चित्त भ्रम योग---

सभी सुख है लेकिन दिमाग में शांति नही है,भोजन भरपेट किया है,सोने के लिये बढिया सर्दी गर्मी से बचने का साधन है,सन्तान ठीक है,घर में कोई आफ़त भी नही है लेकिन दिमाग अशान्त है,रोजी रोजगार भी सही है,धन की भी कोई कमी नही है,हितू नातेदार रिस्तेदार सभी माफ़िक है,कोई बुराई नही कर रहा है लेकिन दिमाग फ़िर भी अशांत है। दिमागी अशान्ति इस कदर हावी है कि रात को खूब सोने की चेष्टा की जाती है,लेकिन सुबह के समय जब सभी के जगने का समय होता है तभी नींद का आना होता है,सभी लोग जाग कर अपने अपने कार्यों में लगे है लेकिन उस समय नींद का आना होता है,किसी न किसी बहाने से कोई आकर जगा भी देता है या शोर सुनकर आंख खुल जाती है तो दिन भर के लिये झल्लाहट पैदा हो जाती हर किसी से बात करते समय कार्य करते समय झल्लाहट ही सवार रहती है,किसी भी काम को हाथ में लिया और किसी ने कुछ कह दिया बस एक दम ताव आया और हाथ के काम को छोड कर जो मन में आया बक दिया या एकान्त में जाकर बैठ गये,रोना आगया बिना कारण के बिना बात के घर के अन्दर क्लेश पैदा हो गया। यह सब होने का कारण एक ही जिसे चित्त-भ्रम योग की संज्ञा दी जाती है।


चित्त भ्रम जरूरी नही है कि किसी समझदार व्यक्ति में या वयस्क व्यक्ति में ही पैदा हो,यह बच्चे के अन्दर भी पैदा हो जाता है,टीचर ने कार्य करने के लिये दिया जल्दबाजी में रफ़ कापी की बजाय किसी फ़ेयर कापी में काम को नोट कर लिया,काम भी ऐसी जगह पर नोट किया जहां बाद में भी कुछ टापिक लिखा जाना है,लेकिन चित्त भ्रम के कारण ऐसा हो गया,घर आकर उसे देख कर दिमाग और भी खराब हो गया,और जो काम दिया गया उसे पूरा नही किया गया परिणाम में सुबह स्कूल जाकर टीचर से कोई झूठा बहाना बनाया और टीचर ने एक नोट कापी के अन्दर डाल दिया,घर आकर डर की बजह से खुद ही पेरेन्ट के साइन कर लिये और टीचर को दिखा दिया,कुछ समय के लिये तो इस चित्त भ्रम वाली स्थिति पर पर्दा डाल दिया लेकिन समय के साथ वह झूठ जब खुला तो और भी बुरा हाल हो गया,चित्त इतना भ्रम में गया कि स्कूल जाने से ही मन दूर हो गया और जो पढा लिखा जा रहा था उसे भूल कर दोस्तों के साथ दिन बिताये जाने लगे,आगे का परिणाम सभी जानते है,यह भी एक चित्त भ्रम का योग चल रहा था,जब तक योग खत्म हुआ तब तक प्रोग्रेस का समय निकल गया।


शिक्षा को पूरा कर लिया नौकरी की तलाश शुरु हो गयी,कोई कम्पनी आयी और उसके अन्दर इन्टरव्यू दे दिया,साथ में विना विचार किये उस कम्पनी के साथ एग्रीमेन्ट भी तीन साल के लिये कर दिया,जब अपनी योग्यता की जांच काम करने के दौरान की तो पता लगा कि जिस कम्पनी में अपनी योग्यता के कारण जोब किया जा रहा है उससे कहीं अधिक दूसरी कम्पनी में पगार भी मिलती और समय भी काम केलिये कम था,लेकिन अब पछताने से क्या होता है,जो होना था वह जरा से चित्त भ्रम की बजह से हो गया,काम भी करना पडेगा और पगार भी उतनी नही कि जीवन आसानी से जिया जा सके,गुस्सा भी उस पल पर आयेगी जब नौकरी के लिये हाँ भी की और एग्रीमेन्ट भी कर लिया,यह क्षणिक चित्त-भ्रम का योग था जिसने आगे के तीन साल तक एक ही पगार में रगडने के लिये मजबूर कर दिया।

सडक पर गाडी ले कर जा रहे है,गाडी भी स्पीड में जा रही है,सामने से एक व्यक्ति सडक को क्रास कर रहा है,चित्त में यही रहा कि जब तक वह आदमी सडक को पार करेगा,तब तक वहाँ गाडी नही पहुंचेगी,लेकिन जैसे ही कुछ फ़ासले पर गाडी पहुंची वह आदमी वापस जिधर से आया था उधर के लिये ही चल दिया,वह आदमी भी मारा गया और खुद भी मय गाडी के लोट पोट हो गये,अस्पताल में गये टूटे अंगो का इलाज चला जीवन भर के लिये अपंग हो गये,मरने वाले के लिये हर्जाना खुद ने या बीमा कम्पनी ने भरा,वह भी मात्र चित्त-भ्रम के कारण,जरा सी देर के लिये चित्त में भ्रम नही आता तो शायद यह पोजीसन जो आज है वह नही होती।


