04/2013

आइये जाने श्री हनुमान जयंती क्यों..??? केसे मनाएं..?? कोनसे उपाय /टोटके करें इस दिन..???

मित्रों, आज मेनेजमेंट गुरु, अंजनी के लाल, पवनपुत्र , अतुलित बलशाली श्री हनुमान जी की जयंती हें.
..रामभक्त श्री हनुमान जी के जीवन से हमें भक्ति,ज्ञान,मर्यादा,सहिष्णुता,भाईचारे का सन्देश मिलता हें... 

 श्री हनुमान जी को हिन्दु धर्म में कष्त विनाशक और भय नाशक देवता के रूप में जाना जाता है| हनुमान जी अपनी भक्ति और शक्ति के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं| सारे पापों से मुक्त करने ओर हर तरह से सुख-आनंद एवं शांति प्रदान करने वाले श्री हनुमान जी की उपासना लाभकारी एवं सुगम मानी गयी है।

भगवान शिव के आठ रूद्रावतारों में एक हैं श्री हनुमान जी। शास्त्रों का ऐसा मत है कि जहां भी राम कथा होती है वहां श्री हनुमान जी अवश्य होते हैं। इसलिए श्री हनुमान की कृपा पाने के लिए श्री राम की भक्ति जरूरी है। जो राम के भक्त हैं हनुमान उनकी सदैव रक्षा करते हैं। भगवान राम त्रेतायुग में धर्म की स्थापना करके पृथ्वी से अपने लोक बैकुण्ठ चले गये लेकिन धर्म की रक्षा के लिए हनुमान को अमरता का वरदान दिया। इस वरदान के कारण हनुमान जी आज भी जीवित हैं और भगवान के भक्तों और धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं। 

हनुमान जयंती एक हिन्दू पर्व होता है। यह चैत्र माह की पूर्णीमा को मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी मंगलवार, स्वाति नक्षत्र मेष लग्न में स्वयं भगवान शिवजी ने अंजना के गर्भ से रुद्रावतार लिया।
श्रीहनुमान जी की जयंती तिथि के विषय में दो विचारधाराएं विशेष रूप से प्रचलित हैं- चैत्र शुक्ल पूर्णमासी और कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी। 
हनुमान जी अपार बलशाली और वीर हैं, तो विद्वता में भी उनका सानी नहीं है। फिर भी उनके भीतर रंच मात्र भी अहंकार नहीं। आज के समय में थोड़ी शक्ति या बुद्धि हासिल कर व्यक्ति अहंकार से भर जाता है, किंतु बाल्यकाल में सूर्य को ग्रास बना लेने वाले हनुमान राम के समक्ष मात्र सेवक की भूमिका में रहते हैं। वह जानते हैं कि सेवा ही कल्याणकारी मंत्र है। बल्कि जिसने भी अहंकार किया, उसका मद हनुमान जी ने चूर कर दिया। 

पंडित दयानन्द शास्त्री  के अनुसार सेवाभाव का उत्कृष्ट उदाहरण हैं केसरी और अंजनी के पुत्र महाबली श्री हनुमान। हनुमान जी ने ही हमें यह सिखाया है कि बिना किसी अपेक्षा के सेवा करने से व्यक्ति सिर्फ भक्त ही नहीं, भगवान बन सकता है। हनुमान जी का चरित्र रामकथा में इतना प्रखर है कि उसने राम के आदर्र्शो को गढ़ने में मुख्य कड़ी का काम किया है। रामकथा में श्री हनुमान के चरित्र में हम जीवन के सूत्र हासिल कर सकते हैं। वीरता, साहस, सेवाभाव, स्वामिभक्ति, विनम्रता, कृतज्ञता, नेतृत्व और निर्णय क्षमता जैसे हनुमान के गुणों को अपने भीतर उतारकर हम सफलता के मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं।

सीता हरण के बाद न सिर्फ तमाम बाधाओं से लड़ते हुए श्री हनुमान समुद्र पार कर लंका पहुंचे, बल्कि अहंकारी रावण का मद चूर-चूर कर दिया। जिस स्वर्ण-लंका पर रावण को अभिमान था, हनुमान ने उसे ही दहन कर दिया। यह रावण के अहंकार का प्रतीकात्मक दहन था। अपार बलशाली होते हुए भी हनुमान जी के भीतर अहंकार नहीं रहा। जहां उन्होंने राक्षसों पर पराक्रम दिखाया, वहीं वे श्रीराम, सीता और माता अंजनी के प्रति विनम्र भी रहे। उन्होंने अपने सभी पराक्रमों का श्रेय भगवान राम को ही दिया।

वह दृश्य किसकी स्मृति में नहीं होगा, जब हनुमान जी लक्ष्मण के मूर्छित होने पर संजीवनी बूटी ही नहीं, पूरा पर्वत ले आए थे। उनकी निष्काम सेवा भावना ने ही उन्हें भक्त से भगवान बना दिया। पौराणिक ग्रंथों में एक कथा है कि भरत, लक्ष्मण व शत्रुघ्न ने भगवान राम की दिनचर्या बनाई, जिसमें हनुमान जी को कोई काम नहीं सौंपा गया? आग्रह करने पर उनसे राम को जम्हाई आने पर चुटकी बजाने को कहा गया। हनुमान जी भूख, प्यास व निद्रा का परित्याग कर सेवा को तत्पर रहते। रात को माता जानकी की आज्ञा से उन्हें कक्ष से बाहर जाना पड़ा। वे बाहर बैठकर निरंतर चुटकी बजाने लगे। हनुमान जी के जाने से श्रीराम को लगातार जम्हाई आने लगी। जब हनुमान ने भीतर आकर चुटकी बजाई, तब जम्हाई बंद हुई।

राम की वानर सेना का उन्होंने नेतृत्व जिस तरह किया, हम उनसे सीख ले सकते हैं। जब वे शापवश अपनी शक्तियों को भूल गए, तब याद दिलाए जाने पर उन्होंने समुद्रपार जाने में तनिक भी देर नहीं लगाई। वहीं लक्ष्मण को शक्ति लग जाने पर जब वे संजीवनी बूटी लाने पर्वत पर पहुंचे, तो भ्रम होने पर उन्होंने पूरा पर्वत ले जाने का त्वरित फैसला लिया। हनुमान जी के ये गुण अपनाकर ही हनुमान जयंती मनाना सफल होगा।

678 साल बाद अतिशुभ है हनुमान जयंती ....ये हम नहीं कह रहे बल्कि हनुमान जयंती पर बन रही ग्रहों की स्थिति ये बता रही है जब आपको बजरंगबली की पूर्ण कृपा तो मिलेगी ही और साथ इस दिन लगने वाले चंद्र ग्रहण के कुप्रभाव से भी रक्षा करेगी ये हनुमान जयंती.

पंडित दयानन्द शास्त्री  के अनुसार जिस प्रकार भगवान श्री राम जी के कार्यों को पूर्ण किया उसी प्रकार भक्त के कार्यों को भी वायुनंदन पूर्ण करते हैं। हनुमान जी की महिमा का गुणगान वाणी के द्वारा किया ही नहीं जा सकता। इनकी महिमा तो अपरंपार है। इसी महिमा के कारण सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग में निरंतर श्री हनुमान जी की आराधना होती रही है और होती रहेगी। हनुमान जी एकादश रुद्र के रूप में संपूर्ण लोकों में वंदनीय हैं। इनके विषय में एक सुंदर कथा इस प्रकार है। 

