माँ गायत्री - एक शोध / विचार--पंडित खींवराज शर्मा (जोधपुर) ---




गायत्री के समग्र विनियोग में सविता देवता, विश्वामित्र ऋषि एवं गायत्री छन्द का उल्लेख किया गया है, परन्तु उसके वर्गीकरण में प्रत्येक अक्षर एक स्वतंत्र शक्ति बन जाता है । हर अक्षर अपने आप में एक मंत्र है । ऐसी दशा में २४ देवता, २४ ऋषि एवं २४ छन्दों का उल्लेख होना भी आवश्यक है । तत्वदर्शियों ने वैसा किया भी है । गायत्री विज्ञान की गहराई में उतरने पर इन विभेदों का स्पष्टीकरण होता है । नारंगी ऊपर से एक दीखती है, पर छिलका उतारने पर उसके खण्ड घटक स्वतंत्र इकाइयों के रूप में भी दृष्टिगोचर होते हैं । गायत्री को नारंगी की उपमा दी जाय तो उसके अन्तराल में चौबीस अक्षरों के रूप में २४ खण्ड घटकों के दर्शन होते हैं । जो विनियोग एक समय गायत्री मंत्र का होता है, वैसा ही प्रत्येक अक्षर का भी आवश्यक होता है । चौबीस अक्षरों के लिए चौबीस विनियोग बनने पर उनके २४ देवता २४ ऋषि एवं २४ छन्द भी बन जाते हैं ।

ऋषियों और देवताओं का परस्पर समन्वय है । ऋषियों की साधना से विष्णु की तरह सुप्तावस्था में पड़ी रहने वाली देवसत्ता को जाग्रत होने का अवसर मिलता है । देवताओं के अनुग्रह से ऋषियों को उच्चस्तरीय वरदान मिलते हैं । वे सार्मथ्यवान् बनते हैं और स्व पर कल्याण की महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करते हैं ।

ऋषि सद्गुण हैं और देवता उनके प्रतिफल । ऋषि को जड़ और देवता को वृक्ष कहा जा सकता है । ऋषित्व और देवत्व के संयुक्त का परिणाम फल-सम्पदा के रूप में सामने आता है । ऋषि लाखों हुए हैं और देवता तो करोड़ों तक बताये जाते हैं । ऋषि पृथ्वी पर और देवता स्वर्ग में रहने वाले माने जाते हैं । स्थूल दृष्टि से दोनों के बीच ऐसा कोई तारतम्य नहीं है, जिससे उनकी संख्या समान ही रहे । उस असमंजस का निराकरण गायत्री के २४ अक्षरों से सम्बद्ध ऋषि एवं देवताओं से होता है । हर सद्गुण का विशिष्ट परिणाम होना समझ में आने योग्य बात है । यों प्रत्येक सद्गुण परिस्थिति के अनुसार अनेकानेक सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकता है, फिर भी यह मान कर ही चलना होगा कि प्रत्येक सत्प्रवृत्ति की अपनी विशिष्ट स्थिति होती है और उसी के अनुरूप अतिरिक्त प्रतिक्रिया भी होती है । ऋषि रूपी पुरुषार्थ से देवता रूपी वरदान संयुक्त रूप से जुड़े रहने की बात हर दृष्टि से समझी जाने योग्य है ।
मूर्धन्य ऋषियों की गणना २४ है । इसका उल्लेख गायत्री तंत्र में इस प्रकार मिलता है-

वामदेवोऽत्रिर्वसिष्ठः शुक्रः कण्वः पराशरः ।
विश्वामित्रो महातेजाः कपिलः शौनको महान्॥ १३॥
याज्ञवल्क्या भरद्वाजो जमदग्निस्तपोनिधिः ।
गौतमो मुद्गलश्चैव वेदव्यासश्च लोमशः॥ १४॥
अगस्त्यः कौशिको वत्सः पुलस्त्यो मांडुकस्तथा ।
दुर्वासास्तपसां श्रेष्ठो नारदः कश्यपस्तथा॥ १५॥
इत्येते ऋषयः प्रोक्ता वर्णानां क्रमशोमुने ।

