11/2011

अपनी जन्म कुंडली  से जानें विवाह में देरी/बाधा के योग ---जन्म कुंडली से करें ग्रह-दोष निवारण------

वर्तमान में युवक-युवतियां का उच्च शिक्षा या अच्छा करियर बनाने के चक्कर में अधिक  उम्र के हो जाने पर विवाह में काफी विलंब हो जाता है। उनके माता-पिता भी असुरक्षा की भावनावश अपने बच्चों के अच्छे खाने-कमाने और आत्मनिर्भर होने तक विवाह न करने पर सहमत हो जाने के कारण  विवाह में विलंब /देरी हो जाती है। 

इस समस्या के निवारणार्थ अच्छा होगा की किसी विद्वान ज्योतिषी को अपनी जन्म कुंडली दिखाकर विवाह में बाधक ग्रह या दोष को ज्ञात कर उसका निवारण करें।
ज्योतिषीय दृष्टि से जब विवाह योग बनते हैं, तब विवाह टलने से विवाह में बहुत देरी हो जाती है। वे विवाह को लेकर अत्यंत चिंतित हो जाते हैं। 
वैसे विवाह में देरी होने का एक कारण बच्चों का मांगलिक होना भी होता है।
इनके विवाह के योग 27, 29, 31, 33, 35 व 37वें वर्ष में बनते हैं। 
जिन युवक-युवतियों के विवाह में विलंब हो जाता है, तो उनके ग्रहों की दशा ज्ञात कर, विवाह के योग कब बनते हैं, जान सकते हैं। 
जिस वर्ष शनि और गुरु दोनों सप्तम भाव या लग्न को देखते हों, तब विवाह के योग बनते हैं। सप्तमेश की महादशा-अंतर्दशा या शुक्र-गुरु की महादशा-अंतर्दशा में विवाह का प्रबल योग बनता है। 
सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश के साथ बैठे ग्रह की महादशा-अंतर्दशा में विवाह संभव है। 
अन्य योग निम्नानुसार हैं- -----
(1) लग्नेश, जब गोचर में सप्तम भाव की राशि में आए। 
(2) जब शुक्र और सप्तमेश एक साथ हो, तो सप्तमेश की दशा-अंतर्दशा में। 
(3) लग्न, चंद्र लग्न एवं शुक्र लग्न की कुंडली में सप्तमेश की दशा-अंतर्दशा में।
(4) शुक्र एवं चंद्र में जो भी बली हो, चंद्र राशि की संख्या, अष्टमेश की संख्या जोड़ने पर जो राशि आए, उसमें गोचर गुरु आने पर। 
(5) लग्नेश-सप्तमेश की स्पष्ट राशि आदि के योग के तुल्य राशि में जब गोचर गुरु आए। 
(6) दशमेश की महादशा और अष्टमेश के अंतर में। 
(7) सप्तमेश-शुक्र ग्रह में जब गोचर में चंद्र गुरु आए। 
(8) द्वितीयेश जिस राशि में हो, उस ग्रह की दशा-अंतर्दशा में।
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विवाह में बाधक योग-----
जन्म कुंडली में 6, 8, 12 स्थानों को अशुभ माना जाता है। मंगल, शनि, राहु-केतु और सूर्य को क्रूर ग्रह माना है। इनके अशुभ स्थिति में होने पर दांपत्य सुख में कमी आती है।
-सप्तमाधिपति द्वादश भाव में हो और राहू लग्न में हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा होना संभव है।
-सप्तम भावस्थ राहू युक्त द्वादशाधिपति से वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है। द्वादशस्थ सप्तमाधिपति और सप्तमस्थ द्वादशाधिपति से यदि राहू की युति हो तो दांपत्य सुख में कमी के साथ ही अलगाव भी उत्पन्न हो सकता है।
-लग्न में स्थित शनि-राहू भी दांपत्य सुख में कमी करते हैं।
-सप्तमेश छठे, अष्टम या द्वादश भाव में हो, तो वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है।
-षष्ठेश का संबंध यदि द्वितीय, सप्तम भाव, द्वितीयाधिपति, सप्तमाधिपति अथवा शुक्र से हो, तो दांपत्य जीवन का आनंद बाधित होता है।
-छठा भाव न्यायालय का भाव भी है। सप्तमेश षष्ठेश के साथ छठे भाव में हो या षष्ठेश, सप्तमेश या शुक्र की युति हो, तो पति-पत्नी में न्यायिक संघर्ष होना भी संभव है।
-यदि विवाह से पूर्व कुंडली मिलान करके उपरोक्त दोषों का निवारण करने के बाद ही विवाह किया गया हो, तो दांपत्य सुख में कमी नहीं होती है। किसी की कुंडली में कौन सा ग्रह दांपत्य सुख में कमी ला रहा है। इसके लिए किसी विशेषज्ञ की सलाह लें।
विवाह योग के लिये जो कारक मुख्य है वे इस प्रकार हैं-
सप्तम भाव का स्वामी खराब है या सही है वह अपने भाव में बैठ कर या किसी अन्य स्थान पर बैठ कर अपने भाव को देख रहा है।
सप्तम भाव पर किसी अन्य पाप ग्रह की द्रिष्टि नही है।
कोई पाप ग्रह सप्तम में बैठा नही है।
यदि सप्तम भाव में सम राशि है।
सप्तमेश और शुक्र सम राशि में है।
सप्तमेश बली है।
सप्तम में कोई ग्रह नही है।
किसी पाप ग्रह की द्रिष्टि सप्तम भाव और सप्तमेश पर नही है।
दूसरे सातवें बारहवें भाव के स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हैं,और गुरु से द्रिष्ट है।
सप्तमेश की स्थिति के आगे के भाव में या सातवें भाव में कोई क्रूर ग्रह नही है।
विवाह नही होगा अगर-----
सप्तमेश शुभ स्थान पर नही है।
सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त होकर बैठा है।
सप्तमेश नीच राशि में है।
सप्तमेश बारहवें भाव में है,और लगनेश या राशिपति सप्तम में बैठा है।
चन्द्र शुक्र साथ हों,उनसे सप्तम में मंगल और शनि विराजमान हों।
शुक्र और मंगल दोनों सप्तम में हों।
शुक्र मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में हों।
शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ हो और पंचम या नवें भाव में हो।
शुक्र बुध शनि तीनो ही नीच हों।
पंचम में चन्द्र हो,सातवें या बारहवें भाव में दो या दो से अधिक पापग्रह हों।
सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर का हो।

विवाह में देरी----
सप्तम में बुध और शुक्र दोनो के होने पर विवाह वादे चलते रहते है,विवाह आधी उम्र में होता है।
चौथा या लगन भाव मंगल (बाल्यावस्था) से युक्त हो,सप्तम में शनि हो तो कन्या की रुचि शादी में नही होती है।
सप्तम में शनि और गुरु शादी देर से करवाते हैं।
चन्द्रमा से सप्तम में गुरु शादी देर से करवाता है,यही बात चन्द्रमा की राशि कर्क से भी माना जाता है।
सप्तम में त्रिक भाव का स्वामी हो,कोई शुभ ग्रह योगकारक नही हो,तो पुरुष विवाह में देरी होती है।
सूर्य मंगल बुध लगन या राशिपति को देखता हो,और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो आध्यात्मिकता अधिक होने से विवाह में देरी होती है।
लगन में सप्तम में और बारहवें भाव में गुरु या शुभ ग्रह योग कारक नही हों,परिवार भाव में चन्द्रमा कमजोर हो तो विवाह नही होता है,अगर हो भी जावे तो संतान नही होती है।
महिला की कुन्डली में सप्तमेश या सप्तम शनि से पीडित हो तो विवाह देर से होता है।
राहु की दशा में शादी हो,या राहु सप्तम को पीडित कर रहा हो,तो शादी होकर टूट जाती है,यह सब दिमागी भ्रम के कारण होता है।
विवाह का समय-----
सप्तम या सप्तम से सम्बन्ध रखने वाले ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा में विवाह होता है।
कन्या की कुन्डली में शुक्र से सप्तम और पुरुष की कुन्डली में गुरु से सप्तम की दशा में या अन्तर्दशा में विवाह होता है।
सप्तमेश की महादशा में पुरुष के प्रति शुक्र या चन्द्र की अन्तर्दशा में और स्त्री के प्रति गुरु या मंगल की अन्तर्दशा में विवाह होता है।

सप्तमेश जिस राशि में हो,उस राशि के स्वामी के त्रिकोण में गुरु के आने पर विवाह होता है।
गुरु गोचर से सप्तम में या लगन में या चन्द्र राशि में या चन्द्र राशि के सप्तम में आये तो विवाह होता है।
गुरु का गोचर जब सप्तमेश और लगनेश की स्पष्ट राशि के जोड में आये तो विवाह होता है।
सप्तमेश जब गोचर से शुक्र की राशि में आये और गुरु से सम्बन्ध बना ले तो विवाह या शारीरिक सम्बन्ध बनता है।
सप्तमेश और गुरु का त्रिकोणात्मक सम्पर्क गोचर से शादी करवा देता है,या प्यार प्रेम चालू हो जाता है।

चन्द्रमा मन का कारक है,और वह जब बलवान होकर सप्तम भाव या सप्तमेश से सम्बन्ध रखता हो तो चौबीसवें साल तक विवाह करवा ही देता है।
दाम्पत्य/वैवाहिक  सुख के उपाय----

