तंत्र साधना के प्रसिद्द हैं श्री विक्रांत भैरव — उज्जैन (मध्यप्रदेश))




उज्जयिनी की ऐतिहासिकता का प्रमाण ई.सन6.0 वर्ष पूर्व मिलता है। तत्कालीन समय में भारत में जो सोलह जनपद थे उनमें अवंति जनपद भी एक था। अवंति उत्तर एवं दक्षिण इन दो भागों में विभक्त होकर उत्तरी भाग की राजधानी उज्जैन थी तथा दक्षिण भाग की राजधानी महिष्मति थी। उस समय चंद्रप्रद्योत नामक सम्राट सिंहासनारूत्रढ थे। प्रद्योत के वंशजों का उज्जैन पर ईसा की तीसरी शताब्दी तक प्रभुत्व था।


सन् १७३७ ई. में उज्जैन सिंधिया वंश के अधिकार में आया उनका सन १८८० ई. तक एक छत्र राज्य रहा जिसमें उज्जैन का सर्वांगीण विकास होता रहा। सिंधिया वंश की राजधानी उज्जैन बनी। राणोजी सिंधिया ने महाकालेश्वर मंदिर का जीर्णोध्दार कराया। इस वंश के संस्थापक राणोजी शिंदे के मंत्री रामचंद्र शेणवी ने वर्तमान महाकाल मंदिर का निर्माण करवाया. सन १८१० में सिंधिया राजधानी ग्वालियर ले जाई गयी किन्तु उज्जैन का संस्कृतिक विकास जारी रहा। १९४८ में ग्वालियर राज्य का नवीन मध्य भारत में विलय हो गया।


पंडित “विशाल” दयानंद शास्त्री के अनुसार  ( जैसा की डबराल बाबा ने बताया की) उज्जयिनी में आज भी अनेक धार्मिक पौराणिक एवं ऐतिहासिक स्थान हैं जिनमें भगवान महाकालेश्वर मंदिर, गोपाल मंदिर, चौबीस खंभा देवी, चौसठ योगिनियां, नगर कोट की रानी, हरसिध्दिमां, गत्रढकालिका, काल भैरव, विक्रांत भैरव, मंगलनाथ, सिध्दवट, बोहरो का रोजा, बिना नींव की मस्जिद, गज लक्ष्मी मंदिर, बृहस्पति मंदिर, नवगृह मंदिर, भूखी माता, भर्तृहरि गुफा, पीरमछन्दर नाथ समाधि, कालिया देह पैलेस, कोठी महल, घंटाघर, जन्तर मंतर महल, चिंतामन गणेश आदि प्रमुख हैं।


विक्रांत भैरव तंत्र क्रिया के लिए प्रसिद्ध है विक्रांत भैरव कालभैरव मंदिर से कुछ दूरी पर विक्रांत भैरव का मंदिर स्थित है। यह मंदिर तांत्रिकों के लिए बहुत ही विशेष है। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर की गई तंत्र क्रिया कभी असफल नहीं होती। यह मंदिर क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित है। विक्रांत भैरव के समीप ही श्मशान भी है। श्मशान और नदी का किनारा होने से यहां दूर-दूर से तांत्रिक तंत्र सिद्धियां प्राप्त करने आते हैं।




अगहन कृष्ण पक्ष की अष्टमी भैरव जयंती के नाम से जानी जाती है। इस दिन मध्यरात्रि में भैरवजी के जन्म की मान्यता है। महाकाल की नगरी में भैरव पूजन की विशेष मान्यता है। 


पीड़ामुक्ति के लिए की जाती है भैरव-साधना :- 


पंडित “विशाल” दयानंद शास्त्री के अनुसार ( जैसा की डबराल बाबा ने बताया की)शनि, राहु, केतु तथा मंगल ग्रह से जो जातक पीड़ित हैं, उन्हें भैरव की साधना अवश्य ही करनी चाहिए। अगर जन्मपत्रिका में मारकेश ग्रहों के रूप में यदि उक्त चारों ग्रहों में से किसी एक का भी प्रभाव दिखाई देता हो तो भैरव जी का पंचोपचार पूजन जरूर करवाना चाहिए। भैरव के जाप, पठनात्मक एवं हवनात्मक अनुष्ठान मृत्यु तुल्य कष्ट को समाप्त कर देते हैं।


