आइये जाने और समझे वास्तुशास्त्र का प्रभाव,उपयोगिता एवं प्रासंगिकता----

वास्तुशास्त्र जीवन के संतुलन का प्रतिपादन करता है। यह संतुलन बिगड़ते ही मानव एकाकी और समग्र रूप से कई प्रकार की कठिनाइयों और समस्याओं का शिकार हो जाता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार पंचमहाभूतों- पृथ्वी ,जल , वायु , अग्नि और आकाश के विधिवत उपयोग से बने आवास में पंचतत्व से निर्मित प्राणी की क्षमताओं को विकसित करने की शक्ति स्वत: स्फूर्त हो जाती है। 

पृथ्वी मानवता और प्राणी मात्र का पृथ्वी तत्व (मिट्टी) से स्वाभाविक और भावनात्मक संबंध है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। इसमें गुरूत्वाकर्षण और चुम्बकीय शक्ति है। यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि पृथ्वी एक विशालकाय चुम्बकीय पिण्ड है। एक चुम्बकीय पिण्ड होने के कारण पृथ्वी के दो ध्रुव उत्तर और दक्षिण ध्रुव हैं। पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणी , सभी जड़ और चेतन वस्तुएं पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण से प्रभावित होते हैं।वास्तुशास्त्र भवन में पंचमहाभूतों का सही संतुलन और सामंजस्य पैदा कर घर के सभी सदस्यों के लिए सौहार्दपूर्ण वातावरण पैदा करता है। आजकल घरों में साज-सज्जा के बेहतरीन नमूने और अत्याधुनिक उपकरणों की कोई कमी नहीं पाई जाती। अगर कमी होती है, तो प्राकृतिक प्रकाश , वायु और पंचतत्वों के सही संतुलन की। एक घर में सही स्थान पर बनी एक बड़ी खिड़की की उपयोगिता कीमती और अलंकृत साजसज्जा से कहीं ज्यादा है।
भाग्य का निर्माण केवल ज्योतिष और वास्तु से ही नहीं होता, वरन् इनके साथ कर्म का योग होना भी अति आवश्यक है। इसलिए ज्योतिषीय एवं वास्तुसम्मत ज्ञान के साथ-साथ विभिन्न दैवीय साधनाओं, वास्तु पूजन एवं ज्योतिष व वास्तु के धार्मिक पहलुओं पर भी विचार करना अत्यंत आवश्यक है। भाग्यवृद्धि में वास्तु शास्त्र का महत्व वास्तु विद्या बहुत ही प्राचीन विद्या है। ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान के साथ-साथ वास्तु शास्त्र का ज्ञान भी उतना ही आवश्यक है जितना कि ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान। विश्व के प्राचीनतम् ग्रंथ ऋग्वेद में भी इसका उल्लेख मिलता है। वास्तु के गृह वास्तु, प्रासाद वास्तु, नगर वास्तु, पुर वास्तु, दुर्गवास्तु आदि अनेक भेद हैं। भाग्य वृद्धि के लिए वास्तु शास्त्र के नियमों का महत्व भी कम नहीं है। घर या ऑफिस का वास्तु ठीक न हो तो भाग्य बाधित होता है। वास्तु और भाग्य का जीवन में कितना संयोग है? क्या वास्तु के द्वारा भाग्य बदलना संभव है? इस प्रश्न के उत्तर के लिए यह जानना आवश्यक है कि भाग्य का निर्माण वास्तु से नहीं अपितु कर्म से होता है और वास्तु का जीवन में उपयोग एक कर्म है और इस कर्म की सफलता का आधार वास्तुशास्त्रीय ज्ञान है। पांच आधारभूत पदार्थों भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश से यह ब्रह्मांड निर्मित है और ये पांचों पदार्थ ही पंच महाभूत कहे जाते हैं। इन पांचों पदार्थों के प्रभावों को समझकर उनके अनुसार अपने भवनों का निर्माण कर मनुष्य अपने जीवन और कार्यक्षेत्र को अधिक सुखी और सुविधा संपन्न कर सकता है। प्राचीन महर्षियों व आधुनिक विद्वानों ने यह सिद्ध कर दिखाया है कि आकाशस्थ ग्रहों के रूप, रंग, गुण, धर्म, स्वभाव व लक्षण आदि का प्रभाव एक-दूसरे से भिन्न है। प्रत्येक ग्रह अपने गुण धर्म के अनुसार माता के गर्भ में शिशु पिंड पर अपना प्रभाव प्रथम मास में दिखाते हैं। जैसे प्रथम मास में शुक्र, द्वितीय मास में मंगल, तृतीय मास में गुरु, चतुर्थ मास में सूर्य, पंचम मास में चंद्र, षष्ठ मास में शनि, सप्तम मास में बुध, अष्टम मास में लग्नेश और नवम मास में पुनः चंद्र का प्रभाव पड़ने पर बालक का जन्म होता है। इस कारण प्रत्येक मनुष्य में भिन्न-भिन्न रूप रंग, गुण, धर्म, स्वभावादि दिखाई देते हैं। उक्त ग्रहों के आधार पर भी वास्तुशास्त्रीय उपाय किये जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान से मनुष्य पूर्व जन्मों के शुभाशुभ कर्मों का ज्ञान प्राप्त कर सकता है और वास्तु शास्त्रीय ज्ञान प्रगति की ओर उन्मुख होने में सबंध मिलता है। कुछ आधुनिक विचारधारा के लोग यह आक्षेप लगाते हैं कि ईश्वर निर्मित घटनाओं का होना निश्चित है तो उसे जानकर ज्योतिषीय या वास्तुशास्त्रीय उपाय करने से क्या लाभ होगा? इसका उत्तर यह है कि मनुष्य को भविष्य में होने वाले अशुभ घटनाओं का ज्ञान यदि उसे पूर्व में ही प्राप्त हो जाए तो उन घटनाओं के प्रतिकार के लिए उपाय निश्चित करने में सहायता नहीं मिलेगी? आने वाले अशुभ प्रसंगों से वह सावधान व सतर्क रहना संभव नहीं होगा? सूर्य चंद्रमादि अन्य ग्रहों और तारों आदि का पृथ्वी के वातावरण पर कितना प्रभाव पड़ता है, यह स्पष्ट है। 
जिस प्रकार पृथ्वी अनेक तत्वों और अनेक प्रकार के खनिजों जैसे लोहा , तांबा , इत्यादि से भरपूर है उसी प्रकार हमारे शरीर में भी अन्य धातुओं के अलावा लौह धातु भी विद्यमान है। कहने का तात्पर्य है कि हमारा शरीर भी चुम्बकीय है और पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति से प्रभावित होता है। वास्तु के इसी सिद्धांत के कारण यह कहा जाता है कि दक्षिण की ओर सिर करके सोना चाहिए। इस प्रकार सोते समय हमारा शरीर ब्रह्मांड से अधिक से अधिक शक्ति को ग्रहण करता है और एक चुम्बकीय लय में सोने की स्थिति से मनुष्य अत्यंत शांतिप्रिय नींद को प्राप्त होता है और सुबह उठने पर तरोताजा महसूस करता है।
वास्तु का प्रभाव चिरस्थायी है, क्योंकि पृथ्वी का यह झुकाव शाश्वत है, ब्रह्माण्ड में ग्रहों आदि की चुम्बकीय शक्तियों के आधारभूत सिध्दांत पर यह निर्भर है और सारे विश्व में व्याप्त है इसलिए वास्तुशास्त्र के नियम भी शाश्वत है, सिध्दांत आधारित, विश्वव्यापी एवं सर्वग्राहा हैं। किसी भी विज्ञान के लिए अनिवार्य सभी गुण तर्क संगतता, साध्यता, स्थायित्व, सिध्दांत परकता एवं लाभदायकता वास्तु के स्थायी गुण हैं। अतः वास्तु को हम बेहिचक वास्तु विज्ञान कह सकते हैं।
जैसे आरोग्यशास्त्र के नियमों का विधिवत् पालन करके मनुष्य सदैव स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकता है, उसी प्रकार वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार भवन निर्माण करके प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को सुखी बना सकता है। चिकित्साशास्त्र में जैसे डाक्टर असाध्य रोग पीड़ित रोगी को उचित औषधि में एवं आपरेशन द्वारा मरने से बचा लेता है उसी प्रकार रोग, तनाव और अशांति देने वाले पहले के बने मकानों को वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार ठीक करवा लेने पर मनुष्य जीवन में पुनः आरोग्य, शांति और सम्पन्नता प्राप्त कर सकता है।
हमारे ग्रंथों के अनुसार----
शास्तेन सर्वस्य लोकस्य परमं सुखम्
चतुवर्ग फलाप्राप्ति सलोकश्च भवेध्युवम्
शिल्पशास्त्र परिज्ञान मृत्योअपि सुजेतांव्रजेत्
परमानन्द जनक देवानामिद मीरितम्
शिल्पं बिना नहि देवानामिद मीरितम्
शिल्पं बिना नहि जगतेषु लोकेषु विद्यते।
जगत् बिना न शिल्पा च वतंते वासवप्रभोः॥

विश्व के प्रथम विद्वान वास्तुविद् विश्वकर्मा के अनुसार शास्त्र सम्मत निर्मित भवन विश्व को सम्पूर्ण सुख, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति कराता है। वास्तु शिल्पशास्त्र का ज्ञान मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कराकर लोक में परमानन्द उत्पन्न करता है, अतः वास्तु शिल्प ज्ञान के बिना निवास करने का संसार में कोई महत्व नहीं है। जगत और वास्तु शिल्पज्ञान परस्पर पर्याय हैं।
