बालारिष्ट योग---

जीवन मे आयु का विचार गुरु से किया जाता है और मौत का विचार राहु से किया जाता है,कुंडली में गोचर का गुरु जब जब जन्म के राहु से युति लेता है,या राहु जन्म के गुरु से युति लेता है,अथवा गोचर का राहु गोचर के गुरु से युति लेता है,अथवा गुरु और राहु का षडाष्टक योग बनता है,अथवा गुरु के साथी ग्रह राहु से अपनी मित्रता कर रहे हो,अथवा राहु के आसपास अपनी युति मिला रहे हो,तो बालारिष्ट-योग की उत्पत्ति हो जाती है,इस योग में जातक की मौत निश्चित होती है,लेकिन मौत भी आठ प्रकार की होती है,जिसके अन्दर तीन मौत भयानक मानी जाती है।

शरीर की मौत जो बारह भावों के अनुसार उनके रिस्तेदारों के सहित मानी जाता है,धन की हानि जो बारह भावों के कारकों के द्वारा जानी जाती है,मन की हानि जो बारह भावों के सम्बन्धियों से बिगाडखाता या दुश्मनी के रूप में मानी जाती है।
गुरु जीव का कारक है

गुरु जो जीव का कारक है,गुरु जो प्रकृति के द्वारा दी गयी सांसों का कारक है,गुरु जो जीवन के हर भाव का प्रोग्रेस का कारक है,गुरु अगर मौत का भी मालिक है तो वह मौत भी किसी न किसी प्रकार के फ़ायदे के लिये ही देता है,गुरु अगर दुशमनी का मालिक है तो वह दुश्मनी भी किसी बहुत बडे फ़ायदे के लिये मानी जाती है,गुरु अगर खर्चे के भाव का मालिक है तो खर्चा भी किसी न किसी अच्छे कारण के लिये ही करवायेगा। गुरु की युति अगर क्रूर ग्रहों से भी हो जाती है तो गुरु के प्रभाव में क्रूर ग्रह भी क्रूरता तो करते है लेकिन व्यक्ति या समाज की भलाई के करते है,गुरु के साथ पापी ग्रह मिल जाते है तो वे पाप भी भलाई के लिये ही करते है,मतलब गुरु का साथ जिस ग्रह के साथ मिल जाता है उसी की "पौ बारह हो जाती है" इस कहावत का रूप भी गुरु के अनुसार ही माना जाता है मतलब जब गुरु किसी भी भाव में प्रवेश करता है तो जीत का ही संकेत देता है,जब वह मौत के भाव में प्रवेश करता है तो जो भी जैसी भी भावानुसार मौत होती है वह आगे के जीवन के लिये या आगे की सन्तान की भलाई के लिये ही होती है। गुरु हवा कारक है उसे ठोस रूप में नही प्राप्त किया जा सकता है गुरु सांस का कारक है सांस को कभी बांध कर नही रखा जा सकता है। गुरु की राहु के साथ नही निभती है,राहु के साथ मिलकर गुरु चांडाल योग बन जाता है,एक गुरु की हैसियत चांडाल की हो जाती है वह अपने ज्ञान को मौज मस्ती के साधनो में खर्च करना शुरु कर देता है,उसे बचाने से अधिक मारने के अन्दर मजा आने लगता है,वह अपने पराक्रम को धर्म और समाज की भलाई के प्रति न सोचकर केवल बुराई और बरबादी के लिये सोचने का काम करने लगता है,गुरु जो पीले रंग का मालिक है अपने अन्दर राहु रूपी भेडिया को छुपाकर धर्म के नाम पर यौन शोषण,धन का शोषण,जीवन का शोषण करना चालू कर देता है।

गुरु जो ज्ञान का कारक है वह उसे मारण मोहन वशीकरण उच्चाटन के रूप में प्रयोग करना शुरु कर देता है,वह पीले कपडों में बलि स्थानों मे जाकर जीव की बलि देना शुरु कर देता है,जब कोई भी ज्ञान मानव जीवन या जीव के अहित में प्रयोग किया जायेगा तो वह चांडाल की श्रेणी में चला जायेगा,और यही गुरु चांडाल योग की परिभाषा कही जायेगी। इसी बात को आज के युग में सूक्षमता से देखें तो जो व्यक्ति आतंकवादी गतिविधियों में लगे है,जो अकारण ही जीव हत्या और मानव के वध के उपाय सोचते है,जो खून बहाने में अपनी अतीव इच्छा जाहिर करते है,जिनके पास वैदिक ज्ञान तो है लेकिन उस ज्ञान के द्वारा वे बजाय किसी की सहायता करने के उस ज्ञान की एवज में धन को प्राप्त करते है,उसे महंगे होटलों में जाकर बीफ़ और मदिरा के साथ उपभोग करते है,उनके वैदिक ज्ञान का प्रयोग गुरु चांडाल की श्रेणी में ही माना जायेगा,"अपना काम बनता,भाड में जाये जनता",का प्रयोग केवल धर्म गुरुओं के प्रति ही नही माना जा सकता है,वह किसी प्रकार के प्राप्त किये गये ज्ञान के प्रति भी माना जा सकता है,जैसे राजनीति के अन्दर असीम ज्ञान को हासिल कर लिया और उस ज्ञान का प्रयोग जनहित में लगाना था लेकिन राहु के द्वारा दिमाग में असर आजाने से वे उसे केवल अपने अहम के लिये खर्च करने लगे,राहु जो सभी तरह से विराट रूप का मालिक है खुद को विराट रूप में दिखाने की कोशिश करने लगे,राहु जो शुक्र के साथ मिलकर चमक दमक का मालिक बना देता है,साज सज्जा से युक्त व्यक्तियों की श्रेणी में लेजाकर खडा कर देता है के रूप में अपने को प्रदर्शित करने में लग गये,लेकिन गुरु का अपना राज्य है वह सांसों के रूप में व्यक्ति के जीव के अन्दर अपना निवास बनाकर बैठा है,उसकी जब इच्छा होगी वह अपनी सांसों को समेट कर चला जायेगा,फ़िर इस देह को राहु ही अपनी रसायनिक क्रिया के द्वारा सडायेगा,या ईंधन बनकर जलायेगा,या विस्फ़ोट में उडायेगा,अथवा आसमानी यात्रा में चिथडे करके उडायेगा,आदि कारणों राहु का कारण भी सामने अवश्य आयेगा।