क्या है भैरव का मूल स्थान :- श्मशान तथा उसके आसपास का एकांत जंगल ही भैरव का मूल स्थान है। संपूर्ण भारत में मात्र उज्जैन ही एक ऐसा स्थल है, जहां ओखलेश्वर तथा चक्रतीर्थ श्मशान हैं। अष्ट महाभैरव इन्हीं स्थानों पर विराजमान है।


उज्जैन में विराजित अष्ट भैरव :– 
स्कंद पुराण की मान्यता अनुसार उज्जैन में अष्ट भैरव कई स्थानों पर विराजमान है। 
* भैरवगढ़ में काल भैरव, 
* दंडपाणी भैरव 
* रामघाट पर आनंद भैरव, 
* ओखलेश्वर श्मशान में विक्रांत भैरव, 
* चक्रतीर्थ श्मशान में बम-बटुक भैरव, 
* गढ़कालिका के समीप काला-गौरा भैरव, 
* कालिदास उद्यान में चक्रपाणी भैरव, 
* सिंहपुरी में आताल-पाताल।
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तंत्र क्रिया के लिए प्रसिद्ध है श्री विक्रांत भैरव—–





उज्जैन नगर से पांँच किलोमीटर की दूरी पर प्राचीन बस्ती भैरवगढ़ या भैरूगढ़  में श्री कालभैरव मंदिर के सामने कुछ कदम चलने पर शिप्रा नदी के तट पर स्थित है प्राचीन श्री विक्रांत महाभैरव मंदिर। 
जनश्रुति है कि यह मंदिर तीन-चार सहस्राब्दियों पूर्व एक विशाल भैरव मंदिर था। इसकी प्राचीनता स्वत: सिद्ध है। प्राचीन मन्दिर के भग्रावशेष, कंगूरेदार शिखर, टूटे हुए स्तम्भ व पाषाण पर नक्काशीदार खंडित मूत्तियाँ शिप्रा से प्राप्त हुई हैं जो इसके प्रमाण हैं। कहते हैं यह अतीत में तंत्र साधकों की तपस्थली रहा है। मन्दिर के आसपास विद्यमान अति प्राचीन मूत्तियां स्वयं अपनी कहानी कहती हैं। 


पंडित “विशाल” दयानंद शास्त्री के अनुसार  ( जैसा की डबराल बाबा ने बताया की) स्कन्दपुराण में उल्लेख है कि एक बार पार्वतीजी ने भगवान् शिव से अवन्ती क्षेत्र के प्रमुख देवताओं व तीर्थों का वर्णन करने का निवेदन किया। सनत्कुमारजी के अनुसार तब महादेवजी ने कहा कि यहां शिप्रा सहित मेरी चार प्रिय नदियां हैं। यहाँ चौरासी लिंगों के रूप में उतने ही शिव निवास करते हैं, आठ भैरव रहते हैं, ग्यारह रुद्र, बाहर आदित्य और छ: गणेश हैं तथा चौबीस देवियां हैं। 


महादेवजी ने जिन आठ भैरवों के नाम बताएं वे हैं— 


.. दण्डपाणि, . विक्रांत .. महाभैरव 4. बटुक 5. बालक 6. बन्दी 7. षट्पंचाशतक व 8. अपरकालभैरव। 


आध्यात्मिक पत्रिका कल्याण के सन् 1957 में प्रकाशित तीर्थांक में भी उज्जैन में अष्टमहाभैरव की सूची इस प्रकार दी गई है—दण्डपाणि (देवप्रयाग के पास), विक्रान्ति भैरव (औंखरेश्वर के पास), महाभैरव (सिंहपुरी), क्षेत्रपाल (सिंहपुरी), बटुक भैरव (ब्रह्मपोल), आनन्द भैरव (मल्लिकार्जुन पर), गौर भैरव (गढ़ पर) और कालभैरव (भैरवगढ़)। इससे श्री विक्रांत भैरवजी की प्राचीनता परिपुष्ट होती है। 


