कैसे होते है पति पत्नी मे झगडे ?

(आइये जाने एवं इसके ज्योतिषीय कारण  )---पंडित दयानन्द शास्त्री 


आदमी का जीवन कुल पांच भावो पर टिका हुआ है,माता के भाव से जन्म लेता है शिक्षा के भाव से अपनी विद्या को प्राप्त करता है और परिवार पर टिक जाता है विद्या के बाद काम धन्धे के लिये अपनी योजना को बनाकर या दूसरो की योजना को बनाकर सेवा मे शुरु हो जाता है इस कार्य के बाद वह अपने जीवन साथी के साथ जुड जाता है और जो भी काम जीवन के लिये करने पडते है करता है और अपने जीवन को पूरा करने के बाद मौत के भाव मे जाकर अपनी इहलीला समाप्त कर लेता है। चौथा भाव माता का माना जाता है और चौथे भाव का कार्य शरीर की पालना करना होता है शिक्षा और परिवार का भाव धन और कुटुम्ब को पालने वाला होता है नौकरी और सेवा का भाव जो छठा कहलाता है वह अपनी औकात को संसार मे दिखाने के लिये अपनी हिम्मत से अपने को समाज मे द्रश्य करने का काम करता है,सप्तम का कार्य जो जीवन साथी का भाव कहलाता है वह घर मकान बनाने आगे की संतति को बढाने और परिवार की उन्नति को पैदा करने से होता है। मौत का भाव जो अष्टम का भाव कहलाता है का कार्य अपना भार बच्चो पर छोडना परिवार को अपने हिसाब से चलने के लिये स्वतंत्र करना आदि का काम होता है। आदमी के पास कई प्रकार के दुख भी आते है और सुख भी आते है लेकिन सुख और दुख तब और अधिक प्रतीत होने लगते है जब दिमाग मे भ्रम पैदा हो जाते है। संसार मे कई कार्य आदमी स्वयं करता है और कई कार्य आदमी से भावना को देकर करवाये जाते है। जो लोग दूसरो पर तानाकशी करते है उलाहना देते है और एक दूसरे की प्रतिस्पर्धा को सामने रखकर एक प्रकार का भूत भरते है वे अक्सर राहु की श्रेणी मे आजाते है और राहु का काम होता है कि वह दो लोगो को आपस मे उलझा कर दूर बैठ कर तमाशा देखे और जिस की जीत होती है उसे वाहवाही दे और जो हारता है उसे समाप्त करने के बाद जो भी उसके पास है उसे लेकर अपने को आगे बढाने का उपक्रम करे। जन्म के समय मे राहु केतु जिस भाव मे होते है और जिस राशि मे होते है उसी का प्रभाव आजीवन देते चले जाते है जिस भाव और जिस राशि से गुजरते है वह जन्म के समय के भाव और राशि का प्रभाव देते चले जाते है।इसे ही समय की आंधी कहते है यह लाभ वाले भावो मे और लाभ की राशि मे होता है तो बढोत्तरी करता जाता है वह अगर मृत्यु के भी भाव मे गोचर करता है तो मौत के बाद के प्रकारो को उत्तम प्रकट करता जायेगा और वही राहु केतु अगर हानि की राशि मे है तो वह लाभ के भाव मे भी जाकर अपनी हानि को प्रकट करने लगेंगे। लेकिन दोनो ही स्थान के राहु केतु अपने अपने समय मे आधा सुख और आधा दुख देने का काम करते है अगर जीवन की पहली सीढी पर दुख मिला है तो दूसरी सीढी पर जाकर यह सुख देने लगते है और जब पहली सीढी पर सुख मिला है तो अन्त की सीढी पर दुख जरूर मिलेगा इसी बात को सोच कर विद्वान लोग अपने जीवन को जीते रहते है और अच्छे मे बुरे समय को तथा बुरे समय मे अच्छे समय की कल्पना को करने के बाद अपने काम करते रहते है।
प्रस्तुत कुंडली वृष लगन की है जातक का राहु पंचम भाव मे कन्या राशि का है। जातक का विद्या वाला क्षेत्र और परिवार वाला क्षेत्र राहु ने अपने कब्जे मे किया हुआ है। जातक को राजनीति हो या खेलकूद हो या फ़िर मनोरंजन का क्षेत्र हो बच्चे पैदा करने वाला क्षेत्र हो या जीवन साथी के लाभ वाला क्षेत्र को सभी के अन्दर छिद्रान्वेषण करने की आदत जन्म के समय से ही है। पिछले समय मे राहु ने मौत के भाव को गोचर मे लिया था उस समय जातक के परिवार मे जो भी मौत से सम्बन्धित कारण बने थे सभी