इस ब्रह्माण्ड में अनेक ग्रह हैं किन्तु जीवन केवल पृथ्वी पर ही है, ऐसा क्यों? इसका कारण यही है केवल पृथ्वी पर ही इन पंचमहाभूतों का सही संतुलन है। वर्तमान परिवेश में विश्व के सभी देशों में हिंसा और आतंकवाद का बोलबाला है। प्रतिदिन स्थान-स्थान पर दिन दहाड़े होने वाले अमानुषिक कृत्य, हिंसा, हत्या, लूटपाट, जलाने-मारने की घटनायें मानव को सदैव आतंकित और तानवग्रस्त रखती हैं। मानवीय संवेदनाएं लुप्त हो रही है। ईमानदारी और नैतिकता की बातें व्यक्ति को बुरी लगती है। मूल्यहीनता के वातावरण में मानव में सहयोग, सद्भाव, संवेदना और भाईचारे के स्थान पर असहयोग, अलगाव,र् ईष्या तथा पारस्परिक विद्वेष पनप रहा है। ऐसी स्थिति में हमारे लिए वास्तुशास्त्र ही एक मात्र आधार है जिसका अध्ययन और अनुकरण करके हम विश्व में पुनः शांति स्थापित कर सकते हैं। सच पूछा जाये तो यह तनाव, अशांति एवं अमानवीय कृत्य सम्पूर्ण विश्व में वास्तु सिध्दांतों की अवहेलना करने के कारण ही दिनों-दिन बढ़ते जा रहे हैं।
वास्तुशास्त्र भारत का अत्यन्त प्राचीन शास्त्र है। वैदिक काल में इसे स्थापत्यवेद की संज्ञा दी गयी। वेदों के प्रति हमारी श्रध्दा और विश्वास आज भी उतने ही दृढ़ हैं जितने पहले थे किन्तु वर्तमान में इस शास्त्र क प्रति संदेह व्यक्त किये जाते हैं जबकि स्थान-स्थान पर खुदाई में प्राप्त प्राचीन बस्तियों के भग्नावेश इस बात के साक्षी हैं कि प्राचीन समय में मंदिर, प्रासाद, बस्तियों एवं नगरों का निर्माण वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार ही होता था और इसी कारण लोग अपेक्षाकृत अधिक सुखी थे।
वास्तुविद्या में भवन पर सूर्य रश्मियों का वही प्रभाव डालने का प्रयास है जो सूर्य रश्मियों का इस पृथ्वी पर है। पृथ्वी अपनी धुरी पर पूर्व की ओर 23.50 डिग्री झुकी हुई है। इस कारण उसका उत्तर भाग, ईशान और पूर्वी भाग पूर्व की ओर झुक गये हैं दक्षिण, नैऋत्य एवं पश्चिम भाग कुछ ऊंचे उठ गये हैं। भवन निर्माण में इसी सिध्दांत के अनुसार भूखण्ड और ढलान पूर्व, उत्तर एवं ईशान और होना तथा भूखण्ड का दक्षिणी भाग, नैऋत्य तथा पश्चिमी भाग ऊंचा होना निर्दिष्ट है। अनुभव से ही यही बात सिध्द होती है कि भवन दक्षिण पश्चिम में ऊंचे तथा ऊंचाई पर निर्मित होते हैं तथा जिनका ढलान पूर्व, उत्तर एवं ईशान की ओर होता है अर्थात् जिनक, प्रयोग लाया गया जल एवं वर्षा का जल ईशान कोण से अथवा पूर्व उत्तर की ओर से बहकर बाहर निकलता हो वहां के निवासी आरोग्य, समृध्दि एवं पारिवारिक शांति का अनुभव करते हैं तथा इससे विपरीत दिशा वालें संकट और विघ्नों से घिरे रहते हैं। 
मानव सभ्यता के विकास एवं विज्ञान की उन्नति के साथ भवन निर्माण कला में अनेकानेक परिवर्तन होते गये। जनसंख्या में द्रूतगति से होती वृध्दि और भूखण्डों की सीमित संख्या जनसामान्य की अशिक्षा और वास्तुग्रंथों के संस्कृत में लिखे होने एवं मुद्रण प्रणाली के विकसित न होने के कारण इस शास्त्र की उत्तरोत्तर अवहेलना होगी गयी। विदेशी शासकों के बार-बार हुए आक्रमणों एवं अंग्रेजों के भारत में आगमन के पश्चात् पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में हम अपने समृध्द ज्ञान के भंडार पर पूर्णरूप से अविश्वास कर इसे कपोल कल्पित, भ्रामक एवं अंधविश्वास समझने लगे। 
