कलश स्थापना---
किसी भी धार्मिक समय में और योजना आदि में कलश स्थापना का बहुत महत्व है,पृथ्वी को कलश रूप में स्थापित किया जाता है,फ़िर कलश में सम्बन्धित देवी देवता का आवाहन कर विराजित किया जाता है,चूंकि पृथ्वी एक कलश की भांति है,और जल को संभाल कर लगातार गोल घूम रही है,जल का एक एक बूंद कितने ही अणुओं की भण्डारिणी है,कलश स्थापना का वैदिक महत्व समझने के बाद किसी भी पूजा पाठ या श्रीदुर्गा स्थापना आदि में कलश से सम्बन्धित भ्रान्तियां अपने आप समाप्त हो जायेंगी।

कलश का रूप--
एक मिट्टी का कलश जो कि काला न हो,कभी कभी अधिक आग से कलश का रंग कहीं कहीं काला हो जाता है,उसे नही लेना चाहिये पीले कलर का कलश लेकर उसे पवित्र जल से साफ़ कर लेना है,और कलश के गले में तीन धागा वाली मोटी मोली को उसी प्रकार से बांधना है जिस प्रकार से गले में धागा आदि बांधते है,फ़िर कलश के चारों तरफ़ चावल का आटा पीसकर चार स्वास्तिक के निशान बना लेने है,और प्रत्येक स्वास्तिक के अन्दर चार चार टीका लगा देने है,जहां पर कलश को स्थापित किया जाना है,उस स्थान को साफ़ करने के बाद कुमकुम या रोली से अष्टदल कमल बना लेना है उसके बाद भूमि का स्पर्श करने के बाद इस मंत्र को पढना है-

ऊँ भूरशि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री, पृथ्वीं यच्छ पृथ्वीं दृ ँ ह पृथ्वीं मा हिं सी:।

इस मन्त्र को पढकर पूजित भूमि पर सप्तधान्य अथवा गेंहूँ या चावल या जौ एक अंजुलि भर कर रख दें।
धान्य को रखकर इस मंत्र को पढें-
ऊँ धान्यमसि धिनुहि देवान प्राणाय त्वो दानाय त्वा व्यानाय त्वा,दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो व: सविता हिरण्यपाणि: प्रति गृभ्णात्वच्छिद्रेण पणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोऽसि।

इस मंत्र को पढने के बाद कलश को धान्य के ऊपर स्थापित कर दें।
इसके बाद इस मंत्र को पढें-
ऊँ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्वन्दव: पुनुरूर्जा नि वर्तस्व सा न: सहस्त्रं धुक्ष्वोरूधारा पयस्वती पुनर्मा विशाद्रयि:।

इसके बाद कलश के अन्दर जल भरते समय इस मन्त्र को पढना है-
ऊँ वरुणस्योत्त्म्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसनमसि वरुणस्य ऋतसदनमा सीद।

इसके बाद किसी साफ़ पत्थर पर सफ़ेद चंदन की लकडी को घिसकर चंदन को किसी साफ़ कटोरी में समेट कर कलश के चारों तरफ़ चन्दन के टीके चारों स्वास्तिकों पर लगाने है,और इस मन्त्र को पढते जाना है-
ऊँ त्वां गन्धर्वा अखनँस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पति:,त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान यक्ष्मादमुच्यत।

कलश के अन्दर सर्वोषधि (मुरा,जटामांसी,वच,कुष्ठ,शिलाजीत,हल्दी,दारूहल्दी,सठी,चम्पक,मुस्ता) को डालते वक्त यह मन्त्र पढना है-
ऊँ या औषधी: पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा,मनै नु बभ्रूणामहँ शतं धामानि सप्त च ।

इसके बाद किसी नदी या तालाब के किनारे से सफ़ेद और हरे रंग की दूब जिसकी लम्बाई एक बलिस्त की हो लानी है,उसे कलश के अन्दर डालते वक्त यह मन्त्र पढना है-
ऊँ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुष: परुषस्परि,एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्त्रेण शतेन च।

कलश के ऊपर पंचपल्लव (बरगद,गूलर,पीपल,आम,पाकड के पत्ते) रखते समय यह मन्त्र पढना है-
ऊँ अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता,गोभाज इत्किलासथ यत्सन्वथ पूरुषम।

इसके बाद कुशा नामकी घास जो कि अश्विन मास की अमावस्या को विधि पूर्वक लायी गयी हो,उसे कलस के अन्दर डालना है,और इस मन्त्र को पढना है-
ऊँ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्व: प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभि:,तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्काम: पुने तच्छकेयम।

