घर के मंदिर का बल्ब देता हें नुकसान/हानि---

आजकल बहुत से लोग घरों या दुकानों में छोटा-सा मंदिर बनाकर उसमें गणेश जी या लक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित कर देते हैं, वहां घी का दीपक जलाने की बजाय बिजली का बल्व लगा देते हैं। 
यदि आपने भी गणेश जी के स्थान में बिजली का लाल बल्ब जला रखा है तो इसे उतार दें। 
यह शुभदायक नहीं है, इससे आपके खाते में हानि के लाल अंक ही आएंगे। अतः घर के मंदिर में कभी भी बिजली के बल्व का इस्तेमाल न करें। 
कहते मंदिर जाने से मन को शांति मिलती है। मंदिर वो स्थान है जहां से व्यक्ति को आत्मिक शांति के साथ ही सुख-समृद्धि भी मिलती है। लेकिन वास्तु के अनुसार घर के आसपास मंदिर का होना शुभ नहीं माना जाता है। ऐसे मंदिर आपका घर बिगाड़ सकते हैं। आपको ऐसे मंदिरों में नहीं जाना चाहिए जो आपके घर के पास है। अगर आप ऐसे मंदिरों में पूजा करते हैं तो उन मंदिरों के प्रभाव से आपका घर बिगड़ सकता है। आपकी पूजा पाठ का अशुभ फल आपके घर पडऩे लगता है।
वास्तु शास्त्रियों का यह मानना है। घर के मुख्य द्वार के सामने मंदिर या अन्य कोई धार्मिक स्थल नहीं होना चाहिए। ऐसा होने पर घर के वास्तु पर इसका असर पड़ता है। इसलिए आप ऐसे मंदिरो को अनदेखा करें जो आपके घर के पास या सामने हो।
पूजाघर भौतिक सुखों की प्राप्ति के साथ-साथ पारलौकिक सुखों एवं आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति का साधन हैं। यह वह कक्ष हैं, जिसमें विश्व का संचालक (ईश्वर) निवास करता हैं। अतः इसका निर्माण एवं इसकी साज सज्जा वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों के अनुसार करनी चाहिए। कई बार वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों का हम उल्लंघन करते हैं और अपनी सुविधानुसार पूजा घर बना लेते हैं। वास्तुसम्मत सिद्धान्तों के विपरीत पूजाघर मुसीबतों का कारण बन सकता है। 
  • - घर के मेन गेट के ठीक सामने अगर कोई मंदिर होता है तो घर के मालिक के लिए ये मंदिर अशुभ फल देने वाला ही रहेगा। 

  • - जिस भूखंड या मकान पर मंदिर की छाया पड़ती है, वहाँ रहने वाले लोगों की आर्थिक स्थिति दिनों दिन बिगड़ती जाती है।

  • - किसी मकान पर मंदिर के शिखर की छाया पडऩा वास्तु के अनुसार अशुभ ही माना जाता है जिस मकान पर मंदिर के  शिखर की छाया पड़ती है वहां रहने वाले लोग कर्ज में डुबते चले जाते हैं।

  • - अगर आपके घर के दाहिनी और मंदिर है तो उस मंदिर के प्रभाव से घर में के मालिक की तबियत अक्सर खराब ही रहेगी।

  • - मकान के बाई तरफ का मंदिर आपका मकान खाली करवा सकता है।

  • - अगर घर के नजदीक  पडऩे वाले मंदिरों के साथ बैर, बबुल के वृक्ष भी हो तो आपके घर में कलह बना रहेगा । 

  • - मंदिर के पास आधा जला हुआ, आधा सूखा, ठूंठ के जैसा पेड़, तीन शिरों या अनेक शिरों वाला पेड़ होना भी आपके लिए अशुभ होता है।

  • - इमली व मेंहदी पर बुरी आत्माओं का वास माना जाता है। घर के आसपास या मंदिर के आसपास होने वाले ये पेड़ शुभ नहीं माने जाते है।
ईशान कोण में कूड़ा न हो-----
ईशान कोण क्योंकि ईश्वर का स्थान है, आप कहीं इस कोण में अपने घर का कूड़ा करकट तो जमा नहीं कर रहे हैं। अगर ऐसा तो यह आपके लिए शुभदायक नहीं हैं। इससे घर में परेशानी आती रहती है। साथ ही इस कोण में भार वाहन की क्षमता बिलकुल नहीं होती है, कहीं आप अपने घर का भारी समान ईशान कोण में तो नहीं रखे हुए हैं? अगर ऐसा है तो उसे हटा दें। जहां तक हो सके आवास के न सिर्फ अंदर बल्कि बाहर भी ईशान कोण को खाली रखें तथा साफ रखें। 

ऊंचा हो घर का दक्षिणि भाग---
आपके घर के मुख्यद्वार के सामने कोई द्वार वेध तो नहीं है? ऐसा कोई वेध हो, तो तुरंत उसे दूर करें। भूखंड का दक्षिणी भाग कहीं उत्तर के भाग से नीचा तो नहीं है? दक्षिणी भाग हमेशा उत्तर से ऊंचा होना चाहिए।

नैऋर्त्य और ईशान कोण----
कहीं आपका नैऋर्त्य कोण का भाग ईशान कोण के भाग से नीचा तो नहीं है। क्योंकि वास्तु सिद्धांत के अनुसार नैऋर्त्य कोण का भाग ईशान से ऊंचा उठा हुआ होना ही शुभप्रद कहा गया है। कहीं आपके भवन अथवा जमीन का ईशान कोण अन्य कोणों से दबा हुआ तो नहीं है? ईशान कोण का भाग बढ़ा हुआ हो, तो सर्व सिद्धि एवं सुखों का दाता है, परंतु दबा हुआ होना कष्टकारक है। 