श्री रामावतार के समय ब्रह्माजी ने देवताओं को वानरों और भालुओं के रूप में धरा पर प्रकट होकर श्री राम जी की सेवा करने का आदेश दिया था। इस आज्ञा का पालन कर उस समय सभी देवता अपने-अपने अंशों से वानर और भालुओं के रूप में उत्पन्न हुए। इनमें वायु के अंश से स्वयं रुद्रावतार महावीर हनुमान जी ने जन्म लिया था। इनके पिता वानरराज केसरी और माता अंजनीदेवी थीं। जन्म के समय नन्हे शिशु को क्षुधापीड़ित देखकर माता अंजना वन से कंद, मूल, फल आदि लेने चली गईं, उधर सूर्योदय के अरुण बिम्ब को फल समझकर बालक हनुमान ने छलांग लगाई और पवन वेग से सूर्यमंडल के पास जा पहंचे। उसी समय राहु भी सूर्य को ग्रसने के लिए सूर्य के समीप पहंचा था। हनुमान जी ने फलप्राप्ति में अवरोध समझकर उसे धक्का दिया तो वह भयभीत होकर इंद्र के पास जा पहंचा। देवराज इंद्र ने सृष्टि की व्यवस्था में विघ्न समझकर हनुमान पर वज्र का आघात किया, जिससे हनुमान जी की बायीं ओर की ठुड्डी (हनु) टूट गई। अपने प्रिय पुत्र पर वज्र के प्रहार से वायुदेव अत्यंत क्षुब्ध हो गए और उन्होंने अपना संचार बंद कर दिया। वायु ही प्राण का आधार है, वायु के संचरण के अभाव में समस्त प्रजा व्याकुल हो उठी। त्राहि-त्राहि व चीत्कार मच गई। ऐसी भयानक स्थिति में समस्त प्रजा को व्याकुल देख प्रजापति पितामह ब्रह्मा सभी देवताओं को लेकर वहां गए, जहां वायुदेव अपने मूच्र्छित शिशु हनुमान को लेकर क्षुब्धावस्था में बैठे थे। ब्रह्माजी ने अपने हाथ के स्पर्श से शिशु हनुमान को सचेत कर दिया। उसी समय वायुदेव व शिशु हनुमान की प्रसन्नता हेतु सभी देवताओं ने शिशु हनुमान को अपने अस्त्र-शस्त्रों से अवध्य कर दिया। पितामह ने वरदान देते हुए कहा- ‘मारुत! तुम्हारा यह नन्हा पुत्र शत्रुओं के लिए भयंकर होगा। युद्ध क्षेत्र में इसे कोई पराजित नहीं कर सकेगा। रावण के साथ युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाकर यह श्री राम जी की प्रसन्नता बढ़ाएगा।’ जो कोई भी श्रद्धाभाव से हनुमान जी की सेवा आराधना करता है, उसकी मनोकामनाएं निश्चय ही पूर्ण होती हैं। उसके चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) सिद्ध हो जाते हैं।

महाबलि श्री हनुमान जी को ऐसे करें प्रसन्न-----

-----पंडित दयानन्द शास्त्री  के अनुसार सतयुग से कलयुग तक प्रथम चरण विशेष में हनुमानजी की आराधना सकल मनोरथ पूर्ण करने वाली है। श्रद्धा भाव से हनुमान जी का नमन रोग, शोक, दुखों को हरकर विशिष्ट फल देता है..
-----सभी जानते हें की चैत्र पूर्णिमा के दिन हनुमान जयंती मनाई जाती है। प्राय: शनिवार व मंगलवार हनुमान के दिन माने जाते हैं। इस दिन हनुमानजी की प्रतिमा को सिंदूर व तेल अर्पण करने की प्रथा है। कुछ जगह तो नारियल चढाने का भी रिवाज है। अध्यात्मिक उन्नति के लिए वाममुखी (जिसका मुख बाईं ओर हो) हनुमान या दास हनुमान की मूर्ति को पूजा में रखते हैं। 
-------अगर धन लाभ की स्थितियां बन रही हो, किन्तु ‍फिर भी लाभ नहीं मिल रहा हो, तो हनुमान जयंती पर गोपी चंदन की नौ डलियां लेकर केले के वृक्ष पर टांग देनी चाहिए. स्मरण रहे यह चंदन पीले धागे से ही बांधना है.
-----श्री हनुमान जी की भक्ति करने वाले को बल, बुद्धि और विद्या सहज में ही प्राप्त हो जाती है। भूत-पिशाचादि भक्त के समीप नहीं आते। हनुमान जी जीवन के सभी क्लेश को दूर कर देते हें..।
------बजरंगबली चमत्कारिक सफलता देने वाले देवता माने गए हैं. हनुमान जयंती पर उनका यह टोटका ‍विशेष रूप से धन प्राप्ति के लिए किया जाता है. साथ ही यह टोटका हर प्रकार का अनिष्ट भी दूर करता है. कच्ची धानी के तेल के दीपक में लौंग डालकर हनुमान जी की आरती करें. संकट दूर होगा और धन भी प्राप्त होगा.
------एक नारियल पर कामिया सिन्दूर, मौली, अक्षत अर्पित कर पूजन करें. फिर हनुमान जी के मन्दिर में चढ़ा आएं. धन लाभ होगा.
------हनुमान जयंती के दिन 11 पीपल के पत्ते लें। उनको गंगाजल से अच्छी तरह धोकर लाल चंदन से हर पत्ते पर 7 बार राम लिखें। इसके बाद हनुमान जी के मन्दिर में चढ़ा आएं तथा वहां प्रसाद बाटें और इस मंत्र का जाप जितना कर सकते हो करें। 
"'जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करो गुरु देव की नांई'" 
हनुमान जयंती के बाद 7 मंगलवार इस मंत्र का लगातार जप करें। प्रयोग गोपनीय रखें। आश्चर्यजनक धन लाभ होगा।

पंडित दयानन्द शास्त्री  के अनुसार यदि धन या पैसों से जुड़ी समस्याओं से निजात पाना चाहते है, दुर्भाग्य को दूर करना है तो हनुमानजी के ऐसे फोटो की पूजा करनी चाहिए जिसमें वे स्वयं श्रीराम, लक्ष्मण और सीता माता की आराधना कर रहे हैं। पवनपुत्र के भक्ति भाव वाली प्रतिमा या फोटो की पूजा करने से उनकी कृपा तो प्राप्त होती है साथ ही श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता की कृपा भी प्राप्त होती है। इन देवी-देवताओं की प्रसन्नता के बाद दुर्भाग्य भी सौभाग्य में परिवर्तित हो जाता है।

-----पंडित दयानन्द शास्त्री  के अनुसार हनुमान जी की कृपा प्राप्ति के लिए निम्न श्लोकों का पाठ करना चाहिए-

जयत्यतिबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः।
 राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः।।
 दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्ट कर्मणः। 
हनूमा´शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः।। 
न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत्। 
शिलाभिश्च प्रहरतः पादपैश्च सहस्रशः।। 
अर्दयित्वा पुरीं लंकामभिवाद्य च मैथिलीम्। 
समृद्धार्थो गमिष्यामि मिषतां सर्वरक्षसाम्।।
 (वा.रा. 5/42/33-36) 

श्री हनुमान वाहक के पाठ से सभी पीड़ाएं दूर हो जाती हैं। हनुमान जी की भक्ति स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध सभी समान रूप से कर सकते हैं। भक्त की भक्तवत्सलता, श्रद्धा भाव, संबंध, समर्पण ही श्री हनुमान जी की कृपा का मूल का मंत्र है।

आइये जाने की क्या हे महावीर जयंती ?? क्यों एवं केसे मनाई जाती हें..???

--- पंडित दयानन्द शास्त्री 

आज भगवान महावीर का जन्मकल्याणक सम्पूर्ण विश्व में मनाया जा रहा हें । 

तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म–दिन महावीर जयंती के नाम से प्रसिद्ध है। महावीर स्वामी का जन्म चैत्र त्रयोदशी को उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में हुआ था। ईस्वी काल गणना के अनुसार सोमवार, दिनांक 27 मार्च, 598 ईसा पूर्व के मांगलिक प्रभात में वैशाली के गणनायक राजा सिद्धार्थ के घर महावीर स्वामी का जन्म हुआ।

वर्धमान महावीर जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान श्री आदिनाथ की परंपरा में चौबीस वें तीर्थंकर हुए थे. इनका जीवन काल पांच सौ ग्यारह से पांच सौ सत्ताईस ईस्वी ईसा पूर्व तक माना जाता है. वर्धमान महावीर का जन्म एक क्षत्रिय राजकुमार के रूप में एक राज परिवार में हुआ था. इनके पिता का नाम राजा सिद्धार्थ एवं माता का नाम प्रियकारिणी था. उनका जन्म प्राचीन भारत के वैशाली राज्य में  हुआ था....
महावीर जी के समय समाज व धर्म की स्थिति में अनेक विषमताएं मौजूद थी धर्म अनेक आडंबरों से घिरा हुआ था और समाज में अत्याचारों का बोलबाल था अत: ऐसी स्थिति में भगवान महावीर जी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया उन्होंने देश भर में भर्मण करके लोगों के मध्य व्याप्त कुरूतियों एवं अंधविश्वासों को दूर करने का प्रयास किया उन्होंने धर्म की वास्तविकता को स्थापित किया सत्य एवं अहिंसा पर बल दिया. 

वर्धमान महावीर का जन्मदिन महावीर जयन्ती के रुप मे मनाया जाता है.....

