रंगपंचमी : रंगों का प्रमुख त्योहार------


चैत्र कृष्ण पंचमी को खेली जाने वाली रंगपंचमी आह्वानात्मक होती है। यह सगुण आराधना का भाग है। ब्रह्मांड के तेजोमय सगुण रंगों का पंचम स्रोत कार्यरत कर देवता के विभिन्ना तत्वों की अनुभूति लेकर उन रंगों की ओर आकृष्ट हुए देवता के तत्व के स्पर्श की अनुभूति लेना, रंगपंचमी का उद्देश्य है। 

पंचम स्रोत अर्थात पंच तत्वों की सहायता से जीव के भाव अनुसार विभिन्न स्तरों पर ब्रह्मांड में प्रकट होने वाले देवता का कार्यरत स्रोत। रंगपंचमी देवता के तारक कार्य का प्रतीक है। 
यहां मनाया जाने वाला रंगपंचमी की गैर एक ऐसा रंगारंग कारवां है, जिसमें बगैर भेदभाव के पूरा शहर शामिल होता है और जमीन से लेकर आसमान तक रंगबिरंगी रंग ही रंग नजर आता हैं। होली का अंतिम दिन रंगपंचमी यानी होली पर्व के समापन का दिन माना जाता है। रंगबिरंगी गेर के साथ इस त्योहार का समापन होता है। 
इस दिन वायुमंडल में उड़ाए जाने वाले विभिन्न रंगों के रंग कणों की ओर विभिन्न देवताओं के तत्व आकर्षित होते हैं। ब्रह्मांड में कार्यरत आपतत्वात्मक कार्य तरंगों के संयोग से होकर जीव को देवता के स्पर्श की अनुभूति देकर देवता के तत्व का लाभ मिलता है।

होली ब्रह्मांड का एक तेजोत्सव है। तेजोत्सव से, अर्थात विविध तेजोत्सव तरंगों के भ्रमण से ब्रह्मांड में अनेक रंग आवश्यकता के अनुसार साकार होते हैं तथा संबंधित घटक के कार्य के लिए पूरक व पोषक वातावरण की निर्मित करते हैं। 

गुलाल लगाना :- 

आज्ञाचक्र पर गुलाल लगाना, पिंड बीज के शिव को शक्ति तत्व का योग देने का प्रतीक है। गुलाल से प्रक्षेपित पृथ्वी व आप तत्व की तरंगों के कारण देह की सात्विक तरंगों को ग्रहण करने में देह की क्षमता बढ़ती है। आज्ञा चक्र से ग्रहण होने वाला शक्तिरूपी चैतन्य संपूर्ण देह में संक्रमित होता है। इससे वायुमंडल में भ्रमण करने वाली चैतन्य तरंगें ग्रहण करने की क्षमता बढ़ती है। इस विधि द्वारा जीव चैतन्य के स्तर पर अधिक संस्कारक्षम बनता है। 
गेर-----
मध्यप्रदेश का इंदौर शहर होल्कर शासनकाल की अपनी परंपराओं को आज भी अपने दामन में संजोए हुए है। रंगपंचमी पर शहर में निकलने वाली गेरें (रंगारंग जुलूस) भी उन्हीं परंपराओं में से एक है। यह ऐसा अवसर होता है जब पूरा इन्दौर शहर ही रंग में रंग जाता है और मस्ती हिलोरे मारती है। वर्तमान में इन्दौर भले ही पानी के संकट से जूझ रहा हो मगर शहर के उत्सवधर्मी लोग रंगपंचमी पर गेर निकालने की तैयारी में जुटे है और उनकी कोशिश है कि वे इस मौके पर हर किसी को अपने रंग में रंग लें।...
मालवा में इस दिन खास तौर जगह-जगहों पर जुलूस निकाले जाते हैं, जिन्हें गैर कहा जाता है। इसमें शस्त्रों का प्रदर्शन काफी महत्व रखता है। इसके साथ ही सड़कों पर युवा वर्ग हैरतअंगेज करतब दिखाते हुए सबका मन मोह लेते हैं। इस दिन खास तौर पर पुरणपोली या फिर श्रीखंड-पूरी का आनंद सभी उठाते हैं। 
भारत के हर राज्य एवं हर स्थान पर होली का त्योहार मनाने की एक अलग ही परंपरा है। इसमें कुछ स्थानों पर होली के पांचवें दिन यानी चैत्र कृष्ण पंचमी को रंगपंचमी का त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। 