इसके बाद कलश में सप्तमृत्ति को ( घुडसाल हाथीसाल बांबी नदियों के संगम तालाब राजा के द्वार और गोशाला के मिट्टी) को डालते समय इस मंत्र को पढना चाहिये-
ऊँ स्योना पृथ्वी नो भवानृक्षरा निवेशनी,यच्छा न: शर्म सप्रथा:।

इसके बाद कलश में सुपारी को डालते वक्त यह मंत्र पढते हैं-
ऊँ या: फ़लिनीर्या अफ़ला अपुष्पा याश्च पुष्पिणी:,बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुंचन्त्वँहस:।

इसके बाद कलश में पंचरत्न (सोना हीरा मोती पद्मराग और नीलम) डालने के समय इस मंत्र को पढना चाहिये-
ऊँ परि वाजपति: कविरग्निअर्हव्यान्यक्रमीत,दधद्रत्नानि दाशुषे।

कलश में द्रव्य (चलती हुई मुद्रा) को डालते वक्त इस मंत्र को पढना चाहिये-
ऊँ हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत,स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।

कलश के ऊपर वस्त्र पहिनाने के समय इस मंत्र को पढें-
ऊँ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमाऽसदत्स्व:,वासो अग्ने विश्वरूपँ व्ययस्व विभावसो।

कलश के ऊपर पूर्ण पात्र (मिट्टी का बना प्याला जो कलश के साथ कुम्हार से लावें) को रखते समय इस मन्त्र को पढें-
ऊँ पूर्णा दर्वि परा पत सुपूर्णा पुनरा पत,वस्नेव विक्रीणावहा इषमूर्जँ शतक्रतो।

चावल से भरे पूर्णपात्र को कलश पर स्थापित करें और उसपर लाल कपडा लपेट हुये नारियल को इस मंत्र पढकर रखें-
ऊँ या: फ़लिनीर्या अफ़ला अपुष्पा याश्च पुष्पिणी:,बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुंचन्त्वँहस:।

इसके बाद कलश में देवी देवताओं का आवाहन करना चाहिये,सबसे पहले हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र से वरुण का आवाहन करे-
कलश में वरुण का ध्यान और आवाहन-
ऊँ तत्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भि:,अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशँ स मा न आयु: प्र मोषी:।
अस्मिन कलशे वरुणं सांड्ग सपरिवारं सायुधं सशक्तिकमावाहयामि। ऊँ भूभुर्व: स्व: भो वरुण ! इहागच्छ इह तिष्ठ स्थापयामि,पूजयामि मम पूजां गृहाण,ऊँ अपां पतये नम:।

इस मन्त्र को कह कर कलश पर अक्षत और फ़ूल छोड दें,फ़िर हाथ में अक्षत और फ़ूल लेकर चारों वेद एवं अन्य देवी देवताओं का आवाहन करे-
कलश में देवी-देवताओं का आवाहन
कलशस्य मुखे विष्णु: कण्ठे रुद्रळ समाश्रित:,मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्मृता:।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा,ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथर्वण:।
अंगेश्च सहिता: सर्वे कलशं तु समाश्रिता:,अत्र गायत्री सावित्री शान्ति: पुष्टिकरी तथा।
आयान्तु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारका:,गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धुकावेरि जलेऽस्मिन संनिधिं कुरु।
सर्वे समुद्रा: सरितीर्थानि जलदा नदा:,आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकारका:।

इस तरह जलाधिपति वरुणदेव तथा वेदों तीर्थों नदों नदियों सागरों देवियों एवं देवताओं के आवाहन के बाद हाथ में अक्षत पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र से कलश की प्रतिष्ठा करें-
प्रतिष्ठा मंत्र
ऊँ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु,विश्वे देवास इह मादयन्तामोउम्प्रतिष्ठ। कलशे वरुणाद्यावाहितदेवता: सुप्रतिष्ठता वरदा भवन्तु,ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:।

यह कहकर कलश के पास अक्षत और फ़ूल छोड दें।
कलश में जल के रूप में वरुण की स्थापना की गयी है,सभी प्रधान वस्तुओं के रूप में पृथ्वी के रूप में स्थल कारक सप्तमृत्तिका,औषधि के रूप में सर्वोषधि,स्थल बीज के रूप में सुपाडी,जल बीज के रूप में नारियल,क्योंकि बीज के अन्दर जीव है,और जब जीव है तो आत्मा का आना जरूरी है,कारक कलश है,इस प्रकार वरुणदेवता का ध्यान पूजा आदिक का विवरण इस प्रकार से सम्पन्न किया जाता है।
ध्यान
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,ध्यानार्थे पुष्पं समर्पयामि। (ध्यान के लिये फ़ूल कलश पर छोडें)

आसन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,आसनार्थे अक्षतान समर्पयामि। (कलश के पास चावल रखें)