१॰ यदि जन्म कुण्डली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, द्वादश स्थान स्थित मंगल होने से जातक को मंगली योग होता है इस योग के होने से जातक के विवाह में विलम्ब, विवाहोपरान्त पति-पत्नी में कलह, पति या पत्नी के स्वास्थ्य में क्षीणता, तलाक एवं क्रूर मंगली होने पर जीवन साथी की मृत्यु तक हो सकती है। अतः जातक मंगल व्रत। मंगल मंत्र का जप, घट विवाह आदि करें।
२॰ सप्तम गत शनि स्थित होने से विवाह बाधक होते है। अतः “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मन्त्र का जप ७६००० एवं ७६०० हवन शमी की लकड़ी, घृत, मधु एवं मिश्री से करवा दें।
३॰ राहु या केतु होने से विवाह में बाधा या विवाहोपरान्त कलह होता है। यदि राहु के सप्तम स्थान में हो, तो राहु मन्त्र “ॐ रां राहवे नमः” का ७२००० जप तथा दूर्वा, घृत, मधु व मिश्री से दशांश हवन करवा दें। केतु स्थित हो, तो केतु मन्त्र “ॐ कें केतवे नमः” का २८००० जप तथा कुश, घृत, मधु व मिश्री से दशांश हवन करवा दें।
४॰ सप्तम भावगत सूर्य स्थित होने से पति-पत्नी में अलगाव एवं तलाक पैदा करता है। अतः जातक आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ रविवार से प्रारम्भ करके प्रत्येक दिन करे तथा रविवार कप नमक रहित भोजन करें। सूर्य को प्रतिदिन जल में लाल चन्दन, लाल फूल, अक्षत मिलाकर तीन बार अर्ध्य दें।
५॰ जिस जातक को किसी भी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो नवरात्री में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक ४४००० जप निम्न मन्त्र का दुर्गा जी की मूर्ति या चित्र के सम्मुख करें।
“ॐ पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम्।।”
६॰ किसी स्त्री जातिका को अगर किसी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो श्रावण कृष्ण सोमवार से या नवरात्री में गौरी-पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जप करना चाहिए-
“हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकर प्रिया।
तथा मां कुरु कल्याणी कान्त कान्तां सुदुर्लभाम।।”
७॰ किसी लड़की के विवाह मे विलम्ब होता है तो नवरात्री के प्रथम दिन शुद्ध प्रतिष्ठित कात्यायनि यन्त्र एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर स्थापित करें एवं यन्त्र का पंचोपचार से पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जइ लड़की स्वयं या किसी सुयोग्य पंडित से करवा सकते हैं।
“कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोप सुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः।।”
८॰ जन्म कुण्डली में सूर्य, शनि, मंगल, राहु एवं केतु आदि पाप ग्रहों के कारण विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो गौरी-शंकर रुद्राक्ष शुद्ध एवं प्राण-प्रतिष्ठित करवा कर निम्न मन्त्र का १००८ बार जप करके पीले धागे के साथ धारण करना चाहिए। गौरी-शंकर रुद्राक्ष सिर्फ जल्द विवाह ही नहीं करता बल्कि विवाहोपरान्त पति-पत्नी के बीच सुखमय स्थिति भी प्रदान करता है।
“ॐ सुभगामै च विद्महे काममालायै धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात्।।”
९॰ “ॐ गौरी आवे शिव जी व्याहवे (अपना नाम) को विवाह तुरन्त सिद्ध करे, देर न करै, देर होय तो शिव जी का त्रिशूल पड़े। गुरु गोरखनाथ की दुहाई।।”
उक्त मन्त्र की ११ दिन तक लगातार १ माला रोज जप करें। दीपक और धूप जलाकर ११वें दिन एक मिट्टी के कुल्हड़ का मुंह लाल कपड़े में बांध दें। उस कुल्हड़ पर बाहर की तरफ ७ रोली की बिंदी बनाकर अपने आगे रखें और ऊपर दिये गये मन्त्र की ५ माला जप करें। चुपचाप कुल्हड़ को रात के समय किसी चौराहे पर रख आवें। पीछे मुड़कर न देखें। सारी रुकावट दूर होकर शीघ्र विवाह हो जाता है।
१०॰ जिस लड़की के विवाह में बाधा हो उसे मकान के वायव्य दिशा में सोना चाहिए।
११॰ लड़की के पिता जब जब लड़के वाले के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें तो लड़की अपनी चोटी खुली रखे। जब तक पिता लौटकर घर न आ जाए तब तक चोटी नहीं बाँधनी चाहिए।
१२॰ लड़की गुरुवार को अपने तकिए के नीचे हल्दी की गांठ पीले वस्त्र में लपेट कर रखे।
१३॰ पीपल की जड़ में लगातार १३ दिन लड़की या लड़का जल चढ़ाए तो शादी की रुकावट दूर हो जाती है।
१४॰ विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब हो और जातिकाएँ अपने अहं के कारण अनेल युवकों की स्वीकृति के बाद भी उन्हें अस्वीकार करती रहें तो उसे निम्न मन्त्र का १०८ बार जप प्रत्येक दिन किसी शुभ मुहूर्त्त से प्रारम्भ करके करना चाहिए।
“सिन्दूरपत्रं रजिकामदेहं दिव्ताम्बरं सिन्धुसमोहितांगम् सान्ध्यारुणं धनुः पंकजपुष्पबाणं पंचायुधं भुवन मोहन मोक्षणार्थम क्लैं मन्यथाम।
महाविष्णुस्वरुपाय महाविष्णु पुत्राय महापुरुषाय पतिसुखं मे शीघ्रं देहि देहि।।”
१५॰ किसी भी लड़के या लड़की को विवाह में बाधा आ रही हो यो विघ्नकर्ता गणेशजी की उपासना किसी भी चतुर्थी से प्रारम्भ करके अगले चतुर्थी तक एक मास करना चाहिए। इसके लिए स्फटिक, पारद या पीतल से बने गणेशजी की मूर्ति प्राण-प्रतिष्टित, कांसा की थाली में पश्चिमाभिमुख स्थापित करके स्वयं पूर्व की ओर मुँह करके जल, चन्दन, अक्षत, फूल, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा करके १०८ बार “ॐ गं गणेशाय नमः” मन्त्र पढ़ते हुए गणेश जी पर १०८ दूर्वा चढ़ायें एवं नैवेद्य में मोतीचूर के दो लड्डू चढ़ायें। पूजा के बाद लड्डू बच्चों में बांट दें।
यह प्रयोग एक मास करना चाहिए। गणेशजी पर चढ़ये गये दूर्वा लड़की के पिता अपने जेब में दायीं तरफ लेकर लड़के के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें।
१६॰ तुलसी के पौधे की १२ परिक्रमायें तथा अनन्तर दाहिने हाथ से दुग्ध और बायें हाथ से जलधारा तथा सूर्य को बारह बार इस मन्त्र से अर्ध्य दें- “ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्त्र किरणाय मम वांछित देहि-देहि स्वाहा।”
फिर इस मन्त्र का १०८ बार जप करें-
“ॐ देवेन्द्राणि नमस्तुभ्यं देवेन्द्र प्रिय यामिनि। विवाहं भाग्यमारोग्यं शीघ्रलाभं च देहि मे।”
१७॰ गुरुवार का व्रत करें एवं बृहस्पति मन्त्र के पाठ की एक माला आवृत्ति केला के पेड़ के नीचे बैठकर करें।
१८॰ कन्या का विवाह हो चुका हो और वह विदा हो रही हो तो एक लोटे में गंगाजल, थोड़ी-सी हल्दी, एक सिक्का डाल कर लड़की के सिर के ऊपर ७ बार घुमाकर उसके आगे फेंक दें। उसका वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा।
१९॰ जो माता-पिता यह सोचते हैं कि उनकी पुत्रवधु सुन्दर, सुशील एवं होशियार हो तो उसके लिए वीरवार एवं रविवार के दिन अपने पुत्र के नाखून काटकर रसोई की आग में जला दें।
२०॰ विवाह में बाधाएँ आ रही हो तो गुरुवार से प्रारम्भ कर २१ दिन तक प्रतिदिन निम्न मन्त्र का जप १०८ बार करें-
“मरवानो हाथी जर्द अम्बारी। उस पर बैठी कमाल खां की सवारी। कमाल खां मुगल पठान। बैठ चबूतरे पढ़े कुरान। हजार काम दुनिया का करे एक काम मेरा कर। न करे तो तीन लाख पैंतीस हजार पैगम्बरों की दुहाई।”
२१॰ किसी भी शुक्रवार की रात्रि में स्नान के बाद १०८ बार स्फटिक माला से निम्न मन्त्र का जप करें-
“ॐ ऐं ऐ विवाह बाधा निवारणाय क्रीं क्रीं ॐ फट्।”
२२॰ लड़के के शीघ्र विवाह के लिए शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को ७० ग्राम अरवा चावल, ७० सेमी॰ सफेद वस्त्र, ७ मिश्री के टुकड़े, ७ सफेद फूल, ७ छोटी इलायची, ७ सिक्के, ७ श्रीखंड चंदन की टुकड़ी, ७ जनेऊ। इन सबको सफेद वस्त्र में बांधकर विवाहेच्छु व्यक्ति घर के किसी सुरक्षित स्थान में शुक्रवार प्रातः स्नान करके इष्टदेव का ध्यान करके तथा मनोकामना कहकर पोटली को ऐसे स्थान पर रखें जहाँ किसी की दृष्टि न पड़े। यह पोटली ९० दिन तक रखें।
२३॰ लड़की के शीघ्र विवाह के लिए ७० ग्राम चने की दाल, ७० से॰मी॰ पीला वस्त्र, ७ पीले रंग में रंगा सिक्का, ७ सुपारी पीला रंग में रंगी, ७ गुड़ की डली, ७ पीले फूल, ७ हल्दी गांठ, ७ पीला जनेऊ- इन सबको पीले वस्त्र में बांधकर विवाहेच्छु जातिका घर के किसी सुरक्षित स्थान में गुरुवार प्रातः स्नान करके इष्टदेव का ध्यान करके तथा मनोकामना कहकर पोटली को ऐसे स्थान पर रखें जहाँ किसी की दृष्टि न पड़े। यह पोटली ९० दिन तक रखें।
२४॰ श्रेष्ठ वर की प्राप्ति के लिए बालकाण्ड का पाठ करे।

वास्तु दोष तो नहीं हें कारण आपके विवाह में देरी/बाधा का...????


