****ज्ञान-विद्या जिस से भी मिले ले लो*****पवन तलहन*******

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यदि अपने से हीन वर्ण के पास कोई विद्या हो तो उसे भी श्रद्धालु बनकर सीख लेना चाहिये! किसी चाण्डाल आदि अन्त्यज के पास भक्ति या आत्मज्ञान हो तो उससे ग्रहण कर लेना चाहिये और दुष्कुल में भी कोई सुयोग्या स्त्री हो तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिये! यदि विष में भी अमृत मिल गया हो तो उस विष से भी अमृत को ले लेना चाहिये! बच्चे से भी हितकर बात ग्रहण कर लेनी चाहिये! शत्रु से भी संतों का आचरण सीख लेना चाहिये और अपवित्र जगह से भी सुवर्ण को ले लेना चाहिये! इस तरह रत्न, विद्या, धर्म, शौच, सुभाषित और तरह-तरह के शिल्प सब से लेने चाहिये! यदि आपत्काल हो तो ब्रह्मचारी अब्राह्मण गुरु का अनुगमन और सुश्रुषा करे! जय हो------
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याद रखो----
अधर्मेनैधते तावत ततो भद्राणि पश्यति !
तत: सपन्ताण्जयति समूलस्तु विनश्यति!!
उपर्युक्त श्लोक का अक्षरार्थ यह प्रतीत होता है कि मनुष्य अधर्म से पहले उन्नति करता है, उसके वाद कल्याण देखता है, फिर शत्रुओं को जीतता है, इसके बाद वहह बांधव, भृत्य और पुत्र आदि के साथ समूल नष्ट हो जाता है!
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धन अनर्थ तथा दुःख का मूल
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धर्माचरण ही सदा सहायक होता है!
मरने वाले के साथ उसका पाप-पुन्य ही जाता है!
काल कि महत्ता को जानो---काल की गति महान है--अनंत सर्वजयी है! ऐसा कोई भी नहीं हुआ, न होगा, जिसकी सत्ता सदा बनी रही हो!
न तद्भूतं प्रपश्यामि स्थिश्यामी स्थितिर्यस्य भवेद ध्रुवा!!
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लक्ष्मी के निवास स्थान को जानो! लक्ष्मी कहाँ निवास करती है!
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गुरु-भक्ति का कदापि त्याग न करो!
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वनस्पतियों का कभी अनादर न करो!
शारीर के आत्म रुपी सार्थी को सदा ईश्वर के चरणों में लगाये रखो!
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क्षमा धर्म का आदर्श है!
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धर्म-लक्षण को पहचानो! धर्माचरण का फल जानो!
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बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है!
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तृष्णा का परित्याग करो!
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तृष्णा त्यागनेवाले को ही सुख मिलता है!
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गौ में सभी देवता तथा तीर्थ प्रतिष्ठित हैं!
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दान अन्न दान सर्वश्रेष्ठ है
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परधर्म अनाचरणीय है!
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वेद को तो माने ही, किल्न्तु धर्मशास्त्र की अवहेलना न करे!
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दूसरों के लिए सदा सत कर्म करो!
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दूसरे को दिया गया सुख-दुःख स्वयं को मिलता है!
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अपने धन का सदुपयोग करो!
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सच्चा सुख धर्माचरण से ही मिलता है!
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धर्म का ही आचरण करो, अधर्म का का नहीं!
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अपनी ही तरह दूसरों के साथ बर्ताब करो!
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धर्म शास्त्र जाने बिना प्रायश्चित्त का निर्णय न करें!
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शारीर में स्थित होकर पितर भोजन करते हैं!
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सदैव महत्त्वपूर्ण उपदेश सुनो!
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अपने में आये दोषों की पहचान करो!
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दूसरे में दोष मत निकालो, अपने में देखो!
जय हो, जय हो,, जय हो----

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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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