श्रीललिता-महा-लक्ष्म्याः स्तोत्रम्—वैदिक जगत—




वैष्णव-सम्प्रदाय के प्रसिद्ध ग्रन्थ “लक्ष्मी-नारायण-संहिता” से उद्धृत निम्न स्तोत्र शक्ति-साधना से सम्बन्धित है । वैष्णव ग्रन्थ होने के कारण इनकी साधना-प्रणाली ‘वैष्णवाचार’-परक है ।
।। श्री नारायणी श्रीरुवाच ।।
ललिताख्य-महा-लक्ष्म्या, नामान्यसंख्यानि वै । तथाप्यष्टोत्तर-शतं, स-पादं श्रावय प्रभो ! ।।
हे प्रभो ! ललिता महा-लक्ष्मी के असंख्य नाम हैं । तथापि उनके एक सौ पैंतीस नामों को सुनाइए ।
।। श्री पुरुषोत्तमोवाच ।।
मुख्य-नाम्नां प्रपाठेन, फलं सर्वाभिधानकम् । भवेदेवेति मुख्यानि, तत्र वक्ष्यामि संश्रृणु ।।
ललिता श्री महा-लक्ष्मीर्लक्ष्मी रमा च पद्मिनी । कमला सम्पदीशा च, पद्मालयेन्दिरेश्वरी ।।
परमेशी सती ब्राह्मी, नारायणी च वैष्णवी । परमेश्वरी महेशानी, शक्तीशा पुरुषोत्तमी ।।
बिम्बी माया महा-माया, मूल-प्रकृतिरच्युती । वासुदेवी हिरण्या च हरिणी च हिरण्मयी ।।
कार्ष्णी कामेश्वरी चापि कामाक्षी भगमालिनी । वह्निवासा सुन्दरी च संविच्च विजया जया ।।
मंगला मोहिनी तापी वाराही सिद्धिरीशिता । भुक्तिः कौमारिकी बुद्धिश्चामृता दुःखहा प्रसूः ।।
सुभाग्यानन्दिनी संपद्, विमला विंद्विकाभिधा । माता मूर्तिर्योगिनी च, चक्रिकार्चा रतिधृती ।।
श्यामा मनोरमा प्रीतिः ऋद्धिः छाया च पूर्णिमा । तुष्टिः प्रज्ञा पद्मावती दुर्गा लीला च माणिकी ।।
उद्यमा भारती विश्वा, विभूतिर्विनता शुभा । कीर्तिः क्रिया च कल्याणी विद्या कला च कुंकुमा ।।
पुण्या पुराणा वागीशी, वरदा विभवात्मिनी । सरस्वती शिवा नादा, प्रतिष्ठा संस्कृता त्रयी ।।
आयुर्जीवा स्वर्ण-रेखा, दक्षा वीरा च रागिनी । चपला पंडिता काली, भद्राम्बिका च मानिनी ।।
विशालाक्षी वल्लभा च गोपी नारी नारायणी । संतुष्टा च सुषुम्ना च, क्षमा धात्री च वारुणी ।।
गुर्वी साध्वी च गायत्री, दक्षिणा चान्नपूर्णिका । राजलक्ष्मीः सिद्धमाता माधवी भार्गवी परो ।।
हारिती राशियानी च, प्राचीनी गौरिका श्रुतिः ।
।। फल-श्रुति ।।
इत्यष्टोत्तर-शतकं, सप्त-विंशतिरित्यपि । ललिता-मुख्य-नामानि, कथितानि तव प्रिये !
नित्यं यः पठते तस्य, भुक्तिर्मुक्तिः कर-स्थिता । स्मृद्धिर्वंशस्य विस्तारः, सर्वानन्दा भवन्ति वै ।।
हे प्रिये ! ललिता के मुख्य एक सौ आठ और सत्ताइस नाम तुमसे कहे हैं । जो नित्य इन नामों को पढ़ता है, उसके कुल की सम्पन्नता बढ़ती है, सभी प्रकार के सुख मिलते हैं और भोग-मोक्ष उसके हाथ में रहते हैं अर्थात् साधक सभी भोगों को भोगकर अन्त में मोक्ष पाता है ।

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