सूर्य इस ब्रह्मांड की आत्मा है और ऊर्जा का मुखय स्त्रोत भी है। सूर्य और अन्य तारों से प्राप्त ऊष्मा और प्रकाश सभी आकाशीय पिंडों की परस्पर आकर्षण शक्ति, पृथ्वी पर उत्पन्न चुंबकीय बल क्षेत्र और इस प्रकार के अन्य भौतिक कारकों का पृथ्वी की भौतिक दशा, वातावरण और जलवायु पर निश्चित प्रभाव पड़ता है और इन सबका मानव जीवन पर अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः वास्तु शास्त्र का ज्योतिष और खगोल से निकट संबंध है। मनुष्य के रहन-सहन को ज्योतिष और खगोलीय कारक प्रभावित करते हैं। जहां प्राचीन शास्त्रों में वर्णित सिद्धांतों के अनुसार भवन, मंदिर, प्रासाद आदि निर्मित किए गए हैं और उनसे संबंधित सभी व्यक्तियों को सभी प्रकार से सुख-समृद्धि और शांति की प्राप्ति हुई है। दूसरी ओर, ऐसे भवन भी है। जो वास्तु सम्मत नहीं बने हैं। उनमें रहने वाले व्यक्तियों को भयंकर कष्ट सहने पड़े हैं। धन और स्वास्थ्य की हानि, परिवार जनों की मृत्यु, सुख-शांति का अभाव, गरीबी, पीड़ा आदि से जूझना पड़ा है। विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र के अनुसार, ''वास्तु शास्त्र के कारण ही समस्त ब्रह्मांड, सुख, वैभव और समृद्धि प्राप्त करता है। मनुष्य को देवत्व प्राप्त होता है। शिल्प-शास्त्र के ज्ञान और संसार के अस्तित्व में निकट का सह-संबंध है। वास्तु शास्त्र के अनुपालन करने वालों को न केवल सांसारिक सुख की प्राप्ति होती है, वरन् उन्हें नैसर्गिक सुख-शांति का भी अनुभव होता है। आज के युग में वैज्ञानिकों ने भी माना है कि सूर्य की महत्ता का विशेष प्रतिपादन सत्य है, क्योंकि उन्होंने भी यह सिद्ध कर दिया कि सूर्य महाप्राण जब शरीर क्षेत्र में अवतीर्ण होता है तो आरोग्य, आयुष्य, तेज, ओज, बल, उत्साह, स््फूर्ति, पुरुषार्थ और विभिन्न महानता मानव में परिणत होने लगती है। आज भी वैज्ञानिक मानते हैं कि सूर्य की प्रातःकालीन अल्ट्रावॉयलेट रश्मियों में विटामिन डी प्रचुर मात्रा में होता है। इन किरणों के प्रभाव से मानव, जीवों तथा पेड़-पौधों में ऊर्जा का विकास होता है। इनसे शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से अनेक लाभ होते हैं। आज भी वास्तु विज्ञान में भवन निर्माण के तहत पूर्व दिशा को मुखय स्थान दिया गया है जिससे सूर्य की प्रातःकालीन किरणें भवन के अंदर अधिक से अधिक प्रवेश कर सकें और उसमें रहने वाले मानव स्वास्थ्य एवं मानसिक दृष्टिकोण से उन्नत रहें। वास्तु शास्त्र की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पंचमहाभूतों से निर्मित प्राणी के जीवन में इन महाभूतों से निर्मित वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने को प्राथमिकता देता है और मानव मात्र की शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं को उन्नत करता है। इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर अपने नियमों एवं सिद्धांतों का प्रतिपादन एवं विवेचन करता है। कहा जाता है कि वास्तु के नियम के विपरीत यदि कोई भवन निर्माण करता है तो प्राकृतिक शक्तियों का कोप उसे झेलना पड़ता है। यदि वास्तु के नियम के अनुसार भवन का निर्माण होता है तो प्राकृतिक शक्तियों का आशिर्वाद भवन के स्वामी को सत्ता प्राप्त होता रहता है, ऐसा विद्वानों का मानना है। भवन निर्माण इन सभी मूल आधार शक्तियों को ध्यान में रखकर किया जाता है ताकि भवन में रहने वाला जीव इन शक्तियों से वंचित न रहे, क्योंकि इन्हीं शक्तियों के आधार पर ही उसका तन मन एवं जीवन संतुिलत एवं र्स्फूत रहता है, भाग्य वृद्धि होती है।
अपने देश भारत के मानचित्र पर दृष्टिपात करें। भारत के उत्तर में विश्व में सर्वाधिक उच्च पर्वत नगाधिराज हिमालय औरर दक्षिण में नीची भूमि वाला हिन्द महासागर है। इसके आग्नेय, नैऋत्य और पश्चिम में भी जल है परिणामस्वरूप यहां सदैव गृहयुध्द, आक्रमण, विदेशियों द्वारा लूटपाट धन सम्पत्ति का हरण और नाश होता रहा है। दक्षिण में जल होने के कारण यहां की महिलाएं सदैव दुःखी रही है, वे जलने मरने को बाध्य हैं चाहे जौहर के रूप में, सती के रूप में या अब दहेज की बलिदेवी पर।
