आइये जाने बुध की महादशा के शुभाशुभ फल---

बुध की महादशा 17 वर्ष तक चलती है। इस दौरान नवग्रहों की अंतर्दशाएं आती हैं। पिछले ह3ते आपने बुध की महादशा में बुध, केतु, शुक्र और सूर्य की अंतर्दशाओं के प्रभाव के बारे में पढ़ा। इस बार पढ़िए बुध की महादशा में शेष ग्रहों की अंतर्दशा के प्रभाव-

चंद्र की अंतर्दशा : इसकी अवधि एक वर्ष, पांच माह की होती है। यदि चंद्र स्वयं बली या योगकारक हो या फिर बृहस्पति की शुभ दृष्टि के प्रभाव में हो, केंद्र या त्रिकोण भाव में हो तो इस अवस्था में चंद्र की शक्ति और बढ़ जाने से यह दशा शुभ फलदायक हो जाती है। धन कमाने के एक से अधिक साधन प्राप्त होते हैं। जीवन साथी या संतान की प्राप्ति होती है। किंतु यदि चंद्रमा वृश्चिक राशि में नीच अंशों का हो या अमावस या कृष्णपक्ष का निर्बल हो तो हर कार्य में विफलता हावी हो जाती है। चिंता व दुर्बलता बढ़ जाती है। साथी व पार्टनर धोखा देते हैं। 

मंगल की अंतर्दशा : केतू की तरह यह दशा भी 11 माह 2७ दिन की होती है। यदि पत्री में मंगल मकर राशि का है या लग्न में मेष या वृश्चिक राशि है और मंगल भी वहीं है, बृहस्पति शुभ ग्रहों केसाथ हो या फिर केंद्र या त्रिकोण भाव में हो तो इस दशा में जातक को राजकृपा प्राप्त होती है। व्यापार में या नौकरी में सरकारी सहायता मिलती है। ऊंचे पद की प्राप्ति होती है। नए व्यापार का शुभारंभ होता है। किंतु यदि मंगल नीच राशि का हो, राहु व शनि के प्रभाव में हो, अस्त हो या शत्रु राशि में हो तो सब विपरीत हो जाता है। आग, चोरी व दुर्घटना का भय रहता है। छह, आठ व 12वें भाव में मंगल हो तो यह सब दशा के आरंभ से ही घटित होना शुरू हो जाता है। भ्राता व पुत्र विरोधी हो जाते हैं।

राहू की अंतर्दशा : दो वर्ष, छह माह, अठारह दिन लंबी होती है राहु की अंतर्दशा। आते ही शुभफल देना आरंभ कर देता है। कुछ को आरंभ में कष्ट देकर बाद में सुखी करता है। किसी को अधिकतम मेहनत केपश्चात भी थोड़ा-सा फल देता है। राहु यदि तीन, छह, व 11वें भाव में है, सरकार से उच्च लाभ की कामना कर सकते हैं। बार-बार लाभ होता है। उच्चाधिकारियों की कृपा विशेष रूप से मिलती है। चुनाव व राजनीतिक कार्यों में विजय मिलती है। आर्थिक वृद्धि तो होती है, किंतु खर्च भी बहुत होता है।लग्न से आठवें या 12वें भाव में राहू है तो कष्टों की शुरुआत समझें। धन संपदा केजाने का समय आ गया मानें। सुख सुविधाएं छिन सकती हैं। मित्र भी शत्रु हो जाते हैं। व्यापार/नौकरी चौपट हो सकती है। 

बृहस्पति की अंतर्दशा : इसकी अवधि दो वर्ष, तीन माह, छह दिन की होती है। शुभ स्थिति में बृहस्पति व्यवसाय, लेखन कार्य एवं प्रकाशन द्वारा उच्च लाभ करवाता है। सरकारी नौकरी में तरक्की होती है। पहले प्रयास में ही नौकरी मिल जाती है। किंतु ६, ८ या 12वें भाव का या मकर का बृहस्पति अति कष्टकारक होता है। निर्णय शक्ति साथ नहीं देती। व्यवसाय/नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। 

शनि की अंतर्दशा : यह आखिरी दशा होती है। दो वर्ष, आठ माह, नौ दिन की। यदि पत्री में केवल बुध अच्छा हो तो शनि की दशा केन मिलने वाले शुभ फल भी प्राप्त हो जाते हैं। कहीं शनि देव अपनी उच्च राशि या स्वराशि या तीसरे, छठे, 11वें भाव में पत्री में विराजमान हैं तो आपकी चिंता के दिन समाप्त हुए। मेहनत का फल प्राप्त होगा। नया उत्साह जागता है। किंतु कहीं शनि 4, 8 या 12वें स्थान में है, तो आपको सतर्क हो जाना चाहिए। यह सब कुछ छीन सकता है आपसे। यदि आने वाली केतू की दशा फलदायक नहीं है तो कंगाली केकगार पर खड़ा कर सकती है बुध-शनि की आखिरी दशा। 

बुध और अन्य अंतर्दशाएं, लग्नों की अलग-अलग शुभाशुभ स्थिति केअनुसार फलों को न्यूनाधिक अवश्य करती हैं, यह ध्यान में अवश्य रखना चाहिए।
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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