नशे/मादक पदार्थो का सेवन का क्या हें कारण....ज्योतिष अनुसार.....!!!!!

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जातक की कुंडली से यह पता चल जाता है की वह मादक पदार्थो का सेवन करता है या नहीं | इससे उसे ठीक करने में भी मदद मिलती है | 
अच्छी दशा आने पर वह खुद अपना इलाज कराता है और जीवन में सफल रहता है | खाने - पीने वाली वस्तुओ का सम्बन्ध चन्द्रमा से है और राहू के नक्षत्र - आद्रा , स्वाती , शतभिषा में दोनों की उपस्थिति , दुसरे भाव के स्वामी की नीच राशी में मौजूदगी और खुद राहू का साथ बैठना जातक द्वारा मादक पदार्थो के सेवन का स्पष्ट संकेत कराता है | 
सभी जानते हैं कि नशा खराब है..??? इससे शरीर, मन, धन, परिवार सब कुछ दाँव पर लग जाता है, मगर फिर भी लोग विशेषकर युवा बुरी तरह से इसकी गिरफ्‍त में आ जाते हैं। आज हर दूसरा युवा किसी न किसी नशे को अपनाता है। प्रारंभ में शौक में किया गया नशा बाद में लत बनता जाता है और सारा करियर तक चौपट कर सकता है।यह सच है कि नशे का आदी बनने में वातावरण का भी हाथ होता है, मगर हॉरोस्कोप यह संकेत पहले ही दे देता है कि किस व्यक्ति की रुचि नशा करने में रहेगी और वह किस तरह का नशा करेगा। यदि किशोरावस्था में ही इन संकेतों को समझकर संबंधित उपाय किए जाएँ तो उसे नशे के दानव की गिरफ्‍त में आने से बचाया जा सकता है।
प्राचीन काल में लोग सोमरस तथा हुक्का पीते थे। आधुनिक युग में इसी बात को आधार बनाकर कहा जाता है। कि नशे की संस्कृति आदिमकाल से जुड़ी हुई है। वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में घुल रहीं अनेक विकृतियों के मूल में एक बड़ा कारण नशे की प्रवृत्ति है। इससे आर्थिक, मानसिक, षारीरिक और भावनात्मक स्तर पर मनुष्य का जितना अहित होता है, उसे आंकड़ो में प्रस्तुतिदी जाय तो उसकी आंखें खुल सकती है। मद्यपान और ध्रूम्रपान को नियन्त्रित या रोकने के लिए पहला सूत्र है हढ संकल्प और दूसरा सूत्र है संकल्प की पूर्ति के लिए कारगर उपायों की खोज कुछ लोग नषीले व मादक पदार्थो के उत्पादन व सेवन पर रोक लगाने की मागं करते हैं। कुछ लोग चाहते हैं कि पाठयक्रम में ऐसे पाठ जोड़े जाएं, जो मादक व नषीले पदार्थो के सेवन से होने वाले दुष्परिणामों को प्रंभावी ढ़ग से प्रस्तुत करते हों। कुछ लोग इलेक्ट्रोनिक्स प्रचार माध्यमों से वातावरण या मानसिकता बदलने की बात करते हैं। कुछ लोगों का चिन्तन है कि तम्बाकू की खेती और बीड़ी उद्योग, कामगरों के सामने नया विकल्प प्रस्तुत किया जाय।
नशे की आदत कैसे लगती है ? 
इस प्रष्न पर  अलग-अलग अभिमत हैं। कुछ व्यक्ति चिन्ता, थकान और परेषानी से छुटकारा पाने की चाह से नशे के क्षेत्र में प्रवेष करते है। कुछ व्यक्ति चिन्ता, थकान और परेषानी से छुटकारा पाने की चाह से नशे के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। कुछ व्यक्ति चिन्ता, थाकान और परेषानी से छुटकारा पाने की चाहसे नशे के क्षेत्र में प्रवेष करते है। कुछ व्यक्ति संघर्षों से जूझने के लिए नषा करते हैं। कुछ व्यक्ति चुस्त, दुरूस्त और आधुनिक कहलाने के लोभ में नषे के चंगुल में फंसते है। कुछ व्यक्ति ऐसे भी हैं, जो दूसरे लोगों को धूम्रपान या मदिरापान करते हुए देखते हैं, तो उनके मन में एक उत्सुमता जागती है है और उनके कदम बहक जाते हैं। कुछ व्यावसायिक ऐसी आकर्षक वस्तुओं का निर्माण करते हैं कि उपभोक्ता उनका प्रयोग किये बिना रह नहीं सकता। कुछ व्यक्ति साथियो के लिहाज या दबाव के कारण नशे के षिकार होते हैं, और भी अनेक कारण हो सकते हैं। कारण कुछ भी हो, एक बार नशे की लत लग जाने के बाद मनुष्य विवश
हो जाता है। फिर तो वह प्रयत्न करने पर भी उससे मुक्त होने में लोग कठिनाई अनुभव करता है।

गर्भावस्था में धूम्रपान करने से बच्चे की सेहत को कई तरह से नुकसान पहुंचता है। एक नए शोध के अनुसार यह नुकसान केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक भी होता है। ऐसे बच्चों में सिगरेट और नशे की लत लगने की संभावना ज्यादा होती है। 
किसी की जन्मकुंडली से केसे जाने की वह नशा करता हें या नहीं-???