उन पर सदैव अत्याचार होते रहे हैं। भारत के ईशान और पूर्वी भाग पश्चिम से कुछ नीचे झुके हुए तथा बढ़े हुए होने के कारण ही यह देश अपने आध्यात्म, संस्कृति दर्शन तथा उच्च जीवन मूल्यों एवं धर्म से समस्त विश्व को सदैव प्रभावित करता रहा है। वास्तु का प्रभाव मंदिरों पर भी होता है, विश्व प्रसिध्द तिरूपति बालाजी का मंदिर वास्तु सिध्दांतों का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, वास्तुशास्त्र की दृष्टि से यह मंदिर शत प्रतिशत सही बना हुआ है।
इसी कारण यह संसार का सबसे धनी एवं ऐश्वर्य सम्पन्न मंदिर है जिसकी मासिक आप करोड़ों रुपये है। यह मंदिर तीन ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है किन्तु उत्तर और ईशान नीचा है। वहां पुष्करणी नदी है, उत्तर में आकाश गंगा तालाब स्थित है जिसके जल से नित्य भगवान की मूर्ति को स्ान कराया जाता है। मंदिरों पूर्वमुखी है और मूर्ति पश्चिम में पूर्व मुखी रखी गई है।
इसके ठीक विपरीत कोणार्क का सूर्य मंदिर है। अपनी जीवनदायिनी किरणों से समस्त विश्व को ऊर्जा, ताप और तेज प्रदान करने वाले भुवन भास्कर सूर्य के इस प्राचीन अत्यन्त भव्य मंदिर की वह भव्यता, वैभव और समृध्दि अधिक समय तक क्यों नहीं टिक पायीं? इसका कारण वहां पर पाये गये अनेक वास्तु दोष हैं। मुख्यतः मंदिर का निर्माण स्थल अपने चारों ओर के क्षेत्र से नीचा है। मंदिर के भूखण्ड में उत्तरी वायव्य एवं दक्षिणी नैऋत्य बढ़ा हुआ है जिनसे उत्तरी ईशान एवं दक्षिणी आग्नेय छोटे हो गये हैं। रथनुमा आकार के कारण मंदिर का ईशान और आग्नेय कट गये हैं तथा आग्नेय में कुआं है। इसी कारण भव्य और समृध्द होने पर भी इस मंदिर की ख्याति, मान्यता एवं लोकप्रियता नहीं बढ़ सकी।
इसी प्रकार विश्व के मानचित्र पर स्थित सभी देशों को वास्तुशास्त्र के आधार पर परखा जा सकता है और सभी देशों के मुख्य स्थलों को भी, जिनके निरीक्षण, अध्ययन और परखने पर हमें वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों की सत्यता और उपयोगिता के दर्शन होते हैं और इसके प्रति हमारा विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है।
जनसंख्या के आधिक्य एवं विज्ञान की प्रगति के कारण आज समस्त विश्व में बहुमंजिली इमारतों का निर्माण किया जा रहा है। जनसामान्य वास्तु सिध्दांतों के विरुध्द बने छोटे-छोटे फ्लेट्स में रहने के लिए बाध्य है। कहा जाता है कि इन्हें वास्तुशास्त्र के अनुरूप नहीं बनाया जा सकता।
पर यदि राज्य सरकारें वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार कॉलोनी निर्माण करने की ठान ही लें और भूखण्डों को आड़े, तिरछे, तिकाने, छकोने न काटकर सही दिशाओं के अनुरूप वर्गाकार या आयताकार काटें, मार्गों को सीधा निकालें एवं कॉलोनाइजर्स का बाध्य करें कि उन्हें वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों का अनुपालन करते हुए ही बहुमंजिली इमारतें तथा अन्य भवन बनाने हैं तो शत-प्रतिशत तो न सही पर साठ प्रतिशत तक तो वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार नगर, कॉलोनी, बस्ती, भवनों, औद्योगिक-व्यापारिक केन्द्रों तथा अन्य का निर्माण किया जा सकता है जिसके फलस्वरूप जन सामान्य सुख, शांति पूर्ण एवं अरोग्यमय, तनाव रहित जीवन व्यतीत कर सकता है।
हमारे प्राचीन साहित्य में वास्तु का अथाह महासागर विद्यमान है। आवश्यकता है केवल खोजी दृष्टि रखने वाले सजग गोताखोर की जो उस विशाल सागर में अवगाहन कर सत्य के माणिक मोती निकाल सके और उस अमृत प्रसाद को समान रूप से जन सामान्य में वितरित कर सुख और समृध्दि का अप्रतिम भण्डार भेंट कर सकें, तभी वास्तुशास्त्र की सही उपयोगिता होगी।