आजकल अनेक अभिभावक  अपने बच्चों की शादी./ विवाह  को लेकर बहुत परेशान/चिंतित रहते हें और पंडितों तथा ज्योतिर्विदों  के पास जाकर परामर्श/सलाह लेते रहते हें...किन्तु क्या कभी आपने सोचा की विवाह में विलंब के कई कारण हो सकते हैं.??? इनमे से एक मुख्य कारण वास्तु दोष भी हो सकता है। यदि आप भी अपनी संतान के विवाह बाधा / देरी की वजह  से चिंतित हैं तो इन वास्तु दोषों पर विचार करें-
1- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें  उनको  उत्तर या उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित कमरे में रहना चाहिए। इससे विवाह के लिए रिश्ते आने लगते हैं।उस कमरे में उन्हें सोते समय अपना सर हमेशा पूर्व दिशा में रखना चाहिए...
2- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें  को ऐसे कक्ष में नहीं रहना चाहिए जो अधूरा बना हुआ हो अथवा जिस कक्ष में बीम लटका हुआ दिखाई देता हो।
3- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें तो उनके शयन कक्ष/ कमरे एवं दरवाजा का रंग गुलाबी, हल्का पीला, सफेद(चमकीला) होना चाहिए।
4- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें तो उन्हें विवाह के लिए अपने  कमरे में पूर्वोत्तर दिशा में पानी का फव्वारा रखना चाहिए।
5- कई बार ऐसा भी होता की कोई युवक या युवती विवाह के लिए तैयार/राजी नहीं होते हें हो तो उसके कक्ष के उत्तर दिशा की ओर क्रिस्टल बॉल कांच की प्लेट अथवा प्याली में रखनी चाहिए।


आपको लगाने वाली चोट का कारण हें शनि देव..आइये जाने---

हमारी छोटी-छोटी लापरवाहियों या किसी और की गलती के कारण हमें चोट लग जाती है। वैसे तो यह एक बहुत सामान्य सी बात है लेकिन इस प्रकार की चोट यदि लौहे से लगती है तो ये बात गंभीर हो जाती है। ज्योतिष आंकलन के अनुसार लौहे से चोट लगने के पीछे शनि देव/गृह का प्रभाव होता है।
शनिदेव सभी नौ ग्रहों में विशेष स्थान रखते हैं क्योंकि इन्हें न्यायाधिश का पद प्राप्त है। शनि महाराज ही व्यक्ति के सभी अच्छे-बुरे कर्मों का फल प्रदान करते हैं। साढ़ेसाती और ढैय्या के काल में शनि राशि विशेष के लोगों को उनके कर्मों का फल देते हैं। यदि किसी व्यक्ति ने जाने-अनजाने कोई गलत कार्य किया है तो शनि उसे वैसी ही सजा देते हैं। इसी वजह से इन्हें क्रूर ग्रह भी माना जाता है।
यदि आपको बार-बार लौहे की वस्तुओं से चोट लगती रहती है तो ध्यान रखें ज्योतिष के अनुसार यह गंभीर बात है। इसका सीधा इशारा यही है आपसे जाने-अनजाने कोई गलती हो गई है। ऐसे में लौहे से चोट लगाने के पीछे शनि का ही प्रभाव बताया जाता है। चूंकि लौहा शनि की प्रिय धातु है अत: इससे हमें किसी प्रकार का नुकसान होना शनि के नाराज होने की सूचना मात्र समझना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के साथ ऐसा बार-बार होता है तो उसे शनि के निमित्त विशेष पूजन आदि कार्य किया जाना चाहिए। प्रति शनिवार तेल का दान करें और भगवान शनि के दर्शन करें। कार्यों में पूरी तरह सावधानी रखें।

वास्तु दोष तो नहीं हें कारण आपके विवाह में देरी/बाधा का...????


आजकल अनेक अभिभावक  अपने बच्चों की शादी./ विवाह  को लेकर बहुत परेशान/चिंतित रहते हें और पंडितों तथा ज्योतिर्विदों  के पास जाकर परामर्श/सलाह लेते रहते हें...किन्तु क्या कभी आपने सोचा की विवाह में विलंब के कई कारण हो सकते हैं.??? इनमे से एक मुख्य कारण वास्तु दोष भी हो सकता है। यदि आप भी अपनी संतान के विवाह बाधा / देरी की वजह  से चिंतित हैं तो इन वास्तु दोषों पर विचार करें-
1- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें  उनको  उत्तर या उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित कमरे में रहना चाहिए। इससे विवाह के लिए रिश्ते आने लगते हैं।उस कमरे में उन्हें सोते समय अपना सर हमेशा पूर्व दिशा में रखना चाहिए...
2- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें  को ऐसे कक्ष में नहीं रहना चाहिए जो अधूरा बना हुआ हो अथवा जिस कक्ष में बीम लटका हुआ दिखाई देता हो।
3- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें तो उनके शयन कक्ष/ कमरे एवं दरवाजा का रंग गुलाबी, हल्का पीला, सफेद(चमकीला) होना चाहिए।
4- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें तो उन्हें विवाह के लिए अपने  कमरे में पूर्वोत्तर दिशा में पानी का फव्वारा रखना चाहिए।
5- कई बार ऐसा भी होता की कोई युवक या युवती विवाह के लिए तैयार/राजी नहीं होते हें हो तो उसके कक्ष के उत्तर दिशा की ओर क्रिस्टल बॉल कांच की प्लेट अथवा प्याली में रखनी चाहिए।

घर के मंदिर का बल्ब देता हें नुकसान/हानि---

आजकल बहुत से लोग घरों या दुकानों में छोटा-सा मंदिर बनाकर उसमें गणेश जी या लक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित कर देते हैं, वहां घी का दीपक जलाने की बजाय बिजली का बल्व लगा देते हैं। 
यदि आपने भी गणेश जी के स्थान में बिजली का लाल बल्ब जला रखा है तो इसे उतार दें। 
यह शुभदायक नहीं है, इससे आपके खाते में हानि के लाल अंक ही आएंगे। अतः घर के मंदिर में कभी भी बिजली के बल्व का इस्तेमाल न करें। 
कहते मंदिर जाने से मन को शांति मिलती है। मंदिर वो स्थान है जहां से व्यक्ति को आत्मिक शांति के साथ ही सुख-समृद्धि भी मिलती है। लेकिन वास्तु के अनुसार घर के आसपास मंदिर का होना शुभ नहीं माना जाता है। ऐसे मंदिर आपका घर बिगाड़ सकते हैं। आपको ऐसे मंदिरों में नहीं जाना चाहिए जो आपके घर के पास है। अगर आप ऐसे मंदिरों में पूजा करते हैं तो उन मंदिरों के प्रभाव से आपका घर बिगड़ सकता है। आपकी पूजा पाठ का अशुभ फल आपके घर पडऩे लगता है।
वास्तु शास्त्रियों का यह मानना है। घर के मुख्य द्वार के सामने मंदिर या अन्य कोई धार्मिक स्थल नहीं होना चाहिए। ऐसा होने पर घर के वास्तु पर इसका असर पड़ता है। इसलिए आप ऐसे मंदिरो को अनदेखा करें जो आपके घर के पास या सामने हो।
पूजाघर भौतिक सुखों की प्राप्ति के साथ-साथ पारलौकिक सुखों एवं आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति का साधन हैं। यह वह कक्ष हैं, जिसमें विश्व का संचालक (ईश्वर) निवास करता हैं। अतः इसका निर्माण एवं इसकी साज सज्जा वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों के अनुसार करनी चाहिए। कई बार वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों का हम उल्लंघन करते हैं और अपनी सुविधानुसार पूजा घर बना लेते हैं। वास्तुसम्मत सिद्धान्तों के विपरीत पूजाघर मुसीबतों का कारण बन सकता है। 
  • - घर के मेन गेट के ठीक सामने अगर कोई मंदिर होता है तो घर के मालिक के लिए ये मंदिर अशुभ फल देने वाला ही रहेगा। 

  • - जिस भूखंड या मकान पर मंदिर की छाया पड़ती है, वहाँ रहने वाले लोगों की आर्थिक स्थिति दिनों दिन बिगड़ती जाती है।

  • - किसी मकान पर मंदिर के शिखर की छाया पडऩा वास्तु के अनुसार अशुभ ही माना जाता है जिस मकान पर मंदिर के  शिखर की छाया पड़ती है वहां रहने वाले लोग कर्ज में डुबते चले जाते हैं।

  • - अगर आपके घर के दाहिनी और मंदिर है तो उस मंदिर के प्रभाव से घर में के मालिक की तबियत अक्सर खराब ही रहेगी।

  • - मकान के बाई तरफ का मंदिर आपका मकान खाली करवा सकता है।

  • - अगर घर के नजदीक  पडऩे वाले मंदिरों के साथ बैर, बबुल के वृक्ष भी हो तो आपके घर में कलह बना रहेगा । 

  • - मंदिर के पास आधा जला हुआ, आधा सूखा, ठूंठ के जैसा पेड़, तीन शिरों या अनेक शिरों वाला पेड़ होना भी आपके लिए अशुभ होता है।

  • - इमली व मेंहदी पर बुरी आत्माओं का वास माना जाता है। घर के आसपास या मंदिर के आसपास होने वाले ये पेड़ शुभ नहीं माने जाते है।
ईशान कोण में कूड़ा न हो-----
ईशान कोण क्योंकि ईश्वर का स्थान है, आप कहीं इस कोण में अपने घर का कूड़ा करकट तो जमा नहीं कर रहे हैं। अगर ऐसा तो यह आपके लिए शुभदायक नहीं हैं। इससे घर में परेशानी आती रहती है। साथ ही इस कोण में भार वाहन की क्षमता बिलकुल नहीं होती है, कहीं आप अपने घर का भारी समान ईशान कोण में तो नहीं रखे हुए हैं? अगर ऐसा है तो उसे हटा दें। जहां तक हो सके आवास के न सिर्फ अंदर बल्कि बाहर भी ईशान कोण को खाली रखें तथा साफ रखें। 

ऊंचा हो घर का दक्षिणि भाग---
आपके घर के मुख्यद्वार के सामने कोई द्वार वेध तो नहीं है? ऐसा कोई वेध हो, तो तुरंत उसे दूर करें। भूखंड का दक्षिणी भाग कहीं उत्तर के भाग से नीचा तो नहीं है? दक्षिणी भाग हमेशा उत्तर से ऊंचा होना चाहिए।

