कुछ जिज्ञासा /जानकारी वास्तु के बारे में..!!!(  DOUBTS & CLARIFICATIONS OF VASTU)—-
वास्तुशास्त्र की उत्पत्ति संभवतः वैदिक काल में हुई। महाभारत, रामायण, मत्स्यपुराण आदि महाकाव्यों में वास्तु का वर्णन मिलता है। इंद्रप्रस्थ का निर्माण वास्तु के नियमों के अनुसार किया गया था; लेकिन एक बड़ी गलती के कारण यह कौरवों के विनाश का साक्षी बना। द्वारका का प्राचीन नगर, जो बाद में डूब गया, वास्तु-आधारित था।वास्तुशास्त्र भारत का अत्यन्त प्राचीन शास्त्र है। वैदिक काल में इसे स्थापत्यवेद की संज्ञा दी गयी। वेदों के प्रति हमारी श्रध्दा और विश्वास आज भी उतने ही दृढ़ हैं जितने पहले थे किन्तु वर्तमान में इस शास्त्र क प्रति संदेह व्यक्त किये जाते हैं जबकि स्थान-स्थान पर खुदाई में प्राप्त प्राचीन बस्तियों के भग्नावेश इस बात के साक्षी हैं कि प्राचीन समय में मंदिर, प्रासाद, बस्तियों एवं नगरों का निर्माण वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार ही होता था और इसी कारण लोग अपेक्षाकृत अधिक सुखी थे।
मानव सभ्यता के विकास एवं विज्ञान की उन्नति के साथ भवन निर्माण कला में अनेकानेक परिवर्तन होते गये। जनसंख्या में द्रूतगति से होती वृध्दि और भूखण्डों की सीमित संख्या जनसामान्य की अशिक्षा और वास्तुग्रंथों के संस्कृत में लिखे होने एवं मुद्रण प्रणाली के विकसित न होने के कारण इस शास्त्र की उत्तरोत्तर अवहेलना होगी गयी। विदेशी शासकों के बार-बार हुए आक्रमणों एवं अंग्रेजों के भारत में आगमन के पश्चात् पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में हम अपने समृध्द ज्ञान के भंडार पर पूर्णरूप से अविश्वास कर इसे कपोल कल्पित, भ्रामक एवं अंधविश्वास समझने लगे।
किन्तु अब जब से विदेशों में हमारे इस शास्त्र को मान्यता प्राप्त हुआ है। जर्मनी, अमेरिका, चीन, जापान आदि देशों में इन ग्रंथों के अनुवाद और सिध्दांतों का अनुपालन आरम्भ हुआ है तो हमने भी इस ओर ध्यान दिया है। किन्तु किसी भी विद्या को पूर्ण और विज्ञान मानने से पूर्व उसे विज्ञान के अनिवार्य पांच तत्वों की कसौटी पर परखना आवश्यक है। ये तत्व है तर्क संगतता और सिध्दान्तता, साध्यता, स्थायित्व, उपयोगिता एवं सर्वग्राह्यता। क्या वास्तु विद्या इस कसौटी पर खरी उतरती है? आइये जाने—
प्रश्न : व्यापार को लेकर परेशान हूं?
– व्यवसायिक प्रतिष्ठान पर बैठते समय आपका मुंह पूर्व या उत्तर की तरफ हो। सदैव गल्ले को दाएं हाथ से खोलें व खुलते समय यह उत्तर की तरफ खुले।
प्रश्न : मानसिक दबाब में रहती हूं व बच्चों की पढ़ाई में रूचि कम है?
– घर के पूर्व-उत्तर कोने में अधिक भारी भरकम समान न रखें, बल्कि इसे साफ व हल्का-फुल्का रखे। कमरों में हल्के रंग का इस्तेमाल करें। पढ़ाई करते समय बच्चों का रुख पूर्व या उत्तर की तरफ हो।
प्रश्न : विदेश जाने में रुकावटें पेश आ रही हैं?
– विदेश जाने के लिए तैयार कागजात, खुद व अन्य सामान के लिए उत्तर-पश्चिम दिशा वाला कमरा इस्तेमाल करें।
प्रश्न : दांपत्तय जीवन सदैव खुशहाल रहे?