जीव के साथ राहु का समागम---

राहु वास्तव में छाया ग्रह है,यह अपने ऊपर कोई आक्षेप नही लेता है,यह एक बिन्दु की तरह से है जो जीव के उसी के रूप में आगे पीछे चलता है,कभी जीव का साथ नही छोडता है,इसके अन्दर एक अजीब सी शक्ति होती है,जब जीव का दिमाग इसके अन्दर फ़ंस जाता है तो वह जीव के साथ जो नही होना होता है वह करवा देता है। यह तीन मिनट की गति से कुंडली में प्रतिदिन की औसत चाल चलता है,इसका भरोसा नही होता है,कि सुबह यह क्या कर रहा है दोपहर को क्या करेगा और शाम होते ही यह क्या दिखाना शुरु कर देगा। राहु को ही कालपुरुष की संज्ञा दी गयी है,वह विराट रूप में सभी के सामने है उसकी सीमा अनन्त है,उसकी दूरी को कोई नाप नही सका है,केवल उसकी संज्ञा नीले रंग के रूप में अनन्त आकाश की ऊंचाइयों में देखी जा सकती है,यह केतु से हमशा विरोध में रहता है,और उसकी उल्टी दिशा का बोधक होता है,जो केतु सहायता के रूप में सामने आता है यह उसी का बल हरण करने के बाद उसकी शक्ति और बोध दोनो को बेकार करने के लिये अपनी योग्यता का प्रमाण देने से नही चूकता है।

सूर्य के साथ अपनी युति बनाते ही वह पिता या पुत्र को आलसी बना देता है,जो कार्य जीवन के प्रति उन्नति देने वाले होते है वे आलस की बजह से पूरे नही हो पाते है,वह आंखो को भ्रम में डाल देता है होता कुछ है और वह दिखाना कुछ शुरु कर देता है। जातक के साथ जो भी कार्य चल रहा होता है उसके अन्दर असावधानी पैदा करने के बाद उस कार्य को बेकार करने के लिये अपनी शक्ति को देता है,पलक झपकते ही आंख की किरकिरी बनकर सडक में मिला देता है,सूर्य के साथ जब भी मिलता है तो केवल जो भी सुनने को मिलता है वह अशुभ ही सुनने को मिलता है,जातक के स्वास्थ्य में खराबी पैदा करने के लिये राहु और सूर्य की युति मुख्य मानी जाती है। राहु से अष्टम में जब भी सूर्य का आना होता है तो या तो बुखार परेशान करता है,अथवा किसी सूर्य से सम्बन्धित कारक का खात्मा सुनने को मिलता है।

बालारिष्ट---

गुरु और राहु दोनो मिलकर जहरीली गैस जैसा उपाय करते है,घर परिवार समाज वातावरण भोजन पानी आदि जीवन के सभी कारक इतना गलत प्रभाव देना चालू कर देते है कि व्यक्ति का जीवन दूभर हो जाता है,अगर व्यक्ति घर वालों के द्वारा परेशान किया जा रहा है तो पडौस के लोग भी उसे परेशान कर देते है,वह पडौस से भी दूर जाना चाहता है तो उसे कालोनी या गांव के लोग परेशान करना चालू कर देते है,जब कि उसकी कोई गल्ती नही होती है केवल वह अपने अन्दर के हाव भाव इस तरह से प्रदर्शित करने लगता है जैसे कि उसके पास कोई बहुत बडी आफ़त आने वाली हो और वह हर बात में डर रहा हो। राहु जो विराट है वह जीव को अपने में समालेने के लिये आसपास अपना माहौल फ़ैला लेता है,और जीव किसी भी तरह से उसके चंगुल में आ ही जाता है,बहुत ही भाग्य या पौरुषता होती है तो जीव बच पाता है,अन्यथा वह राहु का ग्रास तो बन ही जाता है।
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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