श्रीयंत्र / SHREE YANTRA----

‘Sri Yantra’ is the master of all Yantras, since all other Yantras are said to originate from Sri Yantra. ‘Sri’ means wealth and prosperity and ‘Yantra’ means instrument. Sri Yantra is shown in the top right corner of this page. It is composed of 9 interlocking triangles, 4 triangles pointing up and another 5 triangles pointing down. A total of 43 triangles can be seen which are formed from the overlapping of these 9 triangles. The inner most triangle has a dot (bindu) in the center. When Sri Yantra is constructed in 3 dimensional form, it is called 'Maha meru'. Sri Yantra is used in the tantric culture of Hinduism.

We start from the outer side of Sri Yantra and proceed towards its inner details. The outer side of Sri Yantra contains a square with 8 sides. The square represents the physical body. The 8 corners of the square are the 8 deities, starting from top in clock-wise direction, Kubera (North), Isaana (North-East), Indra (East), Agni (South-East), Yama (South), Nirruti (South-West), Varuna (West) and Vaayu (North-West). These 8 deities are protectors of our physical body. We can say our body is composed of these 8 elements. Any excess or deficit in one or more of these elements will lead to diseases and destruction of the physical body. 


The earth square has 3 layers at its outside. These layers represent Tamah (baser qualities), Rajah (anger and desires) and Satwah (softness). These 3 qualities are always attached to a human body.

From this earth square, if we move towards the center of Sri Yantra, we see 3 concentric circles. The outer circle represents Manah (mind), the next one represents Buddhi (intelligence), and the innermost circle represents the Jeevatma (human soul). The significance is this: our wavering mind should apply its intelligence and find the ways to understand the soul. Once we get the awareness of the soul in our body, we are ready to tap the subtle energies of our body.

Our body is a vast reservoir of different types of energies like light, heat and sound. The numerous nerves of the human body circulate these energies and are finally connected to brain through the spinal cord. These nerves meet in bundles at spinal cord region and are called chakras. We can imagine chakras as reservoirs of energy. These chakras are represented in the form of petals. 


The 16 petals of Sri Yantra represent Kaama (desire), Buddhi (intelligence), Ahankaara (igo), Sabda (hearing), Sparsa (touch), Roopa (sight), Rasa (taste), Gandha (smell), Chitta (mind), Dhairya (courage), Smirtya (memory), Naama (name), Beeja (fire), Aatma (soul), Amrita (water) and Sareera (body). These are the elements (or different form of energies) through which our Jeevatma (human soul) understands and interacts with the outside world. We can attain mastery over these elements by meditating and balancing the chakra energies in our body. Even a normal human being then gets some super natural powers called ‘siddhis’.

There are 8 siddhis represented by the 8 petals of the inner circle. They are Anima (smallness), Laghima (bigness), Garima (heaviness), Mahima (creativity), Easatva (godliness), Vasatva (subjugation), Praakamya (fulfilling the objective) and Iccha (willfulness). 


Now we come to the interlaced triangles. Each triangle is formed with 3 straight lines and hence there will be 3 vertices. These vertices denote Jnaana (Iym), Kriya (Hreem) and Iccha (Sreem). There are 4 upward triangles representing the Siva (the male force) and the 5 downward triangles represent the female force, called Shakti (the female force). When 4 upward and 4 downward triangles are taken, they are balanced. They represent that this entire Universe is emerged from Siva and Shakti. The one remaining downward triangle represents the Mother Nature. We live in this Nature and feel that this is the only real world. This feeling is called Maaya (ignorance). Once we come out of this ignorance, we will be able to understand Siva and Shakti.

There is a dot (bindu) in the center of the Sri Yantra. Sit with your eyes closed and and start visualizing a dot in the top centre of your head. This place represents the sahasraara (crown chakra). When we concentrate on this crown chakra, we will be able to come out of Maaya and connect our Jeevathma (bodily soul) to all pervading Supreme soul..