अर्थात्-गायत्री के २४ अक्षरों के द्रष्टा २४ ऋषि यह है-
(१) वामदेव
(२) अत्रि
(३) वशिष्ठ
(४) शुक्र
(५) कण्व
(६) पाराशर
(७) विश्वामित्र
(८) कपिल
(९) शौनक
(१०) याज्ञवल्क्य
(११) भरद्वाज
(१२) जमदग्नि
(१३) गौतम
(१४) मुद्गल
(१५) वेदव्यास
(१६) लोमश
(१७) अगस्त्य
(१८) कौशिक
(१९) वत्स
(२०) पुलस्त्य
(२१) माण्डूक
(२२) दुर्वासा
(२३) नारद
(२४) कश्यप । - गायत्री तंत्र प्रथम पटल

इन २४ ऋषियों को सामान्य जन-जीवन में जिन सत्प्रवृत्तियों के रूप में जाना जा सकता है, वे यह हैं- (१) प्रज्ञा (२) सृजन (३) व्यवस्था (४) नियंत्रण (५) सद्ज्ञान (६) उदारता (७) आत्मीयता (८) आस्तिकता (९) श्रद्धा (१०) शुचिता (११) संतोष (१२) सहृदयता (१३) सत्य (१४) पराक्रम (१५) सरसता (१६) स्वावलम्बन (१७) साहस (१८) ऐक्य (१९) संयम (२०) सहकारिता (२१) श्रमशीलता (२२) सादगी (२३) शील (२४) समन्वय । प्रत्यक्ष ऋषि यही २४ हैं ।

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वेदमाता गायत्री महिमा - 4

ॐ र्भूभुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

आर्शग्रंथों मे गयत्रि मन्त्र
यह महामन्त्र वेदों में कई-कई बार आया है ।
ऋग्वेद में ६ ।६२ ।१०,
‍सामवेद में २ ।८ ।१२,
यर्जुवेद वा० सं० में ३ ।३५-२२ ।९ -३० । २-३६ ।३,
अथर्व वेद में १९ । ७१ ।१
में गायत्री की महिमा विस्तार पूर्वक गाई गई है ।

ब्राह्मण ग्रन्थों में गायत्री मन्त्र का उल्लेख अनेक स्थानोंपर है । यथा-
ऐतरेय ब्राह्मण ४ ।३२ ।२-५ ।५ ।६-१३ ।८, १९ ।८,
‍कौशीतकी ब्राह्मण २२ ।३-२६ ।१०,
गोपथ ब्राह्मण १ ।१ ।३४,
दैवत ब्राह्मण ३ ।२५,
शतपथ ब्राह्मण २ ।३ ।४ ।३९-२३ ।६ ।२ ।९-१४ ।९ ।३ ।११,
तैतरीय सं० १ ।५ ।६ ।४-४ ।१ ।१,
मैत्रायणी सं० ४ ।१० ।३-१४९ ।१४

आरण्यकों में गायत्री का उल्लेख इन स्थानों पर है-
तैत्तरीय आरण्यक १ ।१ ।२१० ।२७ ।१,
वृहदारण्यक ६ ।३ ।११ ।४ ।८,

उपनिषदों में इस महामन्त्र की चर्चा निम्न प्रकरणों में है-
नारायण उपनिषद् १५-२,
मैत्रेय उपनिषद् ६ ।७ ।३४,
जैमिनी उपनिषद् ४ । २८ ।१,
श्वेताश्वतर उपनिषद् ४ ।१८ ।

सूत्र ग्रंथों में गायत्री का विवेचन निम्न प्रसंगों में आया है-
आश्वालायन श्रोैत सूत्र ७ । ६ । ६-८ । १ । १८,
शांखायन श्रौत सूत्र २ । १० ।२-१२ ।७-५ ।५ ।२-१० ।६ ।१०-९ ।१६,
आपस्तम्भ श्रौत सूत्र ६ । १८ । १,
शांखायन गृह्य सूत्र २ । ५ ।१२,७ । १९,६ । ४ । ८,
कौशीतकी सूत्र ९१ । ६,
खगटा गृह्य सूत्र २ । ४ । २१,
आपस्तम्भ गृह्य सूत्र २ । ४ । २१,
बोधायन ध० शा० २ । १० । १७ । १४,
मान०ध०शा० २ ।७७,
ऋग्विधान १ । १२ । ५
मान० गृ० सू० १ । २ । ३-४ । ४ ।८-५ ।२ ।