विक्रांत का अर्थ है जिनकी अंगकांति तपाये हुए स्वर्ण के समान है और नाम के अनुरूप ही तेजस्विता और आलोक विक्रान्त भैरवजी की सिन्दूरचर्चित मूर्ति पर दर्शनीय है। यह स्थल नीरव, एकांत व प्रकृति की मनोहारी नैसर्गिक छटा से युक्त है। यहां दक्षिणवर्ती भैरव की चैतन्य मूर्ति है, जाग्रत श्मशान भूमि है। शिप्रा पूर्ववाहिनी है, प्राचीन शिव मन्दिर है, सती माता के पूज्य चरण हैं, कृत्याओं और मातृकाओं की खंडित पाषाण प्रतिमाएं हैं। 


ऊँचे  घने वृक्ष हैं और सूर्यास्त के उपरांत अंधकार की चादर से ढंका विस्मयकारी वातावरण। ओखरेश्वर  शमशान भूमि से चमत्कारों की अनेक गाथाएं जुड़ी हुई हैं। स्कन्दपुराण के अनुसार इस भैरवतीर्थ में एक उत्तम स्वभाववाली काली नामक योगिनी रहा करती थी जिसने भैरवजी को अपने पुत्र की भांँति पाला था। वे भैरवजी शिप्रा नदी के उत्तरी तट पर सदा स्थित रहते हैं। इसी पुराण में आगे लिखा है— सुंदर चंद्रमा और सूर्य जिनके नेत्र हैं, जिन्होंने मस्तक पर मुकुट और गले में मोतियों की माला धारण कर रखी है तथा जो मनुष्य मात्र के लिए कल्याणस्वरूप हैं, उन विशालकाय भगवान् भूतनाथ भैरव का है मन, तू भजन कर— 
भज जन शिवरूपम् भैरवं भूतनाथम्।
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भैरवजी की उत्पत्ति व स्वरूप——


पंडित “विशाल” दयानंद शास्त्री के अनुसार  ( जैसा की डबराल बाबा ने बताया की) विक्रांत का अर्थ है जिनकी अंगकांति तपाये हुए स्वर्ण के समान है और नाम के अनुरूप ही तेजस्विता और आलोक विक्रान्त भैरवजी की सिन्दूरचर्चित मूर्ति पर दर्शनीय है। यह स्थल नीरव, एकांत व प्रकृति की मनोहारी नैसर्गिक छटा से युक्त है। यहां दक्षिणवर्ती भैरव की चैतन्य मूर्ति है, जाग्रत श्मशान भूमि है। शिप्रा पूर्ववाहिनी है, प्राचीन शिव मन्दिर है, सती माता के पूज्य चरण हैं, कृत्याओं और मातृकाओं की खंडित पाषाण प्रतिमाएं हैं। ऊँचे घने वृक्ष हैं और सूर्यास्त के उपरांत अंधकार की चादर से ढंका विस्मयकारी वातावरण।


ओखरेश्वर शमशान भूमि से चमत्कारों की अनेक गाथाएं जुड़ी हुई हैं। स्कन्दपुराण के अनुसार इस भैरवतीर्थ में एक उत्तम स्वभाववाली काली नामक योगिनी रहा करती थी जिसने भैरवजी को अपने पुत्र की भांति पाला था। वे भैरवजी शिप्रा नदी के उत्तरी तट पर सदा स्थित रहते हैं। इसी पुराण में आगे लिखा है— सुंदर चंद्रमा और सूर्य जिनके नेत्र हैं, जिन्होंने मस्तक पर मुकुट और गले में मोतियों की माला धारण कर रखी है तथा जो मनुष्य मात्र के लिए कल्याणस्वरूप हैं, उन विशालकाय भगवान् भूतनाथ भैरव का है मन, तू भजन कर— भज जन शिवरूपम् भैरवं भूतनाथम्।