के अन्दर राहु वाली बीमारियों के कारणो का बनना माना जाता है इसी के साथ जो भी कारण जातक ने अपने कार्य आदि के लिये किये थे सभी के अन्दर आकस्मिक रूप से बनने वाले कर्जा दुश्मनी बीमारी और जानजोखिम के कारण इसी राहु ने प्रदान किये थे। जहां भी रिस्क लेने की बात आयी होगी जातक को किसी न किसी बीमारी से जूझना पडा होग। भले ही वह संतान के रहने का स्थान हो या शरीर मे खुद के जननांग या लैट्रिन बाथरूम वाली बीमारियो का होना हो। घर के अन्दर का पारिवारिक माहौल हो या पिता के बाहरी कारणो का बनना हो,चाहे वह धर्म कर्म सम्बन्धी कारणो का करना हो या धन को प्रयोग करने का कारण हो सभी बाते राहु के कारण असमंजस और अचानक बनने की बात समझी जा सकती है। वर्तमान मे राहु का गोचर सप्तम मे हो रहा है यह राशि वैसे भी अन्दरूनी मामले की राशि कही जाती है और जब यह सप्तम मे आजाती है तो पति या पत्नी के द्वारा चुभने वाली बात को करना आम बात माना जाता है अक्सर जीवन साथी के भाव मे इस राशि के आने से जातक के जीवन साथी का भाव एक ही माना जाता है कि वह गुप्त साधनो से धन कमाना और गुप्त कार्य करने के बाद अपनी पोजीशन को बढाना दुनिया के भेद समझ कर उनसे काम लेना और जब किसी बात का नही होना हो तो अपने ही कार्यों से अपने को समाप्त कर लेना। कामुकता का होना भी अधिक पाया जाता है कारण इस भाव मे वृश्चिक राशि का होना कामुकता को सामने रखकर ही जीवन साथी के साथ सम्बन्ध बनाये जाते है और जीवन साथी की किसी भी कार्य योजना पर नजर रखना भी एक कारण बन जाता है जब राहु का गोचर इस राशि मे होता है तो जीवन साथी के साथ भी कुछ अच्छा नही होता है वह अपनी किसी न किसी प्रकार की शरीर की बीमारी से भी परेशान होता है और अपने ही ख्यालो मे खोने के बाद तथा अपनी ही बात को उत्तम रूप से मानने के बाद वह समझ भी नही पाता है कि उसे क्या करना है और क्या नही करना है।
सप्तम भाव को मंत्रणा का भाव भी कहा जाता है,किसी भी प्रकार से जातक को किसी प्रकार की सलाह लेने के समय मे कोई अटपटी बात सुनने को मिले या किसी भी काम को करने के लिये रास्ता नही मिल रहा हो तो वह अपने जीवन साथी से रास्ता बनाने की बात करे तो जीवन साथी पर राहु की छाया होने के कारण जीवन साथी सीधा सा उल्टी बात का इशारा जातक के पूर्वजो तक कर देता है या किसी प्रकार से उल्टे धर्म कर्म की बात भी करता है,जब पारिवारिक बात होती है या सामाजिक बात होती है तो जातक अपने अनुसार उल्टी बात को ही अपने जीवन साथी से सुनता है। इसके अलावा राहु की नजर लाभ के भाव मे होने से और लाभ के भाव मे मीन राशि के होने से जातक को लाभ होता है बाहरी लोग लाभ देने के लिये सामने आते है लाभ आता भी है लेकिन उस लाभ का रूप सामने दिखाई ही नही देता है तो जातक के अन्दर एक सोच पैदा हो जाती है कि आखिर मे प्राप्त किया गया लाभ गया कहां,जीवन साथी की भी भावना होती है कि वह जो भी लाभ के साधन है वह कमाता भी खूब है और जोड कर भी रखता है लेकिन वह सब जाता कहां है,अक्सर जीवन साथी के द्वारा लाभ के कारणो को अपने परिवार के भाई बहिनो के लिये या भतीजो के लिये खर्च कर दिया जाता है,जातक को पता भी नही होता है कि कितना कहां पर खर्च हुया है इस बात पर भी जातक के मन के अन्दर एक प्रकार का गलत भाव पैदा हो जाता है,यही नही अक्सर जो भी कार्य जीवन साथी के द्वारा किये जाते है वह अपनी बहिन के लिये किये जा सकते है अगर बुध लाभ भाव मे है और शुक्र साथ है तो कमन्यूकेशन मोबाइल आदि के लिये भी किये जा सकते है,क्योंकि जन्म का केतु इसी भाव मे होने से जातक का लाभ भी कमन्यूकेसन के साधनो