07/2013
माँ बगलामुखी के प्राचीन सिद्ध पीठ/धाम(मंदिर),नलखेडा,जिला-शाजापुर(मध्यप्रदेश) और आचार्य पंडित केलाश शास्त्री-----
तांत्रिकों की देवी बगलामुखी-----

---यदि आप किसी भी परेशानी,अड़चन या विवाद अथवा किसी भी अन्य कारण से परेशान हें तो इस गुप्त नवरात्री के सुअवसर पर अनुष्ठान करवाकर चिंता मुक्त हो जाएँ..
---विशेष पूजा अनुष्ठान --शत्रु बाधा निवारण हेतु तह चुनाव में विजय प्राप्ति हेतु( टिकिट मिलाने से लेकर,नामांकन और विजय तक का पूर्ण पूजा -अनुष्ठान) किये जाते हें..
---यह अनुष्ठान माँ बगलामुखी के प्राचीन सिद्ध पीठ/धाम(मंदिर) पर संपन्न किये जायेंगे..
---स्थान---नलखेडा,जिला-शाजापुर(मध्यप्रदेश)..इस स्थान पर महाभारत काल में पांडवों ने भी साधनाएँ की थी...

''ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ॐ स्वाहा।''

प्राचीन तंत्र ग्रंथों में दस महाविद्याओं का उल्लेख मिलता है। उनमें से एक है बगलामुखी। माँ भगवती बगलामुखी का महत्व समस्त देवियों में सबसे विशिष्ट है। विश्व में इनके सिर्फ तीन ही महत्वपूर्ण प्राचीन मंदिर हैं, जिन्हें सिद्धपीठ कहा जाता है। उनमें से एक है नलखेड़ा में। तो आइए धर्मयात्रा में इस बार हम अपको ले चलते हैं माँ बगलामुखी के मंदिर।

भारत में माँ बगलामुखी के तीन ही प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर माने गए हैं जो क्रमश: दतिया (मध्यप्रदेश), कांगड़ा (हिमाचल) तथा नलखेड़ा जिला शाजापुर (मध्यप्रदेश) में हैं। तीनों का अपना अलग-अलग महत्व है।
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मध्यप्रदेश में तीन मुखों वाली त्रिशक्ति माता बगलामुखी का यह मंदिर शाजापुर तहसील नलखेड़ा में लखुंदर नदी के किनारे स्थित है। द्वापर युगीन यह मंदिर अत्यंत चमत्कारिक है। यहाँ देशभर से शैव और शाक्त मार्गी साधु-संत तांत्रिक अनुष्ठान के लिए आते रहते हैं।

इस मंदिर में माता बगलामुखी के अतिरिक्त माता लक्ष्मी, कृष्ण, हनुमान, भैरव तथा सरस्वती भी विराजमान हैं। इस मंदिर की स्थापना महाभारत में विजय पाने के लिए भगवान कृष्ण के निर्देश पर महाराजा युधि‍ष्ठिर ने की थी। मान्यता यह भी है कि यहाँ की बगलामुखी प्रतिमा स्वयंभू है।
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यहाँ के पंडितजी आचार्य पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री, (मोब.--09669290067 --M.P.  एवं 09024390067--RAJ.) ने बताया कि यह बहुत ही प्राचीन मंदिर है। यहाँ के पुजारी अपनी दसवीं पीढ़ी से पूजा-पाठ करते आए हैं। 1815 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था। इस मंदिर में लोग अपनी मनोकामना पूरी करने या किसी भी क्षेत्र में विजय प्राप्त करने के लिए यज्ञ, हवन या पूजन-पाठ कराते हैं।

यहाँ के अन्य पंडित गोपालजी पंडा, मनोहरलाल पंडा आदि ने बताया कि यह मंदिर श्मशान क्षेत्र में स्थित है। 


बगलामुखी माता मूलत: तंत्र की देवी हैं, इसलिए यहाँ पर तांत्रिक अनुष्ठानों का महत्व अधिक है। यह मंदिर इसलिए महत्व रखता है, क्योंकि यहाँ की मूर्ति स्वयंभू और जाग्रत है तथा इस मंदिर की स्थापना स्वयं महाराज युधिष्ठिर ने की थी।
नलखेडा स्थित इस मंदिर में मां श्री बगलामुखी जी का सिद्ध शक्तिपीठ है, जो लाखों लोगों की आस्था का केन्द्र है। वर्ष भर यहां श्रद्धालु मन्नत मांगने व मनोरथ पूर्ण होने पर आते-जाते रहते हैं....

मां बगलामुखी के इस मंदिर का उल्लेख पांडुलिपियों में भी मिलता है। पांडुलिपियों में मां के जिस स्वरूप का वर्णन है। मां उसी स्वरूप में यहां विराजमान है। ये पीतवर्ण के वस्त्र, पीत आभूषण तथा पीले पुष्पों की ही माला धारण करती हैं। इनके एक हाथ में शत्रु की जिहवा और दूसरे हाथ में मुदगर हैं। मंदिर में हर वर्ष मां बगलामुखी की जयंती पर यहां मां का अनुष्ठान व विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है।

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इस मंदिर में बिल्वपत्र, चंपा, सफेद आँकड़ा, आँवला, नीम एवं पीपल के वृक्ष एक साथ स्थित हैं। इसके आसपास सुंदर और हरा-भरा बगीचा देखते ही बनता है। नवरात्रि में यहाँ पर भक्तों का हुजूम लगा रहता है।


कैसे पहुँचें:----

वायु मार्ग:---- नलखेड़ा के बगलामुखी मंदिर स्थल के सबसे निकटतम एयरपोर्ट इन्दोर   है।

रेल मार्ग:---- ट्रेन द्वारा इंदौर से 30 किमी पर स्थित देवास या लगभग 60 किमी मक्सी पहुँचकर भी शाजापुर जिले के गाँव नलखेड़ा पहुँच सकते हैं।

सड़क मार्ग:-----
01.------ कोटा(राजस्थान) से भी बस,टेक्सी/कार द्वारा द्वारा नलखेडा जाया जा सकता हें..कोटा से झालावाड,झालरापाटन,सोयत तथा सुसनेर होते हुए आमला चोराहे से पूर्व दिशा में स्थित नलखेडा नगर में यह भव्य मंदिर स्थित हें..
दुरी लगभग -180 किलोमीटर ...
02.--- इंदौर से लगभग 165 किमी की दूरी पर स्थित नलखेड़ा पहुँचने के लिए देवास या उज्जैन के रास्ते से जाने के लिए बस और टैक्सी उपलब्ध हैं।
इस वर्ष आषाढ़ी गुप्त नवरात्री (09 जुलाई 2013 ,मंगलवार ) से आशाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से पुनर्वसु नक्षत्र में शुरू हो रहे है अष्टमी भी मंगलवार चित्र नक्षत्र सक्रांति के दिन होने से इन नवरात्रों का महत्त्व और अधिक हो गया है

----संपर्क करें--

आचार्य पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री, 
(मोब.--09669290067 --M.P.  एवं 09024390067--RAJ.)
जानिए की यंत्र क्या हें..?? यंत्र का प्रभाव क्या होता हें..??दोष या बाधा निवारण में यंत्रों का उपयोग कब और केसे करें..??
सामान्य तय यंत्रों को यद्यपि मंत्रों से अलग माना जाता है लेकिन वास्तविकता यह है कि यंत्र यदि शिवरूप हैं तो मंत्र उनकी अंतर्निहित शक्ति है जो डन्हें संचालित करती है और जीवन के सभी साध्यों की प्राप्ति का साधन बनती है। इस लेख में यंत्र में अंकित विभिन्न रूपाकारों की दार्शनिकता एवं रहस्यों के वैज्ञानिक आधार का निरूपण और रहस्योद्घाटन किया गया है।
यंत्र एक प्रकार से सुरक्षा कवच है और यह सही नक्षत्र और तिथि में कागज पर, भोजपत्र पर या तांबे पर बनाया जाता है जो ग्रह मारक या बाधक हो उस ग्रह की पूजा यंत्र द्वारा करें। युद्ध दशा-अंतर्दशा प्रत्यंतर्दशा में यंत्र लाभदायक होते हैं। यंत्र को मंत्र का रूप माना जाता है। यंत्र-रचना मात्र रेखांकन नहीं है बल्कि उसमें वैज्ञानिक तथ्य भी है। कुछ यंत्र रेखा प्रधान होते हैं, कुछ आकृति प्रधान और कुछ संख्या प्रधान होते है। कुछ यंत्रों में बीजाक्षरों का प्रयोग होता है। बीजाक्षर एक संपूर्ण यंत्र होता है। हर ग्रह का यंत्र अलग होता है। यह यंत्र केवल दीपावली, होली या ग्रहणकाल में ही बनाकर सिद्ध किया जा सकता है यदि स्वयं निर्माण कर सकते हैं तो ठीक, नहीं तो किसी विद्वान से इन्हें बनवा सकते हैं।
यंत्र किस सिद्धांत पर कार्य करते हैं?
यंत्र देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। किसी लक्ष्य को शीघ्र प्राप्त करने के लिए यंत्र-साधना को सबसे सरल विधि माना जाता है। तंत्र के अनुसार यंत्र मंे चमत्कारिक दिव्य शक्तियों का निवास होता है। यंत्र सामान्यतः ताम्रपत्र पर बनाए जाते हैं। इसके अलावा यंत्रों को तांबे, चांदी, सोने और स्फटिक में भी बनाया जाता है। ये चारों ही पदार्थ कास्मिक तरंगे उत्पन्न करने और ग्रहण करने की सर्वाधिक क्षमता रखते हैं। कुछ यंत्र भोज-पत्र पर भी बनाए जाते हैं। यंत्र मुख्यतः तीन सिद्धांतों का संयुक्त रूप हैं- आकृति रूप, क्रिया रूप, शक्ति रूप ऐसी मान्यता है कि वे ब्रह्मांड के आंतरिक धरातल पर उपस्थित आकार व आकृति का प्रतिरूप हैं। जैसा कि सभी पदार्थों का बाहरी स्वरूप कैसा भी हो, उसका मूल अणुओं का परस्पर संयुक्त रूप ही हैं। इस प्रकार यंत्र में, विश्व की समस्त रचनाएं समाहित हैं। यंत्र को विश्व-विशेष को दर्शाने वाली आकृति कहा जा सता हैं। ये सामान्य आकृतियां ब्रह्ममांड से नक्षत्र का अपनी एक विशेष आकृति रूप-यंत्र होता हैं। यंत्रों की प्रारंभिक आकृतियां मनोवैज्ञानिक चिन्ह हैं जो मानव की आंतरिक स्थिति के अनुरूप उसे अच्छे बुरे का ज्ञान, उसमें वृद्धि या नियंत्रण को संभव बनाती हैं। इसी कारण यंत्र क्रिया रूप हैं। ‘‘यंत्र’’ की निरंतर निष्ठापूर्वक पूजा करने से ‘आंतरिक सुषुप्तावस्था समाप्त होकर आत्मशक्ति जाग्रत होती हैं और आकृति और क्रिया से आगे जाकर ‘‘शक्ति रूप उत्पन्न होता हैं। जिससे स्वतः उत्पन्न आंतरिक परिवर्तन का मानसिक अनुभव होने लगता हैं। इस स्थिति पर आकर सभी रहस्य खुल जाते हैं।
यंत्र विविध प्रकार में उपलब्ध होते हैं कूर्मपृष्ठीय यंत्र, धरापृष्ठीय यंत्र, मेरुपृष्ठीय यंत्र, मत्स्ययंत्र, मातंगी यंत्र, नवनिधि यंत्र, वाराह यंत्र इत्यादि यह यंत्र स्वर्ण, चांदी तथा तांबे के अतिरिक्त स्फटिक एवं पारे के भी होते हैं. सबसे अच्छा यंत्र स्फटिक का कहा जाता है यह मणि के समान होता है. भक्त, संत, तांत्रिक संन्यासी सभी इस यंत्र की प्रमुखता को दर्शाते हें तथा इन्हें पूजनीय मानते हैं.
यंत्रों में मंत्रों के साथ दिव्य अलौकिक शक्तियां समाहित होती हैं. इन यंत्रों को उनके स्थान अनुरूप पूजा स्थान, कार्यालय, दुकान, शिक्षास्थल इत्यादि में रखा जा सकता है. यंत्र को रखने एवं उसकी पूजा करने से धन-धान्य में वृद्धि होती है और सफलता प्राप्त होती है. श्रीयंत्र विभिन्न आकार के बनाए जाते हैं जैसे अंगूठी, सिक्के, लॉकेट या ताबीज रुप इत्यादि में देखे जा सकते हैं.
यंत्र शास्त्र के अतंर्गत कई ऐसे दुर्लभ यंत्रों का वर्णन है जिनका विधि-विधान से पूजन करने से अभिष्ट फल की सिद्धि होती है, यंत्र की चल या अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठा की जा सकती है यह यंत्र धन प्राप्ति, शत्रु बाधा निवारण, मृत्यंजय जैसे कार्यों लिए रामबाण प्रयोग होते हैं. अपने आप में अचूक, स्वयं सिद्ध, ऐश्वर्य प्रदान करने में सर्वथा समर्थ यह यंत्र जीवन को सुख व सौम्यता से भर देता है.
यद्यपि यंत्र का स्थूल अर्थ समझना सरल हैं। परंतु इसका आंतरिक अर्थ समझना सरल नहीं, क्योंकि मूलतः श्रद्धापूर्वक किये गए प्रयासों के आत्मिक अनुभव से ही इसे जाना जा सकता हैं। यंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा पंचगव्य, पंचामृत एवं गंगाजल से पवित्र करके संबंधित मंत्र से की जाती हैं। बिना प्राण-प्रतिष्ठा के यंत्र को पूजा स्थल पर नहीं रखा जाता। ऐसा करने से नकारात्मक किरणों के प्रभाव से हानि होने की संभावना रहती हैं। पूजा हेतु मार्गदर्शन, अनेक प्रकार के यंत्रों को एक बार प्राण-प्रतिष्ठा के पश्चात् नियमित पूजा की आवश्यकता नहीं होती और वे जीवन पर्यंत रखे जा सकते हैं। यंत्रों पर आधारित कुछ विशेष मंदिर यंत्रों की अदभुत महिमा को देखते हुए, यहां प्राचीन काल से ही यंत्रों पर आधारित मंदिरों का निर्माण किया जाता रहा हैं। यह भी मान्यता रही है कि जो मंदिर यंत्र आधारित होते हैं, वे अपना विशेष धार्मिक महत्व रखते हैं। ऐसे ही कुछ मंदिरों की संक्षिप्त जानकारी यहां दी जा रही हैं।
1. आयल का मेंढक मंदिर भारत का एकमात्र मेंढक मंदिर हैं। यह मंदिर उत्तरप्रदेश में लखनऊ के आॅयल कस्बे में हैं। मेंढक मंदिर देश में अपने ढंग का अकेला और अनोखा मंदिर हैं। इसका निर्माण राज्य को सूखे व बाढ़ जैसी आपदाओं से बचाने के उद्देश्य से किया गया था। मंडूक यंत्र पर आधारित यह मंदिर ग्यारहवीं शती के शासकों के द्वारा किया गया था। इसकी रचना तंत्रवाद पर आधारित हैं। इसकी परिकल्पना एक प्रसिद्ध तांत्रिक ने की थी।
2. श्री यंत्र मंदिर:---- श्री यंत्र मंदिर हरिद्वार के कनखल नामक स्थान का विशेष मंदिर हैं। यह मंदिर अपने आप में अदभुत कला का आदर्श नमूना हैं। इस मंदिर में विशेष रूप से त्रिपुर सुंदरी की पूजा की जाती हैं। यंत्रों की उपयोगिता यंत्र देवशक्तियों के प्रतिक हैं। जो व्यक्ति मंत्रों का उच्चारण नहीं कर सकते, उनके लिए पूजा में यंत्र रखने से ही मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। प्रत्येक यंत्र का अपना अलग महत्व है। कई यंत्र हमें सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। प्राचीन काल से ही, भारतीय संस्कृति में सुख-समृद्धि, दीर्घजीवन, एवं अच्छे स्वास्थ्य के लिए, यंत्र, तंत्र-मंत्र का महत्वपूर्ण स्थान रहा हैं। विभिन्न प्रकार की आध्यात्मिक महत्व की आकृतियों यंत्र के रूप में, सोने, चांदी, तांबा, अष्टधातु अथवा भोज पत्र पर विभिन्न शक्तियों को जाग्रत करने के लिए बनाई जाती हैं।