गायत्री का शीर्ष भाग : ॐ र्भूभुवः स्वः
गायत्री, वैदिक संस्कृत का एक छन्द है जिसमें आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण-कुल २४ अक्षर होते हैं । गायत्री शब्द का अर्थ है- प्राण-रक्षक । गय कहते हैं प्राण को, त्री कहते हैं त्राण-संरक्षण करने वाली को । जिस शक्ति का आश्रय लेने पर प्राण का, प्रतिभा का, जीवन का संरक्षण होता है उसे गायत्री कहा जाता है । और भी कितने अर्थ शास्त्रकारों ने किये हैं । इन सब अर्थों पर विचार करने पर यह कहा जा सकता है कि यह छोटा-सा मन्त्र भारतीय संस्कृति, धर्म एवं तत्वज्ञान का बीज है । इसी के थोड़े से अक्षरों में सन्निहित प्रेरणाओं की व्याख्या स्वरूप चारों वेद बने ।

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वेदमाता गायत्री महिमा - 3

गायत्री मंत्र के २४ अक्षरों को २४ देवताओं का शक्ति - बीज मंत्र माना गया है । प्रत्येक अक्षर का एक देवता है । प्रकारान्तर से इस महामंत्र को २४ देवताओं का एवं संघ, समुच्चय या संयुक्त परिवार कह सकते हैं । इस परिवार के सदस्यों की गणना के विषय में शास्र बतलाते हैं-

गायत्री मंत्र का एक-एक अक्षर एक-एक देवता का प्रतिनिधित्व करता है । इन २४ अक्षरों की शब्द शृंखला में बँधे हुए २४ देवता माने गये हैं-
गायत्र्या वर्णमेककं साक्षात देवरूपकम् ।
तस्मात् उच्चारण तस्य त्राणयेव भविष्यति॥ -गायत्री संहिता
अर्थात्-गायत्री का एक-एक अक्षर साक्षात् देव स्वरूप है । इसलिए उसकी आराधना से उपासक का कल्याण ही होता है ।

दैवतानि शृणु प्राज्ञ तेषामेवानुपूर्वशः ।
आग्नेयं प्रथम प्रोक्तं प्राजापत्यं द्वितीयकम्॥
तृतीय च तथा सोम्यमीशानं च चतुर्थकम् ।
सावित्रं पञ्चमं प्रोक्तं षष्टमादित्यदैवतम्॥
वार्हस्पत्यं सप्तमं तु मैवावरुणमष्टमम् ।
नवम भगदैवत्यं दशमं चार्यमैश्वरम्॥
गणेशमेकादशकं त्वाष्ट्रं द्वादशकं स्मृतम् ।
पौष्णं त्रयोदशं प्रोक्तमैद्राग्नं च चतुर्दशम्॥
वायव्यं पंचदशकं वामदेव्यं च षोडशम् ।
मैत्रावरुण दैवत्यं प्रोक्तं सप्तदशाक्षरम्॥
अष्ठादशं वैश्वदेवमनविंशंतुमातृकम् ।
वैष्णवं विंशतितमं वसुदैवतमीरितम्॥
एकविंशतिसंख्याकं द्वाविंशं रुद्रदैवतम् ।
त्रयोविशं च कौवेरेगाश्विने तत्वसंख्यकम्॥
चतुर्विंशतिवर्णानां देवतानां च संग्रहः । -गायत्री तंत्र प्रथम पटल ।

अर्थात्-हे प्राज्ञ! अब गायत्री के २४ अक्षरों में विद्यमान २४ देवताओं के नाम सुनों-
(१) अग्नि
(२) प्रजापति
(३) चन्द्रमा
(४) ईशान
(५) सविता
(६) आदित्य
(७) बृहस्पति
(८) मित्रावरुण
(९) भग
(१०) अर्यमा
(११) गणेश
(१२) त्वष्टा
(१३) पूषा
(१४) इन्द्राग्नि
(१५) वायु
(१६) वामदेव
(१७) मैत्रावरूण
(१८) विश्वेदेवा
(१९) मातृक
(२०) विष्णु
(२१) वसुगण
(२२) रूद्रगण
(२३) कुबेर
(२४) अश्विनीकुमार ।

