तलाक से बचने के तरीके----

शादी एक पवित्र रिस्ता होता है जो व्यक्ति के काम नाम के पुरुषार्थ को पूर्ण करता है। वर या कन्या की शादी के लिये पहले वर या कन्या की तलाश की जाती है,पहले यह कार्य सगे सम्बन्धियों पर निर्भर हुआ करता था उसके बाद यह पत्र पत्रिकाओं पर निर्भर हो गया और आज यह नेट और शादी विवाह वाली साइटों पर निर्भर हो गया है। शादी करना एक मंहगी गाडी को खरीदने के जैसा है,गाडी को किस्त आदि पर खरीदा तो आसानी से जा सकता है लेकिन उसकी देख रेख और किस्तों के भुगतान का सही प्रबन्ध नही है तो वह गाडी किस्त देने वाले ले ही जायेंगे और बाद में सोचना पडेगा कि कितना नुकसान और कितना फ़ायदा हुआ,जो पहले जेब से था वह भी दे दिया और पेनल्टी में भी देना पडा,जानकार और परिवार के लोगों के बीच में बेइज्जती भी हुयी,कल अपने को शंहशाह समझे जाने वाले आज अपना चेहरा छुपाकर कमरे के अन्दर पड गये। शादी करने से पहले यह सोच लेना चाहिये कि पत्नी को लाने के पहले घर का वातावरण सही है,घर में बहने है वे कितनी होशियार है और शादी के बाद वे पत्नी से सामजस्य बिठा पायेंगी या नही,माँ का स्नेह पुत्र के प्रति आजीवन रहता है,पत्नी के आने के बाद माँ भी अपना अधिकार पूरा समझती है,माँ और पत्नी के बीच की खाई को पाटने के लिये हिम्मत है कि नहीं,यह भी सोचना चाहिये कि बहू किसी दूसरे घर से आयेगी और उस घर के रीति रिवाज और चाल चलन अच्छे भी हो सकते है और बुरे भी हो सकते है,उन्हे सम्भालने की हिम्मत है कि नही,अगर यह सोचा जाये कि पैसा बहुत है और किसी भी समस्या का समाधान पैसे से निकाल लिया जायेगा तो यह बहुत बडी भूल है,शादी और पैसे में जमीन आसमान का फ़र्क है,शादी सन्तति की बढोत्तरी और ग्रहस्थ जीवन के लिये की जाती है जबकि पैसा जीवन यापन में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिये कमाया जाता है। अगर सही पत्नी मिली है और वह घर को चलाना जानती है तो धन की एक बार कमी भी हो जायेगी तो पत्नी घर को चलाकर आगे की स्थिति को सम्भाल लेगी,लेकिन कितना ही पैसा है और पत्नी की नजर अगर घूम गयी तो पूरा पैसा और इज्जत मान सम्मान सभी बरबाद होने में देर नही लगती है।

पति को पत्नी को खोजने के लिये जहां तक हो अपने रिस्तेदारों से सम्पर्क में रहना चाहिये,जब कोई रिस्तेदारी में पत्नी जो जीवन में साथ देने वाली नही मिले तब बाहर की दुनिया में अपनी कोशिश को करना चाहिये,नेट पर या पत्र पत्रिकाओं में आने वाले रिस्ते अक्समात भरोसा करने वाले नही होते है,जो लोग अपने समाज से कटे होते है और एकान्त जीवन जीने के आदी होते है वही इन बातों का सहारा लेते है,और सबसे अधिक सामाजिक व्यक्ति एक ही बात को समझ सकता है कि जो व्यक्ति अपने समाज और परिवार का ही नही हो सका है उसकी सन्तति जिससे शादी करनी है वह सामाजिकता और परिवार वाली बातों में कितना साथ दे पायेगी।
शादी विवाह के लिये चुने जाने वाले रिस्ते में शिक्षा को सबसे पहले देखा जाना चाहिये,शिक्षा के अन्दर यह भी देखना चाहिये कि लडकी ने शिक्षा को प्राप्त करने के लिये कितने समय अकेले जीवन को बिताया है,उस अकेले जीवन को बिताने के अन्दर वह अपनी प्राप्त करने वाली शिक्षा के अन्दर कितना परसेंट ला पायी है,अगर वह बाहर रहकर शिक्षा में कमजोर रही है तो यह बात जरूरी है कि उसने किसी न किसी प्रकार का रोग अपने दिमाग में पाला है और उस रोग के कारण उसकी पढाई कमजोर हुयी है या तो वह अपनी जिम्मेदारी को नही समझ कर तथा अपने परिवार वालों को धोखा देकर बोर्डिंग आदि में रहकर अथवा कम्पयूटर आदि से अपनी नेट वाली गतिविधियों के प्रति अपनी कारगुजारी करती रही है या मोबाइल से एस एम एस आदि से वह मानसिक प्यार प्रेम वाली भावना में बहती रही है इसलिये उसका शिक्षा के अन्दर परसेंटेज कम आया है। जब इस बात का ध्यान हो जाये तो समझना चाहिये कि जो व्यक्ति अपने परिवार वालों को जिन्होने उसे पाला पोषा बडा किया हर सुख दुख का ध्यान रखा उन्हे ही धोखा दे सकती है तो तुम्हारी पत्नी बनकर वह तुम्हारे साथ कितना भला कर सकती है।



