कहाँ होना चाहिए भूमिगत जल/कुआँ/ट्यूबवेल .???

भूमिगत पानी के स्त्रोत
प्रत्येक आवास स्थल पर पानी की आवश्यकता पूर्ति के लिये पुंआ, बोरवेल अथवा भूमिगत पानी के टैंक का निर्माण किया जाता है। इसके लिये वास्तु विषय हमें सही दिशा-निर्देश देता है, जिनका पालन करना अत्यंत आवश्यक होता है। वास्तु के दिशा-निर्देश के अनुसार बनाये गये भूमिगत पानी के स्त्रोत से शुभ फल तथा वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत दिशा में बनाने पर दुष्परिणाम पाप्त होते हैं। पत्येक आवास स्थल पर पानी की आवश्यकता पूर्ति के लिये पुंआ, बोरवेल अथवा भूमिगत पानी के टैंक का निर्माण किया जाता है। इसके लिये वास्तु विषय हमें सही दिशा-निर्देश देता है, जिनका पालन करना अत्यंत आवश्यक होता है। वास्तु के दिशा-निर्देश के अनुसार बनाये गये भूमिगत पानी के स्त्रोत से शुभ फल तथा वास्तु के सिद्धांतों के विपरीत दिशा में बनाने पर दुष्परिणाम पाप्त होते हैं। चित्र में निर्देशित अलग-अलग दिशा में बनाये गये भूमिगत पानी के स्त्रोत से प्राप्त होने वाले पृथक परिणाम :-

जमीन में जल का पता लगाने हेतु प्रयोग--------


यह प्रयोग अत्यन्त ही सरल है तथा इसके माध्यम से जमीन में कहां पानी है और कहाँ नहीं यह ज्ञात किया जा सकता है। दरअसल, कुआँ अथवा ट्यूबवेल खुदवाते समय हमारे मन में बरबस आ जाता है कि पता नहीं जहाँ कूप खनन करवाया जा रहा है वहाँ पानी निकलेगा भी अथवा नहीं ? इस प्रयोग को ऐसे समय प्रयोग करना हितकर है। इसके अन्तर्गत 4-6 मिट्टी के छोटे-छोटे कुल्हड़ ले आयें। कुल्हड़ मिट्टी के बने हुए छोटे लोटे के समान रचना होती है। अब जिस दिन पूर्णिमा हो उस दिन 4-6 ऐसे स्थान चुन लें जिनमें से किसी एक स्थान पर ट्यूबवेल खुदवाना हो। तदुपरान्त प्रत्येक स्थान पर जल से पूर्ण भरकर एवं उस समय मिट्टी का ही ढक्कन लगाकर, ईश्वर का ध्यानकर एक-एक कुल्हड़ रख दें। रात्रि पर्यन्त उन्हें वहीं रखा देने दें। दूसरे दिन सुबह सबेरे (सूर्योदय के समय) प्रत्येक कुल्हड़ का ढक्कन हटाकर देखें। जिस कुल्हड में जल पूर्ण भरा हो उसके नीचे खुदाई करने पर जल निकलेगा तथा जो कुल्हड़ खाली हो उसके नीचे जमीन में जल नहीं है-यह जानें। पुन: ऐसा कुल्हड़ जिसमें जल आधा भरा होगा-उसके नीचे पानी गहराई पर मिलेगा। यह प्रयोग मुझे एक साधु ने बताया था तथा इसकी सार्थकता को मैंने कई बार अजमाया है। इस प्रयोग में प्रयुक्त कुल्हड़ कोरे होने चाहिए। अर्थात् वे नवीन होने चाहिये।

वैसे कई पौधे भी ऐसे होते हैं जिनके माध्यम से जमीन में जल के होने की जानकारी होती है। मसलन जहाँ जमीन पर नारियल अथवा बबूल अथवा खजूर के पेड़ होते हैं वहाँ जल होता है। जिस जमीन पर कैक्टस खूब फले फूलें वहाँ जल होता ही नहीं या फिर वह बहुत नीचे होता है। जमीन पर बैर के पेड़ होना भी जमीन में जल की सूचना देते हैं।
मकान में पानी का स्थान सभी मतों से ईशान से प्राप्त करने को कहा जाता है और घर के पानी को उत्तर दिशा में घर के पानी को निकालने के लिये कहा जाता है,लेकिन जिनके घर पश्चिम दिशा की तरफ़ अपनी फ़ेसिंग किये होते है और पानी आने का मुख्य स्तोत्र या तो वायव्य से होता है या फ़िर दक्षिण पश्चिम से होता है,उन घरों के लिये पानी को ईशान से कैसी प्राप्त किया जा सकता है,इसके लिये वास्तुशास्त्री अपनी अपनी राय के अनुसार कहते है कि पानी को पहले ईशान में ले जायें,घर के अन्दर पानी का इन्टरेन्स कहीं से भी हो,लेकिन पानी को ईशान में ले जाने से पानी की घर के अन्दर प्रवेश की क्रिया से तो दूर नही किया जा सकता है,मुख्य प्रवेश को महत्व देने के लिये पानी का घर मे प्रवेश ही मुख्य माना जायेगा। 