मनुष्य अपनी जिज्ञासु प्रवृति के कारण प्रकृति एवं ब्रह्मांड के रहस्यों के बारे में जानने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहा है। यह भी सर्वमान्य एवं सर्वविदित है कि ब्रह्मांड में स्थित समस्त चर अचर जगत में आपसी संबंध है तथा समस्त ब्रह्मांड एक लयबद्ध तरीके से निश्चित नियमों के आधार पर कार्य करता है। भारतीय वैदिक शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मांड की समस्त क्रियायें ब्रह्ममांड में स्थित विभिन्न शक्तियों द्वारा संचालित की जाती है। चूंकि मनुष्य भी इसी ब्रह्मांड का एक प्रमुख भाग है अतः मानव जीवन भी बहुत हद तक इन्ही शक्तियों द्वारा नियंत्रित एवं संचालित किया जाता है। ये शक्तियां मनुष्यों के जीवन को उनके कर्मों के अनुसार नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। अतः मानव जीवन के संचालन में इन शक्तियों की अहम भूमिका होती है। भारतीय वैदिक साहित्य में ऐसी अनेक विधियों का वर्णन मिलता है जिसके माध्यम से इन शक्तियों का आवाहन किया जा सकता है तथा इनकी कृपा एवं आशिर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। 
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यंत्रों के संक्षिप्त शब्द व अंक----
यंत्रों के संक्षिप्त शब्द एवं अंक वास्तव में देवी और देवता होते हैं जैसे कि विज्ञान का विद्यार्थी जानता है कि भ्2व् का अर्थ है अर्थात पानी जबकि सामान्यजन नहीं जान पाते हैं इसी प्रकार यंत्रों में उल्लिखित शब्द ह्रीं, क्रीं, श्रीं और क्लीं का क्या अर्थ है एक ज्योतिषी या तांत्रिक ही जान सकता है यह सब देवी के संक्षिप्त नाम हैं जैसे ह्रीं का अर्थ बगलामुखी देवी, क्रीं का अर्थ महाकाली से, श्रीं का अर्थ महालक्ष्मी से, क्लीं का अर्थ भगवती दुर्गा से है।
इसी प्रकार से यंत्रों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले चिह्न बिंदु का अर्थ ब्रह्म से, त्रिकोण का अर्थ है शिव एवं भूपूर का अर्थ भगवती से होता है।
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यंत्रों में श्रद्धा एवं विश्वास का प्रभाव :----
यंत्र तभी अपना कार्य करते हैं जब इनको निर्माण करने वाला साधक श्रद्धा एवं विश्वास के साथ पूर्ण मनोयोग एवं पवित्रता के साथ तथा नियमों की जानकारी प्राप्त करके करता है। यदि यंत्र के निर्माण में संदेह होगा तो यंत्र मृत हो जायेगा। इसी के साथ यंत्रों के निर्माण में उपरोक्त बातों एवं अन्य नियमों का ध्यान रखना चाहिए अन्यथा यंत्र निर्माण करने वाले को हानि भी पहुंचा देते हैं। यंत्र ऊर्जा विज्ञान का एक शक्तिशाली माध्यम है। यंत्र विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए निर्मित किये जाते हैं।
इनका वर्गीकरण होता है परंतु उनका शास्त्रानुसार प्रयोग, कोई विषम स्थिति न हो तो, अच्छे कार्यों में ही करना चाहिए जिनका विवरण निम्न प्रकार है- शांतिकर्म यंत्र: यह वह यंत्र होते हैं जिनका उद्देश्य कल्याणकारी और शक्तिप्रद कार्यों के लिए किया जाता है। इससे किसी का अहित नहीं किया जा सकता है। इनका मूल प्रयोग रोग निवारण, ग्रह-पीड़ा से मुक्ति, दुःख, गरीबी के नाश हेतु, रोजगार आदि प्राप्त करने में किया जाता है जैसे श्रीयंत्र।
स्तंभन यंत्र:----- आग, हवा, पानी, वाहन, व्यक्ति, पशुओं आदि से होने वाली हानि को रोकने के लिए इस प्रकार के यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग करने से उपरोक्त कारणों से आई हुई विपदाओं का स्तंभन किया जाता है अर्थात उन पर रोक लगाई जाती है।
सम्मोहन यंत्र:-----
ये यंत्र वह होते हैं जिनसे किसी वस्तु या मनुष्य को सम्मोहित किया जाता है। उच्चाटन यंत्र: ये यंत्र वह होते हैं जिनसे प्राणी में मानसिक अस्थिरता, भय, भ्रम, शंका और कार्य से विरत रहने का कार्य लिया जाता है। इन यंत्रों का प्रयोग वर्जित माना जाता है।
वशीकरण हेतु यंत्र:----
इन यंत्रों के द्वारा प्राणियों, प्रकृति में उपस्थित तत्वों का वशीकरण किया जाता है। इनके प्रयोग से संबंधित व्यक्ति धारण करने वाले के निर्देशों, आदेशों का पालन करते हुए उसके अनुसार आचरण करने लगता है।
आकर्षण हेतु यंत्र:-----
सम्मोहन, वशीकरण, इस यंत्र में बहुत मामूली-सा अंतर है। सामान्यतः ये तीनों एक ही यंत्र हैं पर आकर्षण यंत्र के प्रयोग से दूरस्थ प्राणी को आकर्षित कर अपने पास बुलाया जाता है।
जुम्मन हेतु यंत्र:----
इस यंत्र के प्रयोग से इच्छित कार्य हेतु संबंधित व्यक्ति को आज्ञानुसार कार्य करने के लिए विवश किया जाता है। इसके प्रभाव में आने से व्यक्ति अपना अस्तित्व भूलकर साधक की आज्ञानुसार कार्य करने लगता है। वास्तव में इसके द्वारा प्राणी में दासत्व की भावना पैदा करके उससे कार्य लिया जाता है।
विद्वेषण यंत्र:----
इन यंत्रों के माध्यम से प्राणियों में फूट पैदा करना, अलगाव कराना, शत्रुता आदि कराना होता है। इससे प्राणी की एकता, सुख, शक्ति, भक्ति को नष्ट करना होता है।
मारणकर्म हेतु यंत्र:-----
इन यंत्रों के द्वारा अभीष्ट प्राणी, पशु-पक्षी आदि की मृत्यु का कार्य लिया जाता है। इसके प्रयोग से संबंधित मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। वास्तव में यह हत्याकर्म है। इन यंत्रों का प्रयोग सपने में भी नहीं करना चाहिए। यह सबसे घृणित यंत्र है।
पौष्टिक कर्म हेतु यंत्र:----
किसी का भी अहित किये बिना साधक अपने सिद्ध यंत्रों से अन्य व्यक्तियों के लिए धन-धान्य, सुख सौभाग्य, यश, कीर्ति और मान-सम्मान की वृद्धि हेतु प्रयोग करता है, उन्हें पौष्टिक कर्म यंत्र कहते हैं।
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प्रत्येक यंत्र हर समस्या का समाधान नहीं हो सकता। उसका पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए जातक की जन्मकुंडली में निर्बल योग कारक ग्रह की खोज करके यदि संबंधित यंत्र का प्रयोग करें तो अवश्य ही यथेष्ट लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस लेख में सभी ग्रहों से संबंधित पृथक-पृथक यंत्र और रोग निवारक तेल बनाने की विधि के बारे में बताया गया है। कुंडली में लग्न और चंद्रमा की स्थिति से उपायों की जानकारी मिलती है। ग्रह यदि अग्नि तत्व राशि में है तो यज्ञ, व्रत आदि से लाभ मिलता है।
हिंदु संस्कृति में मंदिर जो कि देवी-देवताओं के पूजा स्थल होते हैं, इनका निर्माण वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार किया जाता है। मंदिरों के स्थान का चयन, मूर्ति स्थापना मंदिरों के उपर स्थित गुंबद एवं ध्वजा आदि सभी का निर्माण वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार तथा उपयुक्त मंत्रोच्चारण के साथ इस प्रकार किया जाता है जिससे वहां पर अधिक से अधिक आध्यात्मिक एवं दैवीय कृपा ;ैचपतपजनंस कवूदचवनतद्ध आ सके। हिंदु संस्कृति में देवी देवताओं को आवाहन करने के अनेक तरीके बताए गये हैं। पूजा करते समय बैठने का ढंग ईश्वर के सामने दंडवत, नतमस्तक होना एक स्थान पर ध्यान केंद्रित करना श्वास प्रक्रिया आत्म नियंत्रण आदि ईश्वर की आराधना के मूलभूत तरीके हैं। इनके माध्यम से मनुष्य ईश्वर के समक्ष स्वयं के शरीर एवं मन को पूर्ण रूप से समर्पित करता है। यह कहना अत्यंत सरल है। परंतु इसका पालन करना कठिन होता है। सही अर्थो में देखा जाए तो शरीर एवं मन का ईश्वर को पूर्णतः समर्पण सबसे बड़ा साधन कहा जा सकता है। यदि हम इसमें सफल हो जाते हैं तो दैवीय शक्तियों की कृपा पात्र अवश्य बनते हैं इसमें कोई संशय नहीं है। इस प्रकार कोई भी पूजा एवं अर्चना तब तक पूरा फल नहीं देती है जब तक कि आराधक या याचक इसे पूर्ण शुद्धि एवं गहनता से नही करे तथा अपने आप को ईश्वर के चरणों में पूर्णतः समर्पित न करे। क्योंकि जरा भी अहंकार साधक की संपूर्ण शक्ति का क्षय कर देता है। यह समस्त ब्रह्मांड शिव एवं शक्ति के सहयोग से संचालित होता है।
शिव का अर्थ संक्षेप में ब्रह्मांड में स्थित ऊर्जा से है जिसका कोई स्वरूप नही है। जबकि प्रकृति साक्षात शक्ति है तथा ब्रह्मांड में स्थित ऊर्जा को स्वरूप प्रकृति में स्थित पांच तत्वों के सहयोग से ही मिल पाता है। इन दोनों में से एक भी अभाव में साकार संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। शिव के बिना शक्ति बलहीन है तथा शक्ति के बिना निर्गुण, निराकार शिव स्वरूप हीन व आकार हीन है। अतः यह संसार शिव एवं शक्ति दोनों के सहयोग से ही संचालित होता है। मानव शरीर इसी ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप कहा जा सकता है तथा यह भी शिव (आत्मा) एवं शक्ति के संयोग से ही संचालित होता है। इस प्रकार मानव शरीर में स्थित आत्मा शिव द्वारा नियंत्रित होती है जबकि मानव शरीर एवं मष्तिष्क प्रकृति जिसको कि महामाया भी कहा जाता है द्वारा संचालित होते है। इस प्रक्रिया में शिव रूप अनेक बार गौण हो जाता है तथा मस्तिष्क एवं शरीर का वर्चस्व हो जाता है जिससे आत्मा को कर्म बंधन में बंधकर जन्म-मरण की प्रक्रिया से बार-बार गुजरना पड़ता है तथा अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। अतः मानव जीवन के संतुलित रूप से संचालन हेतु शिव एवं शक्ति में संतुलन होना आवश्यक होता है। मानव जीवन में स्थित इस असंतुलन को दूर करने के लिये तथा इनमें आपसी सामंजस्य स्थापित करने के लिये भारतीय वेदों एवं पुराणों में अनेक विधियों का उल्लेख किया है। यंत्र, मंत्र एवं तंत्र उनमें से प्रमुख है। मंत्र: भारतीय वैदिक साहित्य में हिंदी वर्णमाला के प्रत्येक अक्षर को एक मंत्र की संज्ञा दी गई है। वही नाद ब्रह्म है। प्रत्येक मंत्र में कितने अक्षर होंगे। इसका चयन मंत्र के फल के अनुसार किया गया है। मंत्र में स्थित अक्षरों की संख्या क े अनसु ार मत्रं क े फल म ंे परिवतर्न हाते ा है। उदाहरणार्थ ऊँ नमः शिवाय में 6 अक्षर ह ंै इसलिय े इस े षडाक्षरी मत्रं कहते हैं। इसमें यदि ऊँ न प्रयुक्त किया जाये एवं केवल नमः शिवाय उच्चारित किया जाये तो यह पंचाक्षरी मंत्र बन जाता है। इसी प्रकार ऊँ नमो नारायणाय अष्टाक्षरी मंत्र कहलाता है तथा ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय द्वादशाक्षरी मंत्र कहलाता है। इस प्रकार मंत्रों का उचित चयन करके विभिन्न दैविय शक्तितयों का आवाहन किया जाता है तथा विभिनन उद्देश्यों की पूर्ति की जाती है। यंत्र, मंत्र एवं तंत्र इन माध्यमों को अपनाकर दैवीय शक्तियों का आवाहन किया जाता है एवं उनसे प्रार्थना, याचना की जाती है जिससे कि वे मनुष्य के भौतिक, आध्यात्मिक विकास में संतुलन स्थापित कर सकें तथा मानव जीवन को सुखी बना सकें।
यंत्र, मंत्र एवं तंत्र शास्त्र को एक पूर्ण विकसित आध्यात्मिक विज्ञान की संज्ञा दी जा सकती है। जिसका उद्ेश्य शरीर, मन एवं आत्मा के विकास में एक संतुलन स्थापित करना तथा मनुष्य का भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास करना है। यदि मंत्रों को वैदिक रीति से पूर्ण शुद्धता एवं श्रद्धा के साथ उच्चारित किया जाता है तो इनके उच्चारण से निकलने वाली तरंगे उस दैवीय शक्ति के तरंगों से संपर्क स्थापित कर सकती है जिसको प्रसन्न करने के लिये ये मंत्र उच्चारित किये जाते हैं। हमारे ऋषियों को इन तरंगों की जानकारी थी तथा उन्होंने मंत्रों के माध्यम से इन तरंगों का उपयोग मनुष्य की आध्यात्मिक विकास एवं मानसिक शान्ति के लिये किया। मंत्रों का यदि विधिवत रूप से उच्चारण किया जाए तो इनसे निकलने वाली तरंगे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ाती है और मानव शरीर से निकलने वाली तरंगे संबंधित दैवीय तरंगों के संपर्क में आकर मानव मस्तिष्क एवं शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। तथा शब्दों के क्रम का विपर्याय होने पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होने लगता है। यंत्रों को सक्रिय एव शक्तिपूर्ण बनाने की क्षमता भी मंत्रों में ही हैं। उसके बिना यंत्र आकार मात्र रह जाऐंगे। यंत्र: मंत्रों की एक रेखाचित्र के माध्यम से अभिव्यक्ति को यंत्र कहते हैं। जिस प्रकार मानव शरीर विशालकाय ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप है। उसी प्रकार विशालकाय ब्रह्मांड को सूक्ष्म रूप में अभिव्यक्त करने के लिये ये यंत्र बनाये जाते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि मंत्रों एवं यंत्रों का आविष्कार किसने किया है यह कहना बहुत कठिन है क्योंकि इसका कहीं पर भी उल्लेख नहीं मिलता है। चूंकि इन यंत्रो का उल्लेख वेदों एवं पुराणों में मिलता है और वेदों के बारे में कहा जाता हैं कि वे अपौरूपेय है इसलिए उनमें मंत्रों के रचयिताओं का इतिहास और जीवनवृत न होकर जीवन दर्शन और रहस्य सूत्र रूप में ही निरूपित हुआ है। जो कि भाषा और शब्दों की श्लेष शक्ति का पूर्ण समावेश है। अतः यंत्र एवं मंत्रों का रचना भी दैविय शक्तियों द्वारा ही की गई है। इन मंत्रों का रहस्योदघाटन हमारे ऋषि एवं मुनियों ने किया है। जिससे आम आदमी इनका लाभ उठा सके।