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गायत्री के चौबीस अक्षरों से संबंधित कलाएँ एवं मातृकाएँ इस प्रकार हैं-
(१) तापिनी
(२) सफला
(३) विश्वा
(४) तुष्टा
(५) वरदा
(६) रेवती
(७) सूक्ष्मा
(८) ज्ञाना
(९) भर्गा
(१०) गोमती
(११) दर्विका
(१२) थरा
(१३) सिंहिका
(१४) ध्येया
(१५) मर्यादा
(१६) स्फुरा
(१७) बुद्धि
(१८) योगमाया
(१९) योगात्तरा
(२०) धरित्री
(२१) प्रभवा
(२२) कुला
(२३) दृष्या
(२४) ब्राह्मी ।

२४ मातृकाएँ

(१) चन्द्रकेश्वरी
(२) अजतवला
(३) दुरितारि
(४) कालिका
(५) महाकाली
(६) श्यामा
(७) शान्ता
(८) ज्वाला
(९) तारिका
(१०) अशोका
(११) श्रीवत्सा
(१२) चण्डी
(१३) विजया
(१४) अंकुशा
(१५) पन्नगा
(१६) विर्वाक्षी
(१७) वेला
(१८) धारिणी
(१९) प्रिया
(२०) नरदत्ता
(२१) गन्धारी
(२२) अम्बिका
(२३) पद्मावती
(२४) सिद्धायिका ।

सामान्य दृष्टि से कलाएँ और मातृकाएँ अलग-अलग प्रतीत होती हैं, किन्तु तात्विक दृष्टि से देखने पर उन दोनों का अन्तर समाप्त हो जाता है । उन्हें श्रेष्ठता की सार्मथ्य कह सकते हैं और उनके नामों के अनुरूप उनके द्वारा उत्पन्न होने वाले सत्परिणामों का अनुमान लगा सकते हैं ।

गायत्री के २४ अक्षर २४ दिव्य प्रकाश स्तम्भ
गोपथ ब्राह्मण में गायत्री के २४ अक्षरों को २४ स्तम्भों का दिव्य तेज बताया गया है । समुद्र में जहाजों का मार्गदर्शन करने के लिए जहाँ-तहाँ प्रकाश स्तम्भ खड़े रहते हैं । उनमें जलने वाले प्रकाश को देखकर नाविक अपने जलपोत को सही रास्ते से ले जाते हैं और वे चट्टानों से टकराने एवं कीचड़ आदि में धँसने से बच जाते हैं । इसी प्रकार गायत्री के २४ अक्षर २४ प्रकाश स्तम्भ बनकर प्रजा की जीवन नौका को प्रगति एवं समृद्धि के मार्ग पर ठीक तरह चलते रहने की प्रेरणा करते हैं । आपत्तियों से बचाते हैं और अनिश्चितता को दूर करते हैं ।

गोपथ के अनुसार गायत्री चारों वेदों की प्राण, सार, रहस्य एवं तन है । साम संगीत का यह रथन्तर आत्मा के उल्लास को उद्देलित करता है । जो इस तेज को अपने में धारण करता है, उसकी वंश परम्परा तेजस्वी बनती चली जाती है । उसकी पारिवारिक संतति और अनुयायियों की शृंखला में एक से एक बढ़कर तेजस्वी, प्रतिभाशाली उत्पन्न होते चले जाते हैं । श्रुति कहती है-
तेजो वै गायत्री छन्दसां रथन्तरमं साम्नाम् तेजश्चतुर्विशस्ते माना तेज एवं तत्सम्यक् दधाति पुत्रस्थ पुत्रस्तेजस्वी भवति॥ -गोपथ
अर्थात्-गायत्री सब वेदों का तेज है । सामवेद का यह रथन्तर छन्द ही २४ स्तम्भों का यह दिव्य तेज है । इस तेज को धारण करने वाले की वंश परम्परा तेजस्वी होती है ।