जनसामान्य वास्तु सिध्दांतों के विरुध्द बने छोटे-छोटे फ्लेट्स में रहने के लिए बाध्य है। कहा जाता है कि इन्हें वास्तुशास्त्र के अनुरूप नहीं बनाया जा सकता।यदि राज्य सरकारें वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार कॉलोनी निर्माण करने की ठान ही लें और भूखण्डों को आड़े, तिरछे, तिकाने, छकोने न काटकर सही दिशाओं के अनुरूप वर्गाकार या आयताकार काटें, मार्गों को सीधा निकालें एवं कॉलोनाइजर्स का बाध्य करें कि उन्हें वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों का अनुपालन करते हुए ही बहुमंजिली इमारतें तथा अन्य भवन बनाने हैं तो शत-प्रतिशत तो न सही पर साठ प्रतिशत तक तो वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार नगर, कॉलोनी, बस्ती, भवनों, औद्योगिक-व्यापारिक केन्द्रों तथा अन्य का निर्माण किया जा सकता है जिसके फलस्वरूप जन सामान्य सुख, शांति पूर्ण एवं अरोग्यमय, तनाव रहित जीवन व्यतीत कर सकता है।
वास्तु शास्त्र एवं ज्योतिष शास्त्र दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं क्योंकि दोनों एक-दूसरे के अभिन्न अंग हैं। जैसे शरीर का अपने विविध अंगों के साथ अटूट संबंध होता है। ठीक उसी प्रकार ज्योतिष शास्त्र का अपनी सभी शाखायें प्रश्न शास्त्र, अंक शास्त्र, वास्तु शास्त्र आदि के साथ अटूट संबंध है। ज्योतिष एवं वास्तु शास्त्र के बीच निकटता का कारण यह है कि दोनों का उद्भव वैदिक संहितायों से हुआ है। दोनों शास्त्रों का लक्ष्य मानव मात्र को प्रगति एवं उन्नति की राह पर अग्रसर कराना है एवं सुरक्षा देना है। अतः प्रत्येक मनुष्य को वास्तु के अनुसार भवन का निर्माण करना चाहिए एवं ज्योतिषीय उपचार (मंत्र, तंत्र एवं यंत्र के द्वारा) समय-समय पर करते रहना चाहिए, क्योंकि ग्रहों के बदलते चक्र के अनुसार बदल-बदल कर ज्योतिषीय उपचार करना पड़ता है। वास्तु तीन प्रकार के होते हैं- त्र आवासीय - मकान एवं फ्लैट त्र व्यावसायिक -व्यापारिक एवं औद्योगिक त्र धार्मिक- धर्मशाला, जलाशय एवं धार्मिक संस्थान। वास्तु में भूमि का विशेष महत्व है। भूमि चयन करते समय भूमि या मिट्टी की गुणवत्ता का विचार कर लेना चाहिए। भूमि परीक्षण के लिये भूखंड के मध्य में भूस्वामी के हाथ के बराबर एक हाथ गहरा, एक हाथ लंबा एवं एक हाथ चौड़ा गड्ढा खोदकर उसमें से मिट्टी निकालने के पश्चात् उसी मिट्टी को पुनः उस गड्ढे में भर देना चाहिए। ऐसा करने से यदि मिट्टी शेष रहे तो भूमि उत्तम, यदि पूरा भर जाये तो मध्यम और यदि कम पड़ जाये तो अधम अर्थात् हानिप्रद है। अधम भूमि पर भवन निर्माण नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार पहले के अनुसार नाप से गड्ढा खोद कर उसमें जल भरते हैं, यदि जल उसमें तत्काल शोषित न हो तो उत्तम और यदि तत्काल शोषित हो जाए तो समझें कि भूमि अधम है। भूमि के खुदाई में यदि हड्डी, कोयला इत्यादि मिले तो ऐसे भूमि पर भवन नहीं बनाना चाहिए। यदि खुदाई में ईंट पत्थर निकले तो ऐसा भूमि लाभ देने वाला होता है। भूमि का परीक्षण बीज बोकर भी किया जाता है। जिस भूमि पर वनस्पति समय पर उगता हो और बीज समय पर अंकुरित होता हो तो वैसा भूमि उत्तम है। जिस भूखंड पर थके होकर व्यक्ति को बैठने से शांति मिलती हो तो वह भूमि भवन निर्माण करने योग्य है। वास्तु शास्त्र में भूमि के आकार पर भी विशेष ध्यान रखने को कहा गया है। वर्गाकार भूमि सर्वोत्तम, आयताकार भी शुभ होता है। इसके अतिरिक्त सिंह मुखी एवं गोमुखि भूखंड भी ठीक होता है। सिंह मुखी व्यावसायिक एवं गोमुखी आवासीय दृष्टि उपयोग के लिए ठीक होता है। किसी भी भवन में प्राकृतिक शक्तियों का प्रवाह दिशा के अनुसार होता है अतः यदि भवन सही दिशा में बना हो तो उस भवन में रहने वाला व्यक्ति प्राकृतिक शक्तियों का सही लाभ उठा सकेगा, किसकी भाग्य वृद्धि होगी। किसी भी भवन में कक्षों का दिशाओं के अनुसार स्थान इस प्रकार होता है।