कई स्थानों पर होली से भी ज्यादा रंगपंचमी पर रंग खेलने की परंपरा है। कई जगहों पर धुलेंड़ी पर गुलाल लगाकर होली खेली जाती है तो रंगपंचमी पर अच्छे-खासे रंगों का प्रयोग कर रंगों का त्योहार मनाया जाता है। 

खास तौर मध्यप्रदेश में रंगपंचमी खेलने की परंपरा काफी पौराणिक है। इस दिन मालवावासियों की रंगपंचमी के गेर की टोलियां सड़कों पर निकालती है तथा एक-दूसरे को रंग लगा कर इस त्योहार की खुशियां इजहार करती है। 
रंगपंचमी के दिन इन रंगों की फुहार में भीगने के लिए न तो किसी को बुलावा दिया जाता है, न ही कोई किसी को रंग लगाता है। फिर भी हजारों हुरियारे हर साल रंगपंचमी पर निकलने वाली गेर यात्रा (फाग) में शामिल होकर इस उत्सव में डूबते हैं और रंगों का त्योहार खुशी-खुशी मनाते हैं। 
रंगों की इस रिवायती फुहार में भीगने के लिये न तो किसी को बुलावा दिया जाता है, न ही कोई किसी को रंग लगाता है. फिर भी हजारों हुरियारे यहां हर साल रंगपंचमी पर निकलने वाली गेर (फाग यात्रा) में शामिल होकर फागुनी उल्लास में डूबते हैं और रंगों का त्यौहार मनाते हैं.
रंगों के सामूहिक आनंद की यह पारपंरिक छटा मध्यप्रदेश के इस उत्सवधर्मी शहर में होलिका दहन के पांचवें दिन निकलने वाली (गेर) में 31 मार्च को नजर आने वाली है.

गेर के दौरान रंगीन फुहारों में भीगने के लिये हुरियारे भी पूरी तरह तैयार हैं.गेर में शामिल होने वाले हजारों हुरियारों पर मिसाइल की सूरत वाली मशीन से रंगों की बौछार की जायेगी. लेकिन इस बात का खास ध्यान भी रखा जायेगा कि इस आयोजन में कम से कम पानी खर्च हो.
उन्होंने बताया कि गेर में हाथी-घोड़ों और बग्घियों के साथ आदिवासी नर्तकों की टोली दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहेगी. गेर ऐसा रंगारंग कारवां है, जिसमें किसी भेद के बगैर पूरा शहर शामिल होता है और जमीन से लेकर आसमान तक रंग ही रंग नजर आते हैं.

गेर शहर के अलग-अलग हिस्सों से निकाली जाती है, जिसमें परंपरागत लवाजमे के साथ हजारों हुरियारे बैंड..बाजों की धुन पर नाचते चलते हैं. साथ चलते हैं. बड़े- बडे टैंकर जिनमें रंगीन पानी भरा होता है.
यह पानी टैंकरों में लगी शक्तिशाली मोटरों से दूर तक फुहारों के रुप में बरसता है और लोगों के तन-मन को तर-बतर कर देता है. 

गेर में कोई भी व्यक्ति एक-दूसरे को रंग नहीं लगाता, फिर भी सब एक रंग में रंग जाते हैं.
इस काफिले में शामिल हजारों लोग शाम ढलने तक रंग-गुलाल की चौतरफा बौछारों में भीगने का निर्मल आनंद लेते रहते हैं. रंगे-पुते लोगों के विशाल समूह में चंद घंटों के लिये ही सही, लेकिन सारे भेद धुलते दिखायी देते हैं. इतिहास के जानकार बताते हैं कि शहर में गेर की परंपरा रियासत काल में शुरु हुई, जब होलकर राजवंश के लोग रंगपंचमी पर आम जनता के साथ होली खेलने के लिये सड़कों पर निकलते थे.

जानकारों के मुताबिक इस परंपरा का एक मकसद समाज के हर तबके के लोगों को रंगों के त्यौहार की सामूहिक मस्ती में डूबने का मौका मुहैया कराना भी था. राजे-रजवाड़ों का शासन खत्म होने के बावजूद लोगों ने इस रंगीन रिवायत को अब तक अपने सीने से लगा रखा है. वक्त के तमाम बदलावों के बाद भी रंगपंचमी पर शहर में रंगारंग परेड रुपी गेर का सिलसिला बदस्तूर जारी है.
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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