नैऋर्त्य और ईशान कोण----
कहीं आपका नैऋर्त्य कोण का भाग ईशान कोण के भाग से नीचा तो नहीं है। क्योंकि वास्तु सिद्धांत के अनुसार नैऋर्त्य कोण का भाग ईशान से ऊंचा उठा हुआ होना ही शुभप्रद कहा गया है। कहीं आपके भवन अथवा जमीन का ईशान कोण अन्य कोणों से दबा हुआ तो नहीं है? ईशान कोण का भाग बढ़ा हुआ हो, तो सर्व सिद्धि एवं सुखों का दाता है, परंतु दबा हुआ होना कष्टकारक है। 

हो सकती है अचानक मृत्यु----
पश्चिम में सिर करके सोने से प्रबल चिंता और हानि होती है, जबकि उत्तर में सिर करके सोने से अचानक मृत्यु की आशंका बनी रहती है। अतः सोने के समय केवल पूर्व तथा दक्षिण की तरफ सिर करके सोना चाहिए।

तनाव लाता है बीम----
आप जहां व्यापार करने बैठते हैं अथवा आप पूजा पाठ करते हैं, उसके ऊपर कोई बीम तो नहीं हैं? अगर ऐसा है, तो आप अपने बैठने का स्थान बदल लें। क्योंकि बीम के नीचे बैठ कर काम करने से मानसिक तनाव होता है। बीम स्वयं ही तनाव में है, वह अपने तनाव से ही भवन का भार वहन करता है। अतः ठीक बीम के नीचे बैठ कर कोई भी कार्य नहीं करें। 

ध्यान दे निकास पर----
घर से निकलते समय आपका मुख किसी दिशा में होता है? कहीं दक्षिण की तरफ मुंह करके तो आप नहीं निकलते? इससे अनावश्यक परेशानी एंव हानि होती है। बहु मंजिले भवनों में इसका अर्थ प्रधान प्रवेशद्वार से होता है।

यथासंभव घर में पूजा के लिए पूजाघर का निर्माण पृथक से कराना चाहिए । यदि पूजा हेतु पृथक कक्ष का निर्माण स्थानाभाव के कारण संभव न हो, तो भी पूजा का स्थान एक निश्चित जगह को ही बनाना चाहिए तथा भगवान की तस्वीर, मूर्ति एवं अन्य पूजा संबंधी सामग्री को रखने के लिए पृथक से एक अलमारी अथवा ऊॅचे स्थान का निर्माण करवाना चाहिए । जिस स्थान पर बैठकर पूजा की जाए, वह भी भूमि से कुछ ऊँचा होना चाहिए तथा बिना आसन बिछाए पूजा नहीं करनी चाहिए । पूजाघर के लिए सर्वाधिक उपर्युक्त दिशा ईशान कोण होती हैं । अर्थात पूर्वोत्तर दिशा में पूजाघर बनाना चाहिए । 
यदि पूजाघर गलत दिशा में बना हुआ हैं तो पूजा का अभीष्ट फल प्राप्त नहीं होता हैं फिर भी ऐसे पूजाघर में उत्तर अथवा पूर्वोत्तर दिशा में भगवान की मूर्तियाॅ या चित्र आदि रखने चाहिए । पूजाघर की देहरी को कुछ ऊँचा बनाना चाहिए । पूजाघर में प्रातःकाल सूर्य का प्रकाश आने की व्यवस्था बनानी चाहिए । पूजाघर में वायु के प्रवाह को संतुलित बनाने के लिए कोई खिड़की अथवा रोशनदान भी होनी चाहिए । पूजाघर के द्वार पर मांगलिक चिन्ह, (स्वास्तीक, ऊँ,) आदि स्थापित करने चाहिए । ब्रह्मा, विष्णु, महेश या सूर्य की मूर्तियों का मुख पूर्व या पश्चिम में होना चाहिए । गणपति एवं दुर्गा की मूर्तियों का मुख दक्षिण में होना उत्तम होता हैं । काली माॅ की मूर्ति का मुख दक्षिण में होना शुभ माना गया हैं । हनुमान जी की मूर्ति का मुख दक्षिण पश्चिम में होना शुभ फलदायक हैं । पूजा घर में श्रीयंत्र, गणेश यंत्र या कुबेर यंत्र रखना शुभ हैं । 
पूजाघर के समीप शौचालय नहीं होना चाहिए । इससे प्रबल वास्तुदोष उत्पन्न होता हैं । यदि पूजाघर के नजदीक शौचालय हो, तो शौचालय का द्वार इस प्रकार बनाना चाहिए कि पूजाकक्ष के द्वार से अथवा पूजाकक्ष में बैठकर वह दिखाई न दे । पूजाघर का दरवाजा लम्बे समय तक बंद नहीं रखना चाहिए । यदि पूजाघर में नियमित रूप से पूजा नहीं की जाए तो वहाॅ के निवासियों को दोषकारक परिणाम प्राप्त होते हैं । पूजाघर में गंदगी एवं आसपास के वातावरण में शौरगुल हो तो ऐसा पूजाकक्ष भी दोषयुक्त होता हैं चाहे वह वास्तुसम्मत ही क्यों न बना हो क्यांेकि ऐसे स्थान पर आकाश तत्व एवं वायु तत्व प्रदूषित हो जाते हैं जिसके कारण इस पूजा कक्ष में बैठकर पूजन करने वाले व्यक्तियों की एकाग्रता भंग होती हैं तथा पूजा का शुभ फला प्राप्त नहीं होता । पूजाघर गलत दिशा में बना हुआ होने पर भी यदि वहां का वातावरण स्वच्छ एवं शांतिपूर्ण होगा तो उस स्थान का वास्तुदोष प्रभाव स्वयं ही घट जाएगा । 
इस प्रकार बिना तोड़-फोड़ के उपर्युक्त उपायो के आधार पर पूजाकक्ष के वास्तुदोष दूर कर समृद्धि एवं खुशहाली पुनः प्राप्त की जा सकती हैं । 

क्या हें ज्योतिष शास्त्र के फलादेश का वैज्ञानिक आधार ?????


बहुत से वैज्ञानिक इस आधार पर इसे विज्ञान मानने से इनकार करते हैं कि भौतिक विज्ञान में सिद्धान्तजों एवं नियमों के आधार पर जब किसी चीज का परीक्षण किया जाता है तब एक बार जो परिणाम मिलता है वहीं परिणाम दूसरी बार परीक्षण करने पर भी प्राप्त होता है, परन्तु ज्योतिष शास्त्र में ऐसा नहीं होता है। ज्योतिष गणना में जो परिणाम एक बार आता है दूसरे ज्योतिष शास्त्री जब उसी सिद्धान्त पर फलादेश करते हैं तो फलादेश अलग आता है।
ज्योतिष शास्त्र बहुत ही गूढ और जटिल विज्ञान है इसलिए इसके सिद्धांतो एवं नियमों का पालन बहुत ही सावधानी से करना होता है। इसमें असावधानी होने पर ही इस प्रकार की सिथति पैदा हो सकता है। दूसरी तरफ ज्योतिष शास्त्र के बहुत से नियम कालान्तर में गुम हो गये हैं जिसके कारण भी भविष्य कथन में कुछ परेशानी और अन्तर हो सकता है अगर उपलब्ध नियमों एवं सिद्धान्तों को सूक्ष्मता से देखकर भविष्य कथन किया जाय तो परिणाम में अन्तर आना सम्भव नहीं है। दूसरी और भविष्य कथन का रूप अलग हो सकता है यह सम्भव है परन्तु परिणाम में समानता से इनकार नहीं किया जा सकता। अत: जो अनिशिचत फलादेश की बात कह कर ज्योतिष शास्त्र को विज्ञान मानने से इनकार करते हैं उन्हें सही नहीं कहा जा सकता।
निष्कर्ष के तौर पर देखें तो ज्योतिष शास्त्र विज्ञान कहलाने का अधिकार रखता है यह उस कसौटी पर खड़ा उतरता है जहाँ से किसी भी शास्त्र विषय को विज्ञान की संख्या प्राप्त होती है। इसे अंधविश्वास या भ्रम कहने वाले अगर साफ मन से इस विषय का अध्ययन करें तो वे इसे विज्ञान मानने से इनकार नहीं कर सकते।
पिछली दो शताब्दियों में किसी भी वस्तु, विषय या सिध्दांतों को भौतिकतावादी आधुनिक विज्ञान के कसौटी पर परखने का एक ऐसा सिलसिला प्रारंभ हुआ जिसने अनेकानेक आधारहीन अंधविश्वासों की धज्जियां उड़ाने के म में कुछ अति महत्वपूर्ण विषयों व आस्थाओं को भी संदेह
के कटघरे में खड़ा कर दिया। उसे लोग विज्ञान की नयी रोशनी कहकर संबोधित करने लगे। उसमें संसार की हर वस्तु व विषय का नये तरीके से आकलन व मूल्यांकन किया जाने लगा। उस मूल्यांकन में ज्योतिष को संभवत सबसे अधिक तिरस्कृत व उपेक्षित विषय साबित करने की चेष्टा की गयी है। यही वजह है कि अपने आपको अत्याधुनिक व वैज्ञानिक विचारों का पोषक दिखाने के फैशन में अधिकांश लोग इस गूढ़ विद्या को मूर्खता व अंधविश्वास का पर्याय भी समझने लगे।
लेकिन यह भी एक तथ्य है कि ज्योतिष एक ऐसा विषय है जिससे प्राचीन कोई और विषय नहीं। इतिहास गवाह है कि ऐसा कोई भी समय नहीं था जब ज्योतिष का अस्तित्व नहीं था। आधुनिक विज्ञान के कसौटी पर भी इस बात की पुष्टि हो जाती है। क्योंकि ईसा से भी 25 हजार वर्ष पूर्व की कुछ ऐसी अस्थियां मिली हैं जिन पर सूर्यादि ग्रहों के ज्योतिषीय चिह्नों का अंकन पाया गया है।
प्रसन्नता की बात है कि आज जैसे -जैसे आधुनिक विज्ञान का विकास हो रहा है, उसकी पिछली धारणाओं का नयी धारणाओं से अपने आप खंडन होता जा रहा है। फलस्वरूप आज नौबत यहां तक आ पहुंची है कि वैज्ञानिकों का भी एक बड़ा वर्ग ज्योतिष को विज्ञान का दर्जा दिये जाने का पक्षधर बनता जा रहा है।