हो सकती है अचानक मृत्यु----
पश्चिम में सिर करके सोने से प्रबल चिंता और हानि होती है, जबकि उत्तर में सिर करके सोने से अचानक मृत्यु की आशंका बनी रहती है। अतः सोने के समय केवल पूर्व तथा दक्षिण की तरफ सिर करके सोना चाहिए।

तनाव लाता है बीम----
आप जहां व्यापार करने बैठते हैं अथवा आप पूजा पाठ करते हैं, उसके ऊपर कोई बीम तो नहीं हैं? अगर ऐसा है, तो आप अपने बैठने का स्थान बदल लें। क्योंकि बीम के नीचे बैठ कर काम करने से मानसिक तनाव होता है। बीम स्वयं ही तनाव में है, वह अपने तनाव से ही भवन का भार वहन करता है। अतः ठीक बीम के नीचे बैठ कर कोई भी कार्य नहीं करें। 

ध्यान दे निकास पर----
घर से निकलते समय आपका मुख किसी दिशा में होता है? कहीं दक्षिण की तरफ मुंह करके तो आप नहीं निकलते? इससे अनावश्यक परेशानी एंव हानि होती है। बहु मंजिले भवनों में इसका अर्थ प्रधान प्रवेशद्वार से होता है।

यथासंभव घर में पूजा के लिए पूजाघर का निर्माण पृथक से कराना चाहिए । यदि पूजा हेतु पृथक कक्ष का निर्माण स्थानाभाव के कारण संभव न हो, तो भी पूजा का स्थान एक निश्चित जगह को ही बनाना चाहिए तथा भगवान की तस्वीर, मूर्ति एवं अन्य पूजा संबंधी सामग्री को रखने के लिए पृथक से एक अलमारी अथवा ऊॅचे स्थान का निर्माण करवाना चाहिए । जिस स्थान पर बैठकर पूजा की जाए, वह भी भूमि से कुछ ऊँचा होना चाहिए तथा बिना आसन बिछाए पूजा नहीं करनी चाहिए । पूजाघर के लिए सर्वाधिक उपर्युक्त दिशा ईशान कोण होती हैं । अर्थात पूर्वोत्तर दिशा में पूजाघर बनाना चाहिए । 
यदि पूजाघर गलत दिशा में बना हुआ हैं तो पूजा का अभीष्ट फल प्राप्त नहीं होता हैं फिर भी ऐसे पूजाघर में उत्तर अथवा पूर्वोत्तर दिशा में भगवान की मूर्तियाॅ या चित्र आदि रखने चाहिए । पूजाघर की देहरी को कुछ ऊँचा बनाना चाहिए । पूजाघर में प्रातःकाल सूर्य का प्रकाश आने की व्यवस्था बनानी चाहिए । पूजाघर में वायु के प्रवाह को संतुलित बनाने के लिए कोई खिड़की अथवा रोशनदान भी होनी चाहिए । पूजाघर के द्वार पर मांगलिक चिन्ह, (स्वास्तीक, ऊँ,) आदि स्थापित करने चाहिए । ब्रह्मा, विष्णु, महेश या सूर्य की मूर्तियों का मुख पूर्व या पश्चिम में होना चाहिए । गणपति एवं दुर्गा की मूर्तियों का मुख दक्षिण में होना उत्तम होता हैं । काली माॅ की मूर्ति का मुख दक्षिण में होना शुभ माना गया हैं । हनुमान जी की मूर्ति का मुख दक्षिण पश्चिम में होना शुभ फलदायक हैं । पूजा घर में श्रीयंत्र, गणेश यंत्र या कुबेर यंत्र रखना शुभ हैं । 
पूजाघर के समीप शौचालय नहीं होना चाहिए । इससे प्रबल वास्तुदोष उत्पन्न होता हैं । यदि पूजाघर के नजदीक शौचालय हो, तो शौचालय का द्वार इस प्रकार बनाना चाहिए कि पूजाकक्ष के द्वार से अथवा पूजाकक्ष में बैठकर वह दिखाई न दे । पूजाघर का दरवाजा लम्बे समय तक बंद नहीं रखना चाहिए । यदि पूजाघर में नियमित रूप से पूजा नहीं की जाए तो वहाॅ के निवासियों को दोषकारक परिणाम प्राप्त होते हैं । पूजाघर में गंदगी एवं आसपास के वातावरण में शौरगुल हो तो ऐसा पूजाकक्ष भी दोषयुक्त होता हैं चाहे वह वास्तुसम्मत ही क्यों न बना हो क्यांेकि ऐसे स्थान पर आकाश तत्व एवं वायु तत्व प्रदूषित हो जाते हैं जिसके कारण इस पूजा कक्ष में बैठकर पूजन करने वाले व्यक्तियों की एकाग्रता भंग होती हैं तथा पूजा का शुभ फला प्राप्त नहीं होता । पूजाघर गलत दिशा में बना हुआ होने पर भी यदि वहां का वातावरण स्वच्छ एवं शांतिपूर्ण होगा तो उस स्थान का वास्तुदोष प्रभाव स्वयं ही घट जाएगा । 
इस प्रकार बिना तोड़-फोड़ के उपर्युक्त उपायो के आधार पर पूजाकक्ष के वास्तुदोष दूर कर समृद्धि एवं खुशहाली पुनः प्राप्त की जा सकती हैं । 
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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