महावीर जी ने अपने उपदेशों द्वारा समाज का कल्याण किया उनकी शिक्षाओं में मुख्य बाते थी कि सत्य का पालन करो, अहिंसा को अपनाओ, जिओ और जीने दो. इसके अतिरिक्त उन्होंने  पांच महाव्रत, पांच अणुव्रत, पांच समिति, तथा छ: आवश्यक नियमों का विस्तार पूर्वक उल्लेख किया. जो जैन धर्म के प्रमुख आधार हुए 

महावीर स्वामी का जीवन हमें एक शांत पथिक का जीवन लगता है जो कि संसार में भटकते-भटकते थक गया है। भोगों को अनंत बार भोग लिये, फिर भी तृप्ति नहीं हुई। अतः भोगों से मन हट गया, अब किसी चीज की चाह नहीं रही। परकीय संयोगों से बहुत कुछ छुटकारा मिल गया। अब जो कुछ भी रह गया उससे भी छुटकारा पाकर महावीर मुक्ति की राह देखने लगे।

तप से जीवन पर विजय प्राप्त करने का पर्व महावीर जयंती के रूप में मनया जाता है. श्रद्धालु मंदिरों में भगवान महावीर की मूर्ति को विशेष स्नान कराते हैं, जो कि अभिषेक कहलाता है. तदुपरांत भगवान की मूर्ति को सिंहासन या रथ पर बिठा कर उत्साह और हर्षोउल्लास पूर्वक जुलूस निकालते हैं, जिसमें बड़ी संख्यां में जैन धर्मावलम्बी शामिल होते हैं. इस सुअवसर पर जैन श्रद्धालु भगवान को फल, चावल, जल, सुगन्धित द्रव्य आदि वस्तुएं अर्पित करते.

महावीर स्वामी ने नारा बुलन्द किया कि प्रत्येक आत्मा परमात्मा बन सकता है। कर्मों के कारण आत्मा का असली स्वरूप अभिव्यक्त नहीं हो पाता है। कर्मों को नाश कर शुद्ध, बुद्ध, निरज्जन और सुखरूप स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार तीस वर्ष तक तत्त्व का भली-भाँति प्रचार करते हुए भगवान महावीर अंतिम समय मल्लों की राजधानी पावा पहुँचे। वहाँ के उपवन में कार्तिक कृष्ण अमावस्या मंगलवार, 15 अक्टूबर, 527 ई. पू. को 72 वर्ष की आयु में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया।

मित्रों में आजकल चूँकि उदयपुर (राजस्था) में हूँ तो यहाँ भी महावीर जयंती को धूमधाम से मनाने को लेकर उदयपुर शहर भर में उत्सवी माहौल है। 

इसी को लेकर महावीर जैन परिषद के संयोजन से शहर के तमाम चौराहों को सजाया गया है। सजे धजे शहर के सभी चौराहों को देखकर लगता है मानो पूरे शहर में बड़ा उत्सव होने वाला है। शहर के उदियापोल, सूरजपोल, शास्त्री सर्कल, कोर्ट चौराहा, चेतक सर्कल, देहलीगेट सहित प्रमुख चौराहों से आकर्षक सजावट की गई है। यह सजावट शहर के प्रमुख टेंट एंड डेकोरेटर्स व्यवसायियों की ओर से की गई है।
महावीर जैन परिषद की ओर से आयोजित सात दिवसीय महोत्सव की कड़ी में सोमवार रात नगर निगम परिसर में भजन संध्या का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें प्रसिद्ध भजन गायक विनित गेमावत एंड पार्टी के गायक प्रस्तुतियां देंगे। आयोजन में 10 हजार से अधिक लोगों के लिए व्यवस्था की गई है।
महावीर जयंती के मुख्य दिन मंगलवार सुबह शोभायात्रा का आयोजन होना है। नगर निगम परिसर से शोभायात्रा की शुरूआत होगी। जो बापू बाजार, देहलीगेट, हाथीपोल, मोती चौहट्टा, घंटाघर, बड़ा बाजार, सिंधी बाजार होते हुए समाज के नोहरे में संपन्न होगी।


आज मेरी जन्मदाती माँ ""स्वर्गीय श्रीमती कमला देवी"" की ""पंचम पुण्यतिथि/ स्मृति दिवस" हें...

मेरी माँ द्वारा प्रदत्त ज्ञान,संस्कार एवं सहयोगी एवं समाजसेवा/मदद करने के गुण को में आज भी प्रचार-प्रसार कर उन्ही के नाम को सार्थक करने के प्रयास कर रहा हूँ..

मैं आज मेरी माँ का स्‍मरण कर रहा हूँ,जो आज हमारे बीच नहीं हैफिर भी उनकी दी हुई शिक्षा और आदर्श हमें मार्ग दर्शन करती हैं !

माँ के बारे में जितना भी कहा जाए / लिखा जाये  कम है! 
माँ हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं और माँ और पिताजी दोनों ही हमारे लिए भगवान का रूप हैं! उन्हीं की वजह से हम इस दुनिया में कदम रखें हैं और जब भी मैं तन्हा महसूस करता हूँ, तब माँ  ही है जिसे मैं बहुत याद करता है और माँ की गोद में सर रखने जैसा सुकून और कहीं नहीं मिलता....

21 अप्रेल 2013 , आज पूरे पांच  साल हुए माँ को दुनिया छोड़ कर गए हुए , श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ पंक्तियाँ उनके लिये ...भावांजलि.----

मेरी स्वर्गवासी माँ के लिए ये चार लाइन----
ऊपर जिसका अंत नहीं,
उसे आसमां कहते हैं,
जहाँ में जिसका अंत नहीं,
उसे माँ कहते हैं!
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माँ को सादर नमन कर, दूँ श्रद्धांजलि मित्र ।
असमय घटनाएं करें, हालत बड़ी विचित्र ।
हालत बड़ी विचित्र,  दिगम्बर सहनशक्ति दे ।
 पाय आत्मा शान्ति, उसे अनुरक्ति भक्ति दे ।
बुद्धिमान हैं आप, सँभालो खुद को रविकर ।
रहा सदा आशीष,  नमन कर माँ को सादर ।।
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जिन्दगी भर बचपन बोला करता......
यादों की बगीची में माँ का चेहरा ही हमेशा ही डोला करता......
न भूले वो माँ की गोदी , आराम की वो माया सी.....
जीवन की धूप में घनी छाया सी.....
पकड़ के उँगली जो सिखाती हमको , जीवन की डगर पर चलना....
हाय अद्भुत है वो खजाना , वो ममता का पलना.....
गीले बिस्तर पर सो जाती , और शिकायत एक नहीं....
चौबीस घंटे वो पहरे पर , अपने लिये पल शेष नहीं....
होता है कोई ऐसा रिश्ता भी , भला कोई भूले से.....
छू ले जैसे ठण्डी हवा , जीवन की तपन में हौले से....
न मन भूलता है वो महक माँ के आँचल की...
न वो स्वाद माँ की उँगलियों का.....
जीवन भर साथ चले जैसे , उजली उजली.....
दुआ ही दुआ ,विश्वास बनी वो फ़रिश्ता सी मेरी माँ...
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"माँ की ममता को भुला सकता है कोन,
और कौन भुला सकता है वो प्यार,
किस तरह बताए माँ के बिना कैसे जी रहए 
मां को आज श्रद्धा सुमन उन्हें अर्पित करते है"
माँ है मंदिर, मां तीर्थयात्रा है,
माँ प्रार्थना है, माँ भगवान है,
माँ के बिना हम बिना माली के बगीचा हैं!

सादर श्रद्धानवत  ------
(पंडित दयानन्द शास्त्री"अंजाना")

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अपने पर्स को इस विधि से रखें, पैसा की तंगी होगी खत्म-----

आप के मूलांक और आप के पर्स में रखे नोट के रंग, सिक्कों में प्रयुक्त धातु आदि के मध्य सामंजस्य बैठा कर भी धन वृद्धि की जा सकती है. यदि आप चाहते हैं कि आपका वॉलेट हमेशा रुपयों से भरा रहे तो इन उपायों का लाभ ले सकते हैं:सभी चाहते हैं कि उनका पर्स हमेशा पैसों से भरा रहे और फिजूल खर्च न हो। ज्यादा पैसा कमाने के लिए कड़ी मेहनत के साथ अच्छी किस्मत भी महत्व रखती है। कुछ परिस्थितियों में मेहनत के बाद भी पर्याप्त धन प्राप्त नहीं हो पाता या खर्चों की अधिकता की वजह से बचत नहीं हो पाती। 
पैसा रखने के लिए सभी के पास पर्स रहता है, अत: पर्स के संबंध में एक सटीक उपाय है जिसे अपनाने से कभी भी आपका पर्स खाली नहीं रहेगा। साथ ही फिजूल खर्चों में कमी आएगी। इस उपाय में आपको किसी भी शुभ मुहूर्त या अपने जन्म दिन पर माता-पिता से एक नोट पर केसर से तिलक लगवाएं। नोट कैसा भी हो सकता है बड़ा या छोटा। केसर का तिलक लगवाने के बाद माता-पिता के चरण स्पर्श करें और आशीर्वाद प्राप्त करें। 