हमारे प्राचीन साहित्य में वास्तु का अथाह महासागर विद्यमान है। आवश्यकता है केवल खोजी दृष्टि रखने वाले सजग गोताखोर की जो उस विशाल सागर में अवगाहन कर सत्य के माणिक मोती निकाल सके और उस अमृत प्रसाद को समान रूप से जन सामान्य में वितरित कर सुख और समृध्दि का अप्रतिम भण्डार भेंट कर सकें, तभी वास्तुशास्त्र की सही उपयोगिता होगी।
हमारे ऋषियों का सारगर्भित निष्कर्ष है , ' यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे। ' जिन पंचमहाभूतों से पूर्ण ब्रह्मांड संरचित है उन्हीं तत्वों से हमारा शरीर निर्मित है और मनुष्य की पांचों इंद्रियां भी इन्हीं प्राकृतिक तत्वों से पूर्णतया प्रभावित हैं। आनंदमय , शांतिपूर्ण और स्वस्थ जीवन के लिए शारीरिक तत्वों का ब्रह्मांड और प्रकृति में व्याप्त पंचमहाभूतों से एक सामंजस्य स्थापित करना ही वास्तुशास्त्र की विशेषता है।

वास्तुशास्त्र को लेकर हर प्रकार से प्रयोग किया जा सकता है। भूखण्ड एवं भवन के दोषपूर्ण होने पर उसे उचित प्रकार से वास्तुनुसार साध्य बनाया जा सकता है। हमने अपने अनुभव से जाना है कि जिन घरों के दक्षिण में कुआं पाया गया उन घरों की गृहस्वामिनी का असामयिक निधन आकस्मिक रूप से हो गया तथा घर की बहुएं चिरकालीन बीमारी से पीड़ित मिली। जिन घरों या औद्योगिक संस्थानों ने नैऋत्य में बोरिंग या कुआं पाया गया वहां निरन्तर धन नाश होता रहा, वे राजा से रंक बन गये, सुख समृध्दि वहां से कोसों दूर रही, औद्योगिक संस्थानों पर ताले पड़ गये। जिन घरों या संस्थानों के ईशान कोण कटे अथवा भग्न मिले वहां तो संकट ही संकट पाया गया। यहां तक कि उस गृहस्वामी अथवा उद्योगपति की संतान तक विकलांग पायी गयी। जिन घरों के ईशान में रसोई पायी गयी उन दम्पत्तियों के यहां कन्याओं को जन्म अधिक मिला या फिर वे गृह कलह से त्रस्त मिले। जिन घरों में पश्चिम तल नीचा होता है तथा पश्चिमी नैऋत्य में मुख्य द्वार होती है, उनके पुत्र मेधावी होने पर भी निकम्मे तथा उल्टी-सीधी बातों में लिप्त मिले हैं।
वास्तु शास्त्र के आर्षग्रन्थों में बृहत्संहिता के बाद वशिष्ठसंहिता की भी बड़ी मान्यता है तथा दक्षिण भारत के वास्तु शास्त्री इसे ही प्रमुख मानते हैं। इस संहिता ग्रंथ के अनुसार विशेष वशिष्ठ संहिता के अनुसार अध्ययन कक्ष निवृत्ति से वरुण के मध्य होना चाहिए। वास्तु मंडल में निऋति एवं वरुण के मध्य दौवारिक एवं सुग्रीव के पद होते हैं। दौवारिक का अर्थ होता है पहरेदार तथा सुग्रीव का अर्थ है सुंदर कंठ वाला। दौवारिक की प्रकृति चुस्त एवं चौकन्नी होती है। उसमें आलस्य नहीं होती है। अतः दौवारिक पद पर अध्ययन कक्ष के निर्माण से विद्यार्थी चुस्त एवं चौकन्ना रहकर अध्ययन कर सकता है तथा क्षेत्र विशेष में सफलता प्राप्त कर सकता है। पश्चिम एवं र्नैत्य कोण के बीच अध्ययन कक्ष के प्रशस्त मानने के पीछे एक कारण यह भी है कि यह क्षेत्र गुरु, बुध एवं चंद्र के प्रभाव क्षेत्र में आता है। बुध बुद्धि प्रदान करने वाला, गुरु ज्ञान पिपासा को बढ़ाकर विद्या प्रदान करने वाला ग्रह है। चंद्र मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करता है। अतः इस स्थान पर विद्याभ्यास करने से निश्चित रूप से सफलता मिलती है। टोडरमल ने अपने 'वास्तु सौखयम्' नामक ग्रंथ में वर्णन किया है कि उत्तर में जलाशय जलकूप या बोरिंग करने से धन वृद्धि कारक तथा ईशान कोण में हो तो संतान वृद्धि