श्रीकृष्ण कृत देवी स्तुति--पंडित दयानन्द शास्त्री    


नवरात्र में श्रद्धा और प्रेमपूर्वक महाशक्ति भगवती देवी की पूजा-उपासना करने से यह निर्गुण स्वरूपा देवी पृथ्वी के समस्त जीवों पर दया करके स्वयं ही सगुणभाव को प्राप्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश रूप से उत्पत्ति, पालन और संहार कार्य करती हैं।


श्रीकृष्ण उवाच---

त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी।
त्वमेवाद्या सृष्टिविधौ स्वेच्छया त्रिगुणात्मिका॥१॥
कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम्।
परब्रह्मास्वरूपा त्वं सत्या नित्या सनातनी॥२॥
तेजःस्वरूपा परमा भक्तानुग्रहविग्रहा।
सर्वस्वरूपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्पर॥३॥

सर्वबीजस्वरूपा च सर्वपूज्या निराश्रया।
सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमंगलमंगला॥४॥

अर्थातः आप विश्वजननी मूल प्रकृति ईश्वरी हो, आप सृष्टि की उत्पत्ति के समय आद्याशक्ति के रूप में विराजमान रहती हो और स्वेच्छा से त्रिगुणात्मिका बन जाती हो।

यद्यपि वस्तुतः आप स्वयं निर्गुण हो तथापि प्रयोजनवश सगुण हो जाती हो। आप परब्रह्म स्वरूप, सत्य, नित्य एवं सनातनी हो।

परम तेजस्वरूप और भक्तों पर अनुग्रह करने आप शरीर धारण करती हों। आप सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी, सर्वाधार एवं परात्पर हो। आप सर्वाबीजस्वरूप, सर्वपूज्या एवं आश्रयरहित हो। आप सर्वज्ञ, सर्वप्रकार से मंगल करने वाली एवं सर्व मंगलों कि भी मंगल हो।


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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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