आपके अपने मूलांक अनुसार ऐसा हो आपका पर्स----

मूलांक 1 (1,10,19,28)
अपने लाल रंग के वॉलेट या पर्स में एक 100 और 20 रुपये के एक एक नोट तथा 1 रुपये के सात नोट को नारंगी रंग के कागज में रखें. एक ताम्बे का सिक्का भी रखें।
मूलांक 2 (2,11,20,29)
अपने सफेद रंग के वॉलेट या पर्स में एक रुपये के दो और 20 रुपये का एक नोट चाँदी की तार में लपेट कर रखें. एक चान्दी का सिक्का भी रखें.
मूलांक 3 (3,12,21,30)
अपने पीले या मेहन्दी रंग के वॉलेट या पर्स में दस रुपये के तीन नोट तथा 1 रूपये के तीन नोट को पीले रंग के कागज में रखें. एक गोल्डन फॉइल का तिकोना टुकडा भी रखें.
मूलांक 4 (4,13,22,31)
अपने भूरे रंग के वॉलेट या पर्स में दस रुपये के दो और 20 रुपये का दो नोट चन्दन का इत्र लगाकर रखें. अपने घर की चुट्की भर मिट्टी भी रखें.
मूलांक 5 (5,14,23)
अपने हरे रंग के वॉलेट या पर्स में पाँच रुपये का एक और 10 रुपये के पाँच नोट एक हरे कागज में रखें. एक बेल का पत्ता भी रखें.  
मूलांक 6 (6,15,24)
अपने चमकीले सफेद रंग के वॉलेट या पर्स में पाँच सौ रुपये का और 100 रुपये का एक एक नोट तथा 1 रुपये के छ: नोट को सिल्वर फॉइल में रखें. एक पीतल का सिक्का भी रखें.
मूलांक 7 (7,16,25)
अपने बहुरंगी वॉलेट या पर्स में एक रुपये के सात और 20 रुपये का एक नोट नारंगी रंग के कागज में रखें. एक मछली का चित्र अंकित किया हुआ सिक्का भी रखें.
मूलांक 8 (8,17,26)
अपने नीले रंग के वॉलेट या पर्स में 100 रुपये का एक और 20 रुपये के चार नोट नीले रंग के कागज में रखें. एक मोर पंख का टुकडा भी रखें.
मूलांक 9 (9,18,27)
अपने नीले और नारंगी रंग के वॉलेट या पर्स में पाँच रुपये का एक और दो रुपये के दो नोट चमेली का इत्र लगे नारंगी रंग के कागज में रखें. एक पीतल का सिक्का भी रखें.
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ज्योतिष के अनुसार कुंडली में यदि कोई ग्रह बाधा हो तो व्यक्ति को गरीबी झेलना पड़ सकती है।
ज्योतिष शास्त्र में गरीबी दूर करने के लिए असंख्य कारगर उपाय बताए गए हैं। इन उपायों को अपनाने से किसी प्रकार की ग्रह बाधा हो वह दूर हो जाती है। यदि किसी वजह से धन प्राप्त करने में कोई समस्या आ रही हो तो इन उपायों से वे सभी परेशानियां भी दूर हो जाती हैं।
यदि आप भी किसी ग्रह बाधा से पीडि़त हैं और आपके पर्स में अधिक समय तक पैसा नहीं टिकता तो निम्र उपाय करें-
किसी भी शुभ मुहूर्त या अक्षय तृतीया या पूर्णिमा या दीपावली या किसी अन्य मुहूर्त में सुबह जल्दी उठें। सभी आवश्यक कार्यों से निवृत्त होकर लाल रेशमी कपड़ा लें। अब उस लाल कपड़े में चावल के 21 दानें रखें। ध्यान रहें चावल के सभी 21 दानें पूरी तरह से अखंडित होना चाहिए यानि कोई टूटा हुआ दान न रखें। उन दानों को कपड़े में बांध लें। इसके बाद धन की देवी माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजन करें। पूजा में यह लाल कपड़े में बंधे चावल भी रखें। पूजन के बाद यह लाल कपड़े में बंधे चावल अपने पर्स में छुपाकर रख लें।
ऐसा करने पर कुछ ही समय में धन संबंधी परेशानियां दूर होने लगेंगी। ध्यान रखें कि पर्स में किसी भी प्रकार की अधार्मिक वस्तु कतई न रखें। इसके अलावा पर्स में चाबियां नहीं रखनी चाहिए। सिक्के और नोट अलग-अलग व्यस्थित ढंग से रखे होने चाहिए। किसी भी प्रकार की अनावश्यक वस्तु पर्स में न रखें। इन बातों के साथ ही व्यक्ति को स्वयं के स्तर भी धन प्राप्ति के लिए पूरे प्रयास करने चाहिए।
===== अपनी राशी के अनुसार रखे पर्स का रंग...लाभ होगा जेसे..-----
----मेष,सिंह, और धनु राशि वाले अपना पर्स लाल या नारंगी रंग का रखे. तो लाभ होगा
----.वृष,कन्या, और मकर राशि वालों को भूरे रंग का पर्स तथा मटमैले रंग का पर्स बहुत फायदा पंहुचायगा
----मिथुन,तुला, और कुम्भ राशि वाले यदि नीले रंग व सफ़ेद रंग का प्रयोग करते है तो मानसिक स्थति के साथ साथ धन के के आगमन के रास्ते भी खुलेंगे.
------ कर्क,वृश्चिक, और मीन राशि को तो हमेशा हरा रंग और सफ़ेद रंग का प्रयोग अपने पर्स में करना लाभदायक रहेगा.

आइये  जाने मुहूर्त का महत्व,प्रभाव एवं आवश्यकता-----

नामकरण, मुंडन तथा विद्यारंभ जैसे संस्कारों के लिए तथा दुकान खोलने, सामान खरीदने-बेचने और ऋण तथा भूमि के लेन-देन और नये-पुराने मकान में प्रवेश के साथ यात्रा विचार और अन्य अनेक शुभ कार्यों के लिए शुभ नक्षत्रों के साथ-साथ कुछ तिथियों तथा वारों का संयोग उनकी शुभता सुनिश्चित करता है। 

भारतीय समाज तथा ज्योतिष शास्त्र में मुहूर्त का अत्यधिक महत्व है। यहां तक कि लोक संस्कृति में भी परंपरा से सदा मुहूर्त के अनुसार ही किसी काम को करना शुभ माना गया है। हमारे सभी शास्त्रों में उसका उल्लेख मिलता है। भारतीय लोक संस्कृति में मुहूर्त तथा शुभ शकुनों का प्रतिपालन किया जाता है। ज्योतिष के अनुसार मुहूर्तों में पंचांग के सभी अंगों का आकलन करके, तिथि-वार-नक्षत्र-योग तथा शुभ लग्नों का सम्बल तथा साक्षी के अनुसार उनके सामंजस्य से बनने वाले मुहूर्तों का निर्णय किया जाता है। 

पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार  जाने कि किस कार्य के लिए इस संयोग का स्वरूप क्या और कैसा हो? नक्षत्र ही भारतीय ज्योतिष का वह आधार है जो हमारे दैनिक जीवन के महत्वपूर्ण कार्यों को प्रभावित करता है। अतः हमें कोई भी कार्य करते हुए उससे संबंधित शुभ नक्षत्रों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए जिससे हम सभी कष्ट एवं विघ्न बाधाओं से दूर रहकर नयी ऊर्जा को सफल उद्देश्य के लिए लगा सकें। विभिन्न कार्यों के लिए शुभ नक्षत्रों को जानना आवश्यक है। 
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार किस वार, तिथि में कौन सा नक्षत्र किस काम के लिए अनुकूल या प्रतिकूल माना गया है, इस विषय में भारतीय ऋषियों ने अनेकों महाग्रंथों का निर्माण किया है जिनमें मुहूर्त मार्तण्ड, मुहूर्त गणपति मुहूर्त चिंतामणि, मुहूर्त पारिजात, धर्म सिंधु, निर्णय सिंधु आदि अनेक ग्रंथ प्रचलित तथा सार्थक हैं। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत तथा भारत का धर्म समाज मुहूर्तों का प्रतिपालन करता है। भारतीय संस्कृति व समाज में जीवन का दूसरा नाम ही 'मुहूर्त' है। 

भारतीय जीवन की नैसर्गिक व्यवस्था में भी मुहूर्त की शुभता तथा अशुभता का आकलन करके उसकी अशुभता को शुभता में परिवर्तन करने के प्रयोग भी किये जाते हैं। महिलाओं के जीवन में रजो दर्शन परमात्मा प्रदत्त तन-धर्म के रूप में कभी भी हो सकता है किंतु उसकी शुभता के लिए रजोदर्शन स्नान की व्यवस्था, मुहूर्त प्रकरण में इस प्रकार दी गयी है- सोम, बुध, गुरु तथा शुक्रवार, अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तरा भाद्रपद, रेवती नक्षत्र शुभ माने गये हैं। मासों में वैशाख, ज्येष्ठ, श्रवण, अश्विनी, मार्गशीर्ष, माघ, फाल्गुन श्रेष्ठ माने गये हैं। शुक्ल पक्ष को श्रेष्ठ माना गया है, दिन का समय श्रेष्ठ है। 

पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार इसी प्रकार- गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्त, सूतिका स्नान, जातकर्म-नामकरण, मूल नक्षत्र, नामकरण शांति, जल पूजा, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, कर्णवेधन, चूड़ाकरण, मुंडन, विद्यारंभ यज्ञोपवीत, विवाह तथा द्विरागंमनादि मुहूर्त अति अनिवार्य रूप में भारतीय हिंदू समाज मानता है। इसके अतिरिक्त भवन निर्माण में, भी नींव, द्वार गृह प्रवेश, चूल्हा भट्टी के मुहूर्त, नक्षत्र, वार, तिथि तथा शुभ योगों की साक्षी से संपन्न किये जाते हैं विपरीत दिन, तिथि नक्षत्रों अथवा योगों में किये कार्यों का शुभारंभ श्रेष्ठ नहीं होता उनके अशुभ परिणामों के कारण सर्वथा बर्बादी देखी गयी है। 

भरणी नक्षत्र के कुयोगों के लिए तो लोक भाषा में ही कहा गया है- ''जन्मे सो जीवै नहीं, बसै सो ऊजड़ होय। नारी पहरे चूड़ला, निश्चय विधवा होय॥'' 

सर्व साधारण में प्रचलित इस दोहे से मुहूर्त की महत्ता स्वयं प्रकट हो रही है कि मुहूर्त की जानकारी और उसका पालन जीवन के लिए अवश्यम्यावी है। पंचक रूपी पांच नक्षत्रों का नाम सुनते ही हर व्यक्ति कंपायमान हो जाता है। 


पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार पंचकों के पांच-श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्रप्रद तथा रेवती नक्षत्रों में, होने वाले शुभ- अशुभ कार्य को पांच गुणा करने की शक्ति है अतः पंचकों में नहीं करने वाले मुहूर्त अथवा कार्य इस प्रकार माने गये हैं- दक्षिण की यात्रा, भवन निर्माण, तृण तथा काष्ट का संग्रह, चारपाई का बनाना या उसकी दावण-रस्सी का कसना, पलंग खरीदना व बनवाना तथा मकान पर छत डालना। 

पंचकों में अन्य शुभ कार्य किये जाते हैं तो उनमें पांच गुणा वृद्धि की क्षमता होती है लोक प्रसिद्ध विवाह या शुभ मुहूर्त बसंत पंचमी तथा फुलेरादूज पंचकों में ही पड़ते हैं जो शुभ माने गये हैं किसी का पंचकों में मरण होने से पंचकों की विधिपूर्वक शांति अवश्य करवानी चाहिए। इसी प्रकार सोलह संस्कारों के अतिरिक्त नव उद्योग, व्यापार, विवाह, कोई भी नवीन कार्य, यात्रा आदि के लिए शुभ नक्षत्रों का चयन किया जाता है अतः उनकी साक्षी से किये गये कार्य सर्वथा सफल होते हैं। 

पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार बहुत से लोग, जनपद के ज्योतिषी, सकलजन तथा पत्रकार भी, पुष्य नक्षत्र को सर्वश्रेष्ठ तथा शुभ मानते हैं। वे बिना सोचे समझे पुष्य नक्षत्र में कार्य संपन्नता को महत्व दे देते हैं। किंतु पुष्य नक्षत्र भी अशुभ योगों से ग्रसित तथा अभिशापित है। पुष्य नक्षत्र शुक्रवार का दिन उत्पात देने वाला होता है। शुक्रवार को इस नक्षत्र में किया गया मुहूर्त सर्वथा असफल ही नहीं, उत्पातकारी भी होता है। 

यह अनेक बार का अनुभव है। एक बार हमारे विशेष संपर्की व्यापारी ने जोधपुर से प्रकाशित होने वाले मासिक पत्र में दिये गये शुक्र-पुष्य के योग में, मना करते हुए भी अपनी ज्वेलरी शॉप का मुहूर्त करवा लिया जिसमें अनेक उपाय करने तथा अनेक बार पुनः पुनः पूजा मुहूर्त करने पर भी भीषण घाटा हुआ वह प्रतिष्ठान सफल नहीं हुआ। अंत में उसको सर्वथा बंद करना पड़ा। 

इसी प्रकार किसी विद्वान ने एक मकान का गृह प्रवेश मुहूर्त शुक्रवार के दिन पुष्य नक्षत्र में निकाल दिया। कार्यारंभ करते ही भवन बनाने वाला ठेकेदार ऊपर की मंजिल से चौक में गिर गया। तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो गया। अतः पुष्य नक्षत्र में शुक्रवार के दिन का तो सर्वथा त्याग करना ही उचित है। बुधवार को भी पुष्य नक्षत्र नपुंसक होता है। अतः इस योग को भी टालना चाहिए, इसमें किया गया मुहूर्त भी विवशता में असफलता देता है। 
पुष्य नक्षत्र शुक्र तथा बुध के अतिरिक्त सामान्यतया श्रेष्ठ होता है। 
रवि तथा गुरु पुष्य योग सर्वार्थ सिद्धिकारक माना गया है। 

इसके अतिरिक्त विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि विवाह में पुष्य नक्षत्र सर्वथा अमान्य तथा अभिशापित है। अतः पुष्य नक्षत्र में विवाह कभी नहीं करना चाहिए। 

मुहूर्त प्रकरण में ऋण का लेना देना भी निषेध माना गया है, रविवार, मंगलवार, संक्राति का दिन, वृद्धि योग, द्विपुष्कर योग, त्रिपुष्कर योग, हस्त नक्षत्र में लिया गया ऋण कभी नहीं चुकाया जाता। 

ऐसी स्थिति में श्रीगणेश ऋण हरण-स्तोत्र का पाठ तथा- ''ऊँ गौं गणेशं ऋण छिन्दीवरेण्यं हँु नमः फट्।'' का नित्य नियम से जप करना चाहिए। 

पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार मानव के जीवन में जन्म से लेकर जीवन पर्यन्त मुहूर्तों का विशेष महत्व है अतः यात्रा के लिए पग उठाने से लेकर मरण पर्यन्त तक- धर्म-अर्थ- काम-मोक्ष की कामना में मुहूर्त प्रकरण चलता रहता है और मुहूर्त की साक्षी से किया गया शुभारंभ सर्वथा शुभता तथा सफलता प्रदान करता है।

नामकरण के लिए :---- संक्रांति के दिन तथा भद्रा को छोड़कर 1, 2, 3, 5, 7, 10, 11, 12, 13 तिथियों में, जन्मकाल से ग्यारहवें या बारहवें दिन, सोमवार, बुधवार अथवा शुक्रवार को तथा जिस दिन अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, चित्रा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, अभिजित, पुष्य, स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा इनमें से किसी नक्षत्र में चंद्रमा हो, बच्चे का नामकरण करना चाहिए। 

मुण्डन के लिए :----- जन्मकाल से अथवा गर्भाधान काल से तीसरे अथवा सातवें वर्ष में, चैत्र को छोड़कर उत्तरायण सूर्य में, सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार अथवा शुक्रवार को ज्येष्ठा, मृगशिरा, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पुनर्वसु, अश्विनी, अभिजित व पुष्य नक्षत्रों में, 2, 3, 5, 7, 10, 11, 13 तिथियों में बच्चे का मुंडन संस्कार करना चाहिए। ज्येष्ठ लड़के का मुंडन ज्येष्ठ मास में वर्जित है। लड़के की माता को पांच मास का गर्भ हो तो भी मुण्डन वर्जित है। 

विद्या आरंभ के लिए -----: उत्तरायण में (कुंभ का सूर्य छोड़कर) बुध, बृहस्पतिवार, शुक्रवार या रविवार को, 2, 3, 5,6, 10, 11, 12 तिथियों में पुनर्वसु, हस्त, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, मूल, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मूल, पूष्य, अनुराधा, आश्लेषा, रेवती, अश्विनी नक्षत्रों में विद्या प्रारंभ करना शुभ होता है। 

दुकान खोलने के लिए : ------हस्त, चित्रा, रोहिणी, रेवती, तीनों उत्तरा, पुष्य, अश्विनी, अभिजित् इन नक्षत्रों में, 4, 9, 14, 30 इन तिथियों को छोड़कर अन्य तिथियों में, मंगलवार को छोड़कर अन्य वारों में, कुंभ लग्न को छोड़कर अन्य लग्नों में दुकान खोलना शुभ है। ध्यान रहे कि दुकान खोलने वाले व्यक्ति की अपनी जन्मकुंडली के अनुसार ग्रह दशा अच्छी होनी चाहिए। 

कोई वस्तु/सामान खरीदने के लिए :----- रेवती, शतभिषा, अश्विनी, स्वाति, श्रवण, चित्रा, नक्षत्रों में वस्तु/सामान खरीदना चाहिए। कोई वस्तु बेचने के लिए : पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाषाढ़ा, कृत्तिका, आश्लेषा, विशाखा, मघा नक्षत्रों में कोई वस्तु बेचने से लाभ होता है। वारों में बृहस्पतिवार और सोमवार शुभ माने गये हैं। 