खोजी जाने वाली पत्नी की माता के बारे में भी पता करना चाहिये कि वह अपने देवर जेठ सास स्वसुर और परिवार से कितना बनाकर चली है,अगर वह अपनी दूर रहने की मजबूरी को बयान करती है तो उसके पूर्व खान्दान के बारे में उनसे मिलकर पता करना चाहिये,कि उनकी बहू ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया है,वैसे यह भी कहा जायेगा कि जिनसे पूंछा गया है वे लोग पुराने रीति रिवाज के है,उन्हे उनसे जलन है आदि,लेकिन एक बात तो ध्यान में रखी ही जा सकती है कि जो माँ अपने परिवार से दूरी बनाकर चली जिसने अपने पति को अपनी उंगलियों पर नचाया वह अपनी पुत्री को क्या शिक्षा दे सकती है और समय आने पर वह तुम्हारे साथ क्या व्यवहार कर सकती है,अथवा वह शादी के तुरत बाद तुम्हारे माता पिता से परिवार से अलग रहने के लिये जोर देगी जिससे उसकी बेटी आगे के जीवन में तुम्हे भी उन्ही की तरह से नचाने की कोशिश करे,और तुम्हारे को यह हजम नही हो मामला कोर्ट केश तक पहुंचे।

शादी विवाह के मामले में यह भी सोचना चाहिये कि कोई कितना खूबशूरत है,और उस खूबशूरती पर फ़िदा होकर अगर शादी की जाती है तो जिस दिन शादी होती है उससे अधिक से अधिक तीन महिने वह खूबशूरती अच्छी लगती है उसके बाद उस खूबशूरती से अचानक नफ़रत पैदा हो जाती है,उस नफ़रत का एक ही कारण होता है कि शरीर अपना कार्य करना बन्द कर देता है तरह तरह की कमजोरी आने लगती है दिमाग में चिढचिढापन पैदा हो जाता है। सिर दर्द की शिकायत हो जाती है,भोजन पचने में दिक्कत आने लगती है,उस समय वह खूबशूरती काल लगने लगती है और उस खूबशूरती के सामने आने में भी दिक्कत होने लगती है,या तो गुस्से में कोई बुरी बात कह दी जाती है या फ़ोन आदि से खूबशूरती के घर वालों से कोई बुरी बात कहते ही खूबशूरती के घर वाले आकर सवार हो जाते है और मामला गम्भीर इसलिये भी हो जाता है कि शरीर मे दम नही होता है,माता पिता बहिन भाई अपनी अपनी ईगो को कायम रखना चाहते है,खूबशूरती सीधी अपने घर जाती है किसी वकील से राय लेती है,वकील को भी ऐसे ही केश लेने में मजा इसलिये भी आता है कि कमाई का साधन चोरी के डकैती के केशों में नही होता है,केवल सामाजिक और पारिवारिक रिस्तों के अन्दर कमाई का साधन इसलिये अधिक बनता है क्योंकि उसे पुलिस को भी सम्भालना पडता है जिन लोगों के नाम रिपोर्ट में उस खूबशूरती ने लिखवाये होते है उनके लिये पुलिस अपनी पूरी शक्ति का प्रयोग केवल इसलिये करती है क्योंकि जितनी उसकी कोशिश होगी उतना ही धन उससे बचने के लिये खर्च किया जायेगा,और केवल वकील के अलावा और कोन बीच का कार्य कर सकता है,पुलिस को जितना देना है उससे दो सौ परसेंट वकील अपने लिये पहले निकाल लेगा उसके बाद ही वह पुलिस से अपनी सांठ गांठ बिठापाने में सफ़ल होगा। इस खूबशूरती के लिये जब कानून ने सीधा ही अन्दर जाने का उपक्रम जारी कर रखा हो,वह भी केवल इसलिये कि हिन्दू समाज में शादी के बाद जो बन्धन होते है वे आजीवन के होते है,और ब्रिटिस कानून की मान्यता केवल वहीं खंडित हो जाती है जहां वह देखता है कि हिन्दू विवाह में एक से अधिक पत्नी को रखने का रिवाज नही है,तो जो कानून बनाये गये उनके द्वारा यह ही पक्का सिद्धान्त बनाया गया कि सबसे पहले हिन्दू की शक्ति को ही विदीर्ण कर दिया जाये,और उसे अपनी पत्नी को किसी दूसरे के पास भोगने के लिये कानूनी रूप से भेजना पडे और किसी दूसरे की पत्नी को अपने पास भोगने के लिये लाना पडे। इस कानून का पूरा फ़ायदा वह खूबशूरती लेती तो है लेकिन वह अपने परिवार के उन सदस्यों के ईगो के कारण जो पहले से ही इस बिर्टिसिया कानून की चपेट में है और उसी कानून को अपनी रोजी रोटी बनाकर यानी कान्वेंट की शिक्षा से पूर्ण होकर अपने पूर्ण विद्वान की श्रेणी में लाने की कोशिश करते है। तो वह खूबशूरती जो महज जवानी के जोश में होश को खोकर लायी गयी थी एक झटके में अपने लटके दिखाकर चली गयी और जो था वह भी गया आगे के जीवन के लिये भी कोई आशा भी नही है कि वह सही चल पायेगा या नहीं।
शादी करने के लिये जहां तक हो सके दिन का समय निश्चित करना चाहिये,रात में केवल गन्धर्व विवाह ही किये जाते है,और गन्धर्व विवाह को किसी नाटक के विवाह की तरह से समझा जाता है जो रात को किया गया और सुबह को बरबाद,दिन में हिन्दू विवाह के लिये नियम बनाये गये है,सूर्य की आभा में जो किरणें सम्बन्धो के अन्दर अपना असर देती है वहां रात की कालिमा कितने ही प्रकास को प्रकट करने के बाद मिटाने की कोशिश की जाये खत्म नही होती है। देवताओं का दिन होता है रात तो केवल निशाचरों की होती है,कलयुग की यही विडम्बना कही जायेगी कि रात को शादी करने के लिये हिन्दू समुदाय को किस प्रकार से अपने समय के अभाव के रूप में प्रकट किया है। शादी करने के लिये भी वही समय निश्चित किया जाना चाहिये जो खुद के लिये सहूलियत वाला हो,लोगों को शादी पर बुलाने के लिये केवल आशीर्वाद समारोह रात को कर देना चाहिये जहां शादी के बाद लोग अपना अपना आशीर्वाद दे सकें,आजकल के अनुसार शादी के पहले स्टेज शो होता है और शादी के पहले ही घर वाले और बाहर वाले बिना ब्याही वधू को और बिना ब्याहे वर को आशीर्वाद देकर अपने उदर की शांति करके चले जाते है,और बाद में मंत्रों से उस जोडे को शादी के बन्धन में बांधा जाता है जो पहले ही शादी के रूप में लोक मान्यता को प्राप्त कर चुका है।