पाद्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,पादयो: पाद्यम समर्पयामि। (जल चढायें)

अर्ध्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,हस्तयोर्ध्यं समर्पयामि। (जल चढायें)

स्नानीय जल
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:.स्नानीयं जलं समर्पयामि। (स्नानीय जल चढायें)

स्नानांग आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,स्नानते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमनीय जल चढायें)

पंचामृत स्नान
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,पंचामृतस्नानं समर्पयामि। (पंचामृत से स्नान करवायें,पंचामृत के लिये दूध,दही,घी,शहद,शक्कर का प्रयोग करें)

गन्धोदक स्नान
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:,गन्धोदकस्नानं समर्पयामि। (पानी में चन्दन को घिस कर पानी में मिलाकर स्नान करवायें)

शुद्धोदक स्नान
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम:.स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। ( शुद्ध जल से स्नान करवायें)

आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमन के लिये जल चढायें)

वस्त्र
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: वस्त्रं समर्पयामि। (वस्त्र चढायें)

आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमन के जल चढायें)

यज्ञोपवीत
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: यज्ञोपवीतं समर्पयामि। (यज्ञोपवीत चढायें)

आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमन के लिये जल चढायें)

उपवस्त्र
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: उपवस्त्रं समर्पयामि। (उपवस्त्र को चढायें)

आचमन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: उपवस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (आचमन के लिये जल चढायें)

चन्दन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: चन्दनं समर्पयामि। (चन्दन को चढायें)

अक्षत
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: अक्षतान समर्पयामि। (चावलों को चढायें)

पुष्पमाला
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: पुष्पमालां समर्पयामि। (पुष्पमाला चढायें)

नानापरिमल द्रव्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: नानापरिमल द्रव्यं समर्पयामि। (नाना परिमल द्रव्य चढायें)

सुगन्धित द्रव्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: सुगन्धित द्रव्यं समर्पयामि। (सुगन्धित द्रव्य चढायें)

धूप
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: धूपमाघ्रापयामि। (धूपबत्ती को आघ्रापित करायें)

दीप
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: दीपं दर्शयामि। (दीपक दिखायें)

हस्तप्रक्षालन
दीपक दिखाकर हाथ धो लें।

नैवैद्य
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: सर्वविधं नैवैद्यम निवेदयामि। (नैवैद्य निवेदित करें)

आचमनादि
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: आचमनीयं जलम,मध्ये पानीयं,उत्तरापोऽशने मुखप्रक्षालनार्थे हस्तप्रक्षालनार्थे च जलं समर्पयामि। (आचमनीय जल एवं पानीय तथा मुख और हस्तप्रक्षालन के लिये जल चढायें)

करोद्वर्तन
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: करोद्वर्तनं समर्पयामि। (करोद्वर्तन के लिये गन्ध समर्पित करें)

ताम्बूल
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: ताम्बूलं समर्पयामि। (सुपारी इलायची लौंग सहित पान का ताम्बूल समर्पित करें)

दक्षिणा
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: कृताया: पूजाया: सादुर्गण्यार्थे द्रव्य दक्षिणां समर्पयामि। (दक्षिणा प्रदान करें)

आरती
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: आरार्तिकं समर्पयामि। (आरती करें)

प्रदक्षिणा
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: प्रदक्षिणां समर्पयामि। (प्रदक्षिणा करें)

प्रार्थना
हाथ में पुष्प लेकर इस प्रकार से प्रार्थना करें-

देवदानव संवादे मद्यमाने महोदधौ,उत्पन्नोऽसि तथा कुम्भ विधृतो विष्णुना स्वयं।
त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवा: सर्वे त्वयि स्थिता:,त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणा: प्रतिष्ठता:।
शिव: स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापति,आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा: सपैतृका:।
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यत: कामफ़लप्रदा:,त्वत्प्रसादादिमां पूजां कर्तुमीहे जलोद्भव।
सांनिध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा।
नमो नमस्ते स्फ़टिकप्रभाय सुश्वेतहाराय सुमंगलाय,सुपाशहस्ताय झषासनाय जलाधिनाथाय नमो नमस्ते।
ऊँ अपां पतये वरुणाय नम:।

नमस्कार
ऊँ वरुणाद्यावाहितदेवताभ्यो नम: प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान समर्पयामि। (इस मन्त्र से नमस्कार पूर्वक पुष्प समर्पित करें)

अब हाथ में जल लेकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण कर जल कलश के पास छोडते हुये समस्त पूजन कर्म भगवान वरुणदेव को निवेदित करें-

समर्पण
कृतेन अनेन पूजनेन कलशे वरुनाद्यावाहितदेवता: प्रीयन्तां न मम।

इति कलश-स्थापना
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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