आइये जाने की क्या हें डोल ग्यारस (जलझूलनी एकादशी) ..????

आज डोल ग्यारस (जलझूलनी एकादशी) है। आज मेरे जन्म-नगर झालरापाटन में, जो अब राजस्थान के दक्षिणी पश्चिमी क्षेत्र का मध्यप्रदेश से सटा एक सीमावर्ती नगर है, एक पखवाड़े पूर्व ही इस आयोजन की योजना/ तय्यरियाँ शुरु हो जाती है। यूँ तो इस आयोजन का अनौपचारिक आरंभ एक दिन पहले तेजादशमी पर ही हो जाता है। दिन भर तेजाजी के मन्दिर पर पूजा के बाद मेले में दसियों जगह गांवों से आए लोग रात भर ढोलक और मंजीरों के साथ खुले हुए छाते उचकाते हुए वीर तेजाजी की लोक गाथा गाते रहते हैं।

डोल  ग्यारस के उपलक्ष्य में आज विशाल चल समारोह निकाला जावेंगा। इस दौरान आकर्षक झांकियों व अखाडों के साथ भजन गायकों द्वारा सुमधुर भजनों की प्रस्तुति दी जावेंगी। सर्व समाज द्वारा आयोंजित चल समारोह में भगवान कृष्ण का आकर्षक श्रृंगार कर नयनाभिराम झांकियों के साथ वीर हनुमान व्यायाम शाला के पहलवानों द्वारा हेरत अंगेज करतबों का प्रदर्शन किया जावेंगा। समारोह में श्री कृष्ण भजन पार्टी द्वारा मनमोहक भजनों की प्रस्तुति दी जावेंगी। चल समारोह से राजस्थान कला मण्डल के कलाकार तलवारों और आग के गोलो के बीच भवई नृत्य का प्रदर्शन करेंगे।
इसके के साथ ही अनैकों मंदिरों पर भगवान की आकर्षक झांकियां सजाई जावेंगी। जो अपने-अपने बैवाणों में सवार होकर सूर्य मंदिर से अखाडों के साथ होकर शहर के मुख्य मार्गों से होती हुई द्वारकाधीश मंदिर के समीप गणगोर घांट पर पहुंचेगी। जहां सभी मंदिर के पुजारियों द्वारा भगवान की विधिवत स्नान व पूजा अर्चना आदि की जाती है । इस दिन चारों ओर उल्लास का माहौल होता है । औरतें गीत भजन आदि गाती हैं और नृत्य करती है पुर्जा-अर्चना की जावेंगी। इससे पूर्व नगर के सभ चौराहे एवं मंदिरों का जमघट लगा रहेगा । सभी मंदिरों से डोल यात्रा निकाली जाएगी। रामधुनी मंडल सहित कई संस्थाओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा डोलयात्रा के साथ साथ रामधुनी नाचते गाते व भजन कीर्तन करते हुए चलेंगे। यात्रा मुख्य मार्गों से होती हुई पंचायत मुख्यालय के पास स्थित तालाब पहुंचेगी। तालाब में ठाकुर जी को जल विहार करवाने के बाद आरती व भजन कीर्तन होंगे।झालरापाटन सहित क्षेत्र ( जिले के अन्य स्थानों पर भी ) में आज गुरुवार (08 सितम्बर,2011 को) को जलझूलनी एकादशी पर विभिन्न मंदिरों से भगवान की डोल यात्रा निकाली जाएगी।सुनेल, पिडावा, अकलेरा, खानपुर, भवानीमंडी, डग, बकानी और मनोहरथाना के साथ साथ सभी छोटे बड़े कस्बों में यह पर्व अपनी अपनी धार्मिक आस्था-निशा अनिसार बड़े ही धूमधाम और आकर्षक ढंग से मनाया जाने की तय्यरिया पूर्ण कर ली गयी हें…

मित्रों…में आज अपने गृहनगर -झालरापाटन ( राजस्थान) आया हुआ हूँ..जो की झालावाड जिले में हें..कोटा से लगभग 90 किलोमीटर दूर…
आज यहाँ पर एतिहासिक ढोल यात्रा ( जल झुलनी एकादशी ) महोत्सव बहुत ही धूमधाम और धार्मिक हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता हें..इस अवसर पर स्थानीय जिला कलेक्टर द्वारा एक दिन का सार्वजनिक अवकाश भी घोषित किया जाता हे ताकि इसे देखने जिले के अलावा अन्य आस पास में क्षेत्र निकटवर्ती मध्यप्रदेश के लोग भी देखने आते हें 

हाडोती क्षत्र के कई स्थानों से लोग इस दिन यहां दर्शनों का लाभ लेने हेतू यहां आते हैं ..वही राज्य सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा किये गए प्रचार-प्रसार के कारण कुछ विदेशी मेहमान( सेलानी) भी भाग लेने/ देखने पहुंचते हें..