शादी के बाद पति और पत्नी के घर वालों को तय कर लेना चाहिये कि शादी के बाद पति और पत्नी के बीच में एक समय सीमा में दूर रहने के लिये बाध्य होना पडेगा,उस समय सीमा में दूर रहने के लिये अगर पत्नी का कोई सम्बन्धी नही है तो वर को इस प्रकार का बन्दोबस्त करना चाहिये कि एक या दो माह के लिये एक वर्ष में दोनो दूर रह सकें,वैसे शादी के बाद पत्नी को केवल चार दिन के लिये ही अपने ससुराल में रहने दिया जाय,उसके बाद तीन महिने का अन्तराल देकर फ़िर भेजा जाये,उस समय पति और पत्नी दोनो कहीं भी हनीमून के लिये जा सकते है,और जैसे ही वापस आयें उन्हे फ़िर से एक माह के लिये अलग किया जाये,इस प्रकार से शादी के तीन साल तक ससुराल में कम ही रखा जाये,तो शादी आजीवन चलने से कोई रोक नही सकता है।

आज के जमाने से पति और पत्नी अगर अलग अलग नही रह सकते है तो उन्हे आपसी समझौतों से एक दूसरे से दूरी बनाकर चलना चाहिये,कम से आपसी सम्बन्धों के मामले में एक माह की और नही चल पाये तो एक सप्ताह की दूरी बनाकर अवश्य चलना चाहिये,इस प्रकार से आपसी आकर्षण का रूप बढता जायेगा,और शादी आराम से आजीवन चल सकती है।

शादी के बाद पति और पत्नी को अपनी अपनी शारीरिक शक्ति का भी ख्याल रखना चाहिये,शादी के बाद शरीर पर अचानक मानसिक दबाब बढता है,वह सम्बन्धो के मामले में भी और परिवार के मामले में भी,अति आकर्षण की वजह से काम भी रुकते है और शरीर भी थकता है,एक दूसरे की कमजोरी को रोकने के लिये बाहरी भोजनो से अरुचि बनानी चाहिये और शक्ति से पूर्ण भोजन को लेना उत्तम बात मानी जाती है,इसके लिये फ़्रेस दूध का सेवन जितना हो सके करना चाहिये,अन्यथा मज्जा बढाने वाली चीजों का सेवन करना चाहिये.यह बात पूरी तरह से सत्य है कि शरीर से ही मन जुडा है और शरीर कमजोर है तो मन अपने आप कमजोर होगा,वासनाओं की वृद्धि तब और बढ जाती है जब शरीर के अन्दर दम नही होता है और वह सीधा दिमाग पर असर देता है,पीजा और बर्गर खाकर शक्ति नही बढती है केवल उदर पूर्ति होती है।
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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