पानी के प्रवेश के लिये अगर घर का फ़ेस साउथ में है तो और भी जटिल समस्या पैदा हो जाती है,दरवाजा अगर बीच में है तो पानी को या तो दरवाजे के नीचे से घर में प्रवेश करेगा,या फ़िर नैऋत्य से या अग्नि से घर के अन्दर प्रवेश करेगा,अगर अग्नि से आता है तो कीटाणुओं और रसायनिक जांच से उसमे किसी न किसी प्रकार की गंदगी जरूर मिलेगी,और अगर वह अग्नि से प्रवेश करता है तो घर के अन्दर पानी की कमी ही रहेगी और जितना पानी घर के अन्दर प्रवेश करेगा उससे कहीं अधिक महिलाओं सम्बन्धी बीमारियां मिलेंगी। 

पानी को उत्तर दिशा वाले मकानों के अन्दर ईशान और वायव्य से घर के अन्दर प्रवेश दिया जा सकता है,लेकिन मकान के बनाते समय अगर पानी को ईशान में नैऋत्य से ऊंचाई से घर के अन्दर प्रवेश करवा दिया गया तो भी पानी अपनी वही स्थिति रखेगा जो नैऋत्य से पानी को घर के अन्दर लाने से माना जा सकता है। पानी को ईशान से लाते समय जमीनी सतह से नीचे लाकर एक टंकी पानी की अण्डर ग्राउंड बनवानी जरूरी हो जायेगी,फ़िर पानी को घर के प्रयोग के लिये लेना पडेगा,और पानी को वायव्य से घर के अन्दर प्रवेश करवाते है तो घर के पानी को या तो दरवाजे के नीचे से पानी को निकालना पडेगा या फ़िर ईशान से पानी का बहाव घर से बाहर ले जायेंगे,इस प्रकार से ईशान से जब पानी को बाहर निकालेंगे तो जरूरी है कि पानी के प्रयोग और पानी की निकासी के लिये ईशान में ही साफ़सफ़ाई के साधन गंदगी निस्तारण के साधन प्रयोग में लिये जानें लगेंगे। और जो पानी की आवक से नुकसान नही हुआ वह पानी की गंदगी से होना शुरु हो जायेगा। 

पूर्व मुखी मकानों के अन्दर पानी को लाने के लिये ईशान को माना जाता है,दक्षिण मुखी मकानों के अन्दर पानी को नैऋत्य और दक्षिण के बीच से लाना माना जाता है,पश्चिम मुखी मकानों के अन्दर पानी को वायव्य से लाना माना जाता है,उत्तर मुखी मकानों के अन्दर भी पानी ईशान से आराम से आता है,इस प्रकार से पानी की समस्या को हल किया जा सकता है। 

दिशापरिणाम
पूर्वमान-सम्मान एवं ऐश्वर्य में वृद्धि
पश्चिममानहानि, शरीर की आंतरिक शक्ति एवं आध्यात्मिक भावना में वृद्धि
उत्तरसुखदायक, धन लाभ
दक्षिणस्त्री नाश, धनहानि, महिला वर्ग का जीवन कष्टमय
पूर्व-ईशानअत्यंत शुभ - सौभाग्य - समृद्धिदायक
उत्तर-ईशानआर्थिक उन्नतिकारक
आग्नेयपत्नि व संतान के लिये घातक, पुत्र नाश, अनारोग्य, वाद-विवाद, विशेषत: द्वितीय संतान के जीवन के लिये अशुभ फलदायक
वायव्यमानसिक अशांति, शत्रु पीड़ा, निर्धनता, चोरी, अदालत के चक्कर, शुभ कार्य में विघ्न
नैऋतगृह मालिक का जीवन मृत्यु तुल्य, अत्ति अशुभ फलदायक, धन नाश, बुरे व्यसन का शिकार
ब्रह्म स्थलधन नाश, मानसिक विक्षिप्तता, आर्थिक दिवालियापन की स्थिति
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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