वास्तु के नियम---


कहावत है कि आधा भाग्य मनुष्य का और आधा भाग्य रहने वाले स्थान का काम करता है,अगर किसी प्रकार से मनुष्य का भाग्य खराब हो जावे तो रहने वाले घर का भाग्य सहारा दे देता है,और जब घर का भाग्य भी खराब हो और मनुष्य का भाग्य भी खराब हो जावे तो फ़िर सम्स्या पर समस्या आकर खडी हो जाती है और मनुष्य नकारात्मकता के चलते सिवाय परेशानी के और कुछ नही प्राप्त कर पाता है.मैने अपने पच्चीस साल के ज्योतिषीय जीवन में जो अद्भुत गुर वास्तु के स्वयं अंजवाकर देखे है,और लोगों को बता कर उनकी परेशानियों का हल निकालने में सहायता दी है वह विकिपीडिया के पाठकों को सप्रेम अर्पित कर रहा हूँ,यह कोई ढकोसला या प्रोप्गंडा नही है.

वास्तु क्या है...???

कम्पास को देखने के बाद और पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के बारे में सभी जानते है,कम्पास की सुई हमेशा उत्तर की तरफ़ रहती है,कारण खिंचाव केवल सकारात्मक चुम्बकत्व ही करता है और विपरीत दिशा में धक्का देने का काम नकारात्मक चुम्बकत्व करता है,कभी आपेन चुम्बक को देखा होगा होगा,उसकी उत्तरी सीमा में लोहे को ले जाते ही वह चुम्बक की तरफ़ खिंचता है और नकारात्मक सीमा में ले जाते ही वह चुम्बक विपरीत दिशा की तरफ़ धक्का देता है,उत्तरी ध्रुव पर सकारात्मक चुम्बकत्व है,और दक्षिणी ध्रुव की तरफ़ नकारात्मक चुम्बकत्व है,उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की तरफ़ लगातार बिना किसी रुकावट के प्रवाहित होती रहती है,यही जीवधारियों के अन्दर जो जैविक करेन्ट उपस्थित होता है,वह इस प्रवाहित होने वाले चुम्बकीय प्रभाव से अपनी गति को बदलता है,सकारात्मक प्रभाव के कारण दिमाग में सकारात्मक विचार उत्पन्न होते है और नकारात्मक प्रभाव के कारण नकारात्मक प्रभाव पैदा होते है.

सकारात्मकता के होते भी नकारात्मक प्रभाव----

मनुष्य शरीर के पैर के तलवे,और हाथों की हथेलियां दोनो ही शरीर के करेंट को प्रवाहित करने और सोखने के काम आती हैं,हाथ मिलाना भी एक ऊर्जा को अपने शरीर से दूसरे के शरीर में प्रवाहित करने की क्रिया है,चुम्बन लेना और देना भी अत्यन्त प्रभावशाली ऊर्जा को प्रवाहित करने और सोखने का उत्तम साधन है,बिना चप्पल के घूमना शरीर की अधिक सकारात्मक ऊर्जा को ग्राउंड करने का काम है जबकि लगातार चप्पल पहिन कर और घर में रबर का अधिक प्रयोग करने पर व्यक्ति अधिक उत्तेजना में आ जाता है,और नंगे पैर रहने वाला व्यक्ति अधिकतर कम उत्तेजित होता है.नकारात्मक पभाव का असर अधिकतर स्त्रियों में अधिक केवल इसलिये देखने को मिलता है कि वे अपने निवास स्थान में नंगे पैर अधिक रहना पसम्द करती है,और जो स्त्रियां पुरुषॊ की तरह से चप्पले या जूतियां पहना करती है वे सकारात्मक काम करना और सकारात्मक बोलना अधिक पसंद करती है.सूर्य सकरात्मकता का प्रतीक है,सूर्योदय के समय जो प्रथम किरण निवास स्थान में प्रवेश करती है,वह ऊर्जा का पूरा असर निवास स्थान में भरती है,और जो भी लोग उस निवास स्थान में रहते है,चाहे वह पशु पक्षी हो या मनुष्य सभी को उसका प्रभाव महसूस होता है.भारत के पुराने जमाने के जो भी किले बनाये जाते थे,उनका सबका सामरिक महत्व केवल इसलिये ही अधिक माना जाता था कि,उनके दरवाजे दक्षिण की तरफ़ ही अधिकतर खुलते थे,मन्दिर जिनके भी दरवाजे दक्षिण की तरफ़ खुलते है,वे सभी मन्दिर प्रसिद्ध है,अस्पताल भी दक्षिण मुखी प्रसिद्ध इसी लिये हो जाते है कि उनका वास्तविक प्रभाव मंगल से जुड जाता है.