Sri Yantra--श्रीयंत्र--

Yantras come from the more than 2000 years old tantric tradition.
A yantra is the yogic equivalent of the Buddhist mandala.

Sri yantra is called the mother of all yantras because all other yantras derive from it.

The Sri Yantra is a configuration of nine interlacing triangles centred around the bindu (the central point of the yantra), drawn by the super imposition of five downward pointing triangles, representing Shakti ; the female principle and four upright triangles, representing Shiva ; the male principle.
Man's spiritual journey from the stage of material existence to ultimate enlightenment is mapped on the Sri Yantra. The spiritual journey is taken as a pilgrimage in which every step is an ascent to the center, a movement beyond one's limited existence, and every level is nearer to the goal.
Each of the circuits of the Sri Yantra, from the outer plane to the bindu (the center), corresponds with one of the stages of the spiritual journey.
The goal of contemplating the Sri Yantra is that the adept can rediscover his primordial sources. The circuits symbolically indicate the sucessive phases in the process of becoming.
Sri Yantra


 श्री यंत्र-(shree yantra)
यह सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है,इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं,और उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है।

यह बेहद शक्तिशाली ललितादेवी का पूजा चक्र है,इसको त्रैलोक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों का मोहन यन्त्र भी कहते है। यह सर्व रक्षाकर सर्वव्याधिनिवारक सर्वकष्टनाशक होने के कारण यह सर्वसिद्धिप्रद सर्वार्थ साधक सर्वसौभाग्यदायक माना जाता है। इसे गंगाजल और दूध से स्वच्छ करने के बाद पूजा स्थान या व्यापारिक स्थान तथा अन्य शुद्ध स्थान पर रखा जाता है। इसकी पूजा पूरब की तरफ़ मुंह करके की जाती है,श्रीयंत्र का सीधा मतलब है,लक्ष्मी यंत्र जो धनागम के लिये जरूरी है। इसके मध्य भाग में बिन्दु व छोटे बडे मुख्य नौ त्रिकोण से बने ४३ त्रिकोण दो कमल दल भूपुर एक चतुरस ४३ कोणों से निर्मित उन्नत श्रंग के सद्रश्य मेरु प्रुष्ठीय श्रीयंत्र अलौकिक शक्ति व चमत्कारों से परिपूर्ण गुप्त शक्तियों का प्रजनन केन्द्र बिद्नु कहा गया है। जिस प्रकार से सब कवचों से चन्डी कवच सर्वश्रेष्ठ कहा गया है,उसी प्रकार से सभी देवी देवताओं के यंत्रों में श्रीदेवी का यंत्र सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसी कारण से इसे यंत्रराज की उपाधि दी गयी है। इसे यन्त्रशिरोमणि भी कहा जाता है। दीपावली धनतेरस बसन्त पंचमी अथवा पौष मास की संक्रान्ति के दिन यदि रविवार हो तो इस यंत्र का निर्माण व पूजन विशेष फ़लदायी माना गया है,ऐसा मेरा विश्वास है।
shri yantra, shree yantra

 श्रीयंत्र पूजा---


धन या पैसा जीवन की अहम जरुरतों में एक है। आज तेज रफ्तार के जीवन में कईं अवसरों पर यह देखा जाता है कि युवा पीढ़ी चकाचौंध से भरी जीवनशैली को देखकर प्रभावित होती है और बहुत कम समय में ज्यादा कमाने की सोच में गलत तरीकें अपनाती है। जबकि धन का वास्तविक सुख और शांति मेहनत, परिश्रम की कमाई में ही है। ऐसा कमाया धन न केवल आत्मविश्वास के साथ दूसरों का भरोसा भी देता है, बल्कि रुतबा और साख भी बनाता है।


धर्म में आस्था रखने वाला व्यक्ति ऐसे ही तरीकों में विश्वास रखता है। इसलिए मातृशक्ति की आराधना के इस काल में यहां बताया जा रहा है, एक ऐसा ही उपाय जिसको अपनाकर जीवन में किसी भी सुख से वंचित नहीं रहेंगे और धन का अभाव कभी नहीं सताएगा। यह उपाय है श्रीयंत्र पूजा।


