना नही रहता है,जातक को शमशानी शक्तियों पर विश्वास होता है और वह इन शक्तियों को दूसरों पर प्रयोग भी करता है।

कपर्दी या विषधर---
इस योग में ग्यारहवें भाव में राहु और पंचम स्थान में केतु होता है,इसकी यह पहिचान भी होती है कि जातक के कोई बडा भाई या बहिन होकर खत्म हो गयी होती है,जातक के पिता को तामसी कारकों को प्रयोग करने की आदत होती है जातक की माँ अचानक किसी हादसे में खत्म होती है,जातक की पत्नी या पति परिवार से कोई लगाव नही रखते है,अधिकतर मामलों में जातक के संतान अस्पताल और आपरेशन के बाद ही होती है,जातक की संतान उसकी शादी के बाद सम्बन्ध खत्म कर देती है,जातक का पालन पोषण और पारिवारिक प्रभाव दूसरों के अधीन रहता है।

रैवत या शेषनाग---
इस योग में लगन से बारहवें भाव में राहु और छठे भाव में केतु होता है,जातक उपरत्व वाली बाधाओं से पीडित रहता है,जातक को बचपन में नजर दोष से भी शारीरिक और बौद्धिक हानि होती है,जातक का पिता झगडालू और माता दूसरे धर्मों पर विश्वास करने वाली होती है,जातक को अकेले रहने और अकेले में सोचने की आदत होती है,जातक कभी कभी महसूस करता है कि उसके सिर पर कोई भारी बजन है और जातक इस कारण से कभी कभी इस प्रकार की हरकतें करने लगता है मानों उसके ऊपर किसी आत्मा का साया हो,जातक के अन्दर सोचने के अलावा काम करने की आदत कम होती है,कभी जातक भूत की तरह से काम करता है और कभी आलसी होकर लम्बे समय तक लेटने का आदी होता है,जातक का स्वभाव शादी के बाद दूसरों से झगडा करने और घर के परिवार के सदस्यों से विपरीत चलने का होता है,जातक की होने वाली सन्तान अपने बचपन में दूसरों के भरोसे पलती है।
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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