सादर नमन कलाम साहब को...




"विशाल" -


बोलते-बोलते अचानक धड़ाम से
जमीन पर गिरा फिर एक वटवृक्ष 
फिर कभी नहीं उठने के लिए
वृक्ष जो रत्न था ।।
वृक्ष जो शक्तिपुंज था
वृक्ष जो न बोले तो भी
खिलखिलाहट बिखेरता था ।।
चीर देता था हर सन्नाटे का सीना
सियासत से कोसों दूर
अन्वेषण के अनंत नशे में चूर
वृक्ष अब नहीं उठेगा कभी
अंकुरित होंगे उसके सपने
फिर इसी जमीन से
उगलेंगे मिसाइलें
शान्ति के दुश्मनों को
सबक सीखने के लिए
वृक्ष कभी मरते नहीं
अंकुरित होते हैं ।।
नए-नए पल्ल्वों के साथ
वे किसी के अब्दुल होते हैं।।
किसी के कलाम ...
अलविदा .अलविदा ,अलविदा।।

---सादर...नमन...वंदन..श्रुद्धांजलि।।।
Share To:

पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

Post A Comment:

0 comments so far,add yours