धार्मिक दृष्टि से लक्ष्मी कृपा के लिए की जाने वाली श्रीयंत्र साधना संयम और नियम की दृष्टि से कठिन होती है। इसलिए यहां बताई जा रही है श्रीयंत्र पूजा की सरल विधि जिसे कोई भी साधारण भक्त अपनाकर सुख और वैभव पा सकता है। सरल शब्दों में यह पूजा मालामाल बना देती है। श्रीयंत्र पूजा की आसान विधि कोई भी भक्त नवरात्रि या उसके बाद भी शुक्रवार या प्रतिदिन कर सकता है।


श्रीयंत्र पूजा के पहले कुछ सामान्य नियमों का जरुर पालन करें -

- ब्रह्मचर्य का पालन करें और ऐसा करने का प्रचार न करें।

- स्वच्छ वस्त्र पहनें।

- सुगंधित तेल, परफ्यूम, इत्र न लगाएं।

- बिना नमक का आहार लें।

- प्राण-प्रतिष्ठित श्रीयंत्र की ही पूजा करें। यह किसी भी मंदिर, योग्य और सिद्ध ब्राह्मण, ज्योतिष या तंत्र विशेषज्ञ से प्राप्त करें।

- यह पूजा लोभ के भाव से न कर सुख और शांति के भाव से करें। इसके बाद श्रीयंत्र पूजा की इस विधि से करें। इसे किसी योग्य ब्राह्मण से भी करा सकते हैं - नवरात्रि या किसी भी दिन सुबह स्नान कर एक थाली में श्रीयंत्र स्थापित करें।

- इस श्रीयंत्र को लाल कपड़े पर रखें।

- श्रीयंत्र का पंचामृत यानि दुध, दही, शहद, घी और शक्कर को मिलाकर स्नान कराएं। गंगाजल से पवित्र स्नान कराएं।

- इसके बाद श्रीयंत्र की पूजा लाल चंदन, लाल फूल, अबीर, मेंहदी, रोली, अक्षत, लाल दुपट्टा चढ़ाएं। मिठाई का भोग लगाएं।

- धूप, दीप, कर्पूर से आरती करें।

- श्रीयंत्र के सामने लक्ष्मी मंत्र, श्रीसूक्त, दुर्गा सप्तशती या जो भी श्लोक आपको आसान लगे, का पाठ करें। किंतु लालच, लालसा से दूर होकर श्रद्धा और पूरी आस्था के साथ करें।

- अंत में पूजा में जाने-अनजाने हुई गलती के लिए क्षमा मांगे और माता लक्ष्मी का स्मरण कर सुख, सौभाग्य और समृद्धि की कामना करें। श्रीयंत्र पूजा की यह आसान विधि नवरात्रि में बहुत ही शुभ फलदायी मानी जाती है। इससे नौकरीपेशा से लेकर बिजनेसमेन तक धन का अभाव नहीं देखते। इसे प्रति शुक्रवार या नियमित करने पर जीवन में आर्थिक कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता।

