केसे दूर होंगे स्वास्तिक से आपके वास्तु दोष..???

स्वास्तिक की आकृति भगवान श्रीगणेश का प्रतिक, विश्वधारक विष्णु एवं सूर्य का आसन माना जाता हैं । स्वास्तिक को भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व प्राप्त हैं । हिन्दू जीवन पद्धति में तो प्रत्येक शुभकार्य के साथ स्वास्तिक जुड़ा हुआ हैं । भवन निर्माण के आरंभ में ही स्वास्तिक का प्रयोग नींव रखते समय शुभ होता हैं । स्वास्तिक का अर्थ है - शुभ, मंगल एवं कल्याण करने वाला । देवताओं के चारों ओर घूमने वाले आभामण्डल का चिन्ह ही स्वास्तिक होने के कारण व देवताओं की शक्ति का प्रतीक हैं, इसलिए शास्त्रों में उसे शुभ तथा कल्याणकारी माना गया हैं । 
स्वास्तिक का उपयोग वास्तुशास्त्र में स्वीकारा जा रहा हैं । जहाॅ वास्तुकारता हो वहाॅ भवन के प्रवेश द्वार पर स्वास्तिक लगाने से घर के समस्त वास्तुदोष स्वतः दूर हो जाते हैं और यही प्रयोग आप अपने व्यापारिक संस्थान या कार्यालय में भी कर सकते हैं । इसका प्रयोग मकान, दुकान एवं कार्यालय में किया जाता हैं । इसके प्रयोग से मनुष्य के जीवन में व्याप्त तनाव, रोग, क्लेश, निर्धनता एवं शत्रुता का निवारण होता हैं । 
रसोईघर, तिजोरी, स्टोररूम एवं प्रवेश द्वार पर सिन्दूर या हल्दी का प्रयोग लाभदायक रहता हैं । स्वास्तिक का प्रयोग शुद्ध, पवित्र एवं सही तरीके तथा स्थान पर करना चाहिए । शौचालय एवं गन्दे स्थानों पर स्वास्तिक का प्रयोग वर्जित (निषेध) हैं । ऐसा करने वाला एवं करवाने वाले की बुद्धि विवेक समाप्त हो जाता हैं, दरद्रिता, तनाव व रोग एवं क्लेश में वृद्धि होती हैं । महिलाओं का स्वास्थ्य खराब रहने लगता हैं । स्वास्तिक जो भारतीय सभ्यता एवं ज्योतिष का प्रतीक हैं की वास्तु शास्त्र के अनुसार विभिन्न प्रकार के दोषो को दूर करने तथा किसी स्थान विशेष की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में किया जाता हैं । यह नकारात्मक ऊर्जा भवन को वास्तु अनुरूप न बनाने अथवा प्राकृतिक दोष के कारण बन सकती हैं । इसका निवारण स्वास्तिक का प्रयोग कर निम्न प्रकार से किया जा सकता हैं:- 
1 किसी भी भवन, कार्यालय, दूकान या फैक्ट्री अथवा कार्यस्थल के मुख्य द्वारा के ऊपर अथवा दोनो तरफ स्वास्तिक बनाएॅ । 
2 पूजा स्थल में स्वास्तिक स्थापित करें । पूजा स्थल को स्वच्छ रखे । 
3 स्वास्तिक चिन्ह अलमारी, तिजौरी व दुकान के केश बाॅक्स के ऊपर निर्मित करें । यह चिन्ह गणेशजी का प्रतिक हैं । गणेशजी रिद्धी-सिद्धी के स्वामी माने जाते हैं । 
4 कुमकुम सिन्दूर व अष्टगंध अथवा काले रंग से भी स्वास्तिक चिन्ह बनाया जा सकता हैं। 
स्वास्तिक को धन की देवी लक्ष्मी का प्रतीक चिन्ह माना जाता हैं । इस प्रकार स्वास्तिक चिन्ह भारतीय संस्कृति के अनेक प्रतीकों को समेटे हुए हैं । स्वास्तिक चारों दिशाओं के अधिपति देवताओं, अग्नि, इन्द्र, वरूण व सोम की पूजा हेतु एवं सप्तऋषियों के आर्शीवाद को प्राप्त करने में प्रयोग किया जाता हैं । 
अतः हमें स्वास्तिक के महत्व को समझकर श्रद्धापूर्वक अपनाना चाहिए । अनजाने में इसके अपमान या गलत प्रयोग से बचना चाहिए । स्वास्तिक के प्रयोग से निम्न लाभ होते हैं - 
1. धनवृद्धि 2. गृह शान्ति          3. रोग निवारण 
4. वास्तुदोष निवारण    5. भौतिक कामनाओं की पूर्ति   6. तनाव अनिद्रा व चिन्ता से मुक्ति 

 पं0 दयानन्द शास्त्री 
विनायक वास्तु एस्ट्रो शोध संस्थान ,  
पुराने पावर हाऊस के पास, कसेरा बाजार, 
झालरापाटन सिटी (राजस्थान) 326023
मो0 नं0-- 09024390067
E-Mail –    dayanandashastri@yahoo.com,      
                  -vastushastri08@rediffmail.com
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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