अध्यातिमक क्षेत्र मनिदर गुरूद्वारा इत्यादि से जुड़े हुए अधिकतर सन्त ज्योतिष विधाा के प्रति नकारात्मक दृषिटकोण रखते हैं। आश्चर्य तो इस बात से होता है कि उन सन्त महापुरूषों वेद-पुराणों में पूर्ण आस्था एवं विश्वास होता है परन्तु वेदों के नेत्र माने जाने वाले ज्योतिष का अपनी बुद्धि के अनुसार खण्डन करते हैं इसके पीछे कौन सा कारण है। यह विचारणीय एवं खोज का विषय है कि लेखक का अपने जीवन में ऐसे कर्इ सन्तों से सामना हुआ है जिनका कहना है कि कुछ भी है सब परमात्मा है ज्योतिष बकवास है तथा इस मनत्र का जप करो सब ठीक हो जायेगा।
समाज में एक लोकोकित बहुत प्रचलित है कि नीम, हकीम खतरा ए जान संसार में जड़-चेतन जो कुछ भी है उसका अपना एक अर्थ तथा प्रभाव है लेकिन उसका लाभ किस प्रकार से लिया जा सकता है। इसे कोर्इ विरला ही जान पाता है परमात्मा का स्थान जीवन में सर्वोच्च है। इसमें शक करने का कोइ कारण नहीं परन्तु जो एक बात हम भूल जाते हैं वो यह है कि परमात्मा हम सबका स्वामी है, सेवक नहीं सांसार में जो कुछ भी घटित होता है वह परमात्मा की इच्छा से होता है।
लेकिन परमात्मा अपनी इच्छा विशेष सेवकों को उत्पन्न करके उनके माध्यम से पूरी करता है। गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि मनुष्य को केवल कर्म करने का अधिकार है फल देने का अधिकार केवल परमात्मा के हाथों में है। ज्योतिष शास्त्र एक ऐसा दर्पण है जिसमें मनुष्य अपने कर्मों के फल को देख सकता है तथा परमात्मा की इच्छा से नवग्रहों के माध्यम से मनुष्य अपने कर्मों का अच्छा या बुरा फल भोगता है।
यह सत्य है जब तक ज्योतिष और ग्रहों के तथाकथित असर साबित नहीं हो जाते, कम से कम तब तक तो ज्योतिष विद्या एक “अप्रायोगिक-विश्वास” ही है, लेकिन सिर्फ़ यही आधार ज्योतिष को विज्ञान नहीं होना सिद्ध नहीं करता, कुछ और भी आधार हैं जिन पर विचार किया जाना आवश्यक है जिससे यह साबित किया जा सके कि ज्योतिष विज्ञान नहीं है, बल्कि कोरे अनुमान, ऊटपटाँग कल्पनायें और खोखला अंधविश्वास है । वैज्ञानिक ज्योतिष को विज्ञान का दर्जा देने से कतराते है | 
क्या सत्ता में बैठा शासक वर्ग ज्योतिष को विज्ञान समझता है ? बिलकुल नहीं समझता है, अगर शासक वर्ग इसे विज्ञान समझता, तो इस क्षेत्र में कार्य करनेवालों के लिए कभी-कभी किसी प्रतियोगिता, अधिकृत संगोष्ठियों आदि का आयोजन होता और ज्योतिष क्षेत्र के विद्वानों को पुरस्कारों से सम्मानित कर प्रोत्साहित किया जाता। दुर्भाग्य की बात है कि आज तक ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। यदि पत्रकारिता के क्षेत्र में देखा जाए, तो लगभग सभी पत्रिकाएँ यदा-कदा ज्योतिष से संबंधित लेख, साक्षात्कार,भविष्यवाणियॉ आदि निकालती ही रहती है, लेकिन जब आज तक इसकी वैज्ञानिकता के बारे में कोई निष्कर्ष ही नहीं निकाला जा सका और जनता को कोई संदेश ही नहीं मिल पाया, तो ऐसे ज्योतिष से संबंधित लेख, साक्षात्कार,भविष्यवाणियॉ आदि का क्या औचित्य है ? इस तरह मूल तथ्य की परिचर्चा के अभाव में फलित ज्योतिष को जाने-अनजाने काफी नुकसान हुआ है । 
ज्योतिष के सन्दर्भ में कारण और निवारण का सिद्धान्त अपना कर भौतिक जगत की श्रेणी मे ज्योतिष को तभी रखा जा सकता है,जब उसे पूरी तरह से समझ लिया जाये | 

ज्योतिष विधा की सत्यता इस बात से प्रमाणित हो जाती है कि मनुष्य की लाख इच्छा करने के बावजूद उसके जीवन में अप्रत्याशित रूप से अविश्वसनीय घटनायें घटित होती हैं। यदि हम सिद्धातों की बात करें तो किसी भी कार्य का परिणाम नियम के अनुरूप होना चाहिये परन्तु हमारी सोच एवं सिद्धान्तों के विपरीत होने वाली आश्चर्यजनक घटनायें ही ज्योतिष के असितत्व को सिद्ध करने के लिए काफी हैं। प्रत्येक मनुष्य का कुछ न कुछ सपना होता है और वह अपने सपने को यथार्थ में बदलने के लिए युकित एवं शकित का पूर्ण उपयोग करता है। इसके बावजूद स्तब्ध कर देने वाला परिणाम सामने आता है। आखिर क्यों क्योंकि हमारे असितत्व से अलग हम पर नियंत्रण करने वाली शकितयाँ ग्रहों एवं देवों, देवी-देवताओं के रूप में सृष्ट में मौजूद हैं एवं परमात्मा के संकल्पों को पूर्ण करने का उत्तरदायित्व इन्हीं शकितयों के जिम्मे होता है।
जिज्ञासा की दृषिट से एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरकर सामने आता है कि ज्योतिष और अध्यात्मक में घनिष्ठ या निकटवर्ती सम्बन्ध होने के बावजूद भी एक दूसरे से भिन्न परिणाम क्यों हैं। इसका कारण यह है कि ज्योतिष के माध्यम से हम अपने इस लोक को सुधार कर सकते हैं अर्थात जीवन में सुख-समृद्धि की प्रापित और कष्टों से निवृत्ति पा सकते हैं, जबकि अध्यात्म से परलोक सुधरता है तथा परमात्मा की कृपा एवं मुकित की प्रापित होती है। वेदों में विशेषकर कर्मकाण्ड के अन्तर्गत सकाम फल प्रापित के लिए बहुत से मन्त्र दिये गये हैं जो कि यज्ञ के दौरान आहुति में प्रयुक्त किये जाते हैं। इस सबसे यह सिद्ध होता है कि ज्योतिष शास्त्र बकवास नहीं यथार्थ है।

वास्तव में ज्योतिष विद्या न केवल विज्ञान है अपितु विज्ञानों का भी विज्ञान है। यह एक ऐसा शास्त्र है जिसे वेदों का नेत्र भी कहा गया है। वेद के छहों अंगों में ज्योतिष को नेत्र का सर्वोच्च स्थान देते हुए भारत के प्राचीन मनीषियों ने सनातन काल से इस विद्या को ज्ञान-विज्ञान , धर्म व अध्यात्म आदि विषयों में सर्वोत्कृष्ट स्थान देते हुए इसके महत्व को विशेष रूप से रेखांकित किया है। ऋग्वेद में पंचानवे हजार वर्ष पहले जो ग्रह -नक्षत्रों की स्थिति थी, उसका उल्लेख किया गया है, जिसका जिक्र करते हुए लोकमान्य तिलक ने यह अनुमान व्यक्त किया था कि हमारे वेद निश्चित रूप से पंचानवे हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन हैं।
सचमुच ज्योतिष कोई नवीन विज्ञान नहीं है जिसे विकसित होना है। यह एक अति प्राचीन विज्ञान है जो कभी अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंच चुका था। कालक्रम से जिस अति प्राचीन भारतीय सभ्यता में इस विज्ञान का चरम विकास हुआ था, वह विनष्ट हो गयी। अत इस विज्ञान की समस्त कड़ियां यकायक इधर-उधर बिखर गयीं। थोड़ी-बहुत कड़ियां जो यत्र-तत्र बिखरी रह गयीं , उन्हीं के आधार पर वर्तमान ज्योतिष विज्ञान का ताना -बाना बुना गया है और उनके गणितीय सूत्रों की सहायता से की गयी गणनाएं आज भी पूर्णतसही सिध्द होती हैं। उपलब्ध ज्योतिष शास्त्रों में ज्योतिषीय गणित -सूत्रों के आधार पर जो फलादेश निकाले जाते हैं वे भी आश्चर्य जनक रूप से सच साबित होते हैं।

