श्री विष्णोरष्टाविंशतिनामस्तोत्रम—-पंडित दयानन्द शास्त्री

अर्जुन उचाव–

किं नु नाम सस्त्राणि जपते च पुन: पुन:!
यानि नामानि दिव्यानि चाचक्ष्व केशव!!१!!
अर्जुन ने पूछा-केशव!
मनुष्य बारंबार एक हजार नामों का जप क्यों करता है? आपके जो दिव्य नाम हों, उनका वर्णन कीजिये!!१!!

श्रीभगवानुवाच–

मत्स्यं कूर्मं वराहं वामनं च जनार्दानम!
गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम!!२!!
पद्मनाभं सहस्त्राक्षं वनमालिं हलायुधम !
गोवर्धनं हृषीकेशं वैकुंठन पुरुशोत्तामम!!३!!
विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम !
दामोदरं श्रीधरं च वेदांग गरुड़ध्वजम !!४!!
अनन्तं कृष्णगोपालं जपतो नास्ति पातकं!
गवां कोटिप्रदानस्य अश्वमेधशतस्य च!!५!!
कन्यादानसहस्त्रानां फलं प्राप्नोति मानव:!
अमायां वा पौर्णमास्यामेकादाश्यां तथैव च!!६!!
संध्याकाले स्मरेन्नित्यं प्रात:काले तथैव च!
मध्यान्हे च जपन्नित्यं सर्वपापै: प्रमुच्यते!!७!!

श्री भगवान कृष्ण बोले–

अर्जुन! मत्स्य, कूर्म, वाराह, वामन, जनार्दन, गोविन्द, पुंडरीकाक्ष, माधव, मधुसूदन, पद्मनाभ, सहस्त्राक्ष, वनमाली, हलायुध, गोवर्धन, हृषीकेष, वैकुण्ठ, पुरुषोत्तम, विश्वरूप, वासुदेव, राम, नारायण, हरि, दामोदर, श्रीधर, वेदांग, गरुड़ध्वज, अनंत, और कृष्णगोपाल– इन नामों का जप करने वाले मनुष्यके भीतर पाप नहीं रहता! वह एक करोड़ गोदान, एक सौ अश्वमेघ-यज्ञ और एक हजार कन्यादान का फल प्राप्त करता है! अमावस्या, पूर्णिमा तथा एकादशी तिथि को और प्रतिदिन सायं-प्रात: रवन मध्याह्न के समय इन नामों का जप करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है!

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