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गायत्री मंत्र का तत्वज्ञान

समस्त विद्याओं की भण्डागार-गायत्री महाशक्ति
ॐ र्भूभुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
गायत्री संसार के समस्त ज्ञान-विज्ञान की आदि जननी है । वेदों को समस्त प्रकार की विद्याओं का भण्डार माना जाता है, वे वेद गायत्री की व्याख्या मात्र हैं । गायत्री को 'वेदमाता' कहा गया है । चारों वेद गायत्री के पुत्र हैं । ब्रह्माजी ने अपने एक-एक मुख से गायत्री के एक-एक चरण की व्याख्या करके चार वेदों को प्रकट किया ।

'ॐ भूर्भवः स्वः' से-ऋग्वेद,
'तत्सवितुर्वरेण्यं' से-यर्जुवेद,
'भर्गोदेवस्य धीमहि' से-सामवेद और
'धियो योनः प्रचोदयात्' से अथर्ववेद की रचना हुई ।

इन वेदों से शास्त्र, दर्शन, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक, सूत्र, उपनिषद्, पुराण, स्मृति आदि का निर्माण हुआ । इन्हीं ग्रन्थों से शिल्प, वाणिज्य, शिक्षा, रसायन, वास्तु, संगीत आदि ८४ कलाओं का आविष्कार हुआ । इस प्रकार गायत्री, संसार के समस्त ज्ञान-विज्ञान की जननी ठहरती है । जिस प्रकार बीज के भीतर वृक्ष तथा वीर्य की एक बूंद के भीतर पूरा मनुष्य सन्निहित होता है, उसी प्रकार गायत्री के २४ अक्षरों में संसार का समस्त ज्ञान-विज्ञान भरा हुआ है । यह सब गायत्री का ही अर्थ विस्तार है ।

मंत्रों में शक्ति होती है । मंत्रों के अक्षर शक्ति बीज कहलाते हैं । उनका शब्द गुन्थन ऐसा होता है कि उनके विधिवत् उच्चारण एवं प्रयोग से अदृश्य आकाश मण्डल में शक्तिशाली विद्युत् तरंगें उत्पन्न होती हैं, और मनःशक्ति तरंगों द्वारा नाना प्रकार के आध्यात्मिक एवं सांसारिक प्रयोजन पूरे होते हैं । साधारणतः सभी विशिष्ट मंत्रों में यही बात होती है । उनके शब्दों में शक्ति तो होती है, पर उन शब्दों का कोई विशेष महत्वपूर्ण अर्थ नहीं होता । पर गायत्री मंत्र में यह बात नहीं है । इसके एक-एक अक्षर में अनेक प्रकार के ज्ञान-विज्ञानों के रहस्यमय तत्त्व छिपे हुए हैं । 'तत्-सवितुः - वरेण्यं-' आदि के स्थूल अर्थ तो सभी को मालूम है एवं पुस्तकों में छपे हुए हैं । यह अर्थ भी शिक्षाप्रद हैं । परन्तु इनके अतिरिक्त ६४ कलाओं, ६ शास्त्रों, ६ दर्शनों एवं ८४ विद्याओं के रहस्य प्रकाशित करने वाले अर्थ भी गायत्री के हैं । उन अर्थों का भेद कोई-कोई अधिकारी पुरुष ही जानते हैं । वे न तो छपे हुए हैं और न सबके लिये प्रकट हैं ।

इन २४ अक्षरों में आर्युवेद शास्त्र भरा हुआ है । ऐसी-ऐसी दिव्य औषधियों और रसायनों के बनाने की विधियाँ इन अक्षरों में संकेत रूप से मौजूद हैं जिनके द्वारा मनुष्य असाध्य रोगों से निवृत्त हो सकता है, अजर-अमर तक बन सकता है । इन २४ अक्षरों में सोना बनाने की विधा का संकेत है । इन अक्षरों में अनेकों प्रकार के आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, नारायणास्त्र, पाशुपतास्त्र, ब्रह्मास्त्र आदि हथियार बनाने के विधान मौजूद हैं । अनेक दिव्य शक्तियों पर अधिकार करने की विधियों के विज्ञान भरे हुए हैं । ऋद्धि-सिद्धियों को प्राप्त करने, लोक-लोकान्तरों के प्राणियों से सम्बन्ध स्थापित करने, ग्रहों की गतिविधि तथा प्रभाव को जानने, अतीत तथा भविष्य से परिचित होने, अदृश्य एवं अविज्ञात तत्त्वोंको हस्तामलकवत् देखने आदि अनेकों प्रकार के विज्ञान मौजूद हैं । जिकी थोड़ी सी भी जानकारी मनुष्य प्राप्त करले तो वह भूलोक में रहते हुए भी देवताओं के समान दिव्य शक्तियों से सुसम्पन्न बन सकता है । प्राचीन काल में ऐसी अनेक विद्याएँ हमारे पूर्वजों को मालूम थीं जो आज लुप्त प्रायः हो गई हैं । उन विद्याओं के कारण हम एक समय जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक एवं स्वर्ग-सम्पदाओं के स्वामी बने हुए थे । आज हम उनसे वञ्चित होकर दीन-हीन बने हुए हैं ।

