केसे करें पितरों की मनुहार श्राद्ध पक्ष में ------

प्रतिवर्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक श्राद्ध पक्ष मान्य रहता है। इस वर्ष यह 29 सितम्बर,2012   से 15 अक्टूबर,2012  तक रहेगा। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध पक्ष में दिवंगत पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान यज्ञ और भोजन का विशेष प्रावधान बताया गया 
'विष्णु पुराण' में कहा गया है कि श्राद्ध और तर्पण से तृप्त होकर पितृगण समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं। श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों के द्वारा ही होती है अत: श्राद्ध के अवसर पर दिवंगत पूर्वजों की मृत्यु तिथि को निमंत्रण देकर ब्राह्मण को भोजन, वस्त्र और दक्षिणा सहित दान देकर श्राद्ध कर्म करना चाहिए। इस दिन पांच पत्तों पर अलग-अलग भोजन सामग्री रखकर पंचबलि करें। ये हैं- गौ बलि, श्वान बलि, काक बलि, देवादि बलि और पिपिलिकादि बलि (चींटियों के लिए)। इसके बाद अग्नि में भोजन सामग्री, सूखे आंवले और मुनक्का का भोग लगाएं। श्राद्ध में एक हाथ से पिंड और आहूति दें लेकिन तर्पण में दोनों हाथों से जल दें।
श्राद्ध के द्वारा प्रसन्न हुए पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग आदि प्रदान करते हैं। पितृश्वरों के आशीर्वाद से ही जन्म कुंडली में निर्मित पितृदोषों के दुष्परिणामों से बचा जा सकता है। आश्विन कृष्ण पक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाते हैं जबकि वार्षिक श्राद्ध एकोदिष्ट होते हैं। वसु, रूद्र और आदित्य श्राद्ध के देवता हैं। यह तीनों हमारे द्वारा किए गए श्राद्ध कर्म से तृप्त होकर मनुष्यों के पितरों को भी तृप्त करते हैं। याज्ञवल्क्य का कथन है कि श्राद्ध देवता श्राद्ध कत्ताü को दीर्घ जीवन, आज्ञाकारी संतान, धन विद्या, संसार के सुख भोग, स्वर्ग तथा दुर्लभ मोक्ष भी प्रदान करते हैं  

केसे करें तर्पण (तिलांजलि)------

श्राद्ध तिथि को स्नान करके पितरों के लिए दिया हुआ तिल मिश्रित जल भी उनके लिए अक्षय तृप्ति का साधक होता है। पितरों का तर्पण करने के पूर्व '? आगच्छन्तु में पितर इमं गृश्न्तु जलान्जलिम।।' मंत्र से उनका आह्वान करें। अब तिल के साथ पिता, पितामह, प्रपितामह और माता, मातामह, प्रमातामह के निमित्त तीन-तीन तिलांजलियां दें। तर्पण में दक्षिण की ओर मुख करके अंजली में कुश के साथ तिल मिश्रित जल लेकर पितृ तीर्थ मुद्रा (दाहिने अंगूठे के सहारे) से उसे जल में डाल दें और पुन: आकाश की तरफ गिराएं। पितरो का निवास आकाश और दक्षिण दिशा होता है। 

केसे और क्या करें श्राद्ध में..????

श्राद्ध अपने ही घर में करना चाहिए, दूसरे के घर में करना निषेध है। श्राद्ध केवल अपरान्ह काल में ही करें। श्राद्ध में तीन वस्तुएं पवित्र हैं- दुहिता पुत्र, कुतपकाल (दिन का आठवां भाग) और काले तिल। श्राद्ध में तीन प्रश्ंासनीय बातें हैं- बाहर भीतर की शुद्धि, क्रोध और जल्दबाजी नहीं करना। श्राद्ध काल में गीताजी, श्रीमद्भागवत पुराण, पितृसूक्त, पितृ संहिता, रूद्र सूक्त, ऎन्द्र मधुमति सूक्त का पाठ करना मन, बुद्धि और कर्म तीनों की शुद्धि के लिए बेहद फलप्रद है। 

केसे जाने की पितृ दोष हें..????
किसी भी जन्म कुंडली में बारहवां भाव, सूर्य शनि की युति और राहु का प्रभाव पितृदोष का कारण बनता है। कई बार यह देखने में आता है कि जन्म कुंडली में अनुकूल ग्रह योग होते हुए भी व्यक्ति को सफलताएं नहीं मिल पाती। ऎसे में देखें कि जन्म कुंडली में पितृदोष तो नहीं है। जिनकी जन्मकुंडली में सूर्य नीचगत, शत्रुक्षेत्रीय या राहु-केतु के साथ द्वादश भाव में स्थित हो तो पितृदोष बनता है। सूर्य-शनि या सूर्य-राहु का योग जन्मकुंडली के केंद्र-त्रिकोण (1, 4, 5, 7, 9, 10) भाव में हो या लग्नेश 6, 8 या 12वें भाव में और राहु लग्न भाव में हो, तो पितृदोष समझें। 
यदि किसी की जन्म पत्रिका उपलब्ध नहीं हो तो जीवन में कुछ परिस्थितियों से पितृदोष प्रमाणित होता है जैसे- बार-बार दुर्घटनाएं होना, मन में हमेशा अनहोनी की आशंका, अच्छे व्यवहार के बावजूद दुर्व्यवहार का सामना करना, नौकरी में बार-बार परेशानियां, विवाह में रूकावट, मानसिक स्थिति ठीक नहीं रहना, संतान कष्ट, पूजा-पाठ में मन नहीं लगना, रोजगार की समस्या, भय, शारीरिक व्याधि, दाम्पत्य जीवन में क्लेश इत्यादि। 
मोहजनित दुखों का कारक राहु, व्यक्ति को भौतिकता की ओर उत्प्रेरित करता है, वह यदि पाप प्रभाव में हो, नीच या शत्रुक्षेत्रीय होकर द्वादश भाव में शनि दृष्ट हो तो वह पितृदोष का कारण बनता है। अष्टम या द्वादश भाव में गुरू-राहु का योग हो और पंचम भाव में सूर्य-शनि या मंगल आदि कू्रर ग्रह स्थिति हो, तो पितृदोष के कारण संतान कष्ट होता है। व्ययेश लग्न में, अष्टमेश पंचम में और दशमेश अष्टम भाव में हो तो पितृदोष के कारण धन हानि और संतान के कारण कष्ट होता है। चंद्रमा के साथ राहु, केतु, बुध या शनि का योग भी पितृदोष की भांति मातृदोष कहलाते हैं। 