– मुख्य शयनकक्ष को दक्षिण पश्चिम में बनाएं। उसमें हल्के गुलाबी रंग का इस्तेमाल करें। अपनी पारिवारिक तस्वीर को पूर्व या फिर उत्तर की तरफ लगाएं।
प्रश्न : वास्तु संबंधी कुछ टिप्स दें जिससे घर में उन्नति आए।
– घर के मुख्य द्वार के अंदर व बाहर दोनों तरफ भगवान गणेश जी का चित्र लगाएं। ऊंचाई वाले वृक्ष दक्षिण व पश्चिम की तरफ लगाएं। पानी के बने तालाब को पूर्व-उत्तर में बनाएं।
प्रश्न : फैक्ट्री शेरमुखी है, साथ लगता प्लाट लेना बेहतर रहेगा या नहीं?
– शेरमुखी प्लाट व्यवसाय के लिए उत्तम है। प्लाट की बढ़ोतरी सदैव पूर्व या उत्तर में लगते प्लाटों में करनी चाहिए। आपके साथ लगता प्लाट उत्तर दिशा में है, इसलिए यह आपके लिए फलदायी रहेगा।
प्रश्न : वास्तु किराये के मकान में रहने पर भी प्रभाव डालता है?
– जी हां। भले आप किराये पर रहें या फिर अपने मकान में वास्तु का संबंध पांच दिशाओं व नवग्रह के साथ है जो हर जगह मौजूद है।
प्रश्न : दुकान पर कारोबार बहुत कम है?
– दुकान पर बना मंदिर गलत दिशा में है। इसे बदलकर पूर्व-उत्तर में बनाएं व कुबेर यंत्र भी स्थापित करें।
प्रश्न : घर में क्लेश रहता है?
– घर के वरिष्ठ सदस्य दक्षिण व पश्चिम वाले कमरों का इस्तेमाल करें। बच्चों को पश्चिम व उत्तर वाले कमरे के प्रयोग के लिए दें।
प्रश्न : घर की महिलाओं में आपसी तनाव रहता है। सास के साथ मतभेद रहता है?
– महिलाओं में मनमुटाव का प्रमुख कारण रसोई घर में आग व पानी का नजदीक होना है। रसोई घर में इन दोनों में फासला बनाएं। खाना तैयार करते समय मुख पूर्व की तरफ हो व पानी की व्यवस्था उत्तर दिशा में हो।
प्रश्न : जब से नई दुकान का नवनिर्माण किया है, कारोबार घटा है व सेहत संबंधी समस्या रहने लगी है?
— पहले आप पूर्व दिशा में बैठते थे, जो सही था। अब आपने अपनी कुर्सी बदल कर दक्षिण की तरफ कर ली है, जो वास्तु दोष है। साथ ही शौचालय से पैदा होती नकारात्मक उर्जा रोकने के लिए इसका निर्माण पश्चिम में करें।
प्र..– ‘वास्तु’ से आप क्या समझते हैं ?
उ.– ‘वास्तु’ शब्द संस्कृत ‘वास’ शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है—निवास करना। यह ‘वास्तु’ और ‘वासना’ शब्दों से भी संबंध रखता है। इसका अभिप्राय है—जीवन को इच्छाओं और वास्तविकता के अनुरूप जीना।
प्र.– क्या आप साधारण शब्दों में बता सकते हैं कि वास्तुशास्त्र क्या है ?
उ.– यह प्रकृति के सिद्धांतों के अनुरूप जीने का प्राचीन विज्ञान है।
प्र.– यह किस हद तक सही है कि वास्तु सिर्फ एक अंधविश्वास है ?
उ.– वास्तु ठोस सिद्धांतो पर आधारित है, जिनका वैज्ञानिक आधार मौजूद है।
प्र. वास्तु का मूल सिद्धांत क्या है 
उ.– हमारा शरीर और यह पूरा ब्रह्मांड पाँच तत्त्वों—वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी और आकाश से बना है। इन सभी तत्त्वों का सही दिशाओं में संतुलन बनाए रखना ही वास्तु का सिद्धांत है।
प्र.– क्या वास्तु एक धार्मिक पद्धति है, जो सिर्फ हिंदुओं को प्रभावित करता है ?