‍आवश्यकता इस बात की है कि गायत्री महामन्त्र में सन्निहित उन लुप्तप्राय महाविद्याओं को खोज निकाला जाय, जो हमें फिर से स्वर्ग- सम्पदाओं का स्वामी बना सके । यह विषय सर्वसाधारण का नहीं है । हर एक का इस क्षेत्र में प्रवेश भी नहीं है । अधिकारी सत्पात्र ही इस क्षेत्र में कुछ अनुसंधान कर सकते हैं और उपलब्ध प्रतिफलों से जनसामान्य को लाभान्वित करा सकते हैं ।

गायत्री के दोनों ही प्रयोग हैं । वह योग भी है और तन्त्र भी । उससे आत्म-दर्शन और ब्रह्मप्राप्ति भी होती है तथा सांसारिक उपार्जन-संहार भी । गायत्री-योग दक्षिण मार्ग है- उस मार्ग से हमारे आत्म-कल्याण का उद्देश्य पूरा होता है ।

‍दक्षिण मार्ग का आधार यह है कि- विश्वव्यापी ईश्वरीय शक्तियों को आध्यात्मिक चुम्बकत्व से खींच कर अपने में धारण किया जाय, सतोगुण को बढ़ाया जाय और अन्तर्जगत् में अवस्थित पञ्चकोष, सप्त प्राण, चेतना चतुष्टय, षटचक्र एवं अनेक उपचक्रों, मातृकाओं, ग्रन्थियों, भ्रमरों, कमलों, उपत्यिकाओं को जागृत करके आनन्ददायिनी = अलौकिक शक्तियों का आविर्भाव किया जाय ।

गायत्री-तन्त्र वाम मार्ग है- उससे सांसारिक वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती हैं और किसी का नाश भी किया जा सकता है । वाम मार्ग का आधार यह है कि-'' दूसरे प्राणियों के शरीरों में निवास करने वाली शक्ति को इधर से उधर हस्तान्तरित करके एक जगह विशेष मात्रा में शक्ति संचित कर ली जाय और उस शक्ति का मनमाना उपयोग किया जाय ।''

तन्त्र का विषय गोपनीय है, इसलिए गायत्री तन्त्र के ग्रन्थों में ऐसी अनेकों साधनाएँ प्राप्त होती हैं, जिनमें धन, सन्तान, स्त्री, यश, आरोग्य, पदप्राप्ति, रोग-निवारण, शत्रु नाश, पाप-नाश, वशीकरण आदि लाभों का वर्णन है और संकेत रूप से उन साधनाओं का एक अंश बताया गया है । परन्तु यह भली प्रकार स्मरण रखना चाहिये कि इन संक्षिप्त संकेतों के पीछे एक भारी कर्मकाण्ड एवं विधिविधान है । वह पुस्तकों में नहीं वरन् अनुभवी साधना सम्पन्न व्यक्तियों से प्राप्त होता है, जिन्हें सद्गुरु कहते हैं ।