भारतीय ज्योतिष का प्राचीनतम इतिहास (खगोलीय विद्या) के रूप सुदूर भूतकाल के गर्भ मे छिपा है,केवल ऋग्वेद आदि प्राचीन ग्रन्थों में स्फ़ुट वाक्याशों से ही आभास मिलता है,कि उसमे ज्योतिष का ज्ञान कितना रहा होगा। निश्चित रूप से ऋग्वेद ही हमारा प्राचीन ग्रन्थ है,बेवर मेक्समूलर जैकीबो लुडविंग ह्विटनी विंटर निट्ज थीवो एवं तिलक ने रचना एवं खगोलीय वर्णनो के आधार पर ऋग्वेद के रचना का काल ४००० ई. पूर्व स्वीकार किया है। चूंकि ऋग्वेद या उससे सम्बन्धित ग्रन्थ ज्योतिष ग्रन्थ नही है,इसलिये उसमे आने वाले ज्योतिष सम्बन्धित लेख बहुधा अनिश्चित से है,परन्तु मनु ने जैसा कहा है कि "भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिद्धयति"। इससे स्पष्ट है कि वेद त्रिकाल सूत्रधर है,और इसके मंत्र द्रष्टा ऋषि भी भी त्रिकालदर्शी थे ।
ज्योतिष शास्त्र एक बहुत ही वृहद ज्ञान है। इसे सीखना आसान नहीं है। ज्योतिष शास्त्र को सीखने से पहले इस शास्त्र को समझना आवश्यक है। सामान्य भाषा में कहें तो ज्योतिष माने वह विद्या या शास्त्र जिसके द्वारा आकाश स्थित ग्रहों, नक्षत्रों आदि की गति, परिमाप, दूरी इत्या‍दि का निश्चय किया जाता है।
ज्योतिष शास्त्र की व्युत्पत्ति 'ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्रम्‌' की गई है। हमें यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि ज्योतिष भाग्य या किस्मत बताने का कोई खेल-तमाशा नहीं है। यह विशुद्ध रूप से एक विज्ञान है। ज्योतिष शास्त्र वेद का अंग है। ज्योतिष शब्द की उत्पत्ति 'द्युत दीप्तों' धातु से हुई है। इसका अर्थ, अग्नि, प्रकाश व नक्षत्र होता है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार ज्योतिर्मय सूर्यादि ग्रहों की गति, ग्रहण इत्यादि को लेकर लिखे गए वेदांग शास्त्र का नाम ही ज्योतिष है।
छः प्रकार के वेदांगों में ज्योतिष मयूर की शिखा व नाग की मणि के समान सर्वोपरी महत्व को धारण करते हुए मूर्धन्य स्थान को प्राप्त होता है। सायणाचार्य ने ऋग्वेद भाष्य भूमिका में लिखा है कि ज्योतिष का मुख्य प्रयोजन अनुष्ठेय यज्ञ के उचित काल का संशोधन करना है। यदि ज्योतिष न हो तो मुहूर्त, तिथि, नक्षत्र, ऋतु, अयन आदि सब विषय उलट-पुलट हो जाएँ।
ज्योतिष शास्त्र के द्वारा मनुष्य आकाशीय-चमत्कारों से परिचित होता है। फलतः वह जनसाधारण को सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्र-सूर्य ग्रहण, ग्रहों की स्थिति, ग्रहों की युति, ग्रह युद्ध, चन्द्र श्रृगान्नति, ऋतु परिवर्तन, अयन एवं मौसम के बारे में सही-सही व महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है। इसलिए ज्योतिष विद्या का बड़ा महत्व है ।
महर्षि वशिष्ठ का कहना है कि प्रत्येक ब्राह्मण को निष्कारण पुण्यदायी इस रहस्यमय विद्या का भली-भाँति अध्ययन करना चाहिए क्योंकि इसके ज्ञान से धर्म-अर्थ-मोक्ष और अग्रगण्य यश की प्राप्ति होती है। एक अन्य ऋषि के अनुसार ज्योतिष के दुर्गम्य भाग्यचक्र को पहचान पाना बहुत कठिन है परन्तु जो जान लेते हैं, वे इस लोक से सुख-सम्पन्नता व प्रसिद्धि को प्राप्त करते हैं तथा मृत्यु के उपरान्त स्वर्ग-लोक को शोभित करते है |
ग्रह नक्षत्रों के परिज्ञान से काल का उद्बोधन करने वाला शास्त्र ज्योतिष शास्त्र ही है। प्रन्तु उस उद्बोधन के साथ आकाशीय चमत्कार को देखने के लिये गणित ज्योतिष के तीन भेद किये गये हैं:-
१.सिद्धान्त गणित--
जिस गणित के द्वारा कल्प से लेकर आधुनैक काल तक के किसी भी इष्ट दिन के खगोलीय स्थितिवश गत वर्ष मास दिन आदि सौर सावन चान्द्रभान को ज्ञात कर सौर सावन अहर्गण बनाकर मध्यमादि ग्रह स्पष्टान्त कर्म किये जाते है,उसे सिद्धान्त गणित कहा जाता है।
२. तंत्र गणित--
जिस तंत्र द्वारा वर्तमान युगादि वर्षों को जानकर अभीष्ट दिन तक अहर्गण या दिन समूहों के ज्ञान के मध्यमादि ग्रह गत्यादि चमत्कार देखा जाता है,उसे तंत्र गणित कहा जाता है।
३. करण गणित
वर्तमान शक के बीच में अभीष्ट दिनों को जानकर अर्थात किसी दिन वेध यंत्रों के द्वारा ग्रह स्थिति देख कर और स्थूल रूप से यह ग्रह स्थिति गणित से कब होगी,ऐसा विचार कर तथा ग्रहों के स्पष्ट वश सूर्य ग्रहण आदि का विचार जिस गणित से होता है,उसे करण गणित कहते हैं ।
तंत्र तथा करण ग्रन्थों का निर्माण वेदों से हजारों वर्षों के उपरान्त हुआ,अत: इस पर विचार न करके वेदों में सिद्धान्त गणित सम्बन्धी बीजों का अन्वेषण आवश्यक होगा। वेदों में सूर्य के आकर्षण बल पर आकाश में नक्षत्रों की स्थिति का वर्णण मिलता है ।

संपूर्ण भारतीय ज्योतिषशास्त्र को मूलतः तीन भागों में बाँटा जा सकता है---
(१) सिद्धान्त ज्योतिष:-
काल गणना की एक विशेष सूक्ष्म माप त्रुटि से लेकर प्रलय के अन्त तक कालों का आकलन, उनका मान, उनका भेद, उनका चार (चलन), आकाश में उनकी गति आदि क्रम से द्विविध प्रकार की गणित से उनके प्रश्न तथा उत्तर जिसमें निहित है। पृथ्वी और आकाश के मध्य स्थित ग्रहों का जिसमें कथन और उनको जानने, वैध करने का यन्त्र आदि वस्तुओं का जिसमें गणित निहित हो, उस प्रबन्ध को विद्वानों ने सिद्धान्त रूप से अभिहित किया है।

सिद्धान्त ज्योतिष के प्रमुख ग्रन्थों के नाम:--सिद्धान्त ग्रन्थों में सूर्य सिद्धान्त, वशिष्ठ सिद्धान्त, ब्रह्म सिद्धान्त, रोमक सिद्धान्त, पौलिश सिद्धान्त, ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त, पितामह सिद्धान्त आदि प्रसिद्ध सिद्धान्त ग्रन्थ हैं ।
सिद्धान्त ज्योतिष के प्रमुख आचार्यों के नाम:--
जिन्होंने ज्योतिष शास्त्र को चलाया ऐसे ज्योतिष शास्त्र के 18 प्रवर्तक आचार्य माने जाते हैं। ये हैं- ब्रह्मा, आचार्य, वशिष्ठ, अत्रि, मनु, पौलस्य,रोमक, मरीचि, अंगिरा, व्यास, नारद, शौनक, भृगु, च्यवन, यवन, गर्ग, कश्यप और पाराशर |

(२) संहिता ज्योतिष:--
ग्रहों की चाल, वर्ष के लक्षण, तिथि, वार, नक्षत्र, योग, कण, मुहूर्त, ग्रह-गोचर भ्रमण, चन्द्र ताराबल, सभी प्रकार के लग्नों का निदान, कर्णच्छेद, यज्ञोपवीत, विवाह इत्यादि संस्कारों का निर्णय तथा पशु-पक्षी चेष्टा ज्ञान, शकुन विचार, रत्न विद्या, अंग विद्या, आकार लक्षण, पक्षी व मनुष्य की असामान्य चेष्टाओं का चिन्तन संहिता विभाग का विषय है।

संहिता ज्योतिष के प्रमुख ग्रन्थों के नाम:-
संहिता ग्रन्थों में वृहत्संहिता, कालक संहिता, नारद संहिता, गर्ग संहिता, भृगु संहिता, अरुण संहिता, रावण संहिता, लिंग संहिता, वाराही संहिता, मुहूर्त चिन्तामण इत्यादि प्रमुख संहिता ग्रन्थ हैं।

संहिता ज्योतिष के प्रमुख आचार्यों के नाम:-
मुहूर्त गणपति, विवाह मार्तण्ड, वर्ष प्रबोध, शीघ्रबोध, गंगाचार्य, नारद, महर्षि भृगु, रावण, वराहमिहिराचार्य सत्य-संहिताकार रहे हैं ।

(३) होरा शास्त्र:-
राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, चलित, द्वादशभाव, षोडश वर्ग, ग्रहों के दिग्बल, काल बल, चेष्टा बल, ग्रहों के धातु, द्रव्य, कारकत्व, योगायोग, अष्टवर्ग, दृष्टिबल, आयु योग, विवाह योग, नाम संयोग, अनिष्ट योग, स्त्रियों के जन्मफल, उनकी मृत्यु नष्टगर्भ का लक्षण प्रश्न एवं ज्योतिष के फलित विषय पर जहाँ विकसित नियम स्थापित किए जाते हैं, वह होरा शास्त्र कहलाता है ।

होरा शास्त्र के प्रमुख ग्रन्थों के नाम:-
सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ वृहद पाराशर होरा शास्त्र मानसागरी, सारावली, वृहत्जातक, जातकाभरण, चमत्कार चिन्तामणि, ज्योतिष कल्पद्रुम, जातकालंकार, जातकतत्व होरा शास्त्र इत्यादि हैं।

होरा शास्त्र के प्रमुख आचार्यों के नाम:-पुराने आचार्यों में पाराशर, मानसागर, कल्याणवर्मा, दुष्टिराज, रामदैवज्ञ, गणेश, नीपति आदि हैं |
इन तीन स्कन्धों वाला उत्तम भारतीय ज्योतिषशास्त्र ही वेदों का पवित्र नेत्र कहा गया है ।

क्या ज्योतिष नक्षत्र विज्ञान हें..????