क्यों मनाया जाता हें यह पर्व—

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मथुरा में जन्मे कृष्ण, उसी दिन नन्द के घर जन्मी कन्या, जिसे कंस ने मार डाला। कन्या के स्थान पर पर कृष्ण पहुँचे तो नन्द के घर आनंद हो गया। अठारह दिन बाद भाद्रपद शुक्ल एकादशी को माँ यशोदा कृष्ण को लिए पालकी में बैठ जलस्रोत पूजने निकली। इसी की स्मृति में इस दिन पूरे देश में समारोह मनाए जाते हैं। राजस्थान में इस दिन विमानों में ईश-प्रतिमाओं को नदी-तालाबों के किनारे ले जाकर जल पूजा की जाती है।

इस दिन झालरापाटन के सभी मंदिरों में विमान सजाए जाते हैं और देवमूर्तियों को इन में पधरा कर उन्हें एक जलूस के रूप में नगर के बाहर एक तालाब ” गोमती सागर” के किनारे ले जाया जाता है। सांझ पड़े वहाँ देवमूर्तियोँ की आरती उतारी जाती है और फिर विमान अपने अपने मंदिरों को लौट जाते हैं। मेरे लिए इस दिन का बड़ा महत्व है।
विमान (बेवान ) केसे सजाया/ बने जाता हें—
तेजा दशमी के दिन ही काठ का बना विमान बाहर निकाला जाता, उस की सफाई धुलाई होती और उसे सूखने के लिए छोड़ दिया जाता। यह वर्ष में सिर्फ एक दिन ही काम आता था। दूसरे दिन सुबह दस बजे से इसे सजाने का काम शुरू हो जाता। । विमान के नौ दरवाजों के खंबे सफेद पन्नियाँ चिपका कर सजाए जाते। ऊपर नौ छतरियों पर चमकीले कपड़े की खोलियाँ जो गोटे से सजी होतीं चढ़ाई जातीं। हर छतरी पर ताम्बे के कलश जो सुनहरे रोगन से रंगे होते चढ़ाए जाते। विमान के अंदर चांदनी तानी जाती। विमान के पिछले हिस्से में जो थोड़ा ऊंचा था वहाँ एक सिंहासन सजाया जाता जिस पर भगवान की प्रतिमा को पधराना होता। आगे का हिस्सा पुजारियों के बैठने के लिए होता। विमान के सज जाने के बाद नीचे दो लम्बी बल्लियाँ बांधी जातीं जिन के सिरे विमान के दोनों ओर निकले रहते। हर सिरे पर तीन तीन कंधे लगते विमान उठाने को।
दोपहर बात करीब एक बजे भगवान का विग्रह लाकर विमान में पधराया जाता।
लोग जय बोलते और विमान को कंधों पर उठा लेते। विमान शोभायात्रा में शामिल हो जाता। सब से पीछे रहता भगवान श्री जी का विमान और उस से ठीक भगवान सत्यनारायण का। इस शोभा यात्रा में नगर के कोई साठ से अधिक मंदिरों के विमान होते। तीन-चार विमानों के अलावा सब छोटे होते, जिन में पुजारी के बैठने का स्थान न होता। शोभा यात्रा में आगे घुड़सवार होते, उन के पीछे अखाड़े और फिर पीछे विमान। हर विमान के आगे एक बैंड होता, उन के पीछे भजन गाते लोग या विमान के आगे डांडिया करते हुए कीर्तन गाते लोग। सारे रास्ते लोग फल और प्रसाद भेंट करते जिन्हें हम विमान में एकत्र करते। अधिक हो जाने पर उन्हें कपडे की गाँठ बना कर नीचे चल रहे लोगों को थमा देते।
शाम करीब पौने सात बजे विमान तालाब पर पहुंचता। सब विमान तालाब की पाल पर बिठा दिए जाते। लोग फलों पर टूटपड़ते, और लगते उन्हें फेंकने तालाब में जहाँ पहले ही बहुत लोग केवल निक्करों में मौजूद होते और फलों को लूट लेते। फिर भगवान की आरती होती। जन्माष्टमी के दिन बनी पंजीरी में से एक घड़ा भर पंजीरी बिना भोग के सहेज कर रखी जाती थी। उसी पंजीरी का यहाँ भोग लगा कर प्रसाद वितरित किया जाता।