श्री यंत्र--

यह सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है,इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं,और उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है। यह बेहद शक्तिशाली ललितादेवी का पूजा चक्र है,इसको त्रैलोक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों का मोहन यन्त्र भी कहते है। यह सर्व रक्षाकर सर्वव्याधिनिवारक सर्वकष्टनाशक होने के कारण यह सर्वसिद्धिप्रद सर्वार्थ साधक सर्वसौभाग्यदायक माना जाता है। इसे गंगाजल और दूध से स्वच्छ करने के बाद पूजा स्थान या व्यापारिक स्थान तथा अन्य शुद्ध स्थान पर रखा जाता है। इसकी पूजा पूरब की तरफ़ मुंह करके की जाती है,श्रीयंत्र का सीधा मतलब है,लक्ष्मी यंत्र जो धनागम के लिये जरूरी है। इसके मध्य भाग में बिन्दु व छोटे बडे मुख्य नौ त्रिकोण से बने ४३ त्रिकोण दो कमल दल भूपुर एक चतुरस ४३ कोणों से निर्मित उन्नत श्रंग के सद्रश्य मेरु प्रुष्ठीय श्रीयंत्र अलौकिक शक्ति व चमत्कारों से परिपूर्ण गुप्त शक्तियों का प्रजनन केन्द्र बिद्नु कहा गया है। जिस प्रकार से सब कवचों से चन्डी कवच सर्वश्रेष्ठ कहा गया है,उसी प्रकार से सभी देवी देवताओं के यंत्रों में श्रीदेवी का यंत्र सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसी कारण से इसे यंत्रराज की उपाधि दी गयी है। इसे यन्त्रशिरोमणि भी कहा जाता है। दीपावली धनतेरस बसन्त पंचमी अथवा पौष मास की संक्रान्ति के दिन यदि रविवार हो तो इस यंत्र का निर्माण व पूजन विशेष फ़लदायी माना गया है,ऐसा मेरा विश्वास है।
सबसे जाना पहचाना एवं लोकप्रीय यंत्र है श्रीयंत्र इसकी अधिष्ठात्री स्वयं त्रिपुरसुंदरी भगवती लक्ष्मी है। श्री का अर्थ है लक्ष्मी यह बेहद शक्तिशाली ललिता देवी का पूजा चक्र है। यह यंत्र सिद्धिदायक, धनदायक, कष्टनाशक, सर्वव्याधीविनाशक एवं सर्व भयनाशक है।
यह यंत्र सर्वसौभाग्य का दायक माना जाता है। इस यंत्र का शुद्ध जल दुध से स्नान कराकर मकान दुकान में पूजन स्थल पर रखा जाता है। इस यंत्र के बीच में बिंदु नौ त्रिकोण इन्ही से बने त्रियालीस अन्य त्रिकोण इस प्रकार यह मेरुपृष्ठीय यंत्र रहस्य एवं चमत्कार से युक्त अपने अंदर कई प्रकार की शक्तियां समेटे हुये गुप्त शक्तियो का केंद्र कहा गया है।यह यंत्र सभी यंत्रो में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। दिपावली, धनतेरस, होली, बसंत पंचमी आदि दिनों में इसकी स्थापना श्रेष्ठ कही गयी है।
 उस समय के अनुकूल इसमें अद्भुत शक्तियों का संचार होता है। तथा यह यंत्र अपनी पूर्ण शक्ति से काम करता है। पौष मास की संक्राती को रविवार का दिन हो तो उस दिन इस यंत्र की स्थापना विशेष फलदायी मानी गयी है।इस यंत्र के पूजन स्थल पर होने से सभी देवी-देवतर प्रसन्न होते है। यह यंत्र जहां होता है। वहंा सुख समृद्धि सदा निवास करती हैं।

हिंदू धर्म में विभिन्न देवी-देवताओं के यंत्रों के बारे में बताया गया है। इन यंत्रों का उपयोग विभिन्न फलों की प्राप्ति के लिए किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्री यंत्र श्री अर्थात धन-सम्पत्ति प्रदान करने वाला है। श्री यंत्र को कामधेनु के समान माना गया है। वेदों के अनुसार श्री यंत्र में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का वास है। वास्तु के अनुसार श्री यंत्र अद्भुत शक्ति सम्पन्न धन-सम्पत्ति, सुख, वैभव प्रदान करने वाला एकमात्र यंत्र है। यदि विधिपूर्वक श्री यंत्र सिद्ध कर लिया जाए तो सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं तथा जो सिद्ध श्री यंत्र की नित्य प्रतिदिन पूजा करता है और धूप-दीप दिखाता है वह संसार के सभी सुखों का भोग करता है।
सिद्ध श्री यंत्र ही देता है फल
आज बाजार में रत्नों के बने श्री यंत्र आसानी से प्राप्त हो जाते हैं किंतु वे सिद्ध नहीं होते। सिद्ध श्री यंत्र में विधिपूर्वक हवन-पूजन करके देवी-देवताओं को प्रतिष्ठित किया जाता है तब श्री यंत्र समृद्धि देने वाला बनता है। यह आवश्यक नहीं कि श्री यंत्र रत्नों का बना हो। श्री यंत्र तांबे पर बना हो अथवा भोज पत्र पर जब तक उसमें मंत्र शक्ति विधिपूर्वक प्रवाहित नहीं की गई हो तब तक वह श्री प्रदाता अर्थात धन प्रदान करने वाला नहीं होता।