--- जेसे-यदि --
---लग्न में पाप ग्रह हो तो व्यक्ति की रुचि नशे में रहेगी।
---- लग्नेश अर्थात मुख्‍य ग्रह निर्बल हो, पाप प्रभाव में हो, तो नशे में रुचि रहेगी।
---यदि लग्नेश नीच का हो, शत्रु क्षेत्री हो, चंद्रमा भी वीक हो तो नशे में रुचि रहेगी।
---लग्नेश का मंगल देखें तो व्यसन में रुचि होती है।
---व्यय स्थान का पापी ग्रह अध्ययन में धन व्यय कराता है।
----बृहस्पति नीच का हो तो व्यसन में रुचि रहती है।
----शुक्र-राहु या केतु के साथ हो, मुख्‍य ग्रह व चंद्रमा कमजोर हो तो व्यसन में रुचि होती है।
----- शनि का लग्न हो, शुक्र अष्टस्थ हो और शनि से दृष्ट हो तो भयंकर व्यसन होता है। लग्न पर सूर्य की दृष्टि माँस-मदिरा में, शनि की दृष्टि सिगरेट-गांजा आदि, मंगल की दृष्टि मदिरापान में रुचि जगाती है।
-----यदि हॉरोस्कोप पितृ दोष से प्रभावित हो तो भी परिवार में नशे का दानव घर जमाता है।

----अपनी नीच राशी वृश्चिक में चन्द्रमा अक्सर जातक को मादक पदार्थो का सेवन कराता है | 
----क्रूर गृह शनि , राहू पीड़ित बुध और क्षीण चन्द्रमा इसमें इजाफा करते है | 
----हालाँकि वृश्चिक पर वृहस्पति की द्रष्टि इसमे कुछ कमी करती है और जातक बदनाम होने से बच जाता है | 
----जिस जातक की कुंडली में एक या दो ग्रह नीच राशी में होते है और चन्द्रमा पीड़ित होकर शत्रु ग्रह में दूषित होता है उसमे मादक पदार्थो के सेवन की इच्छा प्रबल होती है | 
----द्वितीय भाव जिसे भोजन , कुटुंब , वाणी आदि का भाव भी कहा जाता है , के स्वामी की स्थति से भी उसके द्वारा मादक पदार्थो के सेवन का ब्यौरा मिल जाता है | 
-----कलयुग में राहू शनि मंगल व् क्षीण चन्द्रमा ग्रहों की मानसिक चिन्ताओ को उजागर करने में आगे रहते है | 
-----शुक्र की अपनी नीच राशी कन्या में मौजूदगी मादक पदार्थो के सेवन का प्रमुख कारण बनती है | 
------नीच गृह लोगो को नशा कराते है , जिससे जातक अपने साथ ही साथ अपने परिवार को भी अपमानित कराता है | 
------प्रख्यात ज्योतिषियों के मतानुसार मकर लग्न में नीच का वृहस्पति जातक को अफीम का शौकीन बनता है | 
------द्वादश भाव के स्वामी का शत्रु या नीच राशी में होना जातक को नशेडी बनता है | 
-----कमजोर लग्न भी मित्र ग्रहों से सहयोग न मिलाने से नशे की तरफ बदता है लग्न पर पाप ग्रहों की द्रष्टि भी मादक पदार्थो का सेवन करती है | 
-----पेट , जीभ और स्नायु केन्द्रों पर बुध का अधिकार होता है | 
-----बुध को मिश्रित रस भी पसंद है | शुक्र का वीर्य , काफ , जल , नेत्र और कमंगो पर अधिकार है | अत : इन दोनों के द्वितीय भाव से सम्बंधित होने से पीड़ित होने से और द्रष्टि होने से जातक द्वारा मादक पदार्थो का सेवन करने और नहीं करने का पता चलता है | 
-----मंगल , शनि , राहू और क्षीण चन्द्रमा की द्रष्टि उत्तेजना बढाती है | जो जातक को नशेडी बनने पर मजबूर कर देती है | 
-----नवांश कुंडली में पंचम भाव के स्वामी पर नीच या पीड़ित शनि , राहू की द्रष्टि मादक पदार्थो का सेवन कराती है | 
-----सूर्य की नीच राशी तुला में ये स्पष्ट लिखा है की जातक शराब बनाने और बचने वाला होता है | 
