***गुरु कैसा होना चाहिये---गुरु तत्त्व विचार***(संकलन)
-----------------------------------------------------
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर:!
गुरु: साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नम:!
----------------------------------------------------
========= शिव-तत्त्व विचार =========
आजकल सच्चे गुरु प्राय: नहीं मिलते! वास्तव में गुरु सदा ही मुश्किल से मिलते थे! फिर आजकल तो बहुत से लोभी-लालची और कामी-कपटी [काम-कंचन-कीर्ति चाहने वाले ] लोग गुरु बन गये हैं, इस लिये गुरुवेश कलंकित -सा हो गया है! अत: बहुत ही सावधानी से गुरु बनाना चाहिये! गुरु में इतने गुण का होना अवश्यक होने चाहिये!-------
स्वभाव शुद्ध हो, जितेन्द्रिय हो, 
धन का लालच न जिसे हो ही नहीं, 
वेद-शास्त्रों का ज्ञाता हो, सत्य तत्त्व को पा चुका हो, परोपकारी हो, 
दयालु हो, नित्य जप-तपादि साधनों को स्वयं [चाहे लोक-संह्यार्थ ही] करता हो, सत्यवादी हो, शान्ति प्रिय हो, 
योगविद्या में निपुण हो, 
जिसमें शिष्य के पापनाश करने की शक्ति हो, 
जो भगवान का भक्त हो, स्त्रियों में अनासक्त हो, 
क्षमावान हो, धैर्यशाली हो, 
चतुर हो, अव्यसनी हो, 
प्रियभाषी हो, निष्कपट हो, 
निर्र्भय हो, पापों से बिलकुल परे हो, 
सादगी से रहता हो, 
धर्म प्रेमी हो, 
जीवमात्र का सुहृद हो और शिष्य को पुत्र से बढ़ कर प्यार करता हो 
*******************************************
जिनमें उपर लिखित गुण न हों और निम्नलिखित अवगुण हों, उन्हें गुरु नहीं बनाना चाहिये!---
********************************************
जो संस्कारहीन हो, वेद--शास्त्रों जानता-माता न हो, जो वेद शास्त्रों को जान कर भी उनका व्यापार करता हो, जो धर्म के नाम पर वेद-शास्त्रों को छपा कर जीविका चलाता हो, कामिनी-कांचन में आसक्त हो, लोभी हो, मान, यश और पूजा चाहता हो, वैदिक और स्मार्ट कर्मों को न करता हो, असत्य बोलता हो, क्रोधी हो, शुष्क या कटुभाषण करता हो, शिष्यों को अपना मिशन चलाने के लिये धन ईकठा करने के लिये कहता हो, असत्य बोलता हो, निर्दयी हो, पढ़ाकर पैसा लेता हो, कपटी हो, शिष्य के धन की ओर दृष्टि रखता हो, मत्सर करता हो, किसी प्रका से व्यसनी हो, कृपन हो, दुष्ट बुद्धि हो, बाहरी चमत्कार दिखाकर लोगों का चित्त हरता हो, नास्तिक हो, ईश्वर और गुरु की निंदा करता हो, अभिमानी हो, अग्नि और गुरु में श्रधा न रखता हो, अग्नि को प्रकट कर पाखंड करता हो, संध्या-तर्पण, पूजा और मन्त्र आदि के ज्ञान से रहित हो, पूजा आदि के नाम पर पैसा कमाता हो, आलसी हो, विलासी हो, धर्महीन हो, धर्मी होकर भी यश-कीर्ति का लोभी हो, वेद-शास्त्रों का क्रय-विक्रय करने वाला हो, त्यागी न हो, सन्यासी होकर भी त्यागी न हो, जो शिष्य बनाने में विश्वास रखता हो, किसी भी तरह से धर्म के नाम पर अपना प्रचार कराता हो, वेद-शास्त्रों, देवी देवताओं के नाम पर यज्ञा, मन्त्र-तंत्र-यंत्र की पुस्तकें छपा कर धन अर्जित करता हो और परस्त्रियों को दीक्षा देता हो! ऐसे गुरु बनाने पर यदि सत्य कर्म वाला और सत्य पथ पर चलने वाला भी ऐसे गुरु को अपनाता है वह भी नरक का अधिकारी होता है! जब तक चौदह इंद्र अपना राज्य नहीं भागते तब तक वह [गुरु] तथा शिष्य नरकों में रहते हैं! 
इस बात को बहुत अच्छी प्रकार से समझ लेना चाहिये कि शास्त्रों के अनुसार आज कोई भी एक गुरु धर्म-प्रेमी नहीं है! आज गुरु का अर्थ उल्टा हो गया है! पहले कहते थे गुरु भेजे नरक को तो स्वर्ग कि करो आस! आब गुरु भेजे स्वर्ग को तो नरक की करो आस! आज गुरु अँधेरे से निकाल कर प्रकाश की ओर नहीं ले जा रहा, आज तो वह प्रकाश से निकालकर अँधेरे की ओर ले जा रहा है! 
आज किसी भी गुरु में ऐसी शक्ति नहीं है कि वह वह मोक्ष को दिला दे! आज का गुरु उस तत्त्व को नहीं पा सका किसको शास्त्रों में कहा गया है! जो स्वयं शास्त्रों के कथन के अनुसार नहीं चलता, वह कैसे किसी का गुरु हो सकता है! आज के गुरुओं की अंतरात्मा तो मर चुकी है! 
***************************************************
स्त्रियों के प्रति शास्त्र में इस प्रकार कहा है--------
नास्ति स्त्रीणां पृथग यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम!
पातीं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयते!!
अर्थात "स्त्रियों के लिये अलग से यज्ञ, व्रत, उपवास नहीं है! केवल एक पतिकी सेवा करने से वे परमपद को प्राप्त होकर देवताओं द्वारा पूजित होती हैं! 
----------------------------------------------------------
श्रीगणेश, नारायण, सूर्य, दुर्गा और शिव -------

