कविता / ग़जल संग्रह--दयानन्द ''बंधु"


बहुत दिन हुए वो तूफ़ान नही आया,
उस हसीं दोस्त का कोई पैगाम नही आया,
सोचा में ही कलाम लिख देता हूँ,
उसे अपना हाल- ए- दिल तमाम लिख देता हूँ,
ज़माना हुआ मुस्कुराए हुए,
आपका हाल सुने... अपना हाल सुनाए हुए,
आज आपकी याद आई तो सोचा आवाज़ दे दूं,
अपने दोस्त की सलामती की कुछ ख़बर तो ले लूं....
बहुत दिन हुए वो तूफ़ान नही आया,
उस हसीं दोस्त का कोई पैगाम नही आया,
सोचा में ही कलाम लिख देता हूँ,
उसे अपना हाल- ए- दिल तमाम लिख देता हूँ,
ज़माना हुआ मुस्कुराए हुए,
आपका हाल सुने... अपना हाल सुनाए हुए,
आज आपकी याद आई तो सोचा आवाज़ दे दूं,
अपने दोस्त की सलामती की कुछ ख़बर तो ले लूं....
बहुत दिन हुए वो तूफ़ान नही आया,
उस हसीं दोस्त का कोई पैगाम नही आया,
सोचा में ही कलाम लिख देता हूँ,
उसे अपना हाल- ए- दिल तमाम लिख देता हूँ,
ज़माना हुआ मुस्कुराए हुए,
आपका हाल सुने... अपना हाल सुनाए हुए,
आज आपकी याद आई तो सोचा आवाज़ दे दूं,
अपने दोस्त की सलामती की कुछ ख़बर तो ले लूं....
बहुत दिन हुए वो तूफ़ान नही आया,
उस हसीं दोस्त का कोई पैगाम नही आया,
सोचा में ही कलाम लिख देता हूँ,
उसे अपना हाल- ए- दिल तमाम लिख देता हूँ,

=============================================================
मेरा महबूब ज़माने से जुदा लगता है
नज़रों से कातिल और दिल से खुदा लगता है
उन्स का नूर झिलमिलाता है चेहरे पर
आज सूरज भी मुझे बुझा बुझा लगता है
यारो पूछो न मुझसे अब तो खैरियत मेरी
दिल तो पहले गया अब होश गुमा लगता है
महकी महकी सी चांदनी है,रात महकी है
चश्मे शब को तूने हाथों से छुआ लगता है
मेरे जीने का सबब है तेरे होंठों की हंसी
तेरा हर लफ्ज़ मुझे शहद घुला लगता है

===========================================================
खुश रहे तू सदा ये दुआ हे मेरी....." हेप्पी बर्थडे "
शुभ हो मंगल करक हो ..जन्मदिन तुम्हें मुबारक  हो.....
अज्ञान तिमिर हारक ही....
आनंद  का विस्तारक हो....
सम्रद्धि  का सूर्य उदय हो...
सुख -सम्पदा प्रदायक हो....यही शुभ मंगल कामनाएं हे जी आपको हमति और से..खुश रहिये...सम्मान और स्वाभिमान बनाये रखे ..अपने संस्कारों का...!!! 
इति शुभम भवतु..!!!!
=============================================
धड़कन----
धड़कन की तरह एक दिन मेरे दिल में आ जाओ
ख्वाबो में तो आते हो कभी दिल में भी आ जाओ
एक उम्र हुई तुम बिन बिखरा सा रहा हूँ मैं
बस सूखे पत्तों सा उड़ता ही रहा हूँ मैं
चुपके से कभी आकर तुम मुझको सजा जाओ
ख्वाबो में तो आते हो कभी दिल में भी आ जाओ
कभी तन्हाई दिन में, कहीं रात कटी तनहा
भरी भीड़ में लोगों की मैं चलता रहा तनहा
महफ़िल से लिए अब तुम मेरे घर में आ जाओ
ख्वाबो में तो आते हो कभी दिल में भी आ जाओ
बरसे ना जहाँ बादल मैं वो जलता रेत रहा
जो जला उमर सारी मैं वो झुलसा खेत रहा
ये खुश्क जमीं दिल की कभी आ के भिगो जाओ
ख्वाबो में तो आते हो कभी दिल में भी आ जाओ
एक छोड़ के खुद को ही क्या क्या ना जिया मैंने
ये ज़हर कजाओं का हर रोज पिया मैंने
मुझे जियो कभी दो पल, तुम जीना सिखा जाओ
ख्वाबो में तो आते हो कभी दिल में भी आ जाओ
धड़कन की तरह एक दिन मेरे दिल में आ जाओ
ख्वाबो में तो आते हो कभी दिल में भी आ जाओ
=================================================
हमको याद करो------

अपनी बिज़ी जिंदगी से..
थोडा खुद को आजाद करो...
उठाओ अपना मोबाईल..
और हमको याद करो...
पूछ लिया करो कभी -कभी...
आप हमारी भी अहमियत...
हमने माना हे आपको दोस्त...
आप भी हमें दो .....
फ्रेन्ड सी अहमियत....
दो लफ्ज/ अल्फ़ाज अपनेपन के....
बड़ा सहारा देते हे...
ये अल्फाज़ ही तो.....
अंधेरों में भी उजियारा देते हे.....
### दयानंद "बन्धु "
============================================
हम दीवानों की क्या हस्ती, हैं आज यहाँ कल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले

आए बनकर उल्लास अभी, आँसू बनकर बह चले अभी
सब कहते ही रह गए, अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले

किस ओर चले? मत ये पूछो, बस चलना है इसलिए चले
जग से उसका कुछ लिए चले, जग को अपना कुछ दिए चले

दो बात कहीं, दो बात सुनी, कुछ हँसे और फिर कुछ रोए
छक कर सुख दुःख के घूँटों को, हम एक भाव से पिए चले

हम भिखमंगों की दुनिया में, स्वछन्द लुटाकर प्यार चले
हम एक निशानी सी उर पर, ले असफलता का भार चले

हम मान रहित, अपमान रहित, जी भर कर खुलकर खेल चुके
हम हँसते हँसते आज यहाँ, प्राणों की बाजी हार चले

अब अपना और पराया क्या, आबाद रहें रुकने वाले
हम स्वयं बँधे थे, और स्वयं, हम अपने बन्धन तोड़ चले!..
Share To:

पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

Post A Comment:

0 comments so far,add yours