विज्ञान उसे कहते हैं जिनका प्रयोगशाला में परीक्षण किया जा सके और उसके प्रभाव का अध्ययन सम्भव हो। ज्योतिष शास्त्र के आलोचक इस आधार पर भी इसे विज्ञान मानने से इनकार करते हैं कि ज्योतिष शास्त्र के सिद्धान्तों और नियमों का भौतिक प्रयोगशाला में परीक्षण नहीं किया जा सकता है। यही सत्य है कि ज्योतिष विज्ञान का भौतिक प्रयोगशाला में परीक्षण नहीं होता परन्तु इस विज्ञान में भी कारण और प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखार्इ देता है। इस विज्ञान के प्रयोग में गुरूत्वाकर्षण को कारण माना जाता है व शरीर को वस्तु जिसके ऊपर अंतरिक्षीय तत्वों के प्रभाव का पौराणिक नियम एवं सिद्धान्त के आधार पर विश्लेषण किया जाता है। इस आधार पर भौतिक विज्ञान के नियमों को मानने वाले ज्योतिष शास्त्र को विज्ञान कह सकते हैं।
ज्योतिष शास्त्र यूँ तो एक प्रकार का विज्ञान है फिर भी आधुनिक वैज्ञानिक दृषिट रखने वाले बहुत से व्यकित इसे अंधविश्वास और वहम मानते हैं इस विज्ञान के प्रति आलोचनात्मक दृषिट रखने वालों में ऐसे लोग मुख्य रूप से है जिनके लिए ज्योतिष शास्त्र पढ़ पाना और समझना कठिन होता है। बहुत से आलोचक ज्योतिष के सिद्धान्तों की हंसी उड़ाते हैं कि यह कैसे सम्भव है कि किसी के भविष्य को आप देख रकते हैं। आलोचनात्मक दृषिट रखने वाले लोग ज्योतिष विज्ञान को कोरी कल्पना और ठगी मानते हैं।
ज्योतिष विज्ञान की आलोचना करने वाले भले ही अपने अपने तर्क दें परन्तु यह भी गौर करने वाली बात है कि ऐसा कौन सा विज्ञान और सिद्धान्त है जो आलोचनाओं से बचा हुआ है। आलोचना ही सिद्धान्तों एवं विज्ञान को बल प्रदान करता है आवश्यकता यह है कि आलोचनात्मक दृषिट रखने वालों को इस विज्ञान के प्रति मन साफ करना चाहिए और खुले मन से इसका अध्ययन करना चाहिए। इससे वे समझ पायेंगे कि ज्योतिष किस प्रकार विकसित और रहस्यों से भरा विज्ञान है, यह विज्ञान पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण बल के आधार पर कार्य करता है।
सिद्धान्तों नियमों प्रयोगों समालोचनाओं एवं प्रेक्षण के आधार पर जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है, वह विज्ञान है ज्योतिषशास्त्र इन सभी कसौटियों पर खड़ा उतरता है जिसेस इस विज्ञान कहा जा सकता है।विज्ञान की परिभाषा के अनुसार 'सिद्धांतों, नियमों, प्रयोगों, समालोचनाओं एवं प्रेक्षण के आधार पर जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है वह विज्ञान है' | अब हमें यह विचार करना है कि क्या ज्योतिषशास्त्र इन सभी कसौटियों पर खड़ा उतरता है जिससे इसे विज्ञान कहा जा सकता है 
इसके लिए आइये कुछ तथ्यों पर विश्लेषण करते  है ----

(१) समस्त ब्रह्मांड की अति सूक्षम हलचल का प्रभाव भी पृथ्वी पर पडता है,सूर्य और चन्द्र का प्रत्यक्ष प्रभाव हम आसानी से देख और समझ सकते है,सूर्य के प्रभाव से ऊर्जा और चन्द्रमा के प्रभाव से समुद में ज्वार-भाटा को भी समझ और देख सकते है,जिसमे अष्ट्मी के लघु ज्वार और पूर्णमासी के दिन बृहद ज्वार का आना इसी प्रभाव का कारण है,पानी पर चन्द्रमा का प्रभाव अत्याधिक पडता है,मनुष्य के अन्दर भी पानी की मात्रा अधिक होने के कारण चन्द्रमा का प्रभाव मानव मस्तिष्क पर भी पडता है,पूर्णमासी के दिन होने वाले अपराधों में बढोत्तरी को आसानी से समझा जा सकता है,जो पागल होते है उनके असर भी इसी तिथि को अधिक बढते है,आत्महत्या वाले कारण भी इसी तिथि को अधिक होते है,इस दिन स्त्रियों में मानसिक तनाव भी अधिक दिखाई देता है,इस दिन आपरेशन करने पर खून अधिक बहता है,शुक्ल पक्ष मे वनस्पतियां अधिक बढती है,सूर्योदय के बाद वन्स्पतियों और प्राणियों में स्फ़ूर्ति का प्रभाव अधिक बढ जाता है,आयुर्वेद भी चन्द्रमा का विज्ञान है जिसके अन्तर्गत वनस्पति जगत का सम्पूर्ण मिश्रण है,कहा भी जाता है कि "संसार का प्रत्येक अक्षर एक मंत्र है,प्रत्येक वनस्पति एक औषधि है,और प्रत्येक मनुष्य एक अपना गुण रखता है,आवश्यकता पहिचानने वाले की होती है",’ग्रहाधीन जगत सर्वम",विज्ञान की मान्यता है कि सूर्य एक जलता हुआ आग का गोला है,जिससेसभी ग्रह पैदा हुए है,गायत्री मन्त्र मे सूर्य को सविता या परमात्मा माना गया है,रूस के वैज्ञानिक "चीजेविस्की" ने सन १९२० में अन्वेषण किया था,कि हर ११ साल में सूर्य में विस्फ़ोट होता है,जिसकी क्षमता १००० अणुबम के बराबर होती है,इस विस्फ़ोट के समय पृथ्वी पर उथल-पुथल,लडाई झगडे,मारकाट होती है,युद्ध भी इसी समय मे होते है,पुरुषों का खून पतला हो जाता है,पेडों के तनों में पडने वाले वलय बडे होते है,श्वास रोग सितम्बर से नबम्बर तक बढ जाता है,मासिक धर्म के आरम्भ में १४,१५,या १६ दिन गर्भाधान की अधिक सम्भावना होती है |
(२) विज्ञान की परिभाषा के अनुसार विज्ञान उसे कहते हैं जिनका प्रयोगशाला में परीक्षण किया जा सके और उसके प्रभाव का अध्ययन संभव हो | ज्योतिषशास्त्र के आलोचक इस आधार पर भी इसे विज्ञान मानने से इंकार करते हैं कि ज्योतिषशास्त्र के सिद्धान्तों एवं नियमों का भौतिक प्रयोगशाला में परीक्षण नहीं किया जा सकता है | यह सही है कि ज्योतिष विज्ञान का भौतिक प्रयोगशाला मे परीक्षण नहीं होता, परंतु इस विज्ञान में भी कारण और प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते है | इस विज्ञान के प्रयोग में गुरूत्वाकर्षण को कारण माना  जाता है व शरीर को वस्तु जिसके उपर अंतरिक्षीय तत्वों के प्रभाव का पौराणिक नियमों एवं सिद्धांतों के आधार पर विश्लेषण किया जाता हैं | इस आधार पर भौतिक विज्ञान के नियमों को मानने वाले ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान कह सकते हैं |
(३) विभिन्न ग्रहों की एक खास अवधि में निश्चित भूमिका को देखते हुए ही ‘गत्यात्‍मक दशा पद्धति की नींव रखी गयी। अपने दशाकाल में सभी ग्रह अपने गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति के अनुसार ही फल दिया करते हैं। उपरोक्त दोनो वैज्ञानिक आधार प्राप्त हो जाने के बाद भविष्यवाणी करना काफी सरल होता चला गया। ‘ गत्यात्मक दशा पद्धति ’ में नए-नए अनुभव जुडत़े चले गए और शीघ्र ही ऐसा समय आया ,जब किसी व्यक्ति की मात्र जन्मतिथि और जन्मसमय की जानकारी से उसके पूरे जीवन के सुख-दुख और स्तर के उतार-चढ़ाव का लेखाचित्र खींच पाना संभव हो गया। धनात्मक और ऋणात्मक समय की जानकारी के लिए ग्रहों की सापेक्षिक शक्ति का आकलण सहयोगी सिद्ध हुआ ।
(४) ज्योतिषियों के एक वर्ग की मान्यता है कि ज्योतिष और जड़ी-बूटियों की मदद से ब्लड कैंसर और अन्य गंभीर रोगों का भी इलाज संभव है। जातक की पत्रिका में यदि चंद्र और मंगल कमजोर स्थिति में हों और शनि रोग, मृत्यु या व्यय के घर में बैठे हैं तो व्यक्ति को ब्लड कैंसर की पूरी-पूरी आशंका रहती है । कुंडली में कमजोर चंद्र सफ़ेद रक्त कण को कम करता है तथा मंगल के कमजोर होने की स्थिति में व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कण कम होते हैं ।
(५) अधिकांश वैज्ञानिक इस आधार पर इसे विज्ञान मानने से इंकार करते हैं कि भौतिक विज्ञान में सिद्धांतों एवं नियमों के आधार पर जब किसी चीज का परीक्षण किया जाता है तब एक बार जो परिणाम मिलता है वही परिणाम दूसरी बार परीक्षण करने पर भी प्राप्त होता है, परंतु ज्योतिषशास्त्र में ऐसा नहीं होता है | जब कि ज्योतिष गणना में जो परिणाम एक बार आता है दूसरे ज्योतिषशास्त्री जब उसी सिद्धांत पर फलादेश करते हैं तो फलादेश अलग आता है | यदि ज्योतिषशास्त्र के उपलब्ध नियमों एवं सिद्धांतों को सूक्ष्मता से देखकर भविष्य कथन किया जाय तो परिणाम में अंतर आना संभव नहीं है, अत: जो अनिश्चित फलादेश की बात कह कर ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान मानने से इंकार करते हैं उन्हें सही नहीं कहा जा सकता |
(६) अरबों-खरबों रुपये के खर्च पर पलनें वाला विज्ञान अभी तक यह भी नहीं जानता कि मंगल लाल क्यों दिखता है, शनि चित्र-विचित्र रंगों से युक्त क्यों है, बृहस्पति पीला क्यों दिखता है आदि और इनका पृथ्वी और पृथ्वी पर रहनें वालों पर क्या कोई प्रभाव पड़ता है ? वह भी तब जब वह इसी सौरमण्डल के सदस्य हैं जिसमें हमारी पृथ्वी है। अनेकानेक प्रश्न हैं जिन्हें विज्ञान जानने का प्रयास कर रहा है और यह प्रयास जारी रहनें भी चाहिये | परन्तु ज्योतिषशास्त्र में आधुनिक वैज्ञानिक साधनों के अभाव में हजारों वर्ष पूर्व इन सभी प्रश्नों का समुचित उत्तर दे दिया गया था |
(७) वर्तमान समय में जो पंचांग बन रहे हैं, वह लगभग सभी लहरी एफेमरी जो नाटिकल एल्मनॅक पर आधारित है ।  कम्प्यूटर प्रोग्राम में भी डाटाबेस यही एफेमेरी/अल्म है अतः समान चूक वहाँ भी हो गयी है। ज्योतिष गणना में ग्रह आकाश में सदैव एक निश्चित गति से चलते हैं यह ज्योतिष गणना का मुख्य आधार है। अन्तरिक्ष में, सौर धब्बो के अधिक बनने/ कम बननें या किसी केतु (कामेट) के संचरण या अन्य किसी अभिनव खगोलीय घटना वश ग्रहों की गति, भ्रमण स्थिति आदि पर विचलनकारी प्रभाव पड़्ते हैं, उनका आँकलन तभी संभव है जब प्राचीन ज्योतिष गणना पद्धति के अनुसार दृग ज्योतिषीय आधार पर पंचांग निर्मित हों और कम्प्यूटर प्रोग्राम में भी डाटाबेस यही प्राचीन ज्योतिष गणना पद्धति के अनुसार प्रोग्रामिंग की जाये।
(८) वर्तमान विज्ञान ने एक चमत्कारी बात का पता लगाया है कि शनि के दोनों ध्रुवों पर नीली रौशनी चमकती है । अभी हाल ही में आधुनिक और शक्तिशाली हबल टेलिस्कोप से नासा को भेजी गई तस्वीरों ने आश्चर्यजनक और हैरानी में डालने वाला खुलासा किया है | इन तस्वीरों से यह ज्ञात हुआ है कि शनिवार के दिन शनि के दोनों ध्रुवों पर नीली चमकदार रौशनी आश्चर्यजनक तरीके से बढ़ जाती है | यह रौशनी बिल्कुल वैसी ही है, जैसी कि हमारी पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के आकाश में दिखाई देती है । शनिवार की ये रौशनी कई गुना तेज़ क्यों हो जाती है इस बारे में विज्ञान अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया है । यह तो स्पष्ट है कि विज्ञान के पास शनि की नीली रौशनी का कोई जवाब नहीं है, लेकिन ज्योतिषशास्त्र के पास है | हज़ारों साल से ही ज्योतिषशास्त्र ने शनि का रंग काला और नीला बताया है । शनि का प्रकोप शांत करने वाला रत्न नीलम है और शनि में दिखने वाली नीली रौशनी भी कुछ कुछ वैसी ही दिखती है। ज्योतिष में शनिवार के दिन का स्वामी भगवान शनि को ही माना जाता है | ज्योतिषशास्त्र मानता है कि शनिवार का स्वामी होने के कारण शनिवार को शनि देव की शक्ति का प्रभाव काफी ज्यादा रहता है । विज्ञान के क्षेत्र में इन तथ्यों को स्वीकार नहीं किया जाता है लेकिन इनका कोई समुचित उत्तर भी नहीं है |
(९) वैज्ञानिकों तक मंगल की धरती से पहुंची जानकारी कहती है कि मंगल की सतह लाल है | मंगल की सतह से मंगल का आकाश भी लाल ही दिखता है | ज्योतिषशास्त्र ने हज़ारों साल पहले कैसे मंगल का रंग लाल मान लिया । ज्योतिषशास्त्र में ये सिद्धांत लिख दिया कि लाल रंग के कपड़े के दान से मंगल ग्रह की शांति होती है और कैसे लाल रंग के मूंगे को मंगल का रत्न मान लिया गया । जब ज्योतिषशास्त्र ने ये नियम बनाए गए थे, तब मंगल ग्रह की कोई भी तस्वीर मौजूद नहीं थी । अब मंगल ग्रह की मिट्टी की जांच कर रहे वैज्ञानिक मानते हैं कि मंगल की ज़मीन में सोना और तांबा जैसी धातुओं की मात्रा हो सकती है और ज्योतिष के मुताबिक तांबा या सोने में ही मंगल के रत्न मूंगे को धारण किया जाता है । सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि बिना मंगल को समझे कोई कैसे उसे लाल रंग से जोड़ सकता है । ज्योतिषशास्त्र ने मंगल को हमेशा से एक गर्म और उग्र ग्रह माना है जो जोश हिंसा और युद्ध का कारक है और अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों को अब जाकर ये जानकारी मिली है कि मंगल की सतह पर तापमान बहुत ज्यादा रहता है और साथ ही साथ मंगल के वातावरण में समय-समय पर भयानक तूफान उठते रहते हैं । अब हज़ारों साल पहले ज्योतिषशास्त्र के सिद्धांत लिखने वालों के पास ये जानकारियां ज्योतिषशास्त्र के वैज्ञानिक-दृष्टिकोण को ही पुष्ट करता है 

