ऐसा होना चाहिए पश्चिम दिशा का वास्तु---


पूर्व दिशा की विरोधी दिशा है पश्चिम, जहां पूर्व प्रकाश का नेतृत्व करता है, वहीं पश्चिम अंधकार को दर्शाता है। पूर्व से उदय होने वाला सूर्य का प्रकाश इसी दिशा में जा अंधकार में बदल जाता है। इस दिशा के स्वामी है वरुण देव जो कि नदियों, समुद्र और अंधकार के देवता है। वह आकाश का एक रूप है, स्वर्ग के रचयिता है और रात के राजा है।
इस दिशा का संबद्ध शनि ग्रह से भी है। शनि सूर्य के प्रकाश को हटा अंधकार को लाता है और लोगों को भौतिक सुखदायी व आरामतलब बनाता है। शनि मृत्यु, रोग, बुढ़ापे और त्वचा से भी संबद्ध रखता है। शनि के प्रभाव के कारण कोई व्यक्ति अल्प या दीर्घ आयु हो सकता है। शनि डिप्रेशन, शक्ति में कमी और भावनाओं की समाप्ति का कारण भी हो सकता है। शनि को काले रंग से दर्शाया जाता है, वह तामसिक स्वभाव का है और बढ़ती उम्र से भी संबंध रखता है।
पश्चिम मुखी घर या भवन अच्छे माने जाते है, किंतु उन्हे बहुत ही ध्यान से बनाया जाना चाहिये। इनका निर्माण यदि वास्तु सम्मत तरीकों से हो, तो यह परिवार के सदस्यों में शांति और सौहा‌र्द्र लाता है। भवन के पश्चिमी भाग में एक्सटेशन या नया भाग जोड़ना नुकसानदायक हो सकता है। यदि किसी कारणवश यह करना ही पड़े, तो इस नये भाग और पुराने भवन के बीच में खाली जगह या एक दीवार बना इसे अलग करे। पश्चिम दिशा में बालकनी भी नहीं बनानी चाहिये और यदि यह पहले से बनी हो, तो या तो इसे कमरे के रूप में बदल दें या पूर्वी दिशा में इससे बड़ी बालकनी बनायें। पश्चिम दिशा में बेसमेंट निगेटिव ऊर्जा बनाता है। पश्चिम दिशा में बना शयनकक्ष या स्नानगृह पति-पत्नी में दूरियां बढ़ाता है।
इस दिशा में बनी किचेन बरक्कत में कमी करती है। हालांकि यह धन आगमन भी कराता है। इसी भांति अगर पश्चिम में अग्निस्थल हो, तो परिवार के सदस्य गर्मी और पित्त से पीड़ित रहेगे। इस दिशा में बना पूजा स्थल गृहस्वामी को ज्योतिष, तंत्र मंत्र आदि की ओर ले जाता है। किसी भवन का पश्चिमी भाग यदि अन्य हिस्सों से नीचा हो तो ऐसे भवन में रहने वाले अपयश पाते है। साथ ही यदि इस दिशा में पूर्व की तुलना में अधिक खुली जगह हो, तो बड़ी हानि हो सकती है।
पश्चिम दिशा में स्थित द्वार यदि दक्षिण पश्चिम दिशा की ओर फेस करते हों, तो गृहस्वामी को आर्थिक हानि या लंबी बीमारी का सामना करना पड़ता है। साथ ही यदि दरवाजे उत्तर पूर्व दिशा मुखी हों, तो कानूनी झगड़ों में पड़ना पड़ता है और अंतत: धन की हानि होती है। घर का पानी इस दिशा में कतई नहीं निकलना चाहिये अन्यथा घर के पुरुष अस्वस्थता के शिकार हो सकते है।
पश्चिम दिशा में पोर्च या पोर्टिको बनाया जा सकता है। हालांकि यह बहुत ज्यादा बाहर निकला हुआ नहीं होना चाहिए। साथ ही उत्तर पश्चिम व दक्षिण पश्चिम दिशाओं में पोर्च नहीं बनाना चाहिये। घर बनाते वक्त इस बात पर विशेष ध्यान दें किस दिशा में कोई खुला स्थान न हो। साथ ही इस दिशा में बनी दीवारे और जमीन का लेवल घर के अन्य भागों से ऊंचा न हो सके, तो इस दिशा में ऊंचे पेड़ लगा सकती है।
पश्चिम दिशा को बच्चों के कमरे के लिए उपयुक्त माना गया है। यहां वे खेल सकते है, पढ़ाई कर सकते है और रात्रि में आराम से सो सकते है। बच्चों के इस कमरे में बच्चों के पलंग को दक्षिण पश्चिम दिशा की ओर रखें। यदि यह कमरा दो बच्चों द्वारा प्रयोग किया जाता है, तो दोनों को अलग-अलग डेस्क या स्टडी टेबल दें। स्टडी टेबल या डेस्क को उत्तर पूर्व दिशा में ही रखें, जिससे कि पढ़ाई करते वक्त बच्चा उत्तर पूर्व या उत्तर दिशा मुखी हो सके।
इसके अतिरिक्त इस दिशा में सीढ़ी भी बनायी जा सकती है, लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि सीढि़यां पूर्व से पश्चिम या उत्तर से दक्षिण की ओर क्लॉक वाइज ही चलें। सीढ़ी जरूरत के अनुरूप चौड़ी हो और स्टेप्स सही अनुपात में हों। साथ ही सीढि़यों की संख्या सदा विषम संख्या में हो।
अंत में इस दिशा में पोर्च की छत तथा फर्श अन्य भागों से ऊंची होनी चाहिये। साथ ही इस दिशा में कोई भी खाली जगह नहीं होनी चाहिये। इस दिशा का लेवल अन्य भागों से ऊंचा होना चाहिये। यदि यह सब बातें न मानी जायें, तो गृहस्वामी धन, हानि, अपयश, बीमारी आदि से ग्रसित रहेगा।
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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