ऋण लेने-देने के लिए :----- मंगलवार, संक्रांति दिन, हस्त वाले दिन रविवार को ऋण लेने पर ऋण से कभी मुक्ति नहीं मिलती। मंगलवार को ऋण वापस करना अच्छा है। बुधवार को धन नहीं देना चाहिए। कृत्तिका, रोहिणी, आर्द्रा, आश्लेषा, उत्तरा तीनों, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल नक्षत्रों में, भद्रा, अमावस में गया धन, फिर वापस नहीं मिलता बल्कि झगड़ा बढ़ जाता है। 

भूमि के लेन-देन के लिए : -------आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, मृगशिरा, मूल, विशाखा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में, बृहस्पतिवार, शुक्रवार 1, 5, 6, 11, 15 तिथि को घर जमीन का सौदा करना शुभ है। नूतन ग्रह प्रवेश : फाल्गुन, बैशाख, ज्येष्ठ मास में, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, रेवती नक्षत्रों में, रिक्ता तिथियों को छोड़कर सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार को नये घर में प्रवेश करना शुभ होता है। (सामान्यतया रोहिणी, मृगशिरा, उत्तराषाढ़ा, चित्रा व उ. भाद्रपद में) करना चाहिए। 

यात्रा विचार :----- अश्विनी, मृगशिरा, अनुराधा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती नक्षत्रों में यात्रा शुभ है। रोहिणी, ज्येष्ठा, उत्तरा-3, पूर्वा-3, मूल मध्यम हैं। भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, मघा, आश्लेषा, चित्रा, स्वाति, विशाखा निन्दित हैं। मृगशिरा, हस्त, अनुराधा, रिक्ता और दिक्शूल को छोड़कर सर्वदा सब दिशाओं में यात्रा शुभ है। जन्म लग्न तथा जन्म राशि से अष्टम लग्न होने पर यात्रा नहीं करनी चाहिए। यात्रा मुहूर्त में दिशाशूल, योगिनी, राहुकाल, चंद्र-वास का विचार अवश्य करना चाहिए। वाहन (गाड़ी) मोटर साइकिल, स्कूटर चलाने का मुहूर्त : अश्विनी, मृगशिरा, हस्त, चित्रा, पुनर्वसु, पुष्य, ज्येष्ठा, रेवती नक्षत्रों में सोमवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार व शुभ तिथियों में गाड़ी, मोटर साइकिल, स्कूटर चलाना शुभ है। 

कृषि (हल-चलाने तथा बीजारोपण) के लिए :----- अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरा तीनों, अभिजित, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, मूल, धनिष्ठा, रेवती, इन नक्षत्रों में, सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार को, 1, 5, 7, 10, 11, 13, 15 तिथियों में हल चलाना व बीजारोपण करना चाहिए। 

फसल काटने के लिए :------ भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, मृगशिरा, पुष्य, आश्लेषा, मघा, हस्त, चित्रा, स्वाति, ज्येष्ठा, मूल, पू.फाल्गुनी, श्रवण, धनिष्ठा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा तीनों, नक्षत्रों में, 4, 9, 14 तिथियों को छोड़कर अन्य शुभ तिथियों में फसल काटनी चाहिए। 

कुआँ खुदवाना व नलकूप लगवाना :---- रेवती, हस्त, उत्तरा भाद्रपद, अनुराधा, मघा, श्रवण, रोहिणी एवं पुष्य नक्षत्र में नलकूप लगवाना चाहिए। नये-वस्त्र धारण करना : अश्विनी, रोहिणी, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, धनिष्ठा, रेवती शुभ हैं। 

नींव रखना :------ रोहिणी, मृगशिरा, चित्रा, हस्त, ज्येष्ठा, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा एवं श्रवण नक्षत्र में मकान की नींव रखनी चाहिए। मुखय द्वार स्थापित करना : रोहिणी, मृगशिरा, उ.फाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद एवं रेवती में स्थापित करना चाहिए। 

मकान खरीदना ------: बना-बनाया मकान खरीदने के लिए मृगशिरा, आश्लेषा, मघा, विशाखा, मूल, पुनर्वसु एवं रेवती नक्षत्र उत्तम हैं। उपचार शुरु करना : किसी भी क्रोनिक रोग के उपचार हेतु अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, हस्त, उत्तराभाद्रपद, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा एवं रेवती शुभ हैं। 

आप्रेशन के लिए :----- आर्द्रा, ज्येष्ठा, आश्लेषा एवं मूल नक्षत्र ठीक है। विवाह के लिए : रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती शुभ हैं। 

पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार दैनिक जीवन में शुभता व सफलता प्राप्ति हेतु नक्षत्रों का उपयोगी एवं व्यावहारिक ज्ञान बहुत जरूरी है। वास्तव में सभी नक्षत्र सृजनात्मक, रक्षात्मक एवं विध्वंसात्मक शक्तियों का मूल स्रोत हैं। अतः नक्षत्र ही वह सद्शक्ति है जो विघ्नों, बाधाओं और दुष्प्रभावों को दूर करके हमारा मार्ग दर्शन करने में सक्षम है।

यात्रा आदि में शुभ एवं अशुभ मुहूर्त विचार ------

यात्रा तो सभी करते हैं, कभी सफलता तो कभी असफलता हाथ लगती है। यात्रा कभी इतनी सुखद होती है कि दौड़-धूप भरी जिंदगी की सभी थकान दूर हो जाती है। कभी यात्रियों को दुर्घटना के कारण जान भी गंवानी पड़ जाती है। आखिर क्या है इसका रहस्य? शायद सही मुहूर्त का चुनाव।
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार समय का अभाव होने के कारण लोग प्रायः मुहूर्त के महत्व को भूल जाते हैं। मुहूर्त की तब याद आती है जब यात्रा निरर्थक, निष्फल एवं नुकसान दायक साबित होती है। तब व्यक्ति इस बात को सोचने को मजबूर हो जाता है कि काश मैंने अपनी यात्रा शुभ मुहूर्त में प्रारंभ की होती तो होने वाली हानि, मानसिक या शारीरिक कष्ट यात्रा में न सहने पड़ते। यदि हम यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व मुहूर्त का विचार करते हुए अपनी योजना को बनाएं तो बहुत मुमकिन है कि यात्रा एवं प्रवास के दौरान मानसिक तथा शारीरिक कष्ट से मुक्ति मिल जाए तथा हमारी यात्रा के उद्देश्य में सफलता प्राप्त हो।
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार यात्रा कभी इतनी सुखद होती है कि दौड़-धूप भरी जिंदगी की सभी थकान दूर हो जाती है। कभी यात्रियों को दुर्घटना के कारण जान भी गंवानी पड़ जाती है। आखिर क्या है इसका रहस्य? शायद सही मुहूर्त का चुनाव। समय का अभाव होने के कारण लोग प्रायः मुहूर्त के महत्व को भूल जाते हैं। मुहूर्त की तब याद आती है जब यात्रा निरर्थक, निष्फल एवं नुकसान दायक साबित होती है। तब व्यक्ति इस बात को सोचने को मजबूर हो जाता है कि काश मैंने अपनी यात्रा शुभ मुहूर्त में प्रारंभ की होती तो होने वाली हानि, या शारीरिक कष्ट यात्रा में न सहने पड़ते। यदि हम यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व मुहूर्त का विचार करते हुए अपनी योजना को बनाएं तो बहुत मुमकिन है कि यात्रा कष्ट से मुक्ति मिल जाए ।
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार यात्रा मुहूर्त के लिए दिषाशूल, नक्षत्रशूल, योगिनी, भद्रा, चंद्रबल, ताराबल, नक्षत्रशुद्धि आदि का विचार किया जाता है। किसी भी यात्रा मुहूर्त को निकालने के लिए सर्वप्रथम तिथिशुद्धि का विचार किया जाता है। तिथिशुद्धि: यात्रा के लिए निम्न तिथियां शुभ मानी जाती हैं। किसी भी पक्ष की द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी एवं केवल कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथियां। यहां यह बात ध्यान रखने योग्य है कि इन तिथियों में भद्रादोष नहीं होना चाहिए। अर्थात इन तिथियों में यदि विष्टि करण होगा तो वह समय यात्रा के लिए शुभ नहीं होगा। नक्षत्र शुद्धि: तिथि शुद्धि करने के पश्चात ली गई तिथियों का नक्षत्र विचार किया जाता है। यात्रा के लिए शुभ नक्षत्र निम्नलिखित हैं: अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा एवं रेवती नक्षत्र उत्तम माने गए हैं।
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार इनके अतिरिक्त कुछ नक्षत्रों में सभी दिशाओं में यात्रा की जाती है। अर्थात सभी दिशाओं में यात्रा करना जिन नक्षत्रों में शुभ होता है, वे निम्नलिखित हैं - अश्विनी, पुष्य, अनुराधा और हस्त। अंत में कुछ नक्षत्र ऐसे हैं जो यात्रा के लिए मध्यम श्रेणी के माने जाते हैं। वे निम्नलिखित हैं: रोहिणी, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, उत्ताराषाढ़ा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद, ज्येष्ठा, मूल एवं शतभिषा।


दिशाशूल ज्ञानार्थ चक्रम
सोम शनिचर पूरब ना चालू। मंगल बुध उत्तरदिसिकाल।।

रवि शुक्र जो पश्चिम जाय। हानि होय पथ सुख नहिं पाय।।

गुरौ दक्खिन करे पयाना, फिर नहीं समझो ताको आना।।
अर्थ: सोमवार एवं शनिवार को पूरब दिशा में तथा मंगल एवं बुधवार को उत्तर दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिये। रविवार एवं शुक्रवार को पश्चिम दिशा में यात्रा करना सर्वदा हानिकारक है। गुरूवार के दिन तो दक्षिण दिशा में यात्रा करना अशुभ है। ये दिशाशुल कहलाते है। 

नोट:
 दिशाशूल में यदि यात्रा करना आवयकता ही हो तो निम्नाकिंत वस्तु खाने से यात्रा शुभ होती है।
  1. यदि चन्द्रवास मेष, सिंह, धनु राशि के पूर्व में हो तो ’’धनलाभ’’
  2. यदि चन्द्रवास वृष, कन्या, मकर राशि के दक्षिण में हो तो ’’सुख सम्पत्ति’’
  3. यदि चन्द्रवास मिथुन, तुला, कुम्भ राशि के पश्चिम में हो तो ’’मरण तुल्य कष्ट’’
  4. यदि चन्द्रवास कर्क, वृश्चिक, मीन राशि के उत्तर में हो तो ’’धन हानि’’
  5. यदि चन्द्रवास मेष, सिंह, धनु राशि के पूर्व में हो तो ’’धनलाभ’’
  6. यदि चन्द्रवास वृष, कन्या, मकर राशि के दक्षिण में हो तो ’’सुख सम्पत्ति’’
  7. यदि चन्द्रवास मिथुन, तुला, कुम्भ राशि के पश्चिम में हो तो ’’मरण तुल्य कष्ट’’
  8. यदि चन्द्रवास कर्क, वृश्चिक, मीन राशि के उत्तर में हो तो ’’धन हानि’’
वार रविसोममंगलबुध गुरु शुक्रशनि
वस्तुघी दूधगुड़पुष्पदहीघीतिल
यात्रा में शुभ मुहूर्त
शुभ तिथि-द्वितीया, तृतीया, सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी पूर्णिमा। शुभ नक्षत्र-अश्विनी, मृगशिर, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, अनुराधा, श्रवण, घनिष्ठा, रेवती।
अग्निवास
  1. वर्तमान तिथि में 1 जोड़ना पुन: जो वार उस दिन हो उसकी संख्या जोड़ना।
  2. रविवार की संख्या 1 है यही से सभी वारों की संख्या प्रारम्भ होगी।
  3. कुल योग में 4 का भाग देना, शून्य व तीन शेष रहे तो अग्नि का वास पृथ्वी में होता है, इसमें हवन करने पर कार्य की सिद्धि होती है।
चौघड़िया मुहूर्त
यदि शीघ्रता में कोई भी यात्रा का मुहूर्त अथवा शुभ कार्य का मुहूर्त नहीं बन रहा हो तो चौघड़िया मुहूर्त का उपयोग करना चाहिए।

मुहूर्त जानने की विधि
चौघड़िया मुहूर्त का समय दिन व रात के आठ-आठ हिस्से का होता है। जब दिन रात बराबर 12-12 घंटे के होते है। तब एक चौघड़िया मुहूर्त डेढ़ घटे का होता है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक के मान को उस दिन का दिनमान तथा सूर्यास्त से सूर्योदय तक के मान को रात्रिमान कहा जाता है। आपको जिस दिन यात्रा करनी है। उस दिन का दिनमान पंचांग से लीजिये, उसमें क्रमश: जोड़ते हुए उस दिन के आठों चौघड़िया मूहुर्त ज्ञात कीजिये, अब आठों चौघड़िया में कौन सा मुहूर्त शुभ है। यह चक्र से ज्ञात कीजिये। रात्रि के चौघड़िया जानने के लिए भी रात्रिमान के आधार पर यही प्रक्रिया है।
दिन का चौघड़िया सूर्योदय से सूर्यास्त
वारपहलादूसरातीसराचौथापाँचवाछठासातवाँआठवाँ
रविउद्वेग चरलाभअमृतकालशुभरोगउद्वेग
सोम अमृतकालशुभरोगउद्वेग चरलाभअमृत
मंगल रोगउद्वेगचर लाभअमृतकालशुभरोग
बुध्लाभअमृत कालशुभरोगउद्वेगचरलाभ
गुरु शुभरोगउद्वेगचरलाभअमृतकालशुभ
शुक्रचरलाभअमृतकालशुभ रोगउद्वेगचर
शनि कालशुभ रोगउद्वेगचरलाभअमृतकाल

रात्रि का चौघड़िया सूर्यास्त से सूर्योदय तक
वारपहलादूसरातीसराचौथापाँचवाछठासातवाँआठवाँ
रविशुभअमृतचररोगकाललाभउद्वेगशुभ
सोमचररोगकाललाभ उद्वेगशुभअमृतचर
मंगलकाललाभउद्वेग शुभअमृत चररोगकाल
बुध्उद्वेगशुभअमृतचररोग काललाभउद्वेग
गुरुअमृतचररोगकाललाभउद्वेगशुभअमृत
शुक्ररोगकाललाभउद्वेग शुभअमृतचररोग
शनिलाभ उद्वेगशुभअमृतचररोग काललाभ


भद्राकरण
1- पृथ्वी भद्रा - कुम्भ, मीन, कर्क, सिंह
2 स्वर्ग भद्रा -
 मेष, वृष, मिथुन, वृश्चिक
3- पाताल भद्रा - 
कन्या, धनु, तुला, मकर
1- बव 2- बालव 3- कौलव 4- तैतिल 5- गर
6-
 वाणिज 7- विष्टि 8- शकुनी 9- चतुष्पद
10-
 नाग 11- किंस्तुघ्न






कैसे निकालें यात्रा मुहूर्त?
1 चौघड़िया विचार,2 राहुकाल विचार,3 तिथिशुद्धि विचार,4 शुभ। होरा विचार,5 चंद्रबल विचार,6 नक्षत्र शुद्धि विचार,7 लग्न विचार,8 चंद्रदिशा विचार,9 नक्षत्रशूल विचार,10 योगिनी वास का विचार का विचार किया जाता है।
1 चौघड़िया विचार------
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार नक्षत्र शुद्धि करने के उपरांत शुद्ध तिथियों के दिन चौघड़िया विचार किया जाता है। एक चौघड़िया का समय चार घटी होता है अर्थात डेढ़ घंटे का समय होता है। इस शुभ चौघड़िया के दौरान यात्रा करना शुभ फलदायक एवं यात्रा सुखद होती है। कुल आठ चौघड़िया में से चार चौघड़िया शुभ होती हैं जिनके नाम हैं- अमृत, चर, लाभ एवं
2 राहुकाल विचार-----
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार दिशा शूल के समान राहु काल के वास का विचार किया जाता है। विशेष वार को विशेष दिशा में राहु काल का वास माना जाता है। यह निम्न प्रकार है: जिस दिशा में राहुकाल का वास होता है, उस दिशा में यात्रा करना अशुभ माना जाता है अर्थात यात्रा के समय राहुकाल सम्मुख नहीं होना चाहिए।
3 तिथिशुद्धि विचार-----
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार यात्रा के लिए निम्न तिथियां शुभ मानी जाती हैं। किसी भी पक्ष की द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी एवं केवल कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथियां। यहां यह बात ध्यान रखने योग्य है कि इन तिथियों में भद्रादोष नहीं होना चाहिए। अर्थात इन तिथियों में यदि विष्टि करण होगा तो वह समय यात्रा के लिए शुभ नहीं होगा।
4 शुभ होरा विचार-------
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार शुभ चौघड़िया के उपरांत शुभ ग्रह की होरा का विचार भी किया जाता है। जैसा कि हम जानते हैं, शुभ ग्रह चार होते हैं- चंद्र, बुध, गुरु और शुक्र। इन ग्रहों की होरा में यात्रा करना श्रेष्ठ माना जाता है।
5 चंद्रबल विचार--------
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार यात्रा के दिन चंद्रमा का शुभ राशि में होना भी आवश्यक है। अर्थात जिस व्यक्ति को यात्रा करनी है उसकी जन्म राशि ज्ञात होनी चाहिए। जातक की जन्म राशि से यात्रा करने वाले दिन चंद्रमा की राशि 4, 8, 12 नहीं होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में गोचर का चंद्रमा जातक की जन्म राशि से चैथे, आठवें, बारहवें भाव में नहीं होना चाहिए। ताराबल विचार: उपर्युक्त प्रकार से शुद्ध तिथि के दिन के नक्षत्र की संख्या जातक के जन्म नक्षत्र से गिनें । इस संख्या को 9 से भाग दें तथा शेष संख्या यदि 3, 5, 7 हो तो वह दिन यात्रा के लिए अशुभ माना जाता है, क्योंकि इन दिनों जातक के लिए ताराबल क्षीण होगा।
6 नक्षत्र शुद्धि विचार-----
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार तिथि शुद्धि करने के पश्चात ली गई तिथियों का नक्षत्र विचार किया जाता है। यात्रा के लिए शुभ नक्षत्र निम्नलिखित हैं: अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा एवं रेवती नक्षत्र उत्तम माने गए हैं। इनके अतिरिक्त कुछ नक्षत्रों में सभी दिशाओं में यात्रा की जाती है। अर्थात सभी दिशाओं में यात्रा करना जिन नक्षत्रों में शुभ होता है, वे निम्नलिखित हैं - अश्विनी, पुष्य, अनुराधा और हस्त। अंत में कुछ नक्षत्र ऐसे हैं जो यात्रा के लिए मध्यम श्रेणी के माने जाते हैं। वे निम्नलिखित हैं: रोहिणी, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, उत्ताराषाढ़ा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद, ज्येष्ठा, मूल एवं शतभिषा।
7 लग्न विचार-------
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार उपरोक्त शुद्धियों के पश्चात जबकि यात्रा का दिन निश्चित किया जा चुका है, उसके उपरांत किस शुभ लग्न में यात्रा करनी चाहिए यह जानना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। इसके लिए हमें यह बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि कभी भी कुंभ लग्न में या कुंभ के नवांश में यात्रा नहीं करनी है। लग्न शुद्धि इस प्रकार करनी चाहिए कि 1, 4, 5, 7, 10वें भावों में शुभ ग्रह हों तथा लग्न से 3, 6, 10 एवं 11वें भाव में पाप ग्रह स्थित हों। यदि चंद्रमा लग्न से 1, 6, 8 या 12वें भाव में स्थित होगा तो वह लग्न अशुभ होगा। यह चंद्रमा पापग्रह से युक्त होगा तो भी अशुभ माना जाएगा। लग्न शुद्धि इस प्रकार करनी चाहिए कि शनि 10वें, शुक्र 7वें, गुरु 8वें, और बुध 12वें भाव में स्थित हो सकें। किसी विशेष वार को विशेष दिशा में यात्रा करने से माना जाता है। वार एवं दिशा के अनुसार दिशाशूल संलग्न सारणी से देखा जा सकता है।
8 चंद्रदिशा विचार-------
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार कोटा से मुंबई यात्रा करते समय सम्मुख दक्षिण दिशा होती है एवं दाहिने पश्चिम दिशा होती है। चंद्र दिशा विचार के अनुसार यात्रा के समय चंद्रमा सम्मुख या दाहिने होना चाहिए। हम उन तारीखों को ही ग्रहण करेंगे जब चंद्रमा दक्षिण या पश्चिम में होगा। दक्षिण दिशा में चंद्रमा तब होता है जब वह वृष, कन्या या मकर राशि में और पश्चिम में चंद्रमा तब होता है जब वह मिथुन, तुला और कुंभ राशि में हो। इस प्रकार चंद्र दिशा विचार के अनुसार हम देखेंगे कि यात्रा के समय चंद्रमा उपरोक्त राशियों में स्थित हो।
9 नक्षत्रशूल विचार-------
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार दिशाशूल के समान नक्षत्रशूल का भी विचार किया जाता है। दिशाशूल में विशेष दिशा के लिए विशेष वार का होना अशुभ माना जाता है जबकि नक्षत्रशूल में विशेष दिशा के लिए विशिष्ट नक्षत्रों का होना अशुभ माना जाता है। नक्षत्र शूल का विचार निम्न सारणी से जाना जा सकता है। जिस दिशा में यात्रा करनी हो उस दिशा में नक्षत्रशूल विचार भी कर लेना आवश्यक है।
10 योगिनी वास का विचार------
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार यात्रा करते समय योगिनी का वास किस दिशा में है, उसका ज्ञान होना भी आवश्यक है। यात्रा के समय योगिनी का सम्मुख या दाहिने होना अशुभ माना जाता है। योगिनीवास का विचार तिथि एवं दिशा के अनुसार निर्धारित किया जाता है।
यात्रा में दिशा विचार सप्ताह के दिनों अनुसार ----
पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार निम्न दिश एवं दिनों का ध्यान रखकर यात्रा करनी चाहिए...
रविवार -
शुभ दिशाएं -- पूर्व , उत्तर ,आग्नेय (दक्षिण-पूर्व )
अशुभ दिशाएं - पश्चिम , वायव्य (उत्तर-पश्चिम )
सोमवार -
शुभ दिशाएं --- पश्चिम , दक्षिण , वायव्य
अशुभ दिशाएं -- पूर्व , उत्तर , आग्नेय
मंगलवार -
शुभ दिशाएं --- दक्षिण-पूर्व
अशुभ दिशाएं -- उत्तर , पश्चिम , वायव्य
बुधवार -
शुभ दिशाएं --- दक्षिण ,पूर्व , नैर्रित्य (दक्षिण-पश्चिम)
अशुभ दिशाएं - उत्तर , पश्चिम ,ईशान (पूर्व-उत्तर)

गुरूवार -
शुभ दिशाएं --- पूर्व , उत्तर , ईशान
अशुभ दिशाएं - दक्षिण , पूर्व , नैर्रित्य
शुक्रवार -
शुभ दिशाएं -- पूर्व , उत्तर , ईशान
अशुभ दिशाएं - पश्चिम , दक्षिण , नैर्रित्य
शनिवार -
शुभ दिशाएं --- पश्चिम , दक्षिण , नैर्रित्य
अशुभ दिशाएं - पूर्व , उत्तर , ईशान
--------उपरोक्त दिनों में शुभ दिशाओं का ही चयन करना चाहिए , परन्तु यदि किसी कारण से यात्रा के दिन इनमें से शुभ दिशा का चयन नहीं कर पा रहें हो तथा आपको उस दिन यात्रा करना अनिवार्य ही हो तो किसी नजदीकी ज्योतिषी से संपर्क कर शुभ होरा का पता कर ही यात्रा करें और इसके साथ साथ निम्न बातों पर भी अमल कर(उपाय या टोटके करके) बेझिझक यात्रा करें -
-- रविवार को दलिया एवं घी खाकर ,
-- सोमवार को दर्पण देखकर या दूध पीकर ,
-- मंगलवार को गुड खाकर ,
-- बुधवार को धनिया या तिल खाकर ,
-- गुरूवार को दही खाकर ,
-- शुक्रवार को जौ खाकर या दूध पीकर और
-- शनिवार को अदरख या उड़द खाकर प्रस्थान किया जा सकता है ।

होम,यज्ञ या हवन आदि में अग्निवास का मुहूर्त जानना ----


पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार कोई भी अनुष्ठान के पश्चात हवन करने का शास्त्रीय विधान है और हवन करने हेतु भी कुछ नियम बताये गए हैं जिसका अनुसरण करना अति - आवश्यक है , अन्यथा अनुष्ठान का दुष्परिणाम भी आपको झेलना पड़ सकता है । इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात है हवन के दिन 'अग्नि के वास ' का पता करना ताकि हवन का शुभ फल आपको प्राप्त हो सके ।

जिस दिन आपको होम करना हो , उस दिन की तिथि और वार की संख्या को जोड़कर 1 जमा करें फिर कुल जोड़ को 4 से भाग देवें

-यदि शेष शुन्य (0) अथवा 3 बचे , तो अग्नि का वास पृथ्वी पर होगा और इस दिन होम करना कल्याणकारक होता है ।

-यदि शेष 2 बचे तो अग्नि का वास पाताल में होता है और इस दिन होम करने से धन का नुक्सान होता है । 

-यदि शेष 1बचे तो आकाश में अग्नि का वास होगा , इसमें होम करने से आयु का क्षय होता है ।

अतः यह आवश्यक है की होम में अग्नि के वास का पता करने के बाद ही हवन करें ।

पंडित दयानन्द शास्त्री (मोब.--09024390067) के अनुसार  वार की गणना रविवार से तथा तिथि की गणना शुक्ल-पक्ष की प्रतिपदा से करनी चाहिए तदुपरांत गृह के 'मुख-आहुति-चक्र ' का विचार करना चाहिए इसके लिए किसी योग्य ज्योतिषी से परामर्श कर लें .....