पंडित “विशाल” दयानंद शास्त्री के अनुसार ( जैसा की डबराल बाबा ने बताया की) भगवान् भैरव की उत्पत्ति व उनके स्वरूप की अनेक कथाएं पुराणों में वर्णित हैें। इनमें सबसे प्रसिद्ध है ब्रह्मतत्त्व-ज्ञानहीन ब्रह्माजी के शिवनन्दक पांँचवें मुख को काटने के लिए इनका प्राकट्य। भैरव को महाकाल का पाँंचवा  अवतार माना गया है जिनकी शक्ति भैरवी गिरिजा हैं। कालिकापुराण में भैरव को शिव का पुत्र, शिवपुराण में शिव का अवतार, जबकि शक्ति-संगम-तंत्र के कालीखण्ड के अनुसार आपद नामक महाबली दैत्य के वध हेतु भैरव की उत्पत्ति होना वर्णित है। ब्रह्मवैवर्त्त पुराण के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण ने योगबल से अपने दाहिने नेत्र से प्रज्जवलित अग्निशिखा जैसे आठ महान्  भाग्यशाली भैरव प्रकट  किए। वामनपुराण में भगवान् शंकर और दैत्यराज अंधक के बीच हुए भीषण युद्ध में शंकर के सिर से बही रक्तधारा से भैरव की उत्पत्ति का वृत्तांत है। पुराणों में भैरव को शिव का गण भी कहा गया है। वस्तुत: वेदों के रुद्र ही तंत्र में भैरव माने जाते हैं। मत्स्यपुराण के अनुसार जब शिव भैरव रहते हैं तो गौरी भैरवी होती है। 


शिवमहापुराण इन्हें शंकर का का पूर्ण रूप मानता है: 
भैरव: पूर्णरूपो हि शंकरस्य परात्मन:। मूढ़ास्ते वै न जानन्ति मोहिता: शिवमायया।। 
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भैरव से भय क्यों?

पंडित “विशाल” दयानंद शास्त्री के अनुसार  ( जैसा की डबराल बाबा ने बताया की) भैरव शब्द केवल अपनी शाब्दिक ध्वनि एवं अर्थ मात्र से ही सामान्यजन को भयावह लगता है, जबकि वस्तुत: भैरव कोई भक्त को भयभीत करने वाले देवता नहीं हैं। यद्यपि कुछ प्रतिमाओं में उनका स्वरूप भयंकर प्रतीत होता है किंतु वे भयमोचक देवता हैं। वे परम कृपालु, भक्तभयहारी एवं कलियुग में अल्प सेवा और भक्ति से अति शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं। वे परम योगी भगवान् शिव के अवतार माने गए हैं। शिव आशुतोष हैं अर्थात् शीघ्र प्रसन्न होकर मनोकामना पूर्ण करनेवाले। वे मात्र धतूरे व बिल्व पत्र से प्रसन्न  होकर अभय प्रदान करने वाले देवाधिदेव हैं तब उनके ही अवतार से भय कैसा? कई लोग तो भैरव के भक्तों से भी दूरी बनाये रखते हैं, 


पंडित “विशाल” दयानंद शास्त्री के अनुसार  ( जैसा की डबराल बाबा ने बताया की) यह विधि का विधान है कि इस संसार में सत्कर्मी, सदाचारी, सत्यपथगामी और साधुवृत्तिधारी साधक को जहां ईश्वर की कृपा व आशीर्वाद प्राप्त होता है वहीं यह भी निश्चित है कि दुष्कर्मी, दुराचारी, असत्य के पथ के अनुगामी मनुष्य दण्ड के भागी होते हैं तथा भगवान् शिव का यह भैरवावतार ऐसे ही दुष्टों को दण्डित करने के लिए हुआ है। यदि सृष्टि में दण्ड का विधान नहीं होता तो यह पृथ्वी कभी की रसातल में चली जाती। सत्पुरुषों को साधुवाद तथा दुष्टों को पदाघात देने से ही इस सृष्टि का संतुलन बना हुआ है। इसलिए जब प्रात: स्मरणीय गोस्वामी तुलसीदासजी विनय पत्रिका के ग्यारहवें पद में भगवान् शिव के भैरव रूप का स्तवन करते हुए उन्हें भीषणमूर्त्ति, भयंकर भैरव, भूतप्रेत और गणों के स्वामी और विपत्तियों को हरने वाला कहते हैं तब वे यह संदेश देते हैं कि दुष्टात्माओं को दंडित करने का कार्य भैरव का ही है। निष्कर्षत: आत्मतत्त्व के साधक एवं सत्यन्विेषी जिज्ञासु को भगवान् भैरव से भयग्रस्त होने का कोई कारण नहीं है। भैरव की मूर्त्तियां जहांँ एक ओर गिरि, कन्दराओं, दुर्गम पहाड़ों, पहाड़ियों में स्थापित हैं वहीं उन्हें गांव-खेड़ा में खुले चबूतरों पर भी आसानी से देखा जा सकता है। वे सर्वपूज्य और सर्वत्र पूज्य हैं। वे कुलदेवता माने जाते हैं। इसलिए वे लोकदेवता भी हैं।  