यंत्र विशिष्ट देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली ऐसी आकृतियां होती हैं जो आकृति, क्रिया तथा शक्ति नामक तीन सिद्धांतों के आधार पर संयुक्त रूप से कार्य करती है। परंतु इन यंत्रों की आकृति निष्ठापूर्वक और विधि-विधान से की गई पूजा एवं प्राण प्रतिष्ठा से ही जागृत होती है। बिना प्राण-प्रतिष्ठा के यंत्र को पूजा स्थल पर भी नहीं रखा जाता है क्योंकि ऐसा करने से सकारात्मक प्रभाव के स्थान पर नकारात्मक प्रभाव होने लगते हैं। शास्त्रों में यंत्रों को देवी-देवताओं का निवास स्थान माना गया है।
जब यंत्रों का निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा शास्त्रोक्त विधि द्वारा की गई हो और साधक पूर्ण विश्वास तथा श्रद्धा के साथ उनकी आराधना करता हो तो यंत्र-साधना करने वालों को सुख-ऐश्वर्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यंत्र क्या है? इसमें कितनी दिव्य शक्ति विद्यमान है? भिन्न प्रकार के यंत्रों की रेखाएं, बीजाक्षर और बीजांक दिव्य शक्तियों से प्रभावित होते हैं। रेखाओं की आकृति, क्रम व अंकों और अक्षरों के आधार पर ही यंत्र को कोई विशिष्ट नाम दिया जाता है। इसमें अंकित अंक और अक्षर देवता से संबंधित बीजांक शक्ति का प्रतीक होते हैं। यंत्र व मंत्र एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों ही अलौकिक हैं। अलौकिक शक्ति से परिपूर्ण होने की वजह से ये इंसान की इच्छा-पूर्ति करने में समर्थ है। यंत्र-साधना में विश्वास और श्रद्धा के साथ-साथ साधना का सर्वांगीण ज्ञान भी आवश्यक है। तभी दिव्य यंत्रों का चमत्कार हम पा सकते हैं।
जिस प्रकार मंत्रों में ध्वनि तरंगों की आकृति का महत्व है, उसी प्रकार यंत्रों में बिंदु, रेखा, त्रिकोण, वृत्त, चतुर्भुज इत्यादि का विशिष्ट महत्व होता है। तांत्रिक साधनाओं में यंत्र-साधना का बड़ा महत्व है। साधारण भाषा में यंत्र का तात्पर्य मशीन से होता है। जिस तरह देवी-देवताओं की मूर्ति पूजा की जाती है और उन मूर्तियों से लोगों की आस्था और श्रद्धा जुड़ी होती है, उसी तरह यंत्र भी किसी देवी या देवता के प्रतीक होते हैं। इनकी रचना ज्यामितीय होती है। यंत्र में सारी दैवीय शक्तियां सूक्ष्म रूप से विद्यमान होती है। यंत्र आध्यात्मिक दृष्टिकोण से विभिन्न देवी-देवताओं के रंग-रूप के रहस्य होते हैं। इसीलिए साधनाओं के माध्यम से इनमें जितनी शक्ति उत्पन्न की जाती है, यंत्र उतने ही चमत्कारी होते हैं।
यंत्रों में मुख्यतः 5 प्रकार की आकृतियों या रेखाचित्रों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात बिंदु, वृत, त्रिकोण, वर्ग एवं षटकोण। बिंदु: बिंदु आकाश तत्व का द्योतक है। बिंदु प्रत्येक आकार का आधार एवं आरंभ इंगित करता है। दूसरे शब्दों में बिंदु के बिना किसी आकार का आरंभ व अंत निश्चित करना कठिन ही नहीं वरन् असंभव है। बिंदु के अंदर नैसर्गिक गतिशीलता होती है जिसके आधार पर यह प्रत्येक आकार एवं तत्व में अनुप्रविष्ठ ;च्मदमजतंजमद्ध होता है। बिंदु को आकाश की संज्ञा दी जाती है क्योंकि पृथ्वी पर स्थित समस्त चर अचर जगत का आरंभिक बिंदु या जड़ आकाश ही है। बिंदु एक प्रकार की शक्ति है जो कि ऊर्जा प्रवाहित करती है। ये बिंदु किसी भी यंत्र का केंद्र होती है। तंत्र शास्त्र में बिंदु को साक्षात शिव की संज्ञा दी गई है जो कि समस्त शक्तियों का स्रोत है। किसी भी यंत्र के मध्य में स्थित बिंदु विभिन्न रेखाचित्रों से घिरी रहती है ये रेखाचित्र विभिन्न दैवीय शक्तियों को दर्शाते हैं तथा बिंदु इनकी शक्ति के स्रोत के रूप में दिखाई जाती है। सरल रेखा: एक बिंदु को जब दूसरे बिंदुओं से मिलाते हैं तो सरल रेखा बनती है।
वस्तुतः रेखाएं बिंदु पथ ही है। ये दो बिंदु परमात्मा एक जीवात्मा, सुख-दुख, रात्री दिवस आदि को इंगित करते हैं। इस प्रकार सरल रेखा इंगित करता है कि जीवात्मा एवं परमात्मा, सुख दुख आदि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं तथा इन्हें अलग नहीं किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में सरल रेखा यह इंगित करती है कि जीवात्मा परमात्मा का ही अंश है। वृत्त: वृत की कल्पना करते ही एक चक्राकार आकृति आंखों के सामने उभर कर आती है। जब एक बिंदु के चारो ओर दूसरी बिदु को घुमाया जाए तो उसकी चक्राकार गति होती है। इस चक्राकार गति को प्राकृतिक जगत में घूर्णन ;ॅीपतसचववसद्ध क्रिया कहते हैं।
वायु सदैव चलायमान है अतः वृत वायु तत्व बन प्रतिनिधित्व करता है। त्रिकोण: त्रिकोण को वैदिक साहित्य में अत्यधिक महत्ता दी गई है। देखा जाए तो त्रिकोण वह पहला द्वि आयामी रेखाचित्र है जो कि एक स्थान को घेरता है।
उघ्र्व मुखी त्रिकोण ----- अग्नि तत्व का बोध कराता है क्योंकि अग्नि की गति सदैव अघ्र्वमुखी होती है। यह त्रिकोण उन्नति एवं प्रगति का द्योतक है। वैदिक साहित्य में इसे शिव की संज्ञा दी जाती है। इसका ऊपर से संकरा तथा नीचे से फैला होना ये इंगित करता है कि जीवात्मा का जड़ आकाश में है तथा इसका विस्तार पृथ्वी पर होता है।
अधोमुखी त्रिकोण:---- जल तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। जल के बिना जीवन असंभव है। जल की गति अधोमुखी होती है। इसका नीचे से संकरा तथा ऊपर से फैला होना जीवात्मा का पांच तत्वो के माध्यम से पृथ्वी पर फैलाव एवं इसका सांसारिक जगत में बहुत गहरे तक उलझना इंगित करता है।
वर्ग:---- किसी भी यंत्र की बाहरी सीमा आम तौर पर वर्गाकार होती है तथा इसका आरंभ मध्य बिंदु से होता है। इस प्रकार प्रत्येक यंत्र ब्रह्मांड के विकास को सूक्ष्म रूप में प्रस्तुत करता है जो कि आकाश से आरंभ होकर पृथ्वी पर पूर्ण विकसित होता है। वर्गाकार रेखाचित्र पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है क्योंकि विस्तार पृथ्वी का गुण है या दूसरे शब्दों में आकाश से आई ऊर्जा का विकास पृथ्वी पर ही होता है। अतः चतुर्भुज बिंदु का चारों दिशाओं में फैलाव पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। तांत्रिकों के क्षेत्र में सूर्य योग के द्वारा ही आकाशीय शक्ति में से भौतिक पदार्थों का सृजन किया जाता है।
षटकोण:--- उध्र्वामुखी एवं अधोमुखी त्रिकोण से मिलकर बनने वाला षटकोण शिव एवं शक्ति दोनों के संयोग को प्रदर्शित करता है। इसके बिना संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इन षटकोणों के मध्य में स्थित खाली स्थानों को यंत्रों में शिव एवं शक्ति का क्रीडा स्थल माना जाता है। इसी कारण इन खाली स्थानों में विभिन्न अंक या मंत्र इस प्रकार लिखे जाते हैं जिससे कि इन दोनों की कृपा एवं आशिर्वाद प्राप्त किया जा सके। यंत्रों में उपर्युक्त आकृतियों का प्रयोग विभिन्न प्रकार से किया जाता है तथा ब्रह्मांड के विशालकाय रूप को सूक्ष्म रूप में दर्शाया जाता है। इन आकृतियों का विभिन्न यंत्रों में विभिन्न शक्तियों के आवाहन लिए भिन्न-भिन्न रूप से प्रयोग किया गया है तथा इनमें प्रयुक्त किये जाने वाले मंत्रों एवं अंको का चयन भी संबंधित शक्ति के अनुसार ही किया गया है।
यह माना जाता है कि जब कोई व्यक्ति मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित यंत्र पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है तो उसका मष्तिष्क एवं शरीर उस यंत्र की आकार शक्ति से प्रभावित होता है और धीरे-धीरे व्यक्ति को संबंधित शक्तियों की कृपा एवं आशिर्वाद प्राप्त होने लगता है। इस प्रकार यंत्र एवं मंत्र ब्रह्मांड में स्थित विभिन्न शक्तियों तक पहुंचने का या उनका आवाहन करने का एक सशक्त माध्यम है।
यदि इन यंत्रों को विधिवत प्रकार से अभिमंत्रित करके इनकी पूजा अर्चना की जाए तथा इन पर ध्यान केन्द्रित किया जाये तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि ये हमें संबंधित शक्तियों की कृपा का पात्र बन सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र में यंत्र, मंत्र एवं तंत्र के अतिरिक्त बहुत सी दुर्लभ सामग्रियों जैसे औषधि, रत्न, रंगो एवं पदार्थों का भी अत्यधिक महत्व है। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि संपूर्ण ब्रह्मांड में स्थित सभी तत्व परस्पर संबंधित है। अतः एक ग्रह द्वारा मनुष्य ही नहीं वरन ब्रह्मांड के अनेक दूसरे तत्व भी नियंत्रित होते हें। इस प्रकार ज्योतिष शास्त्र में यदि किसी ग्रह से संबंधित किसी तत्व की मानव जीवन में कमी पाई जाती है तो उसे ;उनजनंस तमेवदंदबमद्ध परस्पर संबंध के इस सिद्धांत के आधार पर उस ग्रह से नियंत्रित अन्य तत्वों का प्रयोग करके पूरा करने का प्रयास किया जाता है।
यंत्र विभिन्न आकृतियों का रेखा समूह मात्र होता है जबकि वास्तविकता यह है कि यंत्र का प्रत्येक आकार एक विशेष देवता और तत्व की शक्ति का प्रतीक होता है। जिसे एक निश्चित विधि-विधान के अंतर्गत मंत्रों द्वारा जागृत करके लक्ष्य सिद्धि हेतु प्रयोग किया जाता है। इन यंत्रों का वर्गीकरण उनके उद्देश्य और प्रयोजनों पर आधारित है जिसके बारे में सुविस्तृत जानकारी इस लेख में दी गयी है। सिद्धयंत्र जो आड़ी, तिरछी रेखाओं, बिंदुओं, अंकों, चतुर्भुजों, त्रिकोण आदि से पूरित होते हैं वास्तव में इन्हीं चिह्नों से संचालित होते हैं। इन यंत्रों को यही कल पुर्जे चलाते हैं।
भौतिक यंत्र की कार्य-संरचना दिखाई पड़ती है और उसको देखकर मनुष्य प्रभावित होता है जबकि यंत्र मनुष्य की जीवनशैली बदलकर अपना प्रभाव दिखाते हैं। यंत्रों में बहुत शक्ति होती है। यह असंभव कार्य को भी संभव करके दिखाने की शक्ति रखते हैं। यंत्रों की शक्ति इनमें अंकित चिह्न एवं यंत्रों के द्वारा जागृत होती है। मंत्रों के कंपन से सृष्टि के सब पदार्थ बनते हैं और बिगड़ते हैं, यह विज्ञान भी कहता है। इस कारण से मंत्रों में शक्ति होती है। कालांतर में हमारे ऋषियों-मुनियों ने देखा कि दुष्ट लोग भी मंत्रों के माध्यम से घृणित कार्य कर लेते हैं तो इन्होंने इस मंत्र शक्ति को गुप्त रखने के लिए मंत्रों, रेखाओं, चिह्नों से पूरित कर यंत्रों की रचना की जिससे मंत्रों का दुरुपयोग न हो सके, वास्तव में यंत्र भी इलेक्ट्राॅनिक यंत्रों के जैसे सर्किट होते हैं जो देखने में आड़ी-तिरछी रेखाएं होती हैं परंतु उनका जानकार इंजीनियर उन्हीं के माध्यम से रेडियो, टी.वी., कम्प्यूटर आदि का प्रयोग कर लेता है और सामान्यजन को लाभ पहुंचा देता है।
यदि ग्रह पृथ्वी तत्व राशि (2, 6, 10) राशि में है तो रत्न, यंत्र आदि से लाभ मिलता है। ग्रह यदि वायु तत्व (3, 7, 11) राशि में है तो मंत्र जाप करने से लाभ मिलता है और ग्रह यदि जल तत्व (4, 8, 12) राशि में है तो वस्तुओं को पानी में बहाने से लाभ मिलता है। योग कारक ग्रह यदि निर्बल हो, तो यंत्र-धातु से उपचार करें, अशुभ और मारक ग्रहों का उपाय पूजा-पाठ-दान ग्रह की वस्तु को बहाकर करना चाहिए।
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जानिए कुछ बहुउपयोगी यंत्र को----
(लेखक--रामेन्द्र सिंह जी भादिरिया,जयपुर,राजस्था))