------कर्क राशी में मंगल नीच का होता है | अत : वह चंचल मन वाला और जुआ खेलने में विशेष रूचि रखता है | 
------बुध की नीच राशी मीन है| यह जातक को चिंतित रखता है और उस की स्मरण शक्ति भी ख़राब होती है | कन्या में शुक्र पीड़ित होकर मद्यपान की और ले जाता है | 
------शनि मेष में नीच होता है | वह जातक से जालसाजी , फरेब करने के साथ ही नशा भी करता है | राहू वृश्चिक में नीच का होता है , वह जातक को शराब के आलावा कोकीन , अफीम , हिरोइन आदि का भी टेस्ट कराना चाहता है | 
ये करें उपाय---
आयुर्वेद में छ : रसो - मधुरम , अमल , लवण , कषाय, कटुक व् रिक्त का उल्लेख मिलता है | ज्योतिष में शुक्र , मंगल , वृहस्पति सूर्य व् चन्द्रमा को इनका स्वामी माना जाता है | राहू , शुक्र , चन्द्र व् पीड़ित बुध की दशा , अन्तर्दशा , प्रत्यंतर दशा आदि तथा क्रूर ग्रहों मंगल व् शनि की द्रष्टि जातक को नशे की ओर धकेलती है |
 प्राचीन काल में यू‍नानियों को विश्‍वास था कि जमुनिया धारण करने से नशे का प्रभाव नहीं होता। इसी कारण यूनान आदि के राजा शराब पीने के लिए जमुनिया से निर्मित प्‍यालों का उपयोग करते थे। 
मजबूत वृहस्पति की द्रष्टि इसमे कमी रहती है | हालाँकि यह आवश्यक है की उस लग्न विशेष में वृहस्पति मारक की भूमिका में न हो | यूनानी लोगो में एमीथिष्ट ( कटेला ) से बने प्यालो में शराब पीने का प्रचलन था | माना जाता है कि इससे नशा करने वाले जातक को कटेला पहनाकर नशा छुड़वाया जा सकता है | संभव है की वह पूरी तरह नशा छोड़ दे |
तनाव, बेचैनी, अशांति, भय, उदासी और अनिद्रा तो सर्वमान्य मन के रोग हैं ही तथा इन्हें दूर करने के लिए मनुष्य नशे का सहारा लेने लगता है एवं उसे उससे भी बड़ा रोग नशे का लग जाता है। नशे की लत चाहे पान में जर्दे की हो, चाहे पान-मसाले, गुटका, खैनी या गुलकी हो, चाहे सिगरेट, बीड़ी की हो, चाहे भाँग, शराब या अफीम के सेवन की हो सब तलब पर निर्भर है और तलब शरीर में होने वाली संवेदना पर निर्भर करती है। नई पीढ़ी में अब पेथेर्डान, हीरोइन मेंड्रेक्स, कोकीन आदि नशे की लत पड़ती जा रही है। किसी-किसी का तो इनके बगैर जीना दूभर होता दिखाई देता है। तलब हुई कि नशे की ओर बढ़े और डूबते ही गए। 
किसी भी तरह के नशे से टोटल परहेज। ये नशे हैं, भांग, अफीम, जर्दा, गुटखा, हेरोइन, गांजा, चरस और शराब। शराब चाहे बीयर हो या शैम्पेन सभी मौत के सौदागर हैं। आपकी शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक जिंदगी को तबाह करने के लिए इनसे बेहतर कोई और चीज नहीं है। लंबी और दर्द भरी मौत से बचना है, तो किसी भी तरह के नशे से तुरंत तौबा कर लीजिए। किसी भी तरह का नशा आपकी जरू रत नहीं है। ये अनावश्यक है और पैसे की बरबादी का कारण भी। धीरे-धीरे करके आप कभी भी नशे की आदत नहीं छोड़ सकते, अपनी इच्छा शक्ति काम में लीजिए और नशे की आदत को हमेशा के लिए एकदम गुडबाई कहिए। 
