*नाम और ध्यान**--पवन तलहन ---*
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नाम-जप करने की विधि महर्षि पतंजलि यह बतलाते हैं कि नाम और रूप दोनों को मिलाकर जप करना चाहिये, अर्थात नामके साथ नामी के स्वरुप का ध्यान करना चाहिये और उसमे अपने को तन्मय कर देना चाहिये!---
"तस्य वाचक: प्रणव:! तज्जपस्तदर्थभावनम!
तत: प्रत्यकचेतनाधिगमोsप्यंतरायाभावश्च!!"
नाम और नामी का ध्यान गोस्वामी तुलसी दास जी कहते हैं--
देखिअहिं रूप नाम अधिना! रूप ग्यान नहिं नाम बहीना!!
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें! आवत हृदयं सनेह बीसवें!!
रूप विसेष नाम बिनु जानें! करतल गत न परहिं पहिचानें!!
शास्त्रों में नाम-जपका फल कहा गया है, वह बार-बार बहुत दिनों तक नाम-जप करने से नहीं मिलता, इसका कारण महात्माओं ने दस प्रकार के नामापराराधों का अज्ञान बतलाया है! दस अपराधों से बच कर नाम-जप करने से अति शीध्र फल मिलता है!सत्पुरुषों की निंदा, शिव और विष्णु के गुणों और नामों में भेद-बुद्धि, गुरु की निंदा, श्रुति और शास्त्रों की निंदा, भगवान के नामों में अर्थवाद की कल्पना करना, नाम के बल पर पाप करना, धर्म, व्रत, दान, होम आदि शुभ कर्मों के समान ही नाम- स्मरण को भी एक शुभ कर्म मानना, नाम विमुख एवं अश्रद्धालु लोगों के सुनते नामका उपदेश करना, नाम-माहात्म्य सुनकर भी उसमें प्रेम नहिं करना और अहंता, ममताको ही परम पुरुषार्थ मानकर उन्हीं में रत रहना और नाम परायण नहिं होना--ये दस नामापराध हैं! यदि प्रमादवश इन दासों में से कोई-सा भी अपराध हो जाये तो उससे छूटकर शुद्ध होने का भी पुन: नाम कीर्तन ही है! भूल के लिये पश्चात्ताप करते हुए प्रभुनाम-कीर्तन से नामापराध छूट जाता है!
"नामापराधयुक्तानां नामान्येव हरन्त्यधम!
अविश्रांतप्रयुक्तानि तान्येवार्थकराणि!!"
निरंतर नाम-कीर्तन से सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं! नामके यथार्थ माहात्म्य को समझ कर प्रेम पूर्वक नाम-जप करने से अन्त:करण शुद्ध हो जाने पर भगवभ्दक्तिरूप मधुर फल की प्राप्ति होती है और सकाम मनुष्य को अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष --चारों पदार्थों की सिद्धि अनायास ही हो जाती है!
जो मनुष्य तीनों देवों शिव-ब्रह्मा और विष्णु में भेद न करता हुआ, अपवित्रता का विचार न कर सदा-सर्वदा नाम-स्मरण में रत रहता है, वह शीघ्र ही संसार से मुक्त हो जाता है!
शिव-शंकर, हरि; कृष्ण, विष्णु, राम नाम-स्मरण में न देश और न काल का नियम है!

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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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