ज्योतिष को विज्ञान कहने के लिये इतने सब कारण क्या पर्याप्त नही है ? इतने विश्लेषण के पश्चात् मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ज्योतिषशास्त्र निश्चित रूप से विज्ञान कहलाने का अधिकार रखता है यह उस कसौटी पर खड़ा उतरता है जहां से किसी भी शास्त्र विषय को विज्ञान की संज्ञा प्राप्त होती है | ज्योतिषशास्त्र को अंधविश्वास या भ्रम कहने वाले अगर साफ मन से इस विषय का अध्ययन करें तो वे इसे विज्ञान मानने से इंकार नहीं कर सकते हैं | मुझे यह कहने में तनिक संकोच नहीं है कि ज्योतिषशास्त्र कभी एक निश्चित सिद्धांतों पर आधारित विज्ञान रहा था जिसकी रचना करने वालों के पास आकाशगंगा को समझने का कोई न कोई सशक्त माध्यम अवश्य था और अब तो बॉम्बे हाईकोर्ट भी ज्योतिष को विज्ञान होने की मान्यता दे चुका है । दुनिया भर के वैज्ञानिक भले ही ज्योषित को विज्ञान मानने से इनकार करते हों, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि ज्योतिष एक विज्ञान है। अदालत ने ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान के रूप में दी गई मान्यता रद्द करने के लिए दायर जनहित याचिका खारिज कर दी। जनहित मंच नामक गैर सरकारी संगठन की इस याचिका में फर्जी ज्योतिषियों, तांत्रिकों और वास्तुशास्त्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी । 
बॉम्बे हाईकोर्ट की पीठ ने कहा कि जहां तक ज्योतिष शास्त्र से जुड़े आग्रह का सवाल है तो सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मुद्दे पर विचार कर चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने भीज्योतिष को विज्ञान बताया है। शीर्ष अदालत ने वर्ष २००४ ईस्वी  में विश्वविद्यालयों को निर्देश भी दिया था कि वे ज्योतिष विज्ञान को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करने पर विचार करें । पीठ ने इस संबंध में केंद्र सरकार की ओर से दाखिल शपथ पत्र का भी हवाला दिया । 
सरकार ने शपथ पत्र में कहा है कि ज्योतिषशास्त्र चार हजार साल पुराना विश्वसनीय विज्ञान है और यह दवा व जादुई उपचार अधिनियम (आपत्तिजनक विज्ञापन) सन १९५४ ईस्वी के तहत नहीं आता । इसमें कहा गया है कि इस कानून के दायरे में ज्योतिष शास्त्र और संबंधित विज्ञान नहीं आते हैं । ज्योतिष शास्त्र जैसे समय की कसौटी पर परखे गए विज्ञान पर प्रतिबंध का विचार अनुचित व अन्यायपूर्ण है । यह याचिका जनहित मंच के संयोजक भगवानजी रैयानी और उनके सहयोगी दत्ताराम ने दायर की थी ।
पेस इंटर एस्ट्रोमेडिकल एसोसिएशन गुजरात की अध्यक्ष एवं भारतीय प्राच्य ज्योतिष शोध संस्थान की गुजरात प्रभारी श्रीमती सोनी ने ज्योतिष से जुड़े प्रश्न 'ज्योतिष विज्ञान है, गणित है अथवा ढकोसला है ?' के प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा कि "ज्योतिष ढकोसला नहीं है, यह विज्ञानसम्मत शास्त्र है। इसका उद्‍देश्य जनता के बीच व्याप्त अंधविश्वास को दूर करना है तथा भविष्य की गतिविधियों से परिचित कराना है। ज्यो‍‍तिष विज्ञान से भी पुराना विषय है। वर्तमान में भारत में ही नहीं, दुनिया के अन्य देशों में भी ज्योतिष को मान्यता मिली हुई है ।"  
अत: यह कहा जा सकता है कि वर्तमान विज्ञान की नई शोध और खोजें ज्योतिष के पूर्व धारणाओं को पुष्ट करने हेतु सबूत इकट्ठे कर रही हैं और एक दिन ज्योतिष फिर से अपनी पुरानी गरिमा को अवश्य प्राप्त कर सकेगा । ज्योतिष समय का विज्ञान है, इसमें तिथि, वार, नक्षत्र, योग और कर्म इन पांच चीजों का अध्ययन कर भविष्य में होने वाली घटनाओं की जानकारी दी जाती है। यह किसी जाति या धर्म को नहीं मानता। वेद भगवान भी ज्योतिष के बिना नहीं चलते। वेद के छः अंग हैं, जिसमें छठा अंग ज्योतिष है। हमने पूर्व जन्म में क्या किया और वर्तमान में क्या कर रहे हैं, इसके आधार पर भविष्य में क्या परिणाम हो सकते हैं, इसकी जानकारी दी 'जाती है ।
निष्कर्ष के तौर देखें तो ज्योतिषशास्त्र विज्ञान कहलाने का अधिकार रखता है यह उस कसौटी पर खड़ा उतरता है जहां से किसी भी शास्त्र विषय को विज्ञान की संज्ञा प्राप्त होती है. इसे अंधविश्वास या भ्रम कहने वाले अगर साफ मन से इस विषय का अध्ययन करें तो वे इसे विज्ञान मानने से इंकार नहीं कर सकते.