कारक होता है। राजा भोज के समयंत्रण सूत्रधार में जल की स्थापना का वर्णन इस प्रकार किया-'पर्जन्यनामा यश्चाय् वृष्टिमानम्बुदाधिप'। पर्जन्य के स्थान पर कूप का निर्माण उत्तम होता है, क्योंकि पर्जन्य भी जल के स्वामी हैं। विश्वकर्मा भगवान ने कहा है कि र्नैत्य, दक्षिण, अग्नि और वायव्य कोण को छोड़कर शेष सभी दिशाओं में जलाशय बनाना चाहिये। तिजोरी हमेशा उत्तर, पूर्व या ईशान कोण में रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त आग्नेय दक्षिणा, र्नैत्य पश्चिम एवं वायव्य कोण में धन का तिजोरी रखने से हानि होता है। ड्राईंग रूम को हमेशा भवन के उत्तर दिशा की ओर रखना श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उत्तर दिशा के स्वामी ग्रह बुध एवं देवता कुबेर हैं। वाणी को प्रिय, मधुर एवं संतुलित बनाने में बुध हमारी सहायता करता है। वाणी यदि मीठी और संतुलित हो तो वह व्यक्ति पर प्रभाव डालती है और दो व्यक्तियों के बीच जुड़ाव पैदा करती है। र्नैत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में वास्तु पुरुष के पैर होते हैं। अतः इस दिशा में भारी निर्माण कर भवन को मजबूती प्रदान किया जा सकता है, जिससे भवन को नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव से बचाकर सकारात्मक शक्तियों का प्रवेश कराया जा सकता है। अतः गोदाम (स्टोर) एवं गैरेज का निर्माण र्नैत्य कोण में करते हैं। जिस भूखंड का ईशान कोण बढ़ा हुआ हो तो वैसे भूखंड में कार्यालय बनाना शुभ होता है। वर्गाकार, आयताकार, सिंह मुखी, षट्कोणीय भूखंड पर कार्यालय बनाना शुभ होता है। कार्यालय का द्वार उत्तर दिशा में होने पर अति उत्तम होता है। पूर्वोत्तर दिशा में अस्पताल बनाना शुभ होता है। रोगियों का प्रतीक्षालय दक्षिण दिशा में होना चाहिए। रोगियों को देखने के लिए डॉक्टर का कमरा उत्तर दिशा में होना चाहिए। डॉक्टर मरीजों की जांच पूर्व या उत्तर दिशा में बैठकर करना चाहिए। आपातकाल कक्ष की व्यवस्था वायव्य कोण में होना चाहिए। यदि कोई भूखंड आयताकार या वर्गाकार न हो तो भवन का निर्माण आयताकार या वर्गाकार जमीन में करके बाकी जमीन को खाली छोड़ दें या फिर उसमें पार्क आदि बना दें। भवन को वास्तु के नियम से बनाने के साथ-साथ भाग्यवृद्धि एवं सफलता के लिए व्यक्ति को ज्योतिषीय उपचार भी करना चाहिए। सर्वप्रथम किसी भी घर में श्री यंत्र एवं वास्तु यंत्र का होना अति आवश्यक है। श्री यंत्र के पूजन से लक्ष्मी का आगमन होता रहता है तथा वास्तु यंत्र के दर्शन एवं पूजन से घर में वास्तु दोष का निवारण होता है। इसके अतिरिक्त गणपति यंत्र के दर्शन एवं पूजन से सभी प्रकार के विघ्न-बाधा दूर हो जाते हैं। ज्योतिष एवं वास्तु एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना प्रारंभिक ज्योतिषीय ज्ञान के वास्तु शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता और बिना 'कर्म' के इन दोनों के आत्मसात ही नहीं किया जा सकता। इन दोनों के ज्ञान के बिना भाग्य वृद्धि हेतु किसी भी प्रकार के कोई भी उपाय नहीं किए जा सकते।
वास्तुविद्या मकान को एक शांत , सुसंस्कृत और सुसज्जित घर में तब्दील करती है। यह घर परिवार के सभी सदस्यों को एक हर्षपूर्ण , संतुलित और समृद्धि जीवन शैली की ओर ले जाता है।
मकान में अपनी ज़रूरत से अधिक अनावश्यक निर्माण और फिर उन फ्लोर या कमरों को उपयोग में न लाना ,बेवजह के सामान से कमरों को ठूंसे रखना भवन के आकाश तत्व को दूषित करता है। नकारात्मक शक्तियों के दुष्प्रभाव से बचने के लिए सुझाव है कि भवन में उतना ही निर्माण करें जितना आवश्यक हो।
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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