उ.– जिस प्रकार सूर्य की ऊर्जा प्रत्येक को लाभ पहुँचाती है उसी प्रकार वास्तु के सिद्धांत सभी मतों के लोगों को प्रभावित करते हैं।
प्र..– क्या इसका धर्म से कोई संबंध है ?
उ.– धर्म जीने की एक राह है और वह हमारे जीने के तरीके के अनुरूप होता है। इस ब्रह्मांड में बहुत सी शक्तियां मौजूद हैं और वे सकारात्मक व नकारात्मक ऊर्जा छोड़ती हैं। वास्तु नकारात्मक शक्तियों का मुकाबला करने और सकारात्मक शक्तियों को ग्रहण करने में मदद करता है।
प्र.– क्या वास्तु का कोई आध्यात्मकि पक्ष भी है ?
उ.– बिलकुल। वास्तु के सिद्धांतों के अनुरूप जीने से शांति प्राप्त होती है, जो हमारी आत्मा और जैव विद्युत क्षेत्र को शक्ति देता है।
प्र.— वास्तु में कितनी दिशाएँ हैं ?
उ.— दिशाएँ सिर्फ वास्तु में नहीं हैं बल्कि वे सूर्य से संबद्ध हैं। ये दिशाएँ हैं—पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, दक्षिण-पूर्व, उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम।
प्र.– क्या वेदों में वास्तुशास्त्र का कोई उल्लेख मिलता है ?
उ.— ‘ऋग्वेद’ में इस बात का उल्लेख है कि किसी घर के निर्माण के पहले ‘वास्तु स्पतिदेव’ की पूजा कराई जानी चाहिए। इसमें वास्तु शांति मंत्र भी दिया गया है।
प्र.– वास्तुशास्त्र से संबंधित प्राचीन संबंधित ग्रंथ कौन से हैं ?
उ.— संस्कृत में वास्तुशास्त्र के कई ग्रंथ हैं। इनमें दो प्रमुख हैं—विश्वकर्मा प्रकाश’ और ‘समरंगन सूत्रधार’।
प्र.—. क्या किसी वास्तु—आधारित प्राचीन नगर का कोई प्रमाण मिला है ?
उ.— द्वारका का प्राचीन नगर वास्तु के नियमों के अनुरूप बनाया गया था।
प्र.—-. क्या हमारे धार्मिक ग्रंथों में वास्तु का कोई उल्लेख है ?
उ. —हाँ, मत्स्यपुराण, रामायण और महाभारत में वास्तु का उल्लेख किया गया है।
प्र.— कौरवों के विनाश में वास्तु का क्या योगदान था ?
उ. —इंद्रप्रस्थ के बीचोबीच एक कुआँ खुदवाया गया था, जो वास्तु के सिद्धांतों के बिलकुल विपरीत था।

Que —Are the bad effects of Vaastu Dosh of the house effect tenant? Or the house owner, who is not living in that house?

Clarification : The good or bad effects of Vaastu will effect the persons, who are staying in that house. If the house is rented, or owned, or is in the name of somebody else – This point is meaningless for Vaastu subject. The Vaastu of the house will give auspicious or inauspicious results to those who are living in that house.If the house owner leaves his own house and shift to an another house, then the Vaastu of his own house will not effect him. And who lives in that house, only he will be affected by the auspicious or inauspicious results of the Vaastu of that house. The Vaastu of the house in which you are staying, will clearly effect your nature – thought – relations – business. This is the secret of Vaastu.
Doubt :Is it possible or not to get rid of Vaastu Dosh by performing religious methods – Puja – Havan – Mantra etc.? Please clarify.
Clarification : Performing religious methods – Puja – Havan – Mantra – etc., increases the positive Urja (Energy) in that atmosphere. Because of which there are increases in the positive Urja for sometime. However, this positive Urja will not be effective for long time, because the inauspicious and negative Urja, created by Vaastu Dosh will create obstructions in the flow of the positive Urja. The positive Urja created by methods other than Vaastu can be effective only for sometime, but cannot give relief from the bad effects of Vaastu Dosh permanently. Due to the auspicious Urja, the Vaastu Dosh can be ineffective for some time, but at last, Vaastu Dosh remains its bad effects. To correct the Vaastu is better way to get rid of Vaastu Dosh permanently.