शादी के लिये माता पिता ने वर की तलाश कर दी,शादी का समय निश्चित हो गया,लेकिन जाने कहां से पिछले प्रेमी का टेलीफ़ोन नम्बर मिल गया,लगाया और बातें होने लगीं,उस प्रेमी को भी नम्बर की तलाश थी,बदे दिनों के बाद बात हुयी पता लगा कि शादी होने जा रही है,कब कोई प्रेमी चाहेगा कि उसकी मासूका की शादीकिसी और के साथ हो जाये,दोनो के अन्दर बातें हुई जीने मरने की कसमें खायी गयीं,निश्चित समय पर एक स्थान पर मिलने का वादा हुआ घर से निकलने के लिये कोई झूठ गढा गया,जो भी पास में था सो और कुछ चोरी से लिया गया,सम्बन्धित स्थान पर पहुंचे और प्रेमी के साथ फ़रार,शादी करने के लिये माता पिता पर बज्रपात समाज मेम बुराई,जान पहिचान वालों को मसाला मिला और कुछ दिन बाद जैसे ही प्रेमी को पुराना लगने लगा,उसने भी किनारा काट लिया,हो गयी जिन्दगी बरबाद,जो शील सम्भाल कर रखा था वह भी नही रहा और जो स्वप्न देखे थे सभी मटियामेट वह भी जरा से चित्त-भ्रम के कारण।

यह चित्त को भ्रम देने के लिये राहु को माना जाता है,गुरु या चन्द्रमा पर जब भी राहु अपना असर देता है चित्त के अन्दर भ्रम पैदा हो जाता है,जो गूढ दिमाग का होता है उसके अन्दर कचरा भर जाता है,उस कचरे के कारण जो भी अच्छा कार्य होता है उसके प्रति गहन शंकायें दिमाग के अन्दर घर बना लेती है,व्यक्ति के अन्दर एक नशा हो जाता है वह नशा किसी प्रकार से नही उतरता है,उस नशे को उतारने के लिये लैला मजनू के किस्से बने शीरी फ़हरात के फ़साने बने,लेकिन जब नशा उतरा तो बहुत देर हो चुकी थी,कितनी ही आत्महत्यायें की जाती है,कितने ही मुकद्दमे अदालतों मे चल रहे है,कितने ही लोग अपना घर द्वार छोड कर मारे मारे फ़िर रहे है,वह भी केवल जरा से चित्त-भ्रम के कारण,इस चित्त भ्रम के कारण अपनों की बातें बुरी लगने लगती है,जो उसी प्रकार के चित्त-भ्रम वाली बाते करते है उन्ही की बातें भी अच्छी लगती है,जो कल्पनाओं के आकाश में साथ उडने की कला को जानते है उनसे ही प्रेम करना अच्छा लगता है,लेकिन जैसे ही हकीकत की दुनियां में प्रवेश किया जाता है नशे का पता नही होता है फ़िर सोचना केवल सोचना ही रह जाता है,यही हाल मर्डर करने के समय होता है यही हाल किसी से गाली गलौज करने के समय होता है,यही हाल एक साथ मिलकर आगजनी और पथराव करने के समय होता है,इसे ही चित्त-भ्रम की संज्ञा से सम्बोधित किया जाता है।

इस चित्त भ्रम के आते ही अगर इस चित्त का सही उपाय कर लिया जाये,जो नही समझ में आ रहा है उसके लिये पूंछ लिया जाये,कहावत है लोहा लोहे को ही काटता है,लेकिन गर्म लोहा ठंडे लोहे से काटा जाता है,अगर दिमाग में ठंडक मिलने वाले उपाय किये जायें,जब दिमाग भारी होने लगे तो किसी न किसी प्रकार से अच्छे साहित्य से अपने को जोड लिया जाये जो भी जानकार है उनके साथ बैठ कर कुछ समय तक अपने विचारों के आदान प्रदान को किया जाये,जो भी मानसिक शंका है उसके लिये बुजुर्गों से राय ली जाये तथा मिली राय पर अपने पूर्ण विश्वास और श्रद्धा से अमल किया जाये,राहु की शांति के उपाय के लिये लम्बी यात्रायें की जायें अपने अपने धर्म के अनुसार धार्मिक स्थानों की यात्रायें की जायें,कहावत है कैसा भी चित्त का भ्रम पहाडी यात्रा के बाद समाप्त हो जाता है,कैसा भी चित्त का भ्रम धर्म कार्य करने से खत्म हो जाता है,बीस प्रतिशत सहायता रत्न आदि भी करते है,चित्त भ्रम में होने से सुलेमानी पत्थर को पहिना जाये,बालों पर किया जाने वाला खिजाब कुछ समय के लिये बन्द कर दिया जाये,कपूर को नारियल के तेल मे मिलाकर रोजाना सिर में लगाया जाये,टीवी एम्यूजमेन्ट में सबके साथ बैठ कर ही भाग लिया जाये,जब दिमागी भ्रम चल रहे हों तो किसी प्रकार का जीवन से सम्बन्धित निर्णय नही लिया जाये,ध्यान करने और मेडीटेसन की तरफ़ जाया जाये,किसी योग्य गुरु के सानिध्य में योग का उपाय किया जाये तो बडे से बडे कारण को पैदा होने से रोका जा सकता है।
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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