फ़िर से दिल तो टूटे गा॥ 

फ़िर से दिल तो टूटे गा॥ 
शीशा टूटे य न टूटे
फ़िर से दिल तो टूटे गा॥
महगाई की मार पड़ेगी
प्रिय से प्रेमी रूठेगा॥
महगेमहगे कपडे मागे
प्रेम नगर भी जाना है॥
प्रिय प्रवाह होटल में बैठ कर
प्रेम प्रसाद भी खाना है॥
खाता देखा के प्रेमी जी के
आँख से आंसू छूटे गा॥
प्रेम वती गाडी लेना है
प्रेम भवन बनवाना है॥
प्रेमातुर पिक्चर देखेगे
प्रेम बाग़ भी जाना है॥
५ लाख का बज़ट देख कर
प्रेमी खजाना लूतेगे॥
प्रेम रतन जो पुष्प लगाना
प्रिया की सेज सजाना है॥
सोलह सिंगार को पूरा करना॥
खुशिया का मौसम लाना है॥
सोच सोच के प्रेमी राजा के
मुह से गुब्बारे फूटेगे॥

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मुश्किलों भरा ये सफर भी
कितना सुहाना लगता है
दूर ही सही मंजिल मगर
कितनी मुमकिन लगती है
लगे भी क्‍यों नहीं
मंजिल ही कुछ ऐसी है...
यह सफर प्‍यारा है क्‍योंकि-
यह हमें हमसफर तक पहुंचाता है............
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मन की बात बताने को॥ 

करता कोशिश मेरा दिल जब॥
तेरे दिल से भिड़ने को॥
पता नही क्यो रूक ज़ाता है..
नैना तुमसे मिलने को॥
पथ पर तेरे चल कर आया॥
सात जनम तक रहने को॥
पता नही क्यो पर रूक ज़ाता है॥ 
संग संग तेरे चलने को...
व्याकुल होता बहुरंगी मन॥
पास तुम्हारे आने को॥
पता नही क्यो दिल नही कहता॥
तुमको राज़ बताने को॥
दिल तो धक् धक् कर जाता है॥
तेरे संग मचलाने को॥
पता नही क्यो रूक ज़ाता है॥
पास तुम्हारे आने को॥
रात को सपना बुन लेता हूँ॥
तुमसे प्रीत लगाने को॥
पता नही क्यो कह नही पाता॥
मन की बात बताने को॥
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बहुत समय के बाद आज॥
पूरब से पछुआ डोली है॥
अनजाने में य भूल से॥
मुंडेर पे कोयल बोली है॥ 
सुबह सुबह जब रवि ने ..
आँगन में किरण बिखेर दिया॥ 
हँसा गुलाब खिल खिला कर॥
सारी सुगंध उडेर दिया॥
दीर्घ काल से रूठी मैना॥
फ़िर तोता से बोली है॥

बहुत समय के बाद आज॥
पूरब से पछुआ डोली है॥

सूखी कलियाँ हरी हुयी है॥
उत्सव का मौसम आया है॥
ममता से झुक गई सखा है॥
गगन नीर टपकाया है॥
आँखे भर गई देख प्रीतम को॥
उनकी सूरत भोली है॥

बहुत समय के बाद आज॥
पूरब से पछुआ डोली है॥

नभ से पुष्प की वर्षा होती ॥
मधुर गीत नदियों ने गा ली॥
मौसम मतवाला हंस के बोला॥
तेरी दुःख की बदली जा ली॥
सूखी नैना बहुत दिनों पर॥]
फ़िर से पलके खोली है॥
बहुत समय के बाद आज॥
पूरब से पछुआ डोली है॥
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देख कर बाधा विविधबहु-विघ्न घबराते नहीं
रह भरोसे भाग्य केदु:ख भोग पछताते नहीं
काम कितना ही कठिन हो किन्तु उबताते
नहीं

भीड़ में चंचल बने जोवीर दिखलाते नहीं
हो गए इक आन में उनके बुरे दिन भी भले
सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले-फले
आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही
सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं
वही

मानते जो भी हैं सुनते हैं सदा सबकी कही
जो मदद करते हैं अपनी इस जगत् में आप ही
भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं
कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं
जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं
काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं
आज-कल करते हुएजो दिन गँवाते हैं नहीं
यत्न करने से कभी जो दिल चुराते हैं
नहीं

बात है वह कौनजो होती नहीं उनके लिए
वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए
व्योम को छूते हुए दुर्गम पहाड़ों के
शिखर

वे घने जंगल जहाँ रहता है तम आठों पहर
गरजते जल-राशि की उठती हुई ऊँची लहर
आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपट
ये कँपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं
भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध


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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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