गायत्री की २४ शक्ति

गायत्री मंत्र में चौबीस अक्षर हैं । तत्त्वज्ञानियों ने इन अक्षरों में बीज रूप में विद्यमान उन शक्तियों को पहचाना जिन्हें चौबीस अवतार, चौबीस ऋषि, चौबीस शक्तियाँ तथा चौबीस सिद्धियाँ कहा जाता है । देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षि इसी उपासना के सहारे उच्च पदासीन हुए हैं । 'अणोरणीयान महतो महीयान' यही महाशक्ति है । छोटे से छोटा चौबीस अक्षर का कलेवर, उसमें ज्ञान और विज्ञान का सम्पूर्ण भाण्डागार भरा हुआ है । सृष्टि में ऐसा कुछ भी नहीं, जो गायत्री में न हो । उसकी उच्चस्तरीय साधनाएँ कठिन और विशिष्ट भी हैं, पर साथ ही सरल भी इतनी है कि उन्हें हर स्थिति में बड़ी सरलता और सुविधाओं के साथ सम्पन्न कर सकता है । इसी से उसे सार्वजनीन और सार्वभौम माना गया । नर-नारी, बाल-वृद्ध बिना किसी जाति व सम्प्रदाय भेद के उसकी आराधना प्रसन्नता पूर्वक कर सकते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुरूप लाभ उठा सकते हैं ।

'गायत्री संहिता' में गायत्री के २४ अक्षरों की शाब्दिक संरचना रहस्ययुक्त बतायी गयी है और उन्हें ढूँढ़ निकालने के लिए विज्ञजनों को प्रोत्साहित किया गया है । शब्दार्थ की दृष्टि से गायत्री की भाव-प्रक्रिया में कोई रहस्य नहीं है । सद्बुद्धि की प्रार्थना उसका प्रकट भावार्थ एवं प्रयोजन है । यह सीधी-सादी सी बात है जो अन्यान्य वेदमंत्रों तथा आप्त वचनों में अनेकानेक स्थानों पर व्यक्त हुई है । अक्षरों का रहस्य इतना ही है कि साधक को सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए पे्रेरित करते हैं । इस प्रेरणा को जो जितना ग्रहण कर लेता है वह उसी अनुपात से सिद्ध पुरुष बन जाता है । कहा गया है-
चतुविंशतिवर्णेर्या गायत्री गुम्फिता श्रुतौ ।
रहस्ययुक्तं तत्रापि दिव्यै रहस्यवादिभिः॥ गायत्री संहिता -८५
अर्थात्-वेदों में जो गायत्री चौबीस अक्षरों में गूँथी हुई है, विद्वान् लोग इन चौबीस अक्षरों के गूँथने में बड़े-बड़े रहस्यों को छिपा बतलाते हैं ।

गायत्री की २४ शक्तियों की उपासना करने के लिए शारदा तिलकतंत्र का मार्गदर्शन इस प्रकार है ।
ततः षडङ्गान्यभ्र्यचेत्केसरेषु यथाविधि ।
प्रह्लादिनी प्रभां पश्चान्नित्यां विश्वम्भरां पुनः॥
विलासिनी प्रभवत्यौ जयां शांतिं यजेत्पुनः ।
कान्तिं दुर्गा सरस्वत्यौ विश्वरूपां ततः परम्॥
विशालसंज्ञितामीशां व्यापिनीं विमलां यजेत् ।
तमोऽपहारिणींसूक्ष्मां विश्वयोनिं जयावहाम्॥
पद्मालयां परांशोभां पद्मरूपां ततोऽर्चयेत् ।
ब्राह्माद्याः सारुणा बाह्यं पूजयेत् प्रोक्तलक्षणाः॥ -शारदा० २१ ।२३ से २६
अर्थात्-पूजन उपचारों से षडंग पूजन के बाद प्रह्लादिनी, प्रभा, नित्या तथा विश्वम्भरा का यजन (पूजन) करें । पुनः विलासिनी, प्रभावती, जया और शान्ति का अर्चन करना चाहिए । इसके बाद कान्ति, दुर्गा, सरस्वती और विश्वरूपा का पूजन करें । पुनः विशाल संज्ञा वाली-ईशा (विशालेशा), 'व्यापिनी' और 'विमला' का यजन करना चाहिए । इसके अनन्तर 'तमो', 'पहारिणी', 'सूक्ष्मा', 'विश्वयोनि', 'जयावहा', 'पद्मालया', 'पराशोभा' तथा पद्मरूपा आदि का यजन करें । 'ब्राह्मी' 'सारुणा' का बाद में पूजन करना चाहिए ।
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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