पौराणिक कथा
श्री यंत्र के संदर्भ में एक कथा का वर्णन मिलता है। उसके अनुसार एक बार आदि शंकराचार्यजी ने कैलाश मान सरोवर पर भगवान शंकर को कठिन तपस्या कर प्रसन्न कर दिया। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर उनसे वर मांगने के लिए कहा। आदि शंकराचार्य ने विश्व कल्याण का उपाय पूछा। भगवान शंकर ने शंकराचार्य को साक्षात लक्ष्मी स्वरूप श्री यंत्र की महिमा बताई और कहा- यह श्री यंत्र मनुष्यों का सर्वथा कल्याण करेगा। श्री यंत्र परम ब्रह्म स्वरूपिणी आदि प्रकृतिमयी देवी भगवती महा त्रिपुर सुदंरी का आराधना स्थल है क्योंकि यह चक्र ही उनका निवास और रथ है। श्री यंत्र में देवी स्वयं मूर्तिवान होकर विराजती हैं इसीलिए श्री यंत्र विश्व का कल्याण करने वाला है।

संपूर्ण यंत्र वर्ग में श्री यंत्र को सर्वोपरि एवं महत्त्वपूर्ण माना गया है। इस तंत्र की संरचना रेखा-विज्ञान के अनुसार भी बड़ी ही अद्भुत है। तीन रेखाओं का 11 बिंदु केंद्र बनाना एक विचित्र योग है। फिर किस प्रकार इसकी अन्यान्य रेखाएं आकृतियां बनाती हैं, यह भी आश्चर्य का विषय है। साथ ही साथ संपूर्ण रूप में इस रेखा-रचना को एकटक देखते रहने पर यह चलायमान सा प्रतीत होता है तथा कुछ हिलता-डुलता सा प्रतीत होता है। पश्चिम के सुप्रसिद्ध रेखा वैज्ञानिक श्री ऐलेक्सी कुलचेव ने अद्भुत तथ्य प्रस्तुत किए हैं, जो श्री यंत्र की महत्ता को और पुष्ट करते हैं। यंत्र विज्ञान में श्री यंत्र को धनदायक एवं सब सिद्धिदाता कहा गया है और इसे सिद्ध करने की अनेक विधियां भी बतलाई गई हैं। इस यंत्र को सभी प्रकार की धातुओं पर बनाया जा सकता है। कई मंदिरों के द्वारों पर इसको बना देखा जा सकता है। वास्तव में श्री यंत्र रेखा-विज्ञान की अनूठी आकृति है।  यह यंत्रराज है,जिसकी पूजादीपावली के दिन श्रीसूक्त से की जाती है। विशेष रूप से स्वर्ण या स्फटिक पर अंकित श्री यंत्र सर्वोत्कृष्ट माना गया है। व्यापारियों द्वारा इसका बहुत ही उपयोग होता है। श्री यंत्र अपना महत्त्व और चमत्कार अलग ही रखता है। कहा जाता है मां आनंदमयी को श्री यंत्र बेहद प्रिय था। दीपावली पर श्रीयंत्र की पूजा और ‘श्री सूक्त’ का पाठ अत्यधिक आर्थिक समृद्धि देता है।
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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