से ही होता है। जातक की गुप्त भावना भी एक प्रकार से कुछ विजातीय या विदेशी लोगो के सम्पर्क मे होने के कारण तथा दोस्ती की भावना मे जीवन साथी के साथ कुछ अटपटा लगने से भी दिमागी क्लेश का होना माना जा सकता है। लगन मे केतु की उपस्थिति शरीर और मन मे खाली पन को भी प्रदान करने वाला होता है जब भी मन से कोई काम करने की बात आती है तो रहने वाले स्थान या कार्य करने वाले स्थान पर खाली पन सा महसूस होता है और जो भी कार्य किये जाते है वहां दोहरे साधन भी प्रयोग करने से दिक्कत का होना माना जा सकता है। राहु जीवन साथी के भाव मे है के द्वारा जीवन साथी के प्रभाव अन्धेरे मे भी रहते है जिससे आशंकाये भी दिमाग मे बलवती हो जाती है और वे आशंकाये दिमाग को कनफ़्यूजन मे डाले रहने के कारण भी दिमाग उत्तेजित रहता है। जब जीवन साथी के भाव मे शमशानी शांति देखने को मिलती है याजीवन साथी का प्रभाव भी राख जैसा दिखाई देता है तो भी एक प्रकार से भावना भर जाती है कि जीवन बेकार है जीवन मे जो भी किया वह भी बेकार है संतान नौकरी अक्समात काम के अन्दर आने वाले अडंगे भी जीवन साथी के बदौलत तैयार हुये है,इस प्रकार से भी जीवन साथी के प्रति दिक्कत का होना माना जाता है। अक्सर सप्तम मे राहु आता है तो वह खुद के द्वारा अपनी छाया चार प्रकार से जरूर देता है,एक तो ऊंची शिक्षा और पिता परिवार पर छाया जाती है और उनके बारे मे उल्टा बोला जाता है,दूसरा मित्र वर्ग को आहत किया जाता है और जो भी मित्र वर्ग से कमन्यूकेशन किया जाता है मिलना होता है उसपर भी शक की जाने लगती है जिसके कारण भी घर मे क्लेश का होना माना जाता है इस शक से जातक को अपने जीवन साथी से डर भी लगने लगता है,जातक के शरीर पर भी इस राहु का असर रहने से भी जातक कितना ही अपने को सम्भालने की कोशिश करे अपनी कितनी ही शक्ति का प्रयोग करे जीवन साथी के राहु के द्वारा उसके एक एक क्रिया कलाप पर नजर रखने से भी दिक्कत का आना होता है जैसे किसे टेलीफ़ोन किया गया किससे क्या बात की गयी उस बात का मतलब क्या है मोबाइल मे अमुक नम्बर कहां से आया है इंटरनेट से किसे क्या लिखा गया कौन कौन मित्रता की श्रेणी मे जुडा है और उससे क्या कया बात होती है आदि बाते भी देखने को मिलती है इस बात से भी यह लगने लगता है कि जब किसी भी काम मे स्वतंत्रता नही है तो जीवन का मतलब क्या होता है और जब किसी भी काम को करने के बाद केवल क्लेश ही मिलता है तो फ़िर इस जीवन का मतलब ही क्या रह जाता है। इन सभी समस्या से बचने के लिये राहु के उपाय करना जरूरी है:-
-----जातक को तामसी भोजन और जल्दी से राय लेने वाले कारणो से बचना चाहिये राहु के इस गोचर के समय मे अगर किसी प्रकार से कोई नशा आदि करने की आदत बन जाती है तो आदमी अपने जीवन के साथ साथ अपने परिवार को भी अन्धेरे मे डाल देता है,उसके शरीर मे उन रोगो का आना शुरु हो जाता है जो आगे चलकर जब राहु छठे भाव मे जायेगा तो उसे कष्ट भोगने के लिये अस्पताली जीवन भी जीना पड सकता है और अपने जीवन साथी से अगर अधिक मन मुटाव हो जाता है तो अदालती मामले और वकीलो आदि मे खर्चा करने के बाद खुद का वैवाहिक जीवन भी समाप्त करना पडेगा और केवल भटकाव के अलावा और कोई रास्ता नही मिलेगा.
----राहु के सप्तम मे गोचर के समय जातक को शराब आदि की जरूरत महशूश होने लगती है जब शराब या इसी प्रकार के नशे की आदते शरीर से जुड जाती है तो व्यक्ति अपने जीवन साथी से लगाव भी कम कर देता है वह अपने भौतिक जीवन को तबाह भी करने लगता है और जो काम किया जाता है वह बिना सोचे विचारे किया जाता है फ़लस्वरूप बरबादी ही मिलती है.