साउथ फ़ेसिंग मकान और कार्य स्थलों मे अन्तर---

साउथ को मंगल का क्षेत्र कहा गया है,उज्जैन में मंगलनाथ नामक स्थान पर जो मंगल का यंत्र स्थापित है उसकी आराधना करने पर आराधना करने वाले का फ़ेस दक्षिण की तरफ़ ही रहता है,मन्दिर का मुख्य दरवाजा भी दक्षिण की तरफ़ है,मंगल का रूप दो प्रकार का ज्योतिष में कहा गया है,पहला मंगल नेक और दूसरा मंगल बद,मंगल नेक के देवता हनुमानजी,और मंगल बद के देवता भूत,प्रेत,पिसाच आदि माने गये है.इसी लिये जिनके परिवारों में पितर और प्रेतात्मक शक्तियों की उपासना की जाती है,अधिकतर उन लोगों के घर में शराब कबाब और भूत के भोजन का अधिक प्रचलन होता है,जबकि नेक मंगल के देवता हनुमानजी की उपासना वाले परिवारों के अन्दर मीठी और सुदर भोग की वस्तुओं के द्वारा पूजा की जाती है.साउथ फ़ेसिंग मकान में रहने वाले लोग अगर तीसरे,सातवें,और ग्यारहवें शनि से पूरित हैं तो भी वे अच्छी तरह से निवास करते हैं.साउथ फ़ेसिंग भवन केवल डाक्टरी कार्यों,इन्जीनियरिन्ग वाले कार्यों,बूचडखानों,और भवन निर्माण और ढहाने वाले कार्यों, के प्रति काफ़ी उत्साह वर्धक देखे गये हैं,धार्मिक कार्यों का विवेचन करना,पूजा पाठ हवन यज्ञ वाले कार्यों,आदि के लिये भी सुखदायी साबित हुए हैं,टेक्नीकल शिक्षा और बैंक आदि जो उधारी का काम करते हैं,भी सफ़ल होते देखे गये है,गाडियों के गैरेज और वर्कशाप आदि का मुख दक्षिण दिशा का फ़लदायी होता है,होटल और रेस्टोरेंट भी दक्षिण मुखी अपना फ़ल अच्छा ही देते है.

वास्तु के नियमों का विवेचन---

कुन्डली को देखने के बाद पहले कर्म के कारक शनि को देखने के बाद ही मकान या दुकान का वास्तु पहिचाना जाता है,राहु जो कि मुख्य द्वार का कारक है,को अगर मंगल के आधीन किया जाता है तो वह शक्ति से और राहु वाली शक्तियों से अपने को मंगल के द्वारा शासित कर लिया जाता है,राहु जो कि फ़्री रहने पर अपने को अन्जानी दिशा में ले जाता है,और पता नही होता कि वह अगले क्षण क्या करने वाला है,इस बात को केवल मंगल के द्वारा ही सफ़ल किया जा सकता है.हर ग्रह को समझने के लिये और हर ग्रह का प्रभाव देखने के बाद ही मुख्य दरवाजे का निर्माण उत्तम रहता है,अग्नि-मुखी दरवाजा आग और चोरी का कारक होता है,यह नियम सर्व विदित है,लेकिन उसी अग्नि मुखी दरवाजे वाले घर की मालिक अगर कोई स्त्री है और वह घर स्त्री द्वारा शासित हि तो यह दिशा जो कि शुक्र के द्वारा शासित है,और स्त्री भी शुक्र का ही रूप है,उस घर को अच्छी तरह से संभाल सकती है,लेकिन उस घर में पुरुष का मूल्य न के बराबर हो जाता है,दूसरी विवाहित स्त्री के घर में स्थान पाते ही और उसके पुत्र की पैदायस के बाद ही वह घर या तो बिक जाता है,या फ़िर खाली पडा रहता है,उस घर का पैसा भी स्त्री सम्बन्धी परेशानियों में जिसका शनि और केतु उत्तरदायी होता है,के प्रति कोर्ट केशों और वकीलों की फ़ीस के प्रति खर्च कर दिया जाता है.ईशान दिशा सूर्योदय की पहली सकारात्मक किरण को घर के अन्दर प्रवेश देती है,अगर किसी प्रकार से इस पहली किरण को बाधित कर दिया जाये और उस किरण को जिस भी ग्रह से मिलाकर घर के अन्दर प्रवेश दिया जाता है,उसी ग्रह का प्रभाव घर के अन्दर चालू हो जाता है,पहली किरण के प्रवेश के समय अगर कोई बिजली का या टेलीफ़ोन का खम्भा है,तो पहली किरण केतु को साथ लेकर घर में प्रवेश करेगी,और केतु के १८० अंश विपरीत दिशा में राहु अपने आप स्थापित हो जाता है,यह राहु उस घर को संतान विहीन कर देगा,या फ़िर वहां पर बने किसी भी प्रकार कृत्रिम निर्माण को समाप्त करके शमशान जैसी वीरानी दे देगा,इस बात का सौ प्रतिशत फ़ल आप किसी भी मन्दिर या मीनार की पहली सूर्योदय की किरण के पडने वाले स्थान को देखकर लगा सकते है,उस मंदिर या मीनार के दक्षिण-पश्चिम दिशा में वीराना ही पडा होगा.
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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