इस श्राद्ध पक्ष में करें अपनी राशी अनुसार दान और पायें उनका आशीर्वाद-----

श्राद्ध पक्ष मे राशि अनुसार दान करके ग्रहों और पितरों को प्रसन्न किया जा सकता है। 

किस राशि के जातक को क्या करना चाहिए, जानें जरा-


मेष्: इस राशि के जातकों को श्राद्ध वाले दिन ब्राह्मण को भोजन करवाकर दान स्वरूप लाल-रंग के कपड़ा देना शुभ होता है। गरीबों या मंदिरों में गुड़ से बने भोज्य पदाथोंü का दान देना श्रेष्ठ होता है।

वृष्: इन जातकों को ब्राह्मण भोज के बाद सलेटी रंग की कमीज या सलेटी रंग के वस्त्र दान करना शुभ होता है। सफेद गाय या बैल को भोजन का हिस्सा श्राद्ध के दिन खिलाना भी श्रेष्ठ फलदायी होता है।

मिथुन: ब्राह्मणों को हरे रंग के कपड़े दान करें। साथ ही किसी ब्राह्मण या गरीब को साबूत मूंग दान करें तो ठीक रहता है। यदि संभव हो तो इस दिन परिवार के मुखिया को गाय को हरा चारा खिलाना चाहिए।

कर्क : इन जातकों को श्राद्ध के दिन ब्राह्मणों को सफेद रंग के कपड़े दान करने चाहिए और संभवतया परिवार के मुखिया को तर्पण किसी जलाशय में जाकर करना श्रेष्ठ  होगा। शिव मंदिर में दूध-दही का दान भी शुभ रहता है।

सिंह: इस राशि के जातकों को ब्राह्मण के लिए 
केसरिया रंग के कपड़ों का दान श्रेष्ठ होता है और किसी विष्णु मंदिर मे अनाज से बने पदाथोंü का दान करना अत्यन्त शुभ होता है।

कन्या: ऎसे जातक श्राद्ध के दिन ब्राह्मणों को सलेटी या हरे रंग के कपड़े दान करें। साथ ही गाय या बकरी को घास खिलाना अत्यन्त श्रेष्ठ होता है। भोजन करने वाले ब्राह्मण के वजन के बराबर अनाज दान भी श्रेष्ठ होता है।

तुला: इस राशि के जातकों को ब्राह्मण के लिए दान स्वरूप सफेद रंग के वस्त्र देना शुभ होता है। यदि संभव हो तो गृहस्वामी ब्राह्मण को चांदी से बना कोई आभूषण दान करें तो अतिशुभ होता है।

वृश्चिक: ब्राह्मणों को लाल या मूंगिया रंग के कपडे दान करे तो श्रेष्ठ होगा। साथ ही धर्मस्थान में मीठा भोज्य पदार्थ दान करना अति श्रेष्ठ कर होगा। कौओं को दाल के पकौड़े खिलाना भी अच्छे फल देता है।

धनु: इस राशि के जातकों को श्राद्ध के दिन ब्राह्मण को पीले रंग के वस्त्र दान करने चाहिए। यदि संभव हो तो गृहस्वामी स्वर्णाभूषण ब्राह्मण को दान करें, साथ ही धर्म स्थान में पीले रंग के भोज्य पदाथोंü का दान करना भी शुभफलदायक होता है।

मकर: इन्हें ब्राह्मणों के दान के लिए भूरा या सलेटी रंग का कपड़ा दान करना श्रेष्ठ होता है। साथ ही धर्म स्थान में उड़द से बने पदाथोंü का दान भी श्रेष्ठ फलदायक होता है। 

कुंभ: ब्राह्मणों को सफेद या सलेटी रंग के वस्त्र दान करने चाहिए। साथ ही मंदिर में उड़द एवं दही से बने भोज्य पदाथोंü का दान अतिशुभफलदायक होता है।

मीन: मीन राशि के जातकों को ब्राह्मण के दान स्वरूप पीले एवं के सरिया रंग के वस्त्रों का दान करना शुभफलदायक होता है। साथ ही विष्णु या हनुमान मंदिर मे पीले या गुड़ से बने पदार्थों  का दान करना भी श्रेष्ठ कर होता है।
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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