----राहु के सप्तम मे गोचर करने से सामाजिक जीवन और पारिवारिक जीवन से जुडे लोग दूर होने लगते है उसका कारण कई प्रकार की होनी और अनहोनी बातो को वे करने लगते है और आक्षेप भी देने लगते है वास्तव मे व्यक्ति कतई साफ़ भी हो लेकिन उस व्यक्ति के हर क्रिया कलाप पर कोई न कोई ब्लेम दिया जाने लगता है,इसका कारण एक और भी माना जाता है कि व्यक्ति का जीवन साथी उल्टे शब्दो का प्रयोग समाज के लोगो या परिवार के लोगो से प्रयोग मे लाता है और अपनी ही भावना और अपने ही ख्वाब मे घूमता रहना भी माना जाता है.
-----एकान्त मे बैठे रहना एक अजीब सी दुनिया मे खोये रहना तथा ख्वाब के टूटने पर गुस्सा करना चिढचिढाना आदि भी देखा जाता है इससे भी साधारण रूप से चलता हुआ जीवन अचानक दिक्कत मे आजाता है.
इस राहु से बचने के लिये गलत संगति और अपने घर के भेद किसी से नही कहने चाहिये साथ ही जीवन साथी को किसी भी प्रकार से अकेला नही छोडना चाहिये वह अपने शरीर के साथ कोई भी अपघात कर सकता है और कोई बहुत बडा आक्षेप भी दे सकता है जो आजीवन केवल सोचने के अलावा और कोई रास्ता नही दे सकता है।
इस भाव के राहु के गोचर के बाद अक्सर वैवाहिक जीवन उन्ही का बचता है धर्म कर्म और अपने अनुसार सही मार्ग पर चलते रहे होते है अगर किसी भी प्रकार से गलत कामो मे अनैतिक कामो मे और कमाई के अन्दर कोई भी गलत नीति का प्रयोग किया गया है तो राहु सभी कार्यों के साथ जिसके लिये जो गलत कार्य किया गया है उसे ही नष्ट करने के लिये आगे आता है यह भी देखा गया है कि सौ मे से सत्तर लोगो का वैवाहिक जीवन इसी बीच मे संकट मे आजाता है.
------जातक को तीन भ्रमो से दूर रहना जरूरी है एक तो हकीकत मे चलने वाले भ्रम दूसरे गुप्त रूप से किये जाने वाले कार्यों के भ्रम और तीसरे आशंकाओ वाले भ्रम.
---जातक को अधिक कनफ़्यूजन मे फ़ौरन स्नान करना चाहिये या किसी दूसरे माहौल मे अपने को ले जाना चाहिये.
----जातक को किसी भी प्रकार से वाहनो मे कपडो मे घर के अन्दर के रंग मे या दैनिक उपयोग मे लाये जाने वाले कारणो मे नीले रंग का सख्त परहेज करने लग जाना चाहिये.
अगर अधिक से अधिक मृत्यु वाले कारणो मे जाना पड रहा है अधिक से अधिक अस्पताली कारणो मे जाना पड रहा है घर की बिजली से चलने वाले उपकरण जल्दी जल्दी खराब होने लगे है तो जातक को राहु का तर्पण कराये बिना राहत नही मिल सकती है.
---जातक को चांदी की चैन या मोती की माला गले मे पहिननी चाहिये साथ ही किसी प्रकार से भी विजातीय लोग जो अपने धर्म से उल्टे चलते है का साथ नही पकडना चाहिये.
----जातक को राहु की शांति के लिये केतु के उपाय भी करने चाहिये,जैसे शिव की आराधना लोगो की सहायता वाले काम तीर्थ स्थानो या धार्मिक स्थानो की यात्रा करना भटकने वाले जीवो की रक्षा करना पक्षियों और जानवरो पर दया करना आदि.
----जातक केतु के मंत्रों का जाप रोजाना सुबह सूर्योदय से पहले एक माला करता है तो भी राहु से शांति का कारण बनने लगता है,केतु का मंत्र है ऊँ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं सह केतुवे नम: 
----जातक एक लहसुनिया शनिवार की सुबह सूर्योदय से पहले गणेश मन्दिर मे दान कर दे और दूसरी लहसुनिया पेंडल बनाकर गले मे धारण कर ले तो भी फ़ायदा मिलता है.
---चार मुखी रुद्राक्ष चादी के तार मे बंधवा कर (छेद करवा कर नही) गले मे चांदी की चैन मे पहिने तो भी फ़ायदा होता है.चार मुखी रुद्राक्ष का मंत्र है - ऊँ स्त्रीं हुं फ़ट स्वाहा.
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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