जानिए इस वर्ष चैत्र नवरात्रि 2017 पर्व को कब और क्यों मनाये ???



प्रिय पाठकों/मित्रों, आजकल सोशल मीडिया में चैत्र नवरात्रि 2017 पर्व को लेकर बहुत चर्चा हो रही हैं कि इस वर्ष 28 मार्च को मनाएं या 29 मार्च 2017 को।।

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आइये शास्त्रोक्त सत्य जानने का प्रयास करें ---

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की भारतीय सनातन संस्कृति में संवत् यानि नए साल का शुभारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को होता है और इसी दिन हम लोग चैत्र नवरात्री का शुभारंभ भी करते है । संवत् 2074 में 28 मार्च 2017 मंगलवार के दिन नवरात्री में घट स्थापन किया जायेगा । क्योंकि भारतीय सनातन शास्त्रो में से धर्मसिन्धु और निर्णय सिंधु में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया हुआ है कि "नवरात्र आरम्भ प्रतिपदा के दिन किया जाता है अगर सूर्योदय के समय एक मुहूर्त से कम यही लगभग 48 मिन्ट से कम अगर प्रतिपदा हो तो जिस दिन अमावस्या हो उसी दिन घट स्थापना करना शात्रोक्त सही होता है" और 29 मार्च 2017 को प्रतिपदा सवेरे 5 बज कर 45 मिन्ट पर समाप्त हो जायेगी और सूर्योदय 5 बज कर 36 मिन्ट पर होगा तो प्रतिपदा मात्र 9 मिन्ट ही रहेगी इसलिए नवरात्री का आरम्भ 28 मार्च 2017 को ही किया जायेगा । 

अतः आप सभी से मेरा (ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री) विनम्र निवेदन हैं की किसी भी भ्रम में रह कर 28 मार्च 2017 को ही नवरात्रि का आरम्भ करते हुए माँ जगदम्बा की स्थापना करे जो एकदम सही और शास्त्रोक्त है । क्योंकि कई लोग 29 मार्च को करवा रहे है वो एकदम गलत है ।

ऐसे लोगो से बचे और शास्त्रोक्त निर्णय के अनुसार काम करे जिससे आपको लाभ और आशीर्वाद मिले ।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार 28 मार्च 2017 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्ष की शुरूआत होगी। ज्योतिष शास्त्र में इस दिन सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही गुड़ी पूजन का विशेष विधान बताया गया है। सूर्योदय के समय ही सूर्य को अघ्र्य देना चाहिये और फिर नीम मिश्री का सेवन किया जाये। ज्योतिषियों के अनुसार सूर्य को अघ्र्य प्रदान कर बारह नामों से सूर्य नमस्कार करें तथा वेद में दिये गये संवत्सर सूक्त का पाठ करने से श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होती है।

वर्ष 2017 में चैत्र (वासंती) नवरात्र व्रत 28 मार्च से शुरु होकर 5 अप्रैल तक रहेगें। व्रत का संकल्प लेने के बाद, मिट्टी की वेदी बनाकर ‘जौ बौया’ जाता है। इसी वेदी पर घट स्थापित किया जाता है। घट के ऊपर कुल देवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन किया जाता है। इस दिन "दुर्गा सप्तशती" का पाठ किया जाता है। पाठ पूजन के समय दीप अखंड जलता रहना चाहिए|

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की नवरात्री की पहली तिथि पर सभी भक्त अपने घर के मंदिर में कलश स्थापना करते हैं। इस कलश स्थापना की भी अपनी एक पूजा विधि, एक मुहूर्त होता है। कलश स्थापना को घट स्थापना भी कहा जाता है। घट स्थापना का मुहूर्त प्रतिपदा तिथि (28 मार्च ) को प्रात: 08:26 बजे से 10:24 बजे तक है। इस समय के बीच ही घट स्थापना हो सकेगी।

इसी अवसर पर सृष्टि रचियता ब्रह्माजी के साथ ही शिव विष्णु सहित आह्वान पूजन, ध्वज पूजन, कलश पूजन करने से सुख समृद्धि की प्राप्ति होती हे।ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार  इस दिन विक्रम संवत 2074 शुरू होगा तथा इस अवसर पर तीर्थ की पूजन के साथ ही सुबह 6 बजकर 27 मिनट पर सूर्य को अघ्र्य देने का विधान ज्योतिषियों द्वारा बताया गया है।
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28 मार्च: नवरात्र का पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना होती हैं। इस दिन घटस्थापना का मुहूर्त सुबह 8:26 से लेकर 10:24 तक का हैं। पूजा में इन्हें चमेली का फूल अर्पित करना शुभ होता हैं।
29 मार्च : नवरात्र के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इनकी पूजा में भी चमेली का फूल अर्पित करना शुभ माना जाता हैं।
30 मार्च : नवरात्र के तीसरे दिन देवी चन्द्रघंटा की पूजा होती हैं। इन्हें भी चमेली का फूल पसंद हैं।
31 मार्च: नवऱात्र के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे रूप देवी कूष्मांडा की पूजा होती हैं, जिन्हें लाल रंग के फूल पसंद हैं। 
1 अप्रैल:  नवरात्र के पांचवा दिन माता स्कंदमाता की पूजा की जाती है। जिन्हें मां पार्वती के नाम से भी जाना जाता हैं। इन्हें पूजा में लाल रंग के फूल अर्पित करने चाहिए।
2 अप्रैल: चैत्र नवरात्र के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा का होती हैं। जिन्हें लाल रंग के फूल खासकर गुलाब का फूल अर्पित करें। 
3 अप्रैल : सातवें दिन यानि सप्तमी को मां कालरात्रि की पूजा होती हैं। जिन्हें रात की रानी का फूल पसंद हैं। 
4 अप्रैल: नवरात्र के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। इस दिन कई लोग कन्या पूजन भी करते हैं। 
5 अप्रैल: नववरात्र के अंतिम दिन राम नवमीं होती हैंं। पूजा का मुहूर्त सुबह 11: 09 ​से 1: 38 तक का हैं।
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ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री।।
 इंद्रा नगर, उज्जैन (मध्य प्रदेश)



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पंडित "विशाल" दयानन्द शास्त्री

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