हस्तरेखा से जानिए व्यक्ति का व्यव्हार---
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मनुष्य की प्रकृति के विश्लेषण, अध्ययन एवं परीक्षण करने के जितने भी माध्यम हैं, उनमें हस्तरेखा विज्ञान यानी पॉमिस्ट्री का विशेष महत्व है। हाथ मनुष्य के आचरण व व्यवहार रूपी बक्से की चाबी है, जिसके भीतर प्रकृति ने प्रेरक शक्ति और उसकी उन अंतर्निहित क्षमताओं, गुणों एवं कार्यशक्ति को बंद किया हुआ है, जिनके द्वारा हम स्वयं को पहचानकर अपने जीवन को रूपांतरित कर सकते हैं। हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी लिखा है कि- 

कराग्रे वस्ते लक्ष्मी, कर मध्ये सरस्वती। 
कर पृष्ठे स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते कर दर्शनम्‌॥ 

ये दो पंक्तियाँ हाथ के महत्व को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से हमारे हाथ में सभी देवताओं का निवास है और भौतिक दृष्टि से मनुष्य की उज्ज्वलता, प्रखरता व कार्यशैली का पुंज है। हमारा जीवन परिवर्तनशील है और जीवन संघर्ष का, घात-प्रतिघातों का यह संपूर्ण रूप से प्रतिबिंब है, जिसके माध्यम से हम भूत को जानकर विश्वास करते हैं व वर्तमान को समझते हैं। 

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प्रायः सभी व्यक्तियों के हाथ एक ही प्रकार के नहीं होते, न ही रेखाएँ व योग। सभी में भिन्नता होती है।

मुख्यतः हाथ 7 प्रकार के होते हैं, जिनका क्रम इस प्रकार है- 

1. अविकसित अथवा निम्न श्रेणी के हाथ। 
2. चमचाकार अथवा गतिशील हाथ। 
3. दार्शनिक अथवा गाँठदार हाथ। 
4. नुकीले अथवा कलात्मक हाथ। 
5. आदर्श हाथ। 
6. मिश्रित हाथ। 
7. वर्गाकार अथवा उपयोगी हाथ। 

बहरहाल, हाथों की लकीरों पर बात ना करें और उनकी गतिविधियों पर बात करें तो आपको अचरज होगा कि इस अध्ययन से भी सामने वाले का नेचर जाना जा सकता है। कोई व्यक्ति किसी दूसरे से हाथ मिलाता है---

हाथ मिलाते समय दूसरा हाथ सामने वाले के हाथ पर जैसे- कलाई, बाजू या कंधे पर रखे तो वह निम्न स्वभाव वाला होगा। यह सामने वाले का हितैषी होगा। सामने वाले की अच्छाई चाहेगा। उसकी खुशी, उसकी उन्नति, उसकी समृद्धि चाहेगा। उसे अच्छा मार्गदर्शन देगा एवं यथाशक्ति मदद करेगा। सामने वाले के सुख-दुख में, हँसी-खुशी में, अच्छे-बुरे में साथ देगा एवं सामने वाले का शुभचिंतक होगा। 

यदि कोई व्यक्ति सामने वाले की हथेली को ऊपर से दबाकर हाथ मिलाता है तो वह निम्न स्वभाव का होगा---

वह गुस्सैल एवं घमंडी होगा। सुपीरियरीटी कॉम्प्लेक्स उसमें कूट-कूटकर भरा होता है। सामने वाले को तुच्छ या नहीं के बराबर मानता है। अपने आपको सभी से उच्च समझता है। दूसरों की चिंता नहीं करता। दूसरों पर अपना प्रभाव जमाकर या दबाब डालकर काम करवाता है। तानाशाही प्रवृत्ति का होता है। वह चाहता है कि लोग उसे मानें, जानें एवं सम्मान दें। चाहे वह कैसा भी हो, हर जगह अपने को उच्च मानता है।

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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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