इतनी भिन्न दिखने वाली सारी बीमारियों की जड़ मन के विकार हैं, जिन्हें निर्मूल करने में कोई आध्यात्मिक साधना ही मदद कर सकती है। 'विपश्यना' साधना से हम विकार से विमुक्त हो सकते हैं और अंततः रोगमुक्त भी। यही इसका वैज्ञानिक पहलू है। आधुनिक वैज्ञानिक चिकित्सा-पद्धति का भी मानना है कि मानसिक विकारों- जिनमें तनाव, दब्बू व्यक्तित्व, दूसरे पर निर्भरता, हीनता की भावना, अहंकार, क्षमता से अधिक महत्वाकांक्षा, ईर्ष्या आदि प्रमुख हैं- से अनेक रोग हो सकते हैं, जिन्हें मनोजन्य शारीरिक (साइकोसोमैटिक) रोग कहा जाता है। 
नशे के कारण होते हें ये प्रमुख रोग-----
1. उदर रोग- गैस, पेट में जलन, अल्सर आदि।
2. फेफड़े के रोग- दमा।
3. हृदय रोग- रक्तचाप, हार्ट-अटैक, एन्जाइना।
4. मस्तिष्क रोग- सिरदर्द, अर्धकपाली, शरीर में जगह-जगह दर्द।
5. चर्म रोग- एक्जिमा, सोराइसिस आदि।
मन के विकार ही इन रोगों के कारण हैं एवं वे ही इनका संवर्धन करते हैं। जब-जब इन रोगियों के मन शांत एवं विकार रहित होते हैं तो ये रोग घटने लगते हैं। मानसिक रोग जैसे-तनाव, उदासी, चिंता, अवसाद, अनिद्रा, हिस्टीरिया आदि तो मन के विकारों से उत्पन्न होने वाले रोग ही हैं।'विपश्यना' इन भिन्न दिखने वाले रोगों को मन में निर्मलता लाकर ठीक करती है। 
'विपश्यना' में पहले साँस और मन एकाग्र करना बताया जाता है। हम जानते हैं कि मन और साँस का गहरा संबंध है। भय, क्रोध आदि विकार जागने पर साँस तेज चलने लगती है और इनके समाप्त होने पर फिर अपनी सरल, साधारण धीमी गति पर वापस आ जाती है। साँस में जब मन केंद्रित हो जाता है तो उसी क्षण मन विकार रहित होता है।
नियमित व्यायाम और यौगिक आसन----
नियमित व्यायाम और यौगिक आसन, प्राणायाम आपको चाक चौबन्द रखेंगे। अनुलोम विलोम प्राणायाम आप कभी भी कर सकते हैं, उस हालत में भी जबकि आपकी हार्ट की या हाई ब्लडप्रेशर या डायबिटीज की शिकायत हो, तो भी इससे आपको कोई नुकसान होने की संभावना नहीं है। हां कपालभाति या भçस्त्रका प्राणायाम इन बीमारियों की हालत में नहीं करना चाहिए। इससे हानि होने की संभावना है। पानी में तैरना, हरी- हरी दूब में प्रात:कालीन समय में नंगे पैर घूमना और कई किलोमीटर दूर तक एक ब्रिस्क वॉक आपकी सेहत का बीमा है।
अपना नजरिया बदलिए-----
अंत में आपको अपने सोचने का तरीका भी बदलना होगा।जीवन की समस्याओं और प्रॉब्लम्स के बारे में अपना नजरिया बदलिए। जिंदगी में सभी काम आपकी मनमर्जी के मुताबिक नहीं हो सकते। एडजस्ट करना सीखिए। जिन चीजों या परिस्थितियों को आप चेंज कर सकते हैं उन्हें बदलने की कोशिश कीजिए और जिन्हें बदलना आपके बस में नहीं है उनसे समझौता करना सीखिए। जब आप इस दुनिया में अपनी मर्जी से नहीं आए और ना अपनी मर्जी से जाएंगे तो इस आने-जाने के बीच में हर काम आपकी मर्जी के मुताबिक हो ऎसा कैसे हो सकता है हमें दूसरों के दृष्टिकोण से भी किसी बात को सोचने की आदत डालनी चाहिए। ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती है, हमें दूसरों से अपेक्षाएं कम रखनी चाहिए और उनकी छोटी मोटी गलतियों की उपेक्षा करना सीखना चाहिए। डोन्ट ऎक्सपेक्ट मच ऎंड लर्न टू इग्नोर। हमेशा पॉजिटिव आउटलुक रखिए। नकारात्मक विचार हमेशा बरबादी ही लाते हैं। 
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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