--------------------------------------------------------------------------------------------
********मंगल-कामना- एवं शान्तिपाठ*******
----------------------------------------------------
दिश: पश्य अध्: पश्य व्याधिभ्यो रक्ष नित्यश:!
प्रसीद स्वस्य राष्ट्रस्य राज्ञ: सर्व बलस्य च!!
अनं कुरु सुवृष्टिं च सुभिकहमभयं तथा !
राष्ट्रं प्रवर्द्धतु विभो शान्तिर्भवतु नित्यश:!!
देवानां ब्रह्मणानां भक्तानां कन्याकासु च!
पशूनां सर्वभूतानां शान्तिर्भुवतु नित्यश:!!
संसार-सागर से उद्धार करनेवाले प्रभु! हम आपकी शरण आये हैं, [ आप सर्वथा प्रसन्न हों]! आपकी दिव्य रखा-दृष्टि चतुर्दिक बनी रहे, आधि- वियाधियों से हमारी सदैव रक्षा करते हैं! हमारे राष्ट्र, शासन और सब प्रकार के [त्रिविध] सैन्य-बालों पर आपको विजयिनी वरद-दृष्टि सतत बनी रहे! हमारे देशके धसन-धान्य [संपदा] की श्रीवृद्धि करते रहें! आप सर्वत्र सुवृष्टि [ समयोपयोगी वर्षा] करें! पर्याप्त अनं तथा और सुभिक्ष प्रदान करें! हमारे अन्नके भण्डार भरते रहें! सर्वात: अभय-दान दें! हे विभो! आप हमारे राष्ट्र का संवर्द्धन करें एवं सर्वत्र ही [विश्वरभर में] शुभ-शान्ति, व्याप्त रहे, पुन:--देव ब्राह्मण, भक्त, संत-महात्मा, कन्याओं, पशु-पक्षियों अर्थात समस्त जीव-जगत पर सदैव शान्ति बरसती रहे! [ सभी सर्वत्र सुख-चैन से रहें]!
Share To:

पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

Post A Comment:

0 comments so far,add yours