फिर होती वापसी। विमान पहले आते समय जो रेंगने की गति से चलता, अब तेजी से दौड़ने की गति से वापस मन्दिर लौटता। बीच में अनेक जगह विमान रोक कर लोग आरती करते और प्रसाद का भोग लगा कर लोगों को बांटते।
मेला पहले की तरह इस बार भी तालाब के किनारे के मैदान में ही लगा है और पूरे पन्द्रह दिन तक चलेगा। अगर मेले के एक दो दिन पहले बारिश हो कर खेतों में पानी भर जाए तो किसान फुरसत पा जाते हैं और मेला किसानों से भर उठता है।
इस आयोजन में नगर के सभी मंदिरें से बेवाण ( भगवन की पालकी) लाये जाते हें और प्राचीन तथ एतिहासिक सूर्य मंदिर के निकट सभी को एक साथ ठहराया जाता हें/एकत्र किया जाता हें..यहाँ से सभी पालकी/ बेवाण एक साथ एक शानदार जुलुस के रूप में बंद-बजे, दोल-नगाड़े और अखोदों के साथ गणगोर घंट के लिए रवाना होते हें..मार्ग में अखाड़े के पहलवान अपनी कला कोशल का प्रदर्शन करते चलते हें..जगह-जगह स्वागत/तोरण द्वार बनाकर स्वागत और पूजा -अर्चना की जाती हें..
फुल ढोल ग्यारस के उपलक्ष्य में आज विशाल चल समारोह निकाला जावेंगा। इस दौरान आकर्षक झांकियों व अखाडों के साथ भजन गायकों द्वारा सुमधुर भजनों की प्रस्तुति दी जावेंगी। सर्व समाज द्वारा आयोंजित चल समारोह में भगवान कृष्ण का आकर्षक श्रृंगार कर नयनाभिराम झांकियों के साथ वीर हनुमान व्यायाम शाला के पहलवानों द्वारा हेरत अंगेज करतबों का प्रदर्शन किया जावेंगा। समारोह में श्री कृष्ण भजन पार्टी द्वारा मनमोहक भजनों की प्रस्तुति दी जावेंगी। चल समारोह से राजस्थान कला मण्डल के कलाकार तलवारों और आग के गोलो के बीच भवई नृत्य का प्रदर्शन करेंगे।
इसके के साथ ही अनैकों मंदिरों पर भगवान की आकर्षक झांकियां सजाई जावेंगी। जो अपने-अपने बैवाणों में सवार होकर सूर्य मंदिर से अखाडों के साथ होकर शहर के मुख्य मार्गों से होती हुई द्वारकाधीश मंदिर के समीप गणगोर घांट पर पहुंचेगी। जहां सभी मंदिर के पुजारियों द्वारा भगवान की विधिवत स्नान व पूजा अर्चना आदि की जाती है । इस दिन चारों ओर उल्लास का माहौल होता है । औरतें गीत भजन आदि गाती हैं और नृत्य करती है पुर्जा-अर्चना की जावेंगी। इससे पूर्व नगर के सभ चौराहे एवं मंदिरों का जमघट लगा रहेगा । सभी मंदिरों से डोल यात्रा निकाली जाएगी। रामधुनी मंडल सहित कई संस्थाओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा डोलयात्रा के साथ साथ रामधुनी नाचते गाते व भजन कीर्तन करते हुए चलेंगे। यात्रा मुख्य मार्गों से होती हुई पंचायत मुख्यालय के पास स्थित तालाब पहुंचेगी। तालाब में ठाकुर जी को जल विहार करवाने के बाद आरती व भजन कीर्तन होंगे।झालरापाटन सहित क्षेत्र ( जिले के अन्य स्थानों पर भी ) में आजजलझूलनी एकादशी पर विभिन्न मंदिरों से भगवान की डोल यात्रा निकाली जाएगी।सुनेल, पिडावा, अकलेरा, खानपुर, भवानीमंडी, डग, बकानी और मनोहरथाना के साथ साथ सभी छोटे बड़े कस्बों में यह पर्व अपनी अपनी धार्मिक आस्था-श्रुद्धा अनुसार बड़े ही धूमधाम और आकर्षक ढंग से मनाया जाने की तय्यरिया पूर्ण कर ली गयी हें…
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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