श्री यंत्र-----
यह सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है,इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं,और उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है। यह बेहद शक्तिशाली ललितादेवी का पूजा चक्र है,इसको त्रैलोक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों का मोहन यन्त्र भी कहते है। यह सर्व रक्षाकर सर्वव्याधिनिवारक सर्वकष्टनाशक होने के कारण यह सर्वसिद्धिप्रद सर्वार्थ साधक सर्वसौभाग्यदायक माना जाता है। इसे गंगाजल और दूध से स्वच्छ करने के बाद पूजा स्थान या व्यापारिक स्थान तथा अन्य शुद्ध स्थान पर रखा जाता है। इसकी पूजा पूरब की तरफ़ मुंह करके की जाती है,श्रीयंत्र का सीधा मतलब है,लक्ष्मी यंत्र जो धनागम के लिये जरूरी है। इसके मध्य भाग में बिन्दु व छोटे बडे मुख्य नौ त्रिकोण से बने ४३ त्रिकोण दो कमल दल भूपुर एक चतुरस ४३ कोणों से निर्मित उन्नत श्रंग के सद्रश्य मेरु प्रुष्ठीय श्रीयंत्र अलौकिक शक्ति व चमत्कारों से परिपूर्ण गुप्त शक्तियों का प्रजनन केन्द्र बिद्नु कहा गया है। जिस प्रकार से सब कवचों से चन्डी कवच सर्वश्रेष्ठ कहा गया है,उसी प्रकार से सभी देवी देवताओं के यंत्रों में श्रीदेवी का यंत्र सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसी कारण से इसे यंत्रराज की उपाधि दी गयी है। इसे यन्त्रशिरोमणि भी कहा जाता है। दीपावली धनतेरस बसन्त पंचमी अथवा पौष मास की संक्रान्ति के दिन यदि रविवार हो तो इस यंत्र का निर्माण व पूजन विशेष फ़लदायी माना गया है,ऐसा मेरा विश्वास है।
श्री महालक्ष्मी यंत्र-------
श्री महालक्षमी यंत्र की अधिष्ठात्री देवी कमला हैं,अर्थात इस यंत्र का पूजन करते समय श्वेत हाथियों के द्वारा स्वर्ण कलश से स्नान करती हुयी कमलासन पर बैठी लक्ष्मी का ध्यान करना चाहिये,विद्वानों के अनुसार इस यंत्र के नित्य दर्शन व पूजन से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इस यंत्र की पूजा वेदोक्त न होकर पुराणोक्त है इसमे बिन्दु षटकोण वृत अष्टदल एवं भूपुर की संरचना की गयी है,धनतेरस दीवावली बसन्त पंचमी रविपुष्य एवं इसी प्रकार के शुभ योगों में इसकी उपासना का महत्व है,स्वर्ण रजत ताम्र से निर्मित इस यन्त्र की उपासना से घर व स्थान विशेष में लक्ष्मी का स्थाई निवास माना जाता है।इस यंत्र की संरचना विचित्र है, यंत्रों में जो भी अंक लिखे होते हैं या जो भी आकृतियां निर्मित होती हैं वह देवी देवताओं की प्रतीक होती हैं. यंत्र-शक्ति द्वारा वातावरण में सकारात्मक उर्जा क अप्रवाह होत है. श्री यंत्र को पास रखने से शुभ कार्य सम्पन्न होते रहते हैं. श्रीयंत्र को सर्व सिद्धिदाता, धनदाता या श्रीदाता कहा गया है. इसे सिद्ध या अभिमंत्रित करने के लिए लक्ष्मी जी का मंत्र अति प्रभावशाली माना जाता है मंत्र जप के लिए कमलगट्टे की माला का प्रयोग करना चाहिए.पौराणिक कथा के अनुसार एक बार लक्ष्मी जी पृथ्वी से बैकुंठ धाम चली जाती हैं, इससे पृथ्वी पर संकट आ जाता है तब प्राणियों के कल्याण हेतु वशिष्ठ जी लक्ष्मी को वापस लाने का प्रयास करते हैं. पृथ्वी पर ‘‘श्रीयंत्र’’ की साधना करते हैं श्रीयंत्र को स्थापित कर, प्राण-प्रतिष्ठा एवं पूजा करते हैं उनकी इस पूजा एवं श्री यंत्र स्थापना द्वारा लक्ष्मी जी वहां उपस्थित हो जाती हैं. इस यंत्र का प्रयोग दरिद्रता का नाश करता है. इसकी कृपा से व्यक्ति एकाएक धनवान हो जाता है.
बगलामुखी यंत्र-----
बगला दस महाविद्याओं में एक है इसकी उपासना से शत्रु का नाश होता है,शत्रु की जिव्हा वाणी व वचनों का स्तम्भन करने हेतु इससे बढकर कोई यंत्र नही है। इस यंत्र के मध्य बिंदु पर बगलामुखी देवी का आव्हान व ध्यान करना पडता है,इसे पीताम्बरी विद्या भी कहते हैं,क्योंकि इसकी उपासना में पीले वस्त्र पीले पुष्प पीली हल्दी की माला एवं केशर की खीर का भोग लगता है। इस यंत्र में बिन्दु त्रिकोण षटकोण वृत्त अष्टदल वृत्त षोडशदल एवं भूपुर की रचना की गयी है,नुकसान पहुंचाने वाले दुष्ट शत्रु की जिव्हा हाथ से खींचती हुयी बगलादेवी का ध्यान करते हुये शत्रु के सर्वनाश की कल्पना की जाती है। इस यंत्र के विशेष प्रयोग से प्रेतबाधा व यक्षिणीबाधा का भी नाश होता है।बगलामुखी यंत्र की उपासना से शत्रु का नाश होता है, स्तम्भन करने हेतु इससे बढकर कोई यंत्र नही है. प्रेत बाधा निवारक यंत्र इस यंत्र के विशेष प्रयोग से प्रेतबाधा व यक्षिणीबाधा का भी नाश होता है. महामृत्युंजय इस यंत्र के उपयोग से अकाल मृत्यु से मुक्ति प्राप्त होती है. यह शिव भगवान का प्रिय यंत्र है. भगवान शंकर की स्तुति व उक्त यंत्र की स्थापना भक्त को समस्त बाधाओं से मुक्त कर देती है. रोगों की निवृत्ति के लिये एवं दीर्घायु की कामना के लिये इस यंत्र का उपयोग बहुत लाभदायक होता है.
श्रीमहाकाली यन्त्र-----
शमशान साधना में काली उपासना का बडा भारी महत्व है,इसी सन्दर्भ में महाकाली यन्त्र का प्रयोग शत्रु नाश मोहन मारण उच्चाटन आदि कार्यों में किया जाता है। मध्य बिन्दु में पांच उल्टे त्रिकोण तीन वृत अष्टदल वृत एव भूपुर से आवृत महाकाली का यंत्र तैयार होता है। इस यंत्र का पूजन करते समय शव पर आरूढ मुण्डमाला धारण की हुयी कडग त्रिशूल खप्पर व एक हाथ में नर मुण्ड धारण की हुयी रक्त जिव्हा लपलपाती हुयी भयंकर स्वरूप वाली महाकाली का ध्यान किया जाता है। जब अन्य विद्यायें असफ़ल होजातीं है,तब इस यंत्र का सहारा लिया जाता है। महाकाली की उपासना अमोघ मानी गयी है। इस यंत्र के नित्य पूजन से अरिष्ट बाधाओं का स्वत: ही नाश हो जाता है,और शत्रुओं का पराभव होता है,शक्ति के उपासकों के लिये यह यंत्र विशेष फ़लदायी है। चैत्र आषाढ अश्विन एवं माघ की अष्टमी इस यंत्र के स्थापन और महाकाली की साधना के लिये अतिउपयुक्त है।
महामृत्युंजय यंत्र----
इस यंत्र के माध्यम से मृत्यु को जीतने वाले भगवान शंकर की स्तुति की गयी है,भगवान शिव की साधना अमोघ व शीघ्र फ़लदायी मानी गयी है। आरक दशाओं के लगने के पूर्व इसके प्रयोग से व्यक्ति भावी दुर्घटनाओं से बच जाता है,शूल की पीडा सुई की पीडा में बदल कर निकल जाती है। प्राणघातक दुर्घटना व सीरियस एक्सीडेंट में भी जातक सुरक्षित व बेदाग होकर बच जाता है। प्राणघातक मार्केश टल जाते हैं,ज्योतिषी लोग अरिष्ट ग्रह निवारणार्थ आयु बढाने हेतु अपघात और अकाल मृत्यु से बचने के लिये महामृत्युयंत्र का प्रयोग करना बताते हैं। शिवार्चन स्तुति के अनुसार पंचकोण षटकोण अष्टदल व भूपुर से युक्त मूल मन्त्र के बीच सुशोभित महामृत्युंजय यंत्र होता है। आसन्न रोगों की निवृत्ति के लिये एवं दीर्घायु की कामना के लिये यह यंत्र प्रयोग में लाया जाता है। इस यंत्र का पूजन करने के बाद इसका चरणामृत पीने से व्यक्ति निरोग रहता है,इसका अभिषिक्त किया हुआ जल घर में छिडकने से परिवार में सभी स्वस्थ रहते हैं,घर पर रोग व ऊपरी हवाओं का आक्रमण नहीं होता है।
कनकधारा यंत्र----
लक्ष्मी प्राप्ति के लिये यह अत्यन्त दुर्लभ और रामबाण प्रयोग है,इस यंत्र के पूजन से दरिद्रता का नाश होता है,पूर्व में आद्य शंकराचार्य ने इसी यंत्र के प्रभाव से स्वर्ण के आंवलों की वर्षा करवायी थी। यह यंत्र रंक को राजा बनाने की सामर्थय रखता है। यह यंत्र अष्ट सिद्धि व नव निधियों को देने वाला है,इसमें बिन्दु त्रिकोण एवं दो वृहद कोण वृत्त अष्टदल वृत्त षोडस दल एव तीन भूपुर होते हैं,इस यंत्र के साथ कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना अनिवार्य होता है।
श्रीदुर्गा यंत्र----
यह श्री दुर्गेमाता अम्बेमाता का यंत्र है,इसके मूल में नवार्ण मंत्र की प्रधानता है,श्री अम्बे जी का ध्यान करते हुये नवार्ण मंत्र माला जपते रहने से इच्छित फ़ल की प्राप्ति होती है। विशेषकर संकट के समय इस यंत्र की प्रतिष्ठा करके पूजन किया जाता है। नवरात्र में स्थापना के दिन अथवा अष्टमी के दिन इस यंत्र निर्माण करना व पूजन करना विशेष फ़लदायी माना जाता है,इस यन्त्र पर दुर्गा सप्तशती के अध्याय चार के श्लोक १७ का जाप करने पर दुख व दरिद्रता का नाश होता है। व्यक्ति को ऋण से दूर करने बीमारी से मुक्ति में यह यंत्र विशेष फ़लदायी है।