पंडित “विशाल” दयानंद शास्त्री के अनुसार  ( जैसा की डबराल बाबा ने बताया की)  काशी और उज्जयिनी दोनों काल भैरव की नगरियां हैं। उज्जयिनी में तो उन्हें दिन भर वारुणी (मदिरा) का भोग तांत्रिक मंत्रोच्चार के साथ लगाया जाता है।  शिवपुराण में तो यहाँं तक कहा गया है कि प्राणियों के पूर्व जन्मों के सभी पाप कालभैरव (काशी) के दर्शन से निर्मूल हो जाते हैं तथा जो मूर्ख कालभैरव के भक्तों का अनिष्ट करता है, वह दुर्गति को प्राप्त होता है। नन्दिकेश्वर ने सनत्कुमारजी को यह भी बताया कि भगवान् विश्वनाथ (वाराणसी) के जो भक्त कालभैरव की भक्ति नहीं करते, उन्हें महान् दु:ख की प्राप्ति होती है: 
विश्वेश्वरस्य ये भक्ता न भक्ता कालभैरवे।
ते लभते महादु:ख काश्यां चैव विशेषत:।।
उपर्युक्त व्याख्या से यह स्पष्ट हो जाता है कि भैरवदेव सदैव अपने सच्चे भक्तों व श्रद्धालुओं की रक्षा करते हैं। 
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॥ आरती श्री विक्रान्त भैरव जी ॥

विकरांत भैरव मेटो संकट , बिनती म्हारी सुन लो जी |
भोग लगाऊ मदिरा को मै , प्यालो पी लो जी ||


शंकर को तू सेनापति थारो रूप घणो विकराल |
आँख से थांके लपटा निकले , धक् -धक् धू -धू ज्वाल ||
उज्जयिनी को रक्षक है , तू काशी को कोतवाल |
गावे गुण पाताल भैरवी , वीर भद्र बेताल ||
विपतहर , विकरांत भैरव मेटो संकट , बिनती म्हारी सुन लो जी |
भोग लगाऊ मदिरा को मै , प्यालो पी लो जी ||


थारी सवारी शवान की ने ध्वजा गगन लहराय |
फेरो लगावे मरघट को तू शिव – शिव जपतो जाए ||
चाल झपट थारी घुँघरू रून-झुन , रून-झुन , झंन बाजे |
बटुकनाथ खप्परधर थारो रूप निरालो साज़े ||
विपतहर , विकरांत भैरव मेटो संकट , बिनती म्हारी सुन लो जी |
भोग लगाऊ मदिरा को मै , प्यालो पी लो जी ||


धाम है प्यारो विक्रांत भैरव ओखरेश्वर समसान |
मोक्षदायिनी शिप्रा तट पे , सबको करे कल्यान ||
जादू -टोना दूर करे तू पल में मेटे पीर |
थारा दर्शन करन्या से टूटे , दुःख की हर जंजीर ||
विपतहर , विकरांत भैरव मेटो संकट , बिनती म्हारी सुन लो जी |
भोग लगाऊ मदिरा को मै , प्यालो पी लो जी ||




डाकिन -साकिन भूत -प्रेत गण रेवे थारे संग |
भक्त उतारे आरती, थारो सबसे निरालो ढंग ||
थारा द्वारे जो भी आवे मन मै धर बिसवास |
खाली कदी नी जावे कोई , होवे पूरन आस ||
विपतहर , विकरांत भैरव मेटो संकट , बिनती म्हारी सुन लो जी |
भोग लगाऊ मदिरा को मै , प्यालो पी लो जी ||

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