Doubt :What is the importance of high and low level of roof and floor of the house in Vaastu subject?
Clarification : In Vaastu subject as per the different directions, the high and low level of roof and floor is important. If the floor level of North-East of the house is in low level compared to floor of South-West, then there is continuous flow of positive Urja from North-East direction. Against this, if the floor level of North-East is high, compared to South-West, then it creates obstructions in the flow of positive Urja. If the floor level of South-West is high alongwith the low level of the floor of North-East, then these positive Urja gives more auspicious results. Against this, if the floor level of South-West is low compared to North-East, then the positive Urja will get diverted and negative Urja will enter into the house, which creates Vaastu Dosh.
If the roof of the house is of equal level, it is good. But, if the slanting portion is in East and North, then it gives better results. Against this, if the slanting portion is in South and West, then it gives adverse results.
Doubt :The South-East room of the house is used as master bedroom but this is against Vaastu principles. What is the solution to be safe from this bad effect?
Clarification : The joining point of East and South is called Agney’s corner as per the directions of Vaastu. It is very clear that the word ‘Agney’ means fire. If the bedroom is in Agney’s room, it will create bad effects in the health and wealth of male member.Due to which there is a high possibility of getting diseases related to fire-elements like High BP, diabetes, short temper etc., and unwanted arguments between husband and wife.To get good results from Vaastu subject, it is better that the Agney’s room is used as kitchen. But if there is no other alternative, by leaving one-fourth Eastern portion of Agney’s room, make a partition and use the balance three-fourth portion as bedroom.By wearing Pearl ring and good quality of natural crystal chain (both in silver), reduce the bad effects of fire-elements.
Doubt :Is it possible to get rid of Vaastu Dosh by performing Graha-Shanti and Vaastu-Shanti (Religious methods)?
Clarification : Performing Graha-Shanti is a symbol of your religious belief. You are misunderstanding the main aim and real meaning of Vaastu-Shanti. The real meaning of Vaastu-Shanti is the correct balancing of the five elements of Vaastu subject. Making changes as per Vaastu principle is the only better way to get rid of Vaastu Dosh permanently.
Doubt :I have heard that while digging the foundation of the house if we get bricks, metal (copper) then it brings well sign of happy and prosperity. But if we get bone, hair, iron, etc., it is very inauspicious, due to which there is loss of finance? To get rid of this, remove the mud of that plot, equal to the height of the plot owner and fill new mud in that place, and Vaastu-Shanti should be performed after purifying the place. Is it correct and necessary?
Clarification : Nowadays getting a plot itself is difficult, and to get a plot of our choice is almost impossible. Based on the availability of the plot and your ability, if the house is constructed on that plot as per the Vaastu principle, the persons who lives in that house will enjoy a happy and prosperous life. While digging a plot, which remains empty for a long time, something or the other will come out. It is better to save your self from being confused about unwanted talks, instead of concentrating on baseless talks and wasting money. It is always better that you should construct the house as per Vaastu principles. You will yourself realise the difference of good results of Vaastu.
Is Astrology and Vaastu subjects interlinked? Is it required to analyse the Janma-kundli (horoscope) to get rid of problems? Can we get solutions for problems by the method of Astrology?
Clarification : The forceful entry of Astrology in the Vaastu subject is not required. Astrology and Vaastu, both are different subjects and both are having different utilisation. Astrology is a good subject, which is based on its own mathematics, may give information about the incidents happens in human life. Analysis of the horoscope is not required to get benefit from Vaastu subject, because by the method of the horoscope, based on the effect of Grahas (Planets) to human life, only incident happens in human life may be known. Therefore, it may be said that Astrology can only predict but Vaastu is result-oriented.
The astrology advise us to perform Graha-shanti-puja-yantra to get rid from unfavorable Grahas, but whereas the use of such methods can change the movement of grahas in solar systems, which effects the human life? The answer will be ‘No’. When it is impossible to change the movement of the Grahas, then what is the importance of applying this method? As per Vaastu It is true that whenever a person shift or makes any changes in his house, then the life of that person changes as per the changed Vaastu.

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