सिद्धि श्री बीसा यंत्र----
कहावत प्रसिद्ध है कि जिसके पास हो बीसा उसका क्या करे जगदीशा,अर्थात साधकों ने इस यंत्र के माध्यम से दुनिया की हर मुश्किल आसान होती है,और लोग मुशीबत में भी मुशीबत से ही रास्ता निकाल लेते हैं। इसलिये ही इसे लोग बीसा यंत्र की उपाधि देते हैं। नवार्ण मंत्र से सम्पुटित करते हुये इसमे देवी जगदम्बा का ध्यान किया जाता है। यंत्र में चतुष्कोण में आठ कोष्ठक एक लम्बे त्रिकोण की सहायता से बनाये जाते हैं,त्रिकोण को मन्दिर के शिखर का आकार दिया जाता है,अंक विद्या के चमत्कार के कारण इस यंत्र के प्रत्येक चार कोष्ठक की गणना से बीस की संख्या की सिद्धि होती है। इस यंत्र को पास रखने से ज्योतिषी आदि लोगों को वचन सिद्धि की भी प्राप्ति होती है। भूत प्रेत और ऊपरी हवाओं को वश में करने की ताकत मिलती है,जिन घरों में भूत वास हो जाता है उन घरों में इसकी स्थापना करने से उनसे मुक्ति मिलती है।
श्री कुबेर यंत्र----
यह धन अधिपति धनेश कुबेर का यंत्र है,इस यंत्र के प्रभाव से यक्षराज कुबेर प्रसन्न होकर अतुल सम्पत्ति की रक्षा करते हैं। यह यंत्र स्वर्ण और रजत पत्रों से भी निर्मित होता है,जहां लक्ष्मी प्राप्ति की अन्य साधनायें असफ़ल हो जाती हैं,वहां इस यंत्र की उपासना से शीघ्र लाभ होता है। कुबेर यंत्र विजय दसमीं धनतेरस दीपावली तथा रविपुष्य नक्षत्र और गुरुवार या रविवार को बनाया जाता है। कुबेर यंत्र की स्थापना गल्ले तिजोरियों सेफ़ व बन्द अलमारियों में की जाती है। लक्ष्मी प्राप्ति की साधनाओं में कुबेर यंत्र अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
श्री गणेश यंत्र-----
गणेश यंत्र सर्व सिद्धि दायक व नाना प्रकार की उपलब्धियों व सिद्धियों के देने वाला है,इसमें देवताओं के प्रधान गणाध्यक्ष गणपति का ध्यान किया जाता है। एक हाथ में पास एक अंकुश एक में मोदक एवं वरद मुद्रा में सुशोभित एक दन्त त्रिनेत्र कनक सिंहासन पर विराजमान गणपति की स्तुति की जाती है। इस यंत्र के प्रभाव से और भक्त की आराधना से व्यक्ति विशेष पर रिद्धि सिद्धि की वर्षा करते हैं,साधक को इष्ट कृपा की अनुभूति होने लगती है। उसके कार्यों के अन्दर आने वाली बाधायें स्वत: ही समाप्त हो जातीं हैं,व्यक्ति को अतुल धन यश कीर्ति की प्राप्ति होती है,रवि पुष्य गुरु पुष्य अथवा गणेश चतुर्थी को इस यंत्र का निर्माण किया जाता है,इन्ही समयों में इस यंत्र की पूजा अर्चना करने पर सभी कामनायें सिद्धि होती हैं।
गायत्री यंत्र-----
गायत्री की महिमा शब्दातीत है,इस यंत्र को बनाते समय कमल दल पर विराजमान पद्मासन में स्थिति पंचमुखी व अष्टभुजा युक्त गायत्री का ध्यान किया जाता है,बिन्दु त्रिकोण षटकोण व अष्टदल व भूपुर से युक्त इस यंत्र को गायत्री मंत्र से प्रतिष्ठित किया जाता है। इस यंत्र की उपासना से व्यक्ति लौकिक उपलब्धियों को लांघ कर आध्यात्मिक उन्नति को स्पर्श करने लग जाता है। व्यक्ति का तेज मेधा व धारणा शक्ति बढ जाती है। इस यंत्र के प्रभाव से पूर्व में किये गये पाप कर्मों से मुक्ति मिल जाती है। गायत्री माता की प्रसन्नता से व्यक्ति में श्राप व आशीर्वाद देने की शक्ति आ जाती है। व्यक्ति की वाणी और चेहरे पर तेज बढने लगता है। गायत्री का ध्यान करने के लिये सुबह को माता गायत्री श्वेत कमल पर वीणा लेकर विराजमान होती है,दोपहर को गरूण पर सवार लाल वस्त्रों में होतीं है,और शाम को सफ़ेद बैल पर सवार वृद्धा के रूप में पीले वस्त्रों में ध्यान में आतीं हैं।
दाम्पत्य सुख कारक मंगल यंत्र----
विवाह योग्य पुत्र या पुत्री के विवाह में बाधा आना,विवाह के लिये पुत्र या पुत्री का सीमाओं को लांघ कर सामाजिक मर्यादा को तोडना विवाह के बाद पति पत्नी में तकरार होना,विवाहित दम्पत्ति के लिये किसी न किसी कारण से सन्तान सुख का नहीं होना,गर्भपात होकर सन्तान का नष्ट हो जाना, मनुष्य का ध्यान कर्ज की तरफ़ जाना और लिये हुये कर्जे को चुकाने के लिये दर दर की ठोकरें खाना,किसी को दिये गये कर्जे का वसूल नहीं होना,आदि कारणों के लिये ज्योतिष शास्त्र में मंगल व्रत का विधान है,मंगल के व्रत में मंगल यंत्र का पूजन आवश्यक है। यह यंत्र जमीन जायदाद के विवाद में जाने और घर के अन्दर हमेशा क्लेश रहने पर भी प्रयोग किया जाता है,इसके अलावा इसे वाहन में प्रतिष्ठित कर लगाने से दुर्घटना की संभावना न के बराबर हो जाती है।
श्री पंचदसी यंत्र----
पंचदसी यंत्र को पन्द्रहिया यन्त्र भी कहा जाता है,इसके अन्दर एक से लेकर नौ तक की संख्याओं को इस प्रकार से लिखा जाता है दायें बायें ऊपर नीचे किधर भी जोडा जाये तो कुल योग पन्द्रह ही होता है,इस यन्त्र का निर्माण राशि के अनुसार होता है,एक ही यन्त्र को सभी राशियों वाले लोग प्रयोग नहीं कर सकते है,पूर्ण रूप से ग्रहों की प्रकृति के अनुसार इस यंत्र में पांचों तत्वों का समावेश किया जाता है,जैसे जल तत्व वाली राशियां कर्क वृश्चिक और मीन होती है,इन राशियों के लिये चन्द्रमा का सानिध्य प्रारम्भ में और मंगल तथा गुरु का सानिध्य मध्य में तथा गुरु का सानिध्य अन्त में किया जाता है। संख्यात्मक प्रभाव का असर साक्षात देखने के लिये नौ में चार को जोडा जाता है,फ़िर दो को जोड कर योग पन्द्रह का लिया जाता है,इसके अन्दर मंगल को दोनों रूपों में प्रयोग में लाया जाता है,नेक मंगल या सकारात्मक मंगल नौ के रूप में होता है और नकारात्मक मंगल चार के रूप में होता है,तथा चन्द्रमा का रूप दो से प्रयोग में लिया जाता है। यह यंत्र भगवान शंकर का रूप है,ग्यारह रुद्र और चार पुरुषार्थ मिलकर ही पन्द्रह का रूप धारण करते है। इस यंत्र को सोमवार या पूर्णिमा के दिन बनाया जाता है,और उसे रुद्र गायत्री से एक बैठक में पन्द्रह हजार मंत्रों से प्रतिष्टित किया जाता है।
सम्पुटित गायत्री यंत्र-----
वेदमाता गायत्री विघ्न हरण गणपति महाराज समृद्धिदाता श्री दत्तात्रेय के सम्पुटित मंत्रों द्वारा इस गायत्री यंत्र का निर्माण किया जाता है। यह यंत्र व्यापारियों गृहस्थ लोगों के लिये ही बनाया जाता है इसका मुख्य उद्देश्य धन,धन से प्रयोग में लाये जाने वाले साधन और धन को प्रयोग में ली जाने वाली विद्या का विकास इसी यंत्र के द्वारा होता है,जिस प्रकार से एक गाडी साधन रूप में है,गाडी को चलाने की कला विद्या के रूप में है,और गाडी को चलाने के लिये प्रयोग में ली जाने वाली पेट्रोल आदि धन के रूप में है,अगर तीनों में से एक की कमी हो जाती है तो गाडी रुक जाती है,उसी प्रकार से व्यापारियों के लिये दुकान साधन के रूप में है,दुकान में भरा हुआ सामान धन के रूप में है,और उस सामान को बेचने की कला विद्या के रूप में है,गृहस्थ के लिये भी परिवार का सदस्य साधन के रूप में है,सदस्य की शिक्षा विद्या के रूप में है,और सदस्य द्वारा अपने को और अपनी विद्या को प्रयोग में लाने के बाद पैदा किया जाने फ़ल धन के रूप में मिलता है,इस यंत्र की स्थापना करने के बाद उपरोक्त तीनों कारकों का ज्ञान आसानी से साधक को हो जाता है,और वह किसी भी कारक के कम होने से पहले ही उसे पूरा कर लेता है।
श्री नित्य दर्शन बीसा यंत्र----
इस यंत्र का निर्माण अपने पास हमेशा रखने के लिये किया जाता है,इसके अन्दर पंचागुली महाविद्या का रोपण किया जाता है,अष्टलक्ष्मी से युक्त इस यंत्र का निर्माण करने के बाद इसे चांदी के ताबीज में रखा जाता है,जब कोई परेशानी आती है तो इसे माथे से लगाकर कार्य का आरम्भ किया जाता है,कार्य के अन्दर आने वाली बाधा का निराकरण बाधा आने के पहले ही दिमाग में आने लगता है,इसे शराबी कबाबी लोग अपने प्रयोग में नही ला सकते हैं।
श्री बीसा यंत्र-----
विधान एवं प्रभाव :----इस यंत्र को शुभ महूर्त में ताम्र पत्र पर खुदवा लें फिर सूर्य उदय के समय इस यंत्र का केसर और चन्दन से पूजन करें । 
मंत्र :- ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं लक्ष्मी दैव्य: नमः
इस मंत्र की 21 माला करें साथ में श्री शुक्त का भी पाठ करें । इस यंत्र के प्रभाव से कभी कोई अभाव नहीं रहता । माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है ।
जानिए की रत्न क्या हैं??? जानिए रत्न का प्रभाव एवं रत्न को केसे जागृत करें ?

