राशि और सैक्स - मीन राशि
Sign & Sex - Pisces

सौर मण्डल में इस राशि का आकार विपरीत दिशा में दो मछलियों के समान है, इनमें एक नर दूसरी मादा लगती है। चारों ओर जल प्रतीत होता है। अंग्रेजी की संख्या 69 के समान आकृति बनती है। इस राशि का मास चैत्र (मार्च-अप्रेल), स्वभाव द्विस्वभाव, तत्त्व जल, उभयोदय उदय, लिंग स्त्री, दिशा उत्तर-पूर्व, रंग गहरा भूरा, निवास जल, शरीर अंग पैरों का तलुवा, स्वामी ग्रह बृहस्पति और केतु है। बृहस्पति सत्त्वगुणी, पुरूष है, केतु तमोगुणी, नपुंसक है। केतु का भूरा रंग, बृहस्पति का सुनहला (दोनों मिलकर राषि रंग सलेटी या भूरा), रत्न वैदूर्यमणि है। इन्द्रिय ज्ञान राहु के समान स्पर्श है। आकार रेखा के समान है। जाति ब्राह्मण, अंक 7 है।इस राशि में उत्पन्न जातकों की आंखें मछलियों के समान गोल, सुन्दर, काली और चमकीली होती हैं। स्त्रियां बहुत सुन्दर होती है। इस राशि की गौर वर्ण स्त्रियों के पसीने से मछली जैसी गंध आती है। सुन्दर रूप, कुछ लम्बा चेहरा, शरीर मछली के समान चिकना-चमकीला होता है। यह कितनी ही गहरी नींद में हो, जरा से स्पर्श से आंखें खुल जाती है। इनके स्तन छोटे और मछली की मुखाकृति के समान होते हैं। ऐसा लगता है, मानो दो रोहू मछलियों के सिर काटकर लगा दिये गये हों। इनकी इन्द्रिय रेखा के समान पतली और छोटी-सी होती है। नितम्ब चलते समय इस प्रकार हिलते हैं, मानो घड़े से पानी छलक रहा हो।पुरूष सामान्य कद-काठी पर सुन्दर आंखों और छोटे होंठो के स्वामी होते हैं। इन्द्रिय प्रायः बहुत लघु होती है। इसके तलुवों में कड़ापन ज्यादा होता है। स्त्री-पुरूष विचित्र प्रकार का मैथुन 69 की दशा में करते हैं। एक दूसरे के पैरों की ओर इनका सिर होता है। अपनी राशि के आकार के अनुसार इनको बड़ा सुख मिलता है। द्विस्वभाव, उभयोदय और ब्राह्मण राशि के कारण इसका मैथुन घृणित, चंचल तथा कामकला की दृष्टि से श्रेष्ठ (ब्राह्मण) होता हैं। कामुकता बराबर बनी रहती है। इस राशि का मैथुन सबसे निकृष्ट होता है। यह राशि स्त्री को तृप्त करने की क्षमता रखती है। प्रेमिका या प्रेमी से यह बहुत कम अलग होते हैं। इनका स्वभाव बड़ा चंचल होता है। इस राशि के अधिकांष पुरूष प्रायः नपुंसक, अर्धनपुंसक, शीघ्रपतन, स्वप्नदोष के शिकार होते हैं। यह पूर्ण पूरूष नहीं होते हैं। इस राशि की महिला का मैथुन भी बड़ा चंचल होता है। मछली की तरह उसका बदन सम्भोग के समय लहराता है और अपने पति से भी गिरा हुआ मैथुन पसन्द करती है। इस राशि की महिला को गुप्तागों के दर्शन, स्पर्श से विशेष सुख मिलता है। उनसे खिलवाड़ और प्यार, लगाव इसको विशेष रूचिकर लगता है। इस क्रिया में कम खिलवाड़ में ज्यादा सुख मिलता है। वह कामुक होती है, किन्तु मैथुन से ज्यादा रूचि अन्य कामुक व्यवहारों में करती है। इस राशि की महिलाओं में वासना होती है, किन्तु अपने पर बड़ा नियन्त्रण करती है।इस राशि के जातकों की कामुकता का उत्तेजना स्थल उनके तलवों में होता है। स्त्री या पुरूष के तलवे थोड़ा सा सहलाते ही इनकी उत्तेजना बढ़ जाती है या कामुकता की गति के कारण शीघ्र स्खलित हो जाते हैं। निवास जल होने के कारण इनका मैथुन ठण्डा होता है, उत्तेजक नहीं और शीतल स्थान में यह विशेष कामुकता का परिचय देते हैं। गहरा भूरा रंग इनको विशेष प्रिय है।इस राशि के जातकों का विवाह शीघ्र हो जाता है, किन्तु इनका दाम्पत्य जीवन चंचल-सा, अस्थिर, द्विस्वभाव के कारण बड़ा ही क्लेश भरा होता है। प्रायः गर्भाधान चैत्र मास (मार्च-अप्रेल) में होता है तथा इस माह में इनकी काम वासना ज्यादा होती है। उत्तर-पूर्व दिशा में रूख करके यह मैथुन करने में अपने को बराबर सुखद दशा में रखते हैं। इनका प्रेम मैथुन के समय अत्यन्त प्रगाढ़ हो जाता है, किनतु उतना प्रेम यह अपने सामान्य जीवन में एक-दूसरे के प्रति नहां रखते हैं। इनका दाम्पत्य जीवन द्विस्वभाव राशि होने के कारण प्रायः कलह, वाद-विवाद से भरा रहता हैं। दिन भर या रात भर की कलह का समझौता मैथुन के समय समाप्त हो जाता है और सारा प्यार उनका एक-दूसरे के लिये उमड़ पड़ता है।मैथुन से पूर्व, मध्य या अन्त में यह एक-दूसरे से लिपट कर पड़े रहना ज्यादा पसन्द करते हैं, इसमें इनको ज्यादा सुख मिलता है। इस राशि का जातक अपनी पत्नी के साथ लिपटकर सोना ज्यादा पसन्द करता है। इसका यह स्वभाव बन जाता है। अकेले होने पर यह तकिया, रजाई, गद्दा आदि को ही लपेटकर खींच लेंगें।सन्तान सुख कम ही होता है। इनकी सन्तान प्रायः रूग्ण रहती है। प्रेम के मामले में ये हमेशा डरपोक होते हैं। प्रेम हो जाता है, लेकिन अवैध सम्बन्ध करने से बहुत डरते है। इनका अवैध सम्बन्ध सदैव अस्थायी होता है, केवल शरीर तक कायम रहता है। इनके प्रेमपत्र दार्शनिक किस्म के, संक्षिप्त तथा अनिश्चयात्मक बातो या वायदों से भरे होते हैं। शेरो-शायरी, सिनेमा के गाने जरूर लिखते हैं।इनका पारिवारिक जीवन सामान्यतः सुखद होता है, पर सम्भोग जीवन को काफी समय तक जीते हैं और सबसे ज्यादा सुख यही पाते हैं। सभी प्रकार का प्राकृतिक-अप्राकृतिक-विकृत सम्भोग यही जाना-भोगा होता है तथा मैथुन के समय एक-दूसरे में मछली के समान डुबकी मार जाना इनका स्वभाव होता है। कुल मिलाकर सामान्य दाम्पत्य जीवन अपनी चरम मैथुन सीमा पर यह व्यतीत करते हैं।

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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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