आइये जाने की क्या हे महावीर जयंती ?? क्यों एवं केसे मनाई जाती हें..???

--- पंडित दयानन्द शास्त्री 

आज भगवान महावीर का जन्मकल्याणक सम्पूर्ण विश्व में मनाया जा रहा हें । 

तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म–दिन महावीर जयंती के नाम से प्रसिद्ध है। महावीर स्वामी का जन्म चैत्र त्रयोदशी को उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में हुआ था। ईस्वी काल गणना के अनुसार सोमवार, दिनांक 27 मार्च, 598 ईसा पूर्व के मांगलिक प्रभात में वैशाली के गणनायक राजा सिद्धार्थ के घर महावीर स्वामी का जन्म हुआ।

वर्धमान महावीर जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान श्री आदिनाथ की परंपरा में चौबीस वें तीर्थंकर हुए थे. इनका जीवन काल पांच सौ ग्यारह से पांच सौ सत्ताईस ईस्वी ईसा पूर्व तक माना जाता है. वर्धमान महावीर का जन्म एक क्षत्रिय राजकुमार के रूप में एक राज परिवार में हुआ था. इनके पिता का नाम राजा सिद्धार्थ एवं माता का नाम प्रियकारिणी था. उनका जन्म प्राचीन भारत के वैशाली राज्य में  हुआ था....
महावीर जी के समय समाज व धर्म की स्थिति में अनेक विषमताएं मौजूद थी धर्म अनेक आडंबरों से घिरा हुआ था और समाज में अत्याचारों का बोलबाल था अत: ऐसी स्थिति में भगवान महावीर जी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया उन्होंने देश भर में भर्मण करके लोगों के मध्य व्याप्त कुरूतियों एवं अंधविश्वासों को दूर करने का प्रयास किया उन्होंने धर्म की वास्तविकता को स्थापित किया सत्य एवं अहिंसा पर बल दिया. 

वर्धमान महावीर का जन्मदिन महावीर जयन्ती के रुप मे मनाया जाता है.....

महावीर जी ने अपने उपदेशों द्वारा समाज का कल्याण किया उनकी शिक्षाओं में मुख्य बाते थी कि सत्य का पालन करो, अहिंसा को अपनाओ, जिओ और जीने दो. इसके अतिरिक्त उन्होंने  पांच महाव्रत, पांच अणुव्रत, पांच समिति, तथा छ: आवश्यक नियमों का विस्तार पूर्वक उल्लेख किया. जो जैन धर्म के प्रमुख आधार हुए 

महावीर स्वामी का जीवन हमें एक शांत पथिक का जीवन लगता है जो कि संसार में भटकते-भटकते थक गया है। भोगों को अनंत बार भोग लिये, फिर भी तृप्ति नहीं हुई। अतः भोगों से मन हट गया, अब किसी चीज की चाह नहीं रही। परकीय संयोगों से बहुत कुछ छुटकारा मिल गया। अब जो कुछ भी रह गया उससे भी छुटकारा पाकर महावीर मुक्ति की राह देखने लगे।

तप से जीवन पर विजय प्राप्त करने का पर्व महावीर जयंती के रूप में मनया जाता है. श्रद्धालु मंदिरों में भगवान महावीर की मूर्ति को विशेष स्नान कराते हैं, जो कि अभिषेक कहलाता है. तदुपरांत भगवान की मूर्ति को सिंहासन या रथ पर बिठा कर उत्साह और हर्षोउल्लास पूर्वक जुलूस निकालते हैं, जिसमें बड़ी संख्यां में जैन धर्मावलम्बी शामिल होते हैं. इस सुअवसर पर जैन श्रद्धालु भगवान को फल, चावल, जल, सुगन्धित द्रव्य आदि वस्तुएं अर्पित करते.

महावीर स्वामी ने नारा बुलन्द किया कि प्रत्येक आत्मा परमात्मा बन सकता है। कर्मों के कारण आत्मा का असली स्वरूप अभिव्यक्त नहीं हो पाता है। कर्मों को नाश कर शुद्ध, बुद्ध, निरज्जन और सुखरूप स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार तीस वर्ष तक तत्त्व का भली-भाँति प्रचार करते हुए भगवान महावीर अंतिम समय मल्लों की राजधानी पावा पहुँचे। वहाँ के उपवन में कार्तिक कृष्ण अमावस्या मंगलवार, 15 अक्टूबर, 527 ई. पू. को 72 वर्ष की आयु में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया।

मित्रों में आजकल चूँकि उदयपुर (राजस्था) में हूँ तो यहाँ भी महावीर जयंती को धूमधाम से मनाने को लेकर उदयपुर शहर भर में उत्सवी माहौल है। 

इसी को लेकर महावीर जैन परिषद के संयोजन से शहर के तमाम चौराहों को सजाया गया है। सजे धजे शहर के सभी चौराहों को देखकर लगता है मानो पूरे शहर में बड़ा उत्सव होने वाला है। शहर के उदियापोल, सूरजपोल, शास्त्री सर्कल, कोर्ट चौराहा, चेतक सर्कल, देहलीगेट सहित प्रमुख चौराहों से आकर्षक सजावट की गई है। यह सजावट शहर के प्रमुख टेंट एंड डेकोरेटर्स व्यवसायियों की ओर से की गई है।
महावीर जैन परिषद की ओर से आयोजित सात दिवसीय महोत्सव की कड़ी में सोमवार रात नगर निगम परिसर में भजन संध्या का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें प्रसिद्ध भजन गायक विनित गेमावत एंड पार्टी के गायक प्रस्तुतियां देंगे। आयोजन में 10 हजार से अधिक लोगों के लिए व्यवस्था की गई है।
महावीर जयंती के मुख्य दिन मंगलवार सुबह शोभायात्रा का आयोजन होना है। नगर निगम परिसर से शोभायात्रा की शुरूआत होगी। जो बापू बाजार, देहलीगेट, हाथीपोल, मोती चौहट्टा, घंटाघर, बड़ा बाजार, सिंधी बाजार होते हुए समाज के नोहरे में संपन्न होगी।
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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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