आचार्य पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री, मोब.--09669290067--M.P.  एवं 09024390067--RAJ.
रत्नों को धारण करने के पीछे मात्र उनकी चमक प्रमुख कारण नहीं है बल्कि अपने लक्ष्य के अनुसार उनका लाभ प्राप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि ये रत्न जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य करते किस प्रकार हैं। हम अपने आस-पास व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न रत्न पहने हुए देखते हैं। ये रत्न वास्तव में कार्य कैसे करते हैं और हमारी जन्मकुंडली में बैठे ग्रहों पर क्या प्रभाव डालते हैं और किस व्यक्ति को कौन से विशेष रत्न धारण करने चाहिये, ये सब बातें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। रत्नों का प्रभाव: रत्नों में एक प्रकार की दिव्य शक्ति होती है। वास्तव में रत्नों का जो हम पर प्रभाव पड़ता है वह ग्रहों के रंग व उनके प्रकाश की किरणों के कंपन के द्वारा पड़ता है। हमारे प्राचीन ऋषियों ने अपने प्रयोगों, अनुभव व दिव्यदृष्टि से ग्रहों के रंग को जान लिया था और उसी के अनुरूप उन्होंने ग्रहों के रत्न निर्धारित किये। जब हम कोई रत्न धारण करते हैं तो वह रत्न अपने ग्रह द्वारा प्रस्फुटित प्रकाश किरणों को आकर्षित करके हमारे शरीर तक पहुंचा देता है और अनावश्यक व हानिकारक किरणों के कंपन को अपने भीतर सोख लेता है। अतः रत्न ग्रह के द्वारा ब्रह्मांड में फैली उसकी विशेष किरणों की ऊर्जा को मनुष्य को प्राप्त कराने में एक विशेष फिल्टर का कार्य करते हैं।
जितने भी रत्न या उपरत्न है वे सब किसी न किसी प्रकार के पत्थर है। चाहे वे पारदर्शी हो, या अपारदर्शी, सघन घनत्व के हो या विरल घनत्व के, रंगीन हो या सादे...। और ये जितने भी पत्थर है वे सब किसी न किसी रासायनिक पदार्थों के किसी आनुपातिक संयोग से बने हैं। विविध भारतीय एवं विदेशी तथा हिन्दू एवं गैर हिन्दू धर्म ग्रंथों में इनका वर्णन मिलता है।
आधुनिक विज्ञान ने अभी तक मात्र शुद्ध एवं एकल 128 तत्वों को पहचानने में सफलता प्राप्त की है। जिसका वर्णन मेंडलीफ की आधुनिक आवर्त सारणी (Periodic Table) में किया गया है। किन्तु ये एकल तत्व है अर्थात् इनमें किसी दूसरे तत्व या पदार्थ का मिश्रण नहीं प्राप्त होता है। किन्तु एक बात अवश्य है कि इनमें कुछ एक को समस्थानिक (Isotopes) के नाम से जाना जाता है।
वैज्ञानिक भी मानते हैं कि हमारे शरीर के चारों ओर एक आभामण्डल होता है, जिसे वे AURA कहते हैं। ये आभामण्डल सभी जीवित वस्तुओं के आसपास मौजूद होता है। मनुष्य शरीर में इसका आकार लगभग 2 फीट की दूरी तक रहता है। यह आभामण्डल अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों को प्रभावित करता है। हर व्यक्ति का आभामण्डल कुछ लोगों को सकारात्मक और कुछ लोगों को नकारात्मक प्रभाव होता है, जो कि परस्पर एकदूसरे की प्रकृति पर निर्भर होता है। विभिन्न मशीनें इस आभामण्डल को अलग अलग रंगों के रूप में दिखाती हैं ।
वैज्ञानिकों ने रंगों का विश्लेषण करके पाया कि हर रंग का अपना विशिष्ट कंपन या स्पंदन होता है। यह स्पन्दन हमारे शरीर के आभामण्डल, हमारी भावनाओं, विचारों, कार्यकलाप के तरीके, किसी भी घटना पर हमारी प्रतिक्रिया, हमारी अभिव्यक्तियों आदि को सम्पूर्ण रूप से प्रभावित करते है।
वैज्ञानिकों के अनुसार हर रत्न में अलग क्रियात्मक स्पन्दन होता है। इस स्पन्दन के कारण ही रत्न अपना विशिष्ट प्रभाव मानव शरीर पर छोड़ते हैं।
प्राचीन संहिता ग्रंथों में जो उल्लेख मिलता है, उसमें एकल तत्व मात्र 108 ही बताए गए हैं। इनसे बनने वाले यौगिकों एवं पदार्थों की संख्या 39000 से भी ऊपर बताई गई हैं। इनमें कुछ एक आज तक या तो चिह्नित नहीं हो पाए है, या फिर अनुपलब्ध हैं। इनका विवरण, रत्नाकर प्रकाश, तत्वमेरू, रत्न वलय, रत्नगर्भा वसुंधरा, रत्नोदधि आदि उदित एवं अनुदित ग्रंथों में दिया गया है।
कज्जलपुंज, रत्नावली, अथर्वप्रकाश, आयुकल्प, रत्नाकर निधान, रत्नलाघव, Oriental Prism, Ancient Digiana तथा Indus Catalog आदि ग्रंथों में भी इसका विषद विवरण उपलब्ध है।
कुछ रत्न बहुत ही उत्कट प्रभाव वाले होते है। कारण यह है कि इनके अंदर उग्र विकिरण क्षमता होती है। अतः इन्हें पहनने से पहले इनका रासायनिक परिक्षण आवश्यक है। जैसे- हीरा, नीलम, लहसुनिया, मकरंद, वज्रनख आदि। यदि यह नग तराश (cultured) दिए गए हैं, तो इनकी विकिरण क्षमता का नाश हो जाता है। ये प्रतिष्ठापरक वस्तु (स्टेट्‍स सिंबल) या सौंदर्य प्रसाधन की वस्तु बन कर रह जाते हैं। इनका रासायनिक या ज्योतिषीय प्रभाव विनष्ट हो जाता है।
कुछ परिस्थितियों में ये भयंकर हानि का कारण बन जाते हैं। जैसे- यदि तराशा हुआ हीरा किसी ने धारण किया है तथा कुंडली में पांचवें, नौवें या लग्न में गुरु का संबंध किसी भी तरह से राहु से होता है, तो उसकी संतान कुल परंपरा से दूर मान-मर्यादा एवं अपनी वंश-कुल की इज्जत डुबाने वाली व्यभिचारिणी हो जाएगी।
दूसरी बात यह कि किसी भी रत्न को पहनने के पहले उसे जागृत (Activate) अवश्य कर लेना चाहिए। अन्यथा वह प्राकृत अवस्था में ही पड़ा रह जाता है व निष्क्रिय अवस्था में उसका कोई प्रभाव नहीं हो पाता है।
रत्नों के प्रभाव को प्रकट करने के लिए सक्रिय किया जाता है। इसे ही जागृत करना कहते हैं।
रत्नों का ज्योतिष में उपयोग ज्योतिष शास्त्र में बतायें गये विभिन्न उपायों में रत्नों का भी बड़ा विशेष महत्व है और रत्नों के द्वारा बहुत सकारात्मक परिवर्तन जीवन में आते हैं। परंतु वर्तमान में रत्न धारण करने के विषय में बहुत सी भा्रंतियां देखने को मिलती हैं जिससे बड़ी समस्याएं और दिक्कते उठानी पड़ती है। ज्यादातर व्यक्ति अपनी राशि के अनुसार रत्न धारण कर लेते हैं परंतु उन्हें समाधान मिलने के बजाय और समस्याएं आ जाती हैं।
सर्वप्रथम हमें यह समझना चाहिये कि रत्न धारण करने से होता क्या है। इसके विषय में हमेशा यह स्मरण रखें कि रत्न पहनने से किसी ग्रह से मिल रही पीड़ा समाप्त नहीं होती या किसी ग्रह की नकारात्मकता समाप्त नहीं होती है बल्कि किसी भी ग्रह का रत्न धारण करने से उस ग्रह की शक्ति बढ़ जाती है अर्थात् आपकी कुंडली का वह ग्रह बलवान बन जाता है। उससे मिलने वाले तत्वों में वृद्धि हो जाती है। हमारी कुंडली में सभी ग्रह शुभ फल देने वाले नहीं होते। कुछ ग्रह ऐसे होते हैं जो हमारे लिये अशुभकारक होते हैं और उनका कार्य केवल हमें समस्याएं देना होता है। 
प्रकृति ने अपने विकार निवारण हेतु हमें बहुत ही अनमोल उपहार के रूप में विविध रत्न प्रदान किए हैं, जो हमें भूमि (रत्नगर्भा), समुद्र (रत्नाकर) आदि विविध स्त्रोतों से प्राप्त होते हैं। कौटिल्य ने भी यही बात बताई है- 'खनिः स्त्रोतः प्रकीर्णकं च योनयः'। ये रत्न हमारे हर विकार को दूर करने में सक्षम हैं। चाहे विकार भौतिक हो या आध्यात्मिक। इसी बात को ध्यान में रखते हुए महामति आचार्य वराह मिहिर ने बृहत्संहिता के 79वें अध्याय में लिखा है- 'रत्नेन शुभेन शुभं भवति नृपाणामनिष्टमषुभेन। यस्मादतः परीक्ष्यं दैवं रत्नाश्रितं तज्ज्ञैः।'
ratna vighyan
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अर्थात्‌ शुभ, स्वच्छ व उत्तम श्रेणी का रत्न धारण करने से राजाओं का भाग्य शुभ तथा अनिष्ट कारक रत्न पहनने से अशुभ भाग्य होता है। अतः रत्नों की गुणवत्ता पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। दैवज्ञ को खूब जाँच-परखकर ही रत्न देना चाहिए, क्योंकि रत्न में भाग्य निहित होता है।
किसी रत्न विशेष की व्याख्या करने से पूर्व मूल रत्नों को नामांकित करना आवश्यक है। ये रत्न इस प्रकार हैं- हीरा (वज्र क्पंउवदक), नीलम (इन्द्रनील-चीपतम), पन्ना (मरकत), लहसुनिया या कटैला, विमलक, राजमणि, (सम्भवतः फनंतज्र), स्फटिक, चन्द्रकान्तमणि, सौगन्धिक, गोमेद, शंखमणि, महानील, ब्रह्ममणि, ज्योतिरस, सस्यक, मोती व प्रवाल (मूँगा)। ये रत्न भाग्य वृद्धि के लिए धारण करने योग्य हैं।
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किन ग्रहों के रत्न पहने जाएँ..?????
सामान्यत: रत्नों के बारे में भ्रांति होती है जैसे विवाह न हो रहा हो तो पुखराज पहन लें, मांगलिक हो तो मूँगा पहन लें, गुस्सा आता हो तो मोती पहन लें। मगर कौन सा रत्न कब पहना जाए इसके लिए कुंडली का सूक्ष्म निरीक्षण जरूरी होता है। लग्न कुंडली, नवमांश, ग्रहों का बलाबल, दशा-महादशाएँ आदि सभी का अध्ययन करने के बाद ही रत्न पहनने की सलाह दी जाती है। यूँ ही रत्न पहन लेना नुकसानदायक हो सकता है। मोती डिप्रेशन भी दे सकता है, मूँगा रक्तचाप गड़बड़ा सकता है और पुखराज अहंकार बढ़ा सकता है, पेट गड़बड़ कर सकता है।
समस्त पृथ्वी से मूल रूप में प्राप्त होने वाले मात्र 21 ही हैं किन्तु जिस प्रकार से 18 पुराणों के अलावा इनके 18 उपपुराण भी हैं ठीक उसी प्रकार इन 21 मूल रत्नों के अलावा इनके 21 उपरत्न भी हैं। इन रत्नों की संख्या 21 तक ही सीमित होने का कारण है। जिस प्रकार दैहिक, दैविक तथा भौतिक रूप से तीन तरह की व्याधियाँ तथा इन्हीं तीन प्रकार की उपलब्धियाँ होती हैं और इंगला, पिंगला और सुषुम्ना इन तीन नाड़ियों से इनका उपचार होता है।
इसी प्रकार एक-एक ग्रह से उत्पन्न तीनों प्रकार की व्याधियों एवं उपलब्धियों को आत्मसात्‌ या परे करने के लिए एक-एक ग्रह को तीन-तीन रत्न प्राप्त हैं। ध्यान रहे, ग्रह भी मूल रूप से मात्र तीन ही हैं।
सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र एवं शनि, राहु एवं केतु की अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता न होने से इनकी गणना मूल ग्रहों में नहीं होती है। इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है। इस प्रकार एक-एक ग्रह के तीन-तीन रत्न के हिसाब से सात ग्रहों के लिए 21 मूल रत्न निश्चित हैं। अस्तु, ये मूल रत्न जिस रूप में पृथ्वी से प्राप्त होते हैं, उसके बाद इन्हें परिमार्जित करके शुद्ध करना पड़ता है तथा बाद में इन्हें तराशा जाता है।
सामान्यत: लग्न कुंडली के अनुसार कारकर ग्रहों के (लग्न, नवम, पंचम) रत्न पहने जा सकते हैं जो ग्रह शुभ भावों के स्वामी होकर पाप प्रभाव में हो, अस्त हो या श‍त्रु क्षेत्री हो उन्हें प्रबल बनाने के लिए भी उनके रत्न पहनना प्रभाव देता है।
सौर मंडल के भी हर ग्रह की अपनी ही आभा है, जैसे सूर्य स्वर्णिम, चन्द्रमा दूधिया, मंगल लाल, बुध हरा, बृहस्पति पीला, शुक्र चाँदी जैसा चमकीला, शनि नीला। प्रत्येक ग्रह की अलग अलग आभा भी मानव शरीर के सातों चक्रों को अलग अलग तरह से प्रभावित करती है। रत्न इन्हीं का प्रतिनिधित्व करते हैं। शरीर पर धारण करने पर ये रत्न इन ग्रहों की रश्मियों के प्रभाव को कई गुणा बढ़ा देते हैं।
रत्न - ग्रह - प्रभाव
१ - माणिक्य - सूर्य - शरीर की ऊष्णता को नियंत्रित करता है, मानसिक संतुलन देता है
२ - मोती - चन्द्रमा - भावनाओं को नियंत्रित करता है
३ - मूंगा - मंगल - शरीर की ऊष्णता को बढ़ाता है, पाचन क्षमता बढ़ाता है
४ - पन्ना - बुध - बौद्धिक क्षमताओं की वृद्धि करता है, संतुलन सिखाता है
५ - पुखराज - बृहस्पति - आध्यात्मिक उन्नति देता है, ज्ञान का बेहतर प्रयोग करना सिखाता है
६ - हीरा - शुक्र - प्रेम और सौन्दर्य के प्रति सकारात्मकता देता है, समृद्धि देता है 
७ - नीलम - शनि - न्याय, तकनीकी ज्ञान, तार्किकता बढ़ाता है
८ - गोमेद - राहु - शरीर के हार्मोन्स को संतुलित करता है
९ - वैदूर्य - केतु - शरीर में नकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को रोकता है
रत्न पहनने के लिए दशा-महादशाओं का अध्ययन भी जरूरी है। केंद्र या त्रिकोण के स्वामी की ग्रह महादशा में उस ग्रह का रत्न पहनने से अधिक लाभ मिलता है।
3, 6, 8, 12 के स्वामी ग्रहों के रत्न नहीं पहनने चाहिए। इनको शांत रखने के लिए दान-मंत्र जाप का सहारा लेना चाहिए। रत्न निर्धारित करने के बाद उन्हें पहनने का भी विशेष तरीका होता है। रत्न अँगूठी या लॉकेट के रूप में निर्धारित धातु (सोना, चाँदी, ताँबा, पीतल) में बनाए जाते हैं।
उस ग्रह के लिए निहित वार वाले दिन शुभ घड़ी में रत्न पहना जाता है। इसके पहले रत्न को दो दिन कच्चे दूध में भिगोकर रखें। शुभ घड़ी में उस ग्रह का मंत्र जाप करके रत्न को सिद्ध करें। (ये जाप 21 हजार से 1 लाख तक हो सकते हैं) तत्पश्चात इष्ट देव का स्मरण कर रत्न को धूप-दीप दिया तो उसे प्रसन्न मन से धारण करें। इस विधि से रत्न धारण करने से ही वह पूर्ण फल देता है। मंत्र जाप के लिए भी रत्न सिद्धि के लिए किसी ज्ञानी की मदद भी ली जा सकती है।
शनि और राहु के रत्न कुंडली के सूक्ष्म निरीक्षण के बाद ही पहनना चाहिए अन्यथा इनसे भयंकर नुकसान भी हो सकता है।
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रत्नों का चुनाव कैसे करें:------------ 
अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव को कम करने के लिए या जिस ग्रह का प्रभाव कम पड़ रहा हो उसमें वृद्धि करने के लिए उस ग्रह के रत्न को धारण करने का परामर्श ज्योतिषी देते हैं। एक साथ कौन-कौन से रत्न पहनने चाहिए, इस बारे में ज्योतिषियों की राय है कि,
* माणिक्य के साथ- नीलम, गोमेद, लहसुनिया वर्जित है।
* मोती के साथ- हीरा, पन्ना, नीलम, गोमेद, लहसुनिया वर्जित है।
* मूंगा के साथ- पन्ना, हीरा, गोमेद, लहसुनिया वर्जित है।
* पन्ना के साथ- मूंगा, मोती वर्जित है।
* पुखराज के साथ- हीरा, नीलम, गोमेद वर्जित है।
* हीरे के साथ- माणिक्य, मोती, मूंगा, पुखराज वर्जित है।
* नीलम के साथ- माणिक्य, मोती, पुखराज वर्जित है।
* गोमेद के साथ- माणिक्य, मूंगा, पुखराज वर्जित है।
* लहसुनिया के साथ- माणिक्य, मूंगा, पुखराज, मोती वर्जित है।
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रत्न स्वयं सिद्ध ही होते हैं -----
ज्योतिष ग्रहों के आधार पर व जन्म समय की कुंडलीनुसार ही भाग्य का दर्शन कराता है एवं जातक की परेशानियों को कम करने की सलाह देता है। आज हर इन्सान परेशान है, कोई नोकरी से तो कोई व्यापार से। कोई कोर्ट-कचहरी से तो कोई संतान से। कोई प्रेम में पड़ कर चमत्कारिक ज्योतिषियों के चक्कर में फँस कर धन गँवाता है। ना तो वो किसी से शिकायत कर सकता है और ना किसी को बता सकता है। इस प्रकार न जानें कितने लोग फँस जाते हैं। न काम बनता है ना पैसा मिलता है।
आज हम देख रहे हैं ज्योतिष के नाम पर बडे़-बडे़ अनुष्ठान, हवन, पूजा-पाठ कराएँ जाते है। जबकि इस प्रकार धन व समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है। कुछ ज्योतिषगण प्रेम विवाह, मूठ, करनी, चमत्कारी नग बताकर जनता को लूट रहे है। तो कोई वशीकरण करने का दावा भरते नजर आते है जबकि ऐसा करना कानूनन अपराध है, क्योंकि पहले तो ऐसा होता ही नहीं है।
यदि कोई दावा भरता है तो ये अपराध है। कई तो ऐसे भी है जो जेल से छुडा़ने तक का दावा भरते है, तो कोई बीमारी के इलाज का भी दावा करते है। कुछ एक तो संतान, दुश्मन बाधा आदि दूर करने के दावा भरते है। 
कई ज्योतिषगण बगैर पढ़े, बगैर डिर्गी लिए एक बार नहीं कई बार गोल्ड मैडल पाते हैं। बड़े ताज्जुब की बा‍त है कि जिन्हें ज्योतिष का जरा भी ज्ञान नहीं है वे भी गोल्ड मैडलिस्ट बना दिए जाते है। कई तो करोड़ों मंत्रों की सि‍द्धि द्वारा रत्नों का चमत्कार करने का दावा भरते है। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है, रत्न तो स्वयं सिद्ध होते हैं। बस जरूरत है उन्हें कुंडली के अनुसार सही व्यक्तियों तक पहुँचाने की।
असल में रत्न स्वयं सिद्ध ही होते है। रत्नों में अपनी अलग रश्मियाँ होती है और कुशल ज्योतिष ही सही रत्न की जानकारी देकर पहनाए तो रत्न अपना चमत्कार आसानी से दिखा देते है। माणिक के साथ मोती, पुखराज के साथ मोती, माणिक मूँगा भी पहनकर असीम लाभ पाया जा सकता है। 
नीलम के साथ मूँगा पहना जाए तो अनेक मुसीबातों में ड़ाल देता है। इसी प्रकार हीरे के साथ लहसुनिया पहना जाए तो निश्चित ही दुर्घटना कराएगा ही, साथ ही वैवाहिक जीवन में भी बाधा का कारण बनेगा। पन्ना-हीरा, पन्ना-नीलम पहन सकते है। फिर भी किसी कुशल ज्योतिष की ही सलाह लें तभी इन रत्नों के चमत्कार पा सकते है।
जैसे मेष व वृश्चिक राशि वालों को मूँगा पहनना चाहिए। लेकिन मूँगा पहनना आपको नुकसान भी कर सकता है अत: जब तक जन्म के समय मंगल की स्थिति ठीक न हो तब तक मूँगा नहीं पहनना चाहिए। यदि मंगल शुभ हो तो यह साहस, पराक्रम, उत्साह प्रशासनिक क्षेत्र, पुलिस सेना आदि में लाभकारी होता है।
वृषभ व तुला राशि वालों को हीरा या ओपल पहनना चाहिए। यदि जन्मपत्रिका में शुभ हो तो। इन रत्नों को पहनने से प्रेम में सफलता, कला के क्षेत्र में उन्नति, सौन्दर्य प्रसाधन के कार्यों में सफलता का कारक होने से आप सफल अवश्य होंगे।
मिथुन व कन्या राशि वाले पन्ना पहनें तो सेल्समैन के कार्य में, पत्रकारिता में, प्रकाशन में, व्यापार में सफलता दिलाता है।
सिंह राशि वालों को माणिक ऊर्जावान बनाता है व राजनीति, प्रशासनिक क्षेत्र, उच्च नौकरी के क्षेत्र में सफलता का कारक होता है। 
कर्क राशि वालों को मोती मन की शांति देता है। साथ ही स्टेशनरी, दूध दही-छाछ, चाँदी के व्यवसाय में लाभकारी होता है। 
मकर और कुंभ नीलम रत्न धारण कर सकते हैं, लेकिन दो राशियाँ होने सावधानी से पहनें। 
धनु व मीन के लिए पुखराज या सुनहला लाभदायक होता है। यह भी प्रशासनिक क्षेत्र में सफलता दिलाता है। वहीं न्याय से जुडे व्यक्ति भी इसे पहन सकते है। आपको सलाह है कि कोई भी रत्न किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह बगैर कभी भी ना पहनें।
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रत्न भी बदल देते हैं मनुष्य की तकदीर -----
कहते हैं कि घूरे के दिन भी बदलते हैं तो इंसान के क्यों‍ नहीं। कहावत सच तो है लेकिन लंबा इंतजार करने से अच्छा है यदि आपकी कुंडली सही है तो रत्न धारण करने से अच्छी सफलता मिल सकती है। लेकिन रत्न धारण करने से पहले किसी पारंगत ज्योतिषी से सलाह लेना आवश्यक है।
आजकल कई ज्योतिषी राशि के अनुसार रत्न पहना देते हैं जो कभी-कभी नुकसानदायक भी हो सकता है। आप इस राशि के हैं तो यह रत्न पहन लीजिए। ऐसा कहकर वे रत्न पहना देते हैं। जबकि राशि के साथ ही राशि स्वामी ‍की स्थिति उसके बैठने का स्थान आदि भी बहुत महत्व रखते हैं। जातक को क्या आवश्यकता है, इस बात का ध्यान नहीं रखते।
रत्न पहनाने के ‍पहले उस ग्रह की नवांश व अन्य वर्गों में क्या स्थिति है, उसकी डिग्री क्या है? यह देखना जरूरी है। तभी जाकर सही रत्न पहनकर भरपूर लाभ उठाया जा सकता है।
कहते हैं कि घूरे के दिन भी बदलते हैं तो इंसान के क्यों‍ नहीं। कहावत सच तो है लेकिन लंबा इंतजार करने से अच्छा है यदि आपकी कुंडली सही है तो रत्न धारण करने से अच्छी सफलता मिल सकती है।

आपकी जन्म पत्रिका में लग्नेश मित्र राशि में हो या भाग्य में मित्र का होकर बैठा हो या पंचम में स्वराशि का हो या मित्र राशि का हो। चतुर्थ भाव में मित्र का हो या उच्च का हो तब उससे संबंधित रत्न धारण करने से अच्छे परिणाम मिलते हैं।
भाग्य नवम भाव का स्वामी नवम में हो या स्वराशि का होकर बैठा हो या मित्र राशि का होकर लग्न, चतुर्थ, पंचम, तृतीय, दशम या एकादश में हो या उच्च का होकर द्वादश में हो तो उससे संबंधित रत्न पहनकर अच्छा लाभ उठाया जा सकता है। विद्या, संतान भाव को प्रबल करना हो तो उस भाव का स्वामी नवम में होकर मित्र राशि का हो तो उस भाव के स्वामी का रत्न व पंचम भाव का रत्न नवम भाव से संबंधित रत्न जिस उँगली में पहनते हों तो उसमें पहनने से संतान का भाग्य, विद्या दोनों बढ़ते हैं और मनोरंजन के साधनों में वृद्धि होती है।
मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है। चतुर्थ भाव का रत्न भी पहनकर माता, भूमि, भवन, जनता से संबंधित कार्यों में लाभ उठाया जा सकता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि नवांश में नीच का न हो, नहीं तो लाभ के बजाए नुकसान ही होता है। इसी प्रकार पंचमेश विद्या विचार शुभ हो तो उस रत्न से अच्छा लाभ मिल सकता है। यदि जो रत्न पहना जाए उसकी महादशा का या अंतर्दशा चर ही हो तो अच्छे परिणाम मिलते हैं।
रत्न पहनने से पहले शुभ मुहूर्त में ही रत्न बनवाना चाहिए और प्राण-प्रतिष्ठा कर पहनना चाहिए। फिर देखिए कैसे नहीं रत्न तकदीर बदलने में कामयाब होता है।
अब यदि ऐसे ग्रह का रत्न धारण कर लिया जाये तो वह अशुभकारक ग्रह बलवान हो जायेगा और अधिक समस्यायें उत्पन्न होंगी। अतः प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक रत्न धारण नहीं करना चाहियें। रत्न धारण के लिये यह देखें जो ग्रह हमारी कुंडली का लग्नेश है उसका व लग्नेश के मित्र ग्रहों (जोकि केवल त्रिक 6, 8, 12 भावों के स्वामी न हों) का रत्न ही हमें धारण करना चाहिये। जब केवल लग्नेश, पंचमेश व नवमेश ग्रह का रत्न आजीवन धारण किया जाता है तो वह शुभ फल ही देता है। अतः इस बात पर भी ध्यान नहीं देना चाहिए कि जिस ग्रह की महादशा है उसी का रत्न धारण कर लें। यदि वह ग्रह शुभकारक है तो ही उसका रत्न पहनें। वस्तुतः रत्न धारण करने में राशि की नहीं जन्मकुंडली के अग्नि पुराण की कथा के अनुसार वृत्रासुर ने देव लोक पर आक्रमण किया तब भगवान विष्णु की सलाह पर देवराज इंद्र ने महर्षि दधीचि से दान में प्राप्त उनकी हड्डियों से वज्र नामक अस्त्र का निर्माण किया। वस्तुतः दधीचि की हड्डियों के पृथ्वी पर गिरने वाले सूक्ष्मखंड ही हीरे की खाने बनकर प्रकट हुए। वस्तुतः चैरासी रत्न/उपरत्नों में सबसे मूल्यवान माणिक और हीरा ही है। जहां तक हीरे की उत्पत्ति का प्रश्न है, इसका जन्म शुद्ध कोयले से होता है। वैज्ञानिक परीक्षण से ज्ञात होता है कि कोयले (कार्बन) का प्रमुख तत्व कार्बनडाई आॅक्साइड जब घनीभूत होकर जम जाता है, तो वह पारदर्शी क्रिस्टल का रूप ले लेता है। यही पारदर्शी कार्बन हीरा कहलाता है। हीरा एक मूल्यवान रत्न है। हीरे में सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि यह रत्नों में सर्वाधिक कठोर एवं अभंजनशील है। इन्हें विशेष तरीके से तराश कर छोटे-छोटे हीरे तैयार किये जाते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हीरा टूट गया है। धूप में हीरा रख दिया जाए तो उसमें से इंद्रधनुष के समान लग्न की तथा तदनुसार अनुकूल व प्रतिकूल ग्रहों की प्रधानता होती है। रत्न धारण विधि: रत्न को धारण करने से पहले उसे तदनुरूप धातु की अंगूठी में बनवाये। तत्पश्चात् उसे शुद्ध व सिद्ध करना होगा। तभी वह अपना प्रभाव दिखायेगा। रत्न से संबंधित ग्रह के वार को उसे पहले गाय के कच्चे दूध में फिर गंगाजल मंे अभिषेक करके धूप-दीप जलाकर उस ग्रह के मंत्र की कम से कम तीन व अधिकतम ग्यारह माला जाप करके पूर्वाभिमुख होकर रत